
पूर्व प्रधानमंत्री के अंतिम संस्कार के दिन प्रधानमंत्रियों के मामले में न सिर्फ सरकार का दोहरा रवैया सामने आया। पीएम केयर्स और मेड इन इंडिया का सच भी सामने आया है। पर खबर? ढूंढ़ते रह जाओगे !
संजय कुमार सिंह
आज की खबर असल में अखबारों में छपी ही नहीं है। खबर यह है कि कांग्रेस की जोरदार मांग के बावजूद सरकार ने मनमोहन सिंह के अंतिम संस्कार के लिए जमीन नहीं दी। उनका अंतिम संस्कार आम आदमी की तरह निगमबोध घाट पर हुआ (वहां कुछ वीआईपी जगहें भी हैं)। भिन्न अखबारों में यह खबर भिन्न तरह से छपी है। इंडियन एक्सप्रेस ने मूल खबर से अलग, चार कॉलम की एक खबर छापकर बताया है कि सरकार मनमोहन सिंह का स्मारक बनाने के लिए जगह देने की कांग्रेस की मांग मान गई है। अखबार ने शीर्षक में ही बताया है कि यूपीए ने 2013 में इस प्रथा को खत्म कर दिया था। खबर के अनुसार सरकार ने कहा है कि इसके लिए ट्रस्ट बनाना पड़ेगा, उसे भी जगह देनी होगी। दि एशियन एज ने सिंगल कॉलम की खबर से बताया है कि निगम बोध घाट पर अंतिम संस्कार के सरकार के निर्णय से केंद्र सरकार और कांग्रेस आमने सामने है और इंडियन एक्सप्रेस की खबर बिना कहे जो कहती है कि ऐसा कुछ है ही नहीं, ना इसका कारण है। जमीन इतनी आसानी से थोड़े दी जा सकती है अंतिम संस्कार तो वैसे ही होगा जैस और प्रधानमंत्रियों का हुआ है या यूपीएम के रोक लगाने के बाद होना चाहिये आदि आदि। टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक ज्यादा स्पष्ट है, कांग्रेस ने मनमोहन सिंह के लिए स्मारक की मांग की; सरकार ने कहा इसके लिए प्रतिबद्ध हैं। उपशीर्षक में लिखा है, केंद्र ने समय की कमी का उल्लेख किया; कांग्रेस ने इसे अपमान कहा। दिलचस्प है अमर उजाला में प्रणब मुखर्जी की बेटी का रोना। फोटो के साथ दो कॉलम में छपी सात लाइन की खबर का दो लाइन का शीर्षक है, प्रणब मुखर्जी की बेटी शर्मिष्ठा का छलका दर्द…कांग्रेस पर सवाल।
यहां यह बताना जरूरी है कि प्रणब मुखर्जी राष्ट्रपति भले रहे हों पर प्रधानमंत्री नहीं थे और मनमोहन सिंह अकेले प्रधानमंत्री हैं जो रिजर्व बैंक के गवरनर रहे हैं। और तब रहे हैं जब उसपर रहने का मतलब होता था। बाद के गवरनर कौन कैसे बने आप जानते हैं। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, मनमोहन सिंह का अंतिम संस्कार कांग्रेस ने स्मारक थल पर संस्कार की मांग की। इंट्रो है, गृहमंत्रालय ने एक सार्वजनिक श्मशान घाट पर संपूर्ण सैनिक सम्मान के साथ राजकीय अंत्येष्टि की घोषणा की; कांग्रेस ने कहा भारत के पहले सिख प्रधानमंत्री का जानबूझकर अपमान किया गया, जमीन के आवंटन के लिए खरगे ने मोदी और प्रधानमंत्री से बात की थी। नवोदय टाइम्स में कई खबरों के साथ दो कॉलम का एक शीर्षक है, स्मारक के लिए स्थान आवंटित करेगी सरकार, शाह ने खरगे को किया सूचित। द टेलीग्राफ की एक शीर्षक है, “सच्चे मित्र, ‘भ्रष्ट नहीं किये जा सकने वाले