
यह खबर पक्ष और विपक्ष का स्तर तो बताती ही है, पत्रकारिता की मजबूरियां भी स्पष्ट करती है। ऐसी खबर अगर लीड बनानी पड़े तो निश्चित रूप से स्थिति सामान्य नहीं है बाकी अखबारों में तो नहीं ही है। यह बोफर्स कांड का खुलासा करने वाला द हिन्दू है। इसकी लीड और शीर्षक पर एस गुरुमूर्ति ने टिप्पणी की थी। संयोग से नाम भी द हिन्दू है।
संजय कुमार सिंह
आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक जितना बेमतलब और निराधार है उतनी ही बड़ी जगह में छपा है। छह कॉलम की इस लीड का शीर्षक है, घुसपैठियों को मतदाता बनाए रखने के लिए एसआईआर का मुद्दा उठा रहा विपक्ष : (अमित) शाह। कहने की जरूरत नहीं है कि यह पूरी तरह बकवास है और एसआईआर की गड़बड़ियों पर सुप्रीम कोर्ट में ढेरों तथ्य रखे गए हैं। भले उनपर कोई फैसला नहीं हुआ हो या इसके बावजूद जारी हो। अभी मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि कल संसद में एसआईआर पर चर्चा नहीं थी, चर्चा चुनाव सुधार पर थी और देश के गृहमंत्री अमित शाह ने वोट चोरी को नेहरू, इंदिरा, सोनिया से जोड़ दिया। कहा, कांग्रेस नेतृत्व के कारण हारी, ईवीएम के कारण नहीं। यह इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है जबकि राहुल गांधी ने कहा है कि अमित शाह ने डिजिटल, मशीन से पढ़ने योग्य पारदर्शी मतदाता सूची मुहैया कराने पर कुछ नहीं कहा। इस पर भी कुछ नहीं कहा कि भाजपा नेता कई राज्यों की मतदाता सूची में हैं और वोट भी डालते हैं। द हिन्दू में हाईलाइट की गई राहुल गांधी की बातों में यह भी है कि चुनाव आयुक्तों के चयन की प्रक्रिया से मुख्य न्यायाधीश को अलग कर दिए जाने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं है। चुनाव आयुक्त को कानूनी सुरक्षा दिए जाने पर बेमतलब की प्रतिक्रिया थी जबकि सीसीटीवी फुटेज नहीं देने के लिए जो बहाना गढ़ा गया है वह विचित्र है। इन सबके बावजूद देश के गृहमंत्री ने किसी विषय पर चर्चा के दौरान संसद में अगर कुछ कहा है तो वह निश्चित रूप से खबर है लेकिन उसे कई तरह से पेश किया जा सकता है। आज अमर उजाला और द हिन्दू के तरीके रेखांकित करने लायक हैं।
हिन्दू में अमित शाह का कहा तो छपा ही है और उसे उतना ही महत्व दिया गया है जितना उनके कहे पर राहुल गांधी की प्रतिक्रिया को। लेकिन जर्नलिज्म ऑफ करेज की टैगलाइन वाले इंडियन एक्सप्रेस ने राहुल गांधी की इस प्रतिक्रिया को पहले पन्ने पर जगह नहीं दी है। यह अलग बात है कि वहां राहुल गांधी और अन्य विषयों पर गंभीर व दिलचस्प खबरें हैं। इनमें एक, सीआईसी के चुनाव के लिए मोदी, शाह के साथ बैठक में राहुल ने अपना विरोध दर्ज कराया हिन्दुस्तान टाइम्स में टॉप पर सिंगल कॉलम में है जबकि इंडियन एक्सप्रेस में यह राहुल गांधी की फोटो के साथ दो कॉलम में है। हिन्दुस्तान टाइम्स में चुनाव सुधार पर चर्चा की खबर सेकेंड लीड है। शीर्षक है, “पता लगाएं (मतदाता सूची से हटाएं) और वापस भेजें” : अमित शाह ने लोकसभा में एसआईआर का बचाव किया। कहने की जरूरत नहीं है कि देश के गृहमंत्री ने कहा है तो खबर है और जो कहा है उसी के हिसाब से प्रमुखता मिलेगी। लेकिन बिहार में एसआईआर के दौरान कितने घुसपैठियों