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आज के अखबार : जनगणना पर नई खबर प्लांट करने और एलएसी पर गश्ती के फॉलोअप का सिलसिला

संजय कुमार सिंह

आज के अखबारों में सूत्रों के हवाले से एक नई खबर है, जनगणना अगले साल हो सकती है। एक सूत्र ने अखबारों को यह जानकारी दी है और लगभग सभी अखबारों में लीड या सेकेंड लीड है। उस पर आने से पहले बता दूं कि यह खबर कितनी महत्वपूर्ण या खोजी है। आप जानते हैं कि जनगणना हर 10 साल पर होती आई है और इस हिसाब से 2021 में हो जानी चाहिये थी। कोविड के कारण मोदी सरकार ने इस काम को अनिश्चितकाल के लिए टाल दिया था। चार साल गुजर चुके हैं। सरकार अपने जरूरी काम छोड़कर चुनाव लड़ने और जीतने में लगी रहती है – का यह एक बड़ा और गंभीर उदाहरण है। सरकार जब विमान उड़ाने की धमकी देने वालों को इतने दिन में नहीं रोक पाई है, डिजिटल अरेस्ट से 120 करोड़ रुपए लूट लिये जाने के बाद प्रधानमंत्री ने अब लोगों को सतर्क किया है, यह नहीं बताया कि इस मामले में क्या कार्रवाई हुई है और निजी क्षेत्र में विमान बनाने की कंपनी के उद्घाटन का प्रचार आज है ही तो सरकारी काम करने की घोषणा चुनाव के समय अनुकूल स्थिति बनाएगी। उसके लिए कुछ औपचारिकताएं जरूरी होंगी और उसके बिना खबर छपवाने का आसान तरीका है, लीक या प्लांट करना। हमारे समय में रिपोर्टर बाईलान के लालच में या फिर सोर्स बनाने की कोशिश में इस तरह की खबरें प्लांट करते थे। डेस्क पर हमलोग समझते थे लेकिन खबर और रिपोर्ट से संबंध के आधार पर उसे स्थान मिलता था।

इस लिहाज से यह लीक या प्लांट बिल्कुल बेदम है क्योंकि जनगणना के साथ जातिवार जनगणना होगी कि नहीं – यह महत्वपूर्ण सवाल है। यह एक राजनीतिक मुद्दा है और सरकार की भविष्य की राजनीति का पता चलेगा। इसका असर चुनाव जीतने हारने पर भी पड़ सकता है। इसलिए यह खबर तब महत्वपूर्ण होती जब कम से कम यह बताया जाता कि जातिवार जनगणना होगी कि नहीं। सूत्रों के हवाले से होगी या नहीं होगी छपवाकर प्रतिक्रिया भी जानी जा सकती थी लेकिन वह भी नहीं हुआ है और इस लिहाज से यह खबर नहीं है। ऐसे में मुझे लगता है कि सरकार खबरें पहले की ही तरह प्लांट कर रही है और उसमें भी कुछ नहीं है फिर भी लगभग सभी अखबारों में पहले पन्ने पर छप गई है। अकेले द टेलीग्राफ ने शीर्षक में ही बता दिया है कि अभी भी कुछ तय नहीं है और यही इसकी लीड है। यह समझदारी वाली पत्रकारिता है और इसके लिए बहुत काबिल संपादकीय टीम की जरूरत नहीं है। रिपोर्टर काडर का न हो तो ऐसी खबरें ऐसे ही लिखी जाएंगी। हालांकि कई बार खबर देने वाला ऐसे देता है जैसे उसी को दे रहा हो तब रिपोर्टर के गच्चा खाने की संभावना रहती है और उस दशा में डेस्क पर काम के लोग हों तो खबर ऐसे नहीं छपती। यह हास्यास्पद है कि प्रचार की खबर पर बाईलाइन दी जा रही है। हालांकि यही हाल रहा तो कुछ दिन बाद बाईलाइन का अर्थ ही बदल जायेगा।  