प्रधानमंत्री’ के लिए श्रद्धांजलि प्रवाह”। कांग्रेस नेता के मामले में भाजपा सरकार ने जो किया और उसे अखबारों ने जैसे बताया उसे ठीक से समझने के लिए अटल बिहारी वायपेयी का अंतिम संस्कर याद किया जाना चाहिये जो 17 अगस्त 2018 को हुआ था। नवभारत टाइम्स की खबर के अनुसार, जानेमाने कवि, प्रखर वक्ता, सशक्त पत्रकार और जननेता रहे देश के पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी शुक्रवार शाम पंचतत्व में विलीन हो गए। दिल्ली के स्मृति स्थल पर राष्ट्र ने उन्हें नम आंखों से अंतिम विदाई दी। वाजपेयी की दत्तक पुत्री नमिता भट्टाचार्य ने उन्हें मुखाग्नि दी। इस दौरान वहां मौजूद सभी लोग हाथ जोड़े खड़े रहे। सभी की आंखों में आंसू थे। वाजपेयी का अंतिम संस्कार पूरे राजकीय सम्मान के साथ संपन्न किया गया। उनका अंतिम संस्कार निधन के अगले दिन शुक्रवार को किया गया था।
17 अगस्त 2018 की बीबीसी की खबर इस प्रकार है, भारत रत्न और तीन बार देश के प्रधानमंत्री रहे 93 वर्षीय अटल बिहारी वाजपेयी का आज शाम चार बजे अंतिम संस्कार किया जाएगा। वाजपेयी का गुरुवार की शाम 5.05 बजे निधन हो गया। उनके निधन पर सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा की गई। दिल्ली समेत मध्यप्रदेश, उत्तरप्रदेश, राजस्थान, बिहार, झारखंड, पंजाब के सरकारी स्कूलों-कॉलेजों में छुट्टी का एलान किया गया। दूसरी ओर, घटिया राजनीति और पत्रकारिता का उदाहरण है, जनसत्ता डॉट कॉम की आज की खबर, बात सिर्फ मनमोहन सिंह के मेमोरियल की, कांग्रेस को क्यों याद दिलाया गया नरसिम्हा राव का अंतिम संस्कार? कहने की जरूरत नहीं है कि अगर यह कोई मामला हो भी तो कांग्रेस का आंतरिक मामला है, अगर इसमें कुछ गलत है तो इससे दूसरी गलती सही नहीं हो जायेगी। अभी मामला न सिर्फ मनमोहन सिंह के कद का है बल्कि अटल बिहारी वाजपेयी का हाल का उदाहरण है और भाजपा का ही सत्ता में होना है। मुझे लगता है कि भाजपा राजनीतिक कारणों से अगर कुछ गलत, अनैतिक करती है तो मीडिया में उसके समर्थक जरूर निकल आते हैं। जो भी हो, यह यथार्थ है।
इंडियन एक्सप्रेस में आज छपी एक खबर के अनुसार पीएम केयर्स को 2022-23 में 912 करोड़ रुपये मिले हैं। आप जानते हैं कि यह एक समर्पित राष्ट्रीय कोष है जिसे कोविड-19 जैसी भयावह आकस्मिकताओं से निपटने के लिए मार्च 2020 में बनाया गया था। इस कोष का प्राथमिक उद्देश्य आने वाली आपात स्थितियों या संकट की स्थितियों से निपटना है। प्रधानमंत्री के पदनाम से केंद्र सरकार के मंत्रियों को साथ मिलाकर बना यह कोष वैसे तो हर तरह से सरकारी लगता है पर निजी होने का दावा करता है। बाद में इसमें रतन टाटा और सुधा मूर्ति को शामिल कर लिया गया। सुधा मूर्ति को राज्यसभा का सदस्य बना दिया गया और रतन टाटा अब रहे नहीं। इसलिये यह कोष और चाहे जो हो, सामान्य नहीं है। सरकारी या निजी भी नहीं है। कोविड के लिए बना था तो बाद में पैसे लेना (मिलना) ‘खबर’ है। और आज यह खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में पहले पन्ने पर है। कहने की जरूरत नहीं है कि 912 करोड़ रुपये की यह खबर कुछ करोड़ रुपयों की कई खबरों से छोटी, हल्की या कम महत्वपूर्ण हैं जबकि हजारों करोड़ रुपये की कई खबरों के मुकाबले बहुत छोटी है। इसलिए खबर भी अपनी तरह की अकेली है।