का पता लगा (मतदाता सूची से हटाए गए) और वापस भेजे गए? यह नहीं बताया गया है और बिहार की तथाकथित शुद्ध मतदाता सूची क्या बिल्कुल शुद्ध है, उसमें कोई गलती नहीं है? जाहिर है, अभी तक ऐसा कोई दावा नहीं किया गया है और इसके बावजूद देश भर में एसआईआर चल रहा है जबकि सार्वजनिक तौर पर कहा जा चुका है कि कानून में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है। वैसे भी मतदाता सूची की जिन खामियों को राहुल गांधी ने उजागर किया है उससे साफ है कि चुनाव आयोग मतदाता सूची बनाने में अक्षम और अयोग्य है या फिर वही कर रहा है जो सरकार चाहती है। जाहिर है कि इन तथ्यों के आलोक में खबर ऐसी होनी चाहिए थी जिससे पाठकों को जानकारी मिले, उनकी शंका दूर हो और सरकार का पक्ष स्पष्ट हो। खबर के नाम पर हवा-हवाई बयान हो कि नेहरू जी पहले वोट चोर थे तो कोई भी कहेगा कि इससे भाजपा को वोट चोरी का हक नहीं मिल जाता है। न ही संसद में असत्य बोलना सही हो सकता है। द हिन्दू ने शीर्षक और उपशीर्षक में तो अमित शाह की बातों को रखा है लेकिन उपशीर्षक के आखिर में लिखा है, राहुल ने कहा कि भाजपा नेता बचाव की मुद्रा में थे। मुझे लगता है कि राहुल गांधी ने जो कहा उसे यहां बताकर अगर इरादतन गुड़ गोबर नहीं किया गया हो तो भी यह स्वतंत्र और संतुलित पत्रकारिता की कोशिश है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी ईवीएम को क्लीन चिट देने वाले अमित शाह के बयान को शीर्षक बनाया है। उन्होंने कहा है, चुनाव में हार के पीछे ईवीएम नहीं, कांग्रेस आलाकमान है। दि एशियन एज का शीर्षक है, घुसपैठियों को वोट नहीं देने देंगे : अमित शाह ने एसआईआर का बचाव किया, विपक्ष पर आरोप लगाए। अखबार ने अमित शाह के कहे को ही हाईलाइट किया है। तीन फ्लैग शीर्षक में एक राहुल गांधी का है, अमित शाह को चर्चा के लिए चुनौती। पर अमित शाह की इस बात को बोल्ड में लिखा गया है, केंद्रीय गृहमंत्री ने विपक्ष के नेता राहुल गांधी के वोट चोरी के दावे का मुकाबला करने के लिए पूर्व प्रधानमंत्री जवाहर लाल नेहरू और इंदिरा गांधी तथा कांग्रेस नेता सोनिया गांधी पर यही आरोप लगाए। कहने की जरूरत नहीं है कि इस आरोप में कितनी सत्यता है और अगर है तो अब क्या किया जा सकता है और अपने ऊपर आरोप लगने पर इसे बचाव में लगाया जाना कितना महत्वपूर्ण है कि कोई अखबार प्रमुखता दे और यह नहीं बताए कि राहुल गांधी ने कहा कि अमित शाह बचाव की मुद्रा में हैं। अपनी तीन प्रेस कांफ्रेंस पर चर्चा करने की चुनौती राहुल गांधी को दी। यह सब पत्रकारिता की चिन्ता और शोध का विषय हो सकता है। द टेलीग्राफ ने इस विषय को पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में रखा है। शीर्षक है, अमित शाह ने विपक्ष के वोट चोरी अभियान की आलोचना की। हिन्दी अखबारों में नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, “ईवीएम नहीं, जनता जिताती है : शाह”। इसे समझने के लिए मेरी किताब है, मैंने कल भी यहां लिखा था – ईवीएम वाशिंग मशीन में धुली। राहुल गांधी ने भाजपा सरकार पर वोट चोरी के साथ सभी संवैधानिक संस्थाओं पर कब्जे का आरोप लगाया है। यह भी कहा है कि एक संगठन के सदस्यों को अयोग्य होने पर भी विश्वविद्यालयों का कुलपति बनाया जा रहा है। इसपर अमित शाह ने कहा है, क्या इस देश में ऐसा कोई कानून है जो आरएसएस के कार्यकर्ताओं को पद पर रहने से रोकता है (टाइम्स ऑफ इंडिया)।