द टेलीग्राफ का फ्लैग शीर्षक है, चार साल की देरी के बाद ओबीसी की गणना का इंतजार कीजिये। मुख्य शीर्षक है, जनगणना के संकेत, जाति पर दुविधा। दूसरी ओर, इंडियन एक्सप्रेस में शीर्षक कुछ ज्यादा ही आशावादी है। खबर टॉप पर तो है ही, शीर्षक है – जनगणना अगले साल और तब परिसीमन : 2029 चुनाव की योजना नई सीटों पर बनाइये। दि एशियन एज में यह वार्षिक कार्यक्रम लगता है और सेकेंड लीड है। शीर्षक है, जनगणना 2025 में शुरू होने की उम्मीद, 2026 तक पूर्ण होने की उम्मीद। उपशीर्षक में चार बुलेट प्वाइंट हैं। जातिवार जनगणना पर स्पष्टता नहीं, कांग्रेस सर्वदलीय बैठक के पक्ष में, एनपीआर अद्यतन किया जायेगा क्या इसके बाद परिसीमन होगा? इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर की तरह है। हिन्दुस्तान टाइम्स के शीर्षक से इस खबर को लीड बनाने का कारण तो समझ में आता है लेकिन सूत्रों की खबर है – इसका पता नहीं चलता है। शीर्षक है, वर्षों की देरी के बाद जनगणना की प्रक्रिया 2025 में शुरू की जायेगी।

टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। यहां सूत्रों की एक और खबर सेकेंड लीड है। इसके अनुसार, चीन सीमा पर लद्दाख की दो जगहों से सेना का डिसएंगेजमेंट (ना कोई घुसा था ना घुसा हुआ है के बावजूद) लगभग पूरा हो चुका है। मोटे तौर पर यह अमर उजाला की कल वाली खबर है जो अंग्रेजी अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं छपी थी और इतवार को टाइम्स के रिपोर्टर ने नहीं लिखी होगी। कल दी तो पहले की खबर के फॉलोअप के लिहाज से महत्वपूर्ण है ही। हालांकि, कल की खबर विदेशमंत्री के हवाले से थी। आज यह खबर सूत्रों के हवाले से है और बताया गया है कि सूत्र ने सोमवार की रात दी। इससे साफ है कि सरकार ने जिसे खबर छपवाने या प्लांट करने की जिम्मेदारी दी है वह पूरी तरह मुस्तैद है और अपना काम ठीक से कर रहा है। दूसरे शब्दों में सरकार अपने प्रचार का काम ही ठीक से कर रही है, विमान उड़ाने की धमकी तक नहीं रोक पा रही है। उसपर आगे। द हिन्दू में लीड तो निजी क्षेत्र की विमान बनाने वाली कंपनी के उद्घाटन की खबर ही है पर शीर्षक अंतरराष्ट्रीय और गरिष्ठ है। असल में इसके ज्यादातर पाठक यूपीएससी के छात्र होते हैं तो संभव है उनके लिए बताया गया हो कि भारत और स्पेन ने लेबनान में संयुक्त राष्ट्र की सेना पर हमलों की निन्दा की। कहने की जरूरत नहीं है कि यह शीर्षक इस उद्घाटन से भाजपा या सरकार को जो प्रचार पाना है उसके अनुकूल नहीं है। भले असल में शीर्षक यही होना चाहिये था।

जनगणना वाली खबर अमर उजाला में दूसरे पहले पन्ने पर सात कॉलम में टॉप पर है। मुख्य शीर्षक है, इंतजार खत्म…. जनगणना अगले साल, संप्रदायों का आंकड़ा भी जुटाएगी सरकार। उपशीर्षक तीन बुलेट प्वाइंट हैं – जाति गणना पर अभी तक नहीं लिया गया अंतिम फैसला, 2028 में पूरा होगा परिसीमन 2) पहली बार डिजिटल तरीके का इस्तेमाल और 3) कोरोना के कारण 2021 में नहीं हुई थी जनगणना। इसमें हाईलाइट की हुई एक सूचना यह भी है कि सरकार परिसीमन की कवायद 2028 तक पूरी कर लेना चाहती है, क्योंकि इसके बाद ही अगले लोकसभा में चुनाव में सीटों की संख्या 33 फीसदी बढ़ाकर महिला आरक्षण का लाभ दिया जा सकेगा। आप जानते हैं कि नौकरी में महिलाओं के लिए आरक्षण नहीं है, जातिवार आरक्षण का क्या हाल है पर जनप्रतनिधियों के मामले में आरक्षण के कारण पार्षद पति और सरपंच पति की सक्रियता और कारनामे हम जानते हैं। ऐसे में महिला आरक्षण कितना लाभदायक होगा या भविष्य में सांसद पति का उदय होगा इसपर कोई चर्चा या चिन्ता मीडिया में नहीं है। इसपर तभी बात होनी चाहिये थी जब आरक्षण की घोषणा की गई थी।