इस खबर के अनुसार, यह सार्वजनिक तौर पर उपलब्ध सूचना के आधार पर है और ब्याज से इसकी कमाई 170.38 करोड़ रुपये है। इसमें विदेशी चंदा और उसका ब्याज भी शामिल है लेकिन कोई मीडिया संस्थान चलाने के लिए विदेशी मदद ले तो उसे कैसे परेशान किया जाता है वह आप देख चुके हैं। जनसेवा करने के लिए विदेशी दान लेना आम भारतीयों के लिये इतना मुश्किल बना दिया गया है कि कई गैर सरकारी संगठन काम नहीं कर पा रहे हैं। खबर में यह भी बताया गया है कि कोष की इस साल की कमाई में 225 करोड़ का रिफंड भी है। इनमें 202 करोड़ रुपये ‘मेड इन इंडिया’ वेंटीलेटर के हैं जो केंद्र, राज्य और केंद्र शासित प्रदेश द्वारा संचालित अस्पतालों के लिए थे। आपको याद होगा कि कोविड महामारी फैलने के बाद यह पता चला था कि वेंटीलेटर की जरूरत होगी। सरकार ने अपनी तरफ से देश के नागरिकों और जरूरतों के लिए कितने वेंटीलेटर खरीदे वह तो अलग बात है, मेड इन इंडिया वेंटीलेटर की बात चली, 50,000 वेंटीलेटर खरीदे गये और वे किसी काम के नहीं निकले।
यह न सिर्फ ‘मेड इन इंडिया‘ के प्रचार का सच है मौके पर चौका, माफ कीजियेगा ठगी, लूटने और लुट जाने का भी उदाहरण है। इसमें किसी को सजा दिये जाने, किसी के खिलाफ कार्रवाई की कोई खबर नहीं है आज इस खबर से यह बताया गया है कि दान के वे पैसे ‘मेड इन इंडिया’ के नाम पर नकली माल पकड़ाने और सप्लाई करने वालों को लुटाये नहीं गये हैं। यह मुद्दा ही नहीं है कि नकली माल के लिये भुगतान हुआ और वापस लेना पड़ा। इससे कुछ लोगों की जान गई होगी, मकसद पूरा नहीं हुआ और पीएम केयर्स के साथ सरकार की छवि भी खराब हुई पर वह सब मुद्दा नहीं है। मैं यहां नकली वेंटीलेटर का ऑर्डर दिये जाने और उसके लिए 202 करोड़ रुपये अदा कर दिये जाने और उसे पैसे को वापस मिल जाने की ‘खबर’ से जुड़ा सच बताना चाहता हूं। बहुत सारे लोगों को इसमें कुछ गलत नहीं लगेगा और मेरा मकसद उन गलतियों की चर्चा करना भी नहीं है। मैं सिर्फ यह बताना चाहता हूं कि आप सक्षम हों तो कैसे अपने कृपापात्रों की कमाई करा सकते हैं। कई बार यह सब जानते समझते होता है कई बार पूरी कृपा होती है लेकिन ना खाउंगा ना खाने दूंगा में नहीं होनी चाहिये और अगर यही सब करना था तो बोलने की कोई जरूरत नहीं थी।