तथ्य यह है कि इस देश में आरएसएस पर तीन बार प्रतिबंध लग चुका है। अब भाजपा और आरएसएस के लोग सत्ता पर स्थायी कब्जा बनाए रखने की कोशिश में लगते हैं और राहुल गांधी ने यही आरोप लगाया है। लेकिन इसमें जो मूल तथ्य है उसका जवाब नहीं दिया गया है। राहुल गांधी के आरोप “लोकतंत्र की स्वतंत्रता”, संवैधानिक संस्थाओं का रक्षक रूप से गिरते हुए नियंत्रण और चुनावी निष्पक्षता पर प्रश्न उठाते हैं — ये मुद्दे संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों से सीधे जुड़े हैं। अगर किसी भी संवैधानिक संस्था में राजनीतिक पक्षपात, चयन प्रक्रिया में कमी या वास्तविक स्वतंत्रता प्रभावित हो रही है तो यह जाँच का विषय होना चाहिए। इसमें भ्रष्टाचार और पक्षपात शामिल हो सकता है। इसका जवाब यह नहीं है कि आरएसएस पर प्रतिबंध का नहीं है, विशेषाधिकार का है। राहुल गांधी लोकतंत्र की “स्वतंत्रता और पारदर्शिता” के पक्ष में बड़े सवाल उठा रहे हैं और अमित शाह इसे वैधानिकता, जनादेश और राजनीतिक वैचारिकता के तहत खारिज/पलट रहे हैं। इसका महत्व इतना ही है कि वे गृहमंत्री हैं या देश में भाजपा सत्ता में है। वोट चोरी से है या नहीं वह भी मुद्दा है लेकिन जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली स्थिति है।
गौरतलब है कि राहुल गांधी ने कहा कि ईवीएम की आंतरिक क्रियावली (आर्किटेक्चर, सॉफ्टवेयर, हार्डवेयर) सार्वजनिक या निरीक्षण योग्य नहीं है। अगर यह लोकतंत्र का आधार है तो पूरी पारदर्शिता होनी चाहिए या फिर इसे खत्म कर देना चाहिए। उन्होंने मांग की कि “हमारे विशेषज्ञों को देखने दिया जाए कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन के अंदर क्या है”। उन्होंने कहा कि चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए। राहुल गांधी ने मांग की है कि चुनाव सुधार के नाम पर सिर्फ मतदाता सूची सुधार न हो मतदान और मतदान प्रणाली, चुनाव आयोग, मशीन-इंफ्रास्ट्रक्चर, पारदर्शिता और जवाबदेही पर भी व्यापक सुधार हो। राहुल गांधी ने सीधे आरोप लगाया है कि वर्तमान व्यवस्था में, ईवीएम, मतदाता सूची और चुनाव आयोग की मिलीभगत से “वोट चोरी” हो रही है। यह “मूलभूत लोकतांत्रिक अधिकार” को नष्ट करने जैसा है। उन्होंने इसे “सबसे बड़ा राष्ट्र-विरोधी कृत्य” करार दिया है। उन्होंने यह भी कहा है कि अगर चुनाव आयोग और सरकार सचमुच पाक-साफ हैं तो ईवीएम/वीवीपैट मशीनों और उनकी कोडिंग, उनसे जुड़े हर पहलू को खुला पब्लिक ऑडिटिंग योग्य बनाना चाहिए ताकि जनता और पार्टियों को भरोसा हो सके। राहुल गांधी ने कहा कि चुनाव सुधार सिर्फ मतदाता सूची या एसआईआर तक सीमित नहीं होना चाहिए। उसे एक व्यापक पैकेज होना चाहिए। खबरों के अनुसार, अमित शाह ने राहुल गांधी का जवाब दिया। अब आप देखिए कि जवाब में क्या है और कितना सही है तथा आप कितने संतुष्ट हैं। अखबार, खबरें और मीडिया तो जो हैं सो हैं ही।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