सरकार और उसके काम और प्रचार के प्रति ज्यादातर अखबारों का रुख अनुकूल और समर्थन वाला ही है। दूसरी ओर सरकार अपने काम में फिसड्डी, ढीली-ढाली और लेट-लतीफ है। जनगणना में देरी इसका उदाहरण है। इसलिए, सरकार के काम नहीं हो रहे हैं या इससे जनता को परेशानी है, ऐसी खबरें बहुत कम छपती हैं। उदाहरण के लिए आज हिन्दुस्तान टाइम्स में सिंगल कॉलम की एक खबर है, सरकार ने ब्यूरो ऑफ सिविल एविएशन एंड सिक्यूरिटी (बीसीएएस) के नए प्रमुख का चुनाव अभी नहीं किया है जबकि मौजूदा डीजी 31 अक्तूबर को रिटायर होने वाले हैं। ऐसे मामलों में मौजूदा डीजी को ही सेवा विस्तार देना सबसे आसान होता है। कई मामलों में सरकार ऐसा करती रही है लेकिन इस मामले में न तो घोषणा हुई है और ना खबर है। पहले सूत्र ऐसी खबर देते थे। अब सूत्रों की खबरों की गुणवत्ता बदल गई है। बीसीएएस के डीजी की नियुक्ति महत्वपूर्ण है क्योंकि इस समय विमानों को उड़ाने की जो धमकियां मिल रही हैं उसमें बीसीएएस की भूमिका महत्वपूर्ण है। आप जानते हैं कि यह समस्या महीने भर से चल रही है और सरकार को बहुत पहले से पता होगा कि मौजूदा डीजी 31 अक्तूबर को रिटायर हो जायेंगे। पर सरकार की अपनी प्राथमिकता है। इसमें कुछ खास नहीं है। खास यह है कि अखबारों की इसमें रुचि नहीं है। नवोदय टाइम्स की खबर के अनुसार सोमवार को 60 से अधिक विमानों में बम रखे होने की धमकी मिली। 15 दिन में यह संख्या 410 से अधिक है।

धमकी से याद आया, मामला विमानन कंपनियों को सोशल मीडिया के जरिये धमकी देने तक ही सीमित नहीं है। अब सांसद पप्पू यादव को फोन पर धमकी दिये जाने की खबर है। आज यह अखबारों में छपी भी है। धमकी जेल में बंद अपराधी, लॉरेंस विश्नोई के गैंग की तरफ से दी गई है। आगे जो होगा सो तो होगा पर सरकार कहां है, कानून-व्यवस्था की स्थिति क्या है? ना घुसपैठ रुक रही है ना धमकियां। घुसपैठ के लिए तो ममता सरकार जिम्मेदार हो सकती हैं पर विमान में बम होने की धमकी देने वालों की पहचान हुई? अगर वे सोशल मीडिया के जरिये धमकी दे रहे हैं तो भी इतने समय में नहीं पकड़े जाने का क्या कारण समझा जाये। और फिर लॉरेंस बिश्नोई जो जेल में है की ओर से धमकी आने और हाल में मुंबई में हत्या के मामले में उसका नाम आने के बाद पुलिस क्या कुछ कर पाई है? बुलडोजर न्याय, पुलिस हिरासत में मौत और मुठभेड़ में अपराधियों के मारे जाने के बावजूद जेल में बंद अपराधी के निडर होने का कुछ कारण तो होगा? टाइम्स ऑफ इंडिया की एक खबर के अनुसार दिल्ली में सक्रिय माफिया समूहों में एक और या तीसरा बमबिहा सिंडिकेट भी सक्रिय लग रहा है। अखबार अपने पाठकों को यह सब भी समझाने-बताने की कोशिश नहीं करते। ऐसी खबरों के बीच आज द हिन्दू की सेकेंड लीड महाराष्ट्र में भिन्न दलों के सीट साझा करने में हो रही बाधाओं की खबर है। लेकिन दिल्ली में वायु प्रदूषण और दीवाली पर उसके बढ़ जाने के अनुभव और सूचना के बीच दिल्ली के पर्यावरण मंत्री ने दिल्ली के उपराज्यपाल से कहा है कि दिल्ली में पटाखों की बिक्री के खिलाफ कार्रवाई करें – यह खबर द हिन्दू में पहले पन्ने पर आठ लाइन में है। अपने अखबार में आप ढूंढ़िये।

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