मेरे एक परिचित के घर में शादी थी, वे शादी का जेवर खरीदने दिल्ली आये थे और उन्हें पुराने जेवर देकर नये जेवर खरीदने थे। दुकानदार ने काफी सारे जेवरों को लेने से मना कर दिया और जहां तक मैं समझ पाया वे किसी खास दुकानदार से खरीदे गये थे। दिल्ली के दुकानदार ने जो कहा वह संक्षेप में यही कि सोना नकली (मिलावटी) था और उसका वह भाव नहीं मिलेगा। जिनकी संपत्ति थी उन्हें इसकी जरा चिन्ता नहीं हुई। बाद में उन्होंने कहा कि जिससे खरीदा है वह परिचित है और उसने कहा है कि अगर कोई न ले तो वो वापस ले लेगा। मैं खेल समझ गया। आप भी समझ गये होंगे। उसने 10 हजार का मिलावटी सोना एक लाख रुपये में मेरे परिचित को टिका दिया था और जब पोल खुल गई तो वह अपनी चोरी स्वीकार करने की बजाय पूरे पैसे देकर झेंप मिटा रहा था क्योंकि ‘परिचित’ था। इस बीच, उसने और कुछ नहीं तो 90 हजार रुपये का ब्याज खाया ही। यह सुविधा सबको नहीं मिलती है और यह भी मिलने लगे तो लोगों की गरीबी दूर हो जाये। ऐसे में सोने की बजाय जीवन रक्षक मशीनें खरीदी गईं और काम नहीं आईं, कोई हर्जाना नहीं लिया गया क्योंकि पैसा ही अपना नहीं था, मकसद सेवा थी ही नहीं, वेंटीलेटर बनाने वाले का भला करना था हो गया। इससे इनकार किया जा सकता है पर इनकार तो अरविन्द केजरीवाल भी करते रहते हैं। मनीष सिसोदिया ने भी किया ही था। पर जमानत देने में सुप्रीम कोर्ट ने नानी याद दिला दी यहां तो अपराध होने जैसा ही कुछ नहीं है।
भक्त गण भले समझते हों कि यह चंदे का पैसा है और उनके प्रधानसेवक इसका उपयोग या दुरुपयोग कर सकते हैं – विरोधियों को चुप रहना चाहिये। पर सच्चाई यह है कि पीएम केयर्स में दान आयकर कानून की धारा 80 जी के तहत 100 प्रतिशत छूट की हकदार है। यानी यहां दान देने वालों में से बहुतों ने आयकर में छूट ली है और आयकर में छूट के कारण यह पैसा सरकारी हो जाता है। यह ऐसी सुविधा है जिससे कोई भी आयकर दाता खुशी-खुशी दान देने के लिए तैयार रहेगा लेकिन यह सुविधा सबों को नहीं मिलती है और निजी संस्थाओं के लिए मुश्किल भी है। निजी संस्थाओं की बात करें तो उसका नाम भी पीएम केयर्स नहीं हो सकता है और सरकारी कार्यालय से तो कोई क्या चला पायेगा। हालांकि चल रहा है तो ओएनजीसी ने 100 करोड़ रुपये दिये थे। मैंने पहले भी कई बार लिखा है कि अगर किसी के पास एक करोड़ रुपये हों और वह उसे सरकारी बैंक में सबसे कम ब्याज दर पर भी रखे तो 50,000 रुपये महीने मिलेंगे और कहने की जरूरत नहीं है कि देश के कई शहरों में मध्यमवर्गीय जीवन जीने के लिए यह पर्याप्त है। लेकिन कांग्रेस को भ्रष्टाचारी कहकर सत्ता में आये प्रधानसेवक और चौकीदार ने जो किया है उसमें अदाणी के 20,000 करोड़ रुपये की जांच की जरूरत नहीं समझी गई और कथित शेल कंपनियों का निवेश रोकने के लिए लाखों शेल कंपनियां बंद कराई गई हैं। यही हाल गैर सरकारी संगठनों का है, कई छोटे बंद करा दिये गये और हजारों करोड़ का पीएम केयर्स न सिर्फ खोला गया, कोविड के बाद भी चल रहा है, धन प्राप्त कर रहा है और खबर सिर्फ इंडियन एक्सप्रेस में।
इंडियन एक्सप्रेस में आज ही एक और दिलचस्प खबर है, शिमला में तैनात ईडी अफसर के खिलाफ सीबीआई लगी है और ईडी विपक्ष के नेताओं के खिलाफ। जहां तक सरकारी अधिकारियों के काम की बात है नशे की खेप टन में आये तो कार्रवाई की खबर नहीं लगती और कुछ ग्राम के लिए शाहरुख खाने के बेटे को न सिर्फ गिरफ्तार किया गया उसे लंबे समय तक जमानत नहीं मिली और सबने कहा कि जमानत नहीं मिलना ज्यादा चौकाने वाली बात थी। जहां तक गिरफ्तारी की बात है संबंधित अधिकारी पर 25 करोड़ रुपये की वसूली की कोशिश का आरोप सीबीआई का ही रहा है और अगर आर्यन को जमानत नहीं मिली तो निश्चित रूप से इसका संबंध इस वूसूली की कोशिश से हो सकता है क्योंकि जैसा तब कहा गया था, पहली ही तारीख पर जमानत मिल जानी चाहिये थी और अगर मिल जाती तो वसूली की कोशिश का मामला टिकता ही नहीं। यह अलग बात है कि शाहरुख खान के बेटे आर्यन खान को गिरफ्तार करने के बाद उनसे जबरन वसूली की कोशिश करने के आरोपी अधिकारी समीर वानखेड़े ने अपने बचाव में बॉलीवुड सुपरस्टार के साथ अपनी चैट पेश की। मुंबई में नारकोटिक्स कंट्रोल ब्यूरो के पूर्व जोनल निदेशक समीर वानखेड़े ने बॉम्बे हाईकोर्ट में कथित चैट के स्क्रीनशॉट पेश किए, जिसमें शाहरुख खान उनसे आर्यन खान को रिहा करने की भीख मांगते हुए दिखाई दे रहे हैं क्योंकि “वह एक इंसान के रूप में टूट जाएगा”।
आर्यन खान को 3 अक्टूबर, 2021 को एक क्रूज शिप पर एक पार्टी में ड्रग्स विरोधी छापेमारी के बाद गिरफ्तार किया गया था। लगभग एक महीने बाद उन्हें रिहा कर दिया गया। नशे के आरोप में गलत गिरफ्तारी और पिता से वसूली की कोशिश (अपराधियों द्वारा अपहरण और वसूली की कोशिश अलग मामला और समस्या है) में एक युवा टूट जायेगा – यह किसी को समझ में आयेगा पर जो चल रहा है और इस आरोप के बाद भी कुछ नहीं हुआ, महाराष्ट्र में फिर भाजपा जीत गई – बहुत कुछ कहता है और यह भी कि सरकार भाजपा की हो तो वह हारती नहीं है। सरकार नहीं हो तो जीतती नहीं है (आमतौर पर) यह झारखंड में साबित हुआ है। हालांकि उसे अलग रंग देने के लिए कहा जा चुका है कि महाराष्ट्र में भाजपा जीती तो ईवीएम खराब और झारखंड में इंडिया गठबंधन जीता तो ठीक – पर मामला जो है वह सबको समझ में आ रहा है अब तो साफ दिख रहा है। ऐसे में कुछ ईनामी जजों की मदद से पीएमएलए जैसे कानून है जो नेताओं और मंत्रियों को जेल में रखने में मदद कर रहे हैं पर यह सोचने वाला कोई नजर नहीं आ रहा है कि आर्यन खान क्या करेगा और कहां रहना पसंद करेगा।
जहां तक अखबारों के पहले पन्ने पर छपने वाली खबरों की बात है, आज कई अखबारों में पाकिस्तानी आतंकी और हाफिज सईद के रिश्तेदार मक्की के निधन की खबर तीन कॉलम में छपी है (इंडियन एक्सप्रेस में नीचे और हिन्दुस्तान टाइम्स में ऊपर)। टाइम्स ऑफ इंडिया में सिंगल कॉलम की खबर देखकर याद आया कि 2008 के मुंबई हमलों के बाद अंतरराष्ट्रीय आतंकी घोषित मक्की की बीमारी से अस्पताल में मौत अगर तीन कॉलम की खबर होगी तो मुठभेड़ में या वैसे मारे जाने की खबर कहां छपती और कितनी बड़ी खबर हो जाती?


