दिल्ली में नई भाजपा सरकार के पहले विधानसभा सत्र के दौरान प्रेस की स्वतंत्रता को लेकर विवाद खड़ा हो गया है। कई पत्रकारों को विधानसभा परिसर में प्रवेश से अस्थायी रूप से रोक दिया गया, जिनमें कई मान्यता प्राप्त पत्रकार भी शामिल थे। आमतौर पर इन पत्रकारों को बिना किसी बाधा के विधानसभा की कार्यवाही कवर करने की अनुमति होती है।
पहले दिन से ही पत्रकारों की एंट्री पर रोक
मुख्यमंत्री रेखा गुप्ता और उनके मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण के दिन कम से कम तीन पत्रकारों—एएनआई के निरंजन मिश्रा, एबीपी न्यूज़ के दीपक रावत और पीटीआई की श्वेता—को विधानसभा के गेट पर रोक दिया गया। अगले दिन टाइम्स नाउ नवभारत के पुलकित नागर, न्यूज़ नेशन के मोहित बख्शी, न्यूज़18 के जावेद मंसूरी, ज़ी न्यूज़ के देवेश भाटी और जनतंत्र के नमित त्यागी को प्रवेश से रोका गया। हालांकि, बाद में विधानसभा अध्यक्ष के दखल के बाद इन्हें अंदर जाने दिया गया।
विधानसभा सचिवालय ने कहा- ‘गलतफहमी’ थी
विधानसभा अध्यक्ष के सचिव रंजीत सिंह ने इस विवाद पर सफाई देते हुए कहा कि यह एक “गलतफहमी” थी। उन्होंने बताया, “जब यह हुआ तो मुझे इसकी जानकारी नहीं थी, लेकिन जैसे ही मुझे पता चला, तुरंत इस मुद्दे को सुलझा लिया गया।”
न्यूज़लॉन्ड्री में प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, एक व्हाट्सएप चैट के स्क्रीनशॉट भी सामने आए हैं, जिसमें उन पत्रकारों के नामों की सूची देखी जा सकती है जिन्हें विधानसभा में प्रवेश से रोका गया था।
पत्रकारों ने लगाए पक्षपात के आरोप
पत्रकारों का आरोप है कि भाजपा के कुछ खास रिपोर्टरों को अंदर जाने दिया गया, जबकि पहले दिल्ली सरकार को कवर करने वाले कई पत्रकारों को रोका गया। एक वरिष्ठ पत्रकार ने कहा, “कांग्रेस सरकार से लेकर आम आदमी पार्टी के शासन तक, डीआईपी-मान्यता प्राप्त पत्रकारों को हमेशा विधानसभा में प्रवेश मिलता रहा है। लेकिन इस बार जिस तरह का सीधा प्रतिबंध लगाया गया, वह चौंकाने वाला है।”
एक अन्य पत्रकार ने बताया, “आम आदमी पार्टी के कार्यकाल में दिल्ली सचिवालय और पार्टी कार्यालय में प्रवेश पर प्रतिबंध जरूर था, लेकिन विधानसभा में ऐसा कभी नहीं हुआ।”
क्या आगे भी जारी रहेगा प्रतिबंध?
फिलहाल, स्पीकर के हस्तक्षेप के बाद पत्रकारों को अंदर जाने दिया गया, लेकिन यह एक अस्थायी समाधान लगता है। एक पत्रकार ने कहा, “अभी स्पीकर की दखलअंदाजी के बिना किसी को एंट्री नहीं मिल रही है। आगे क्या होगा, यह स्पष्ट नहीं है।”
इस घटनाक्रम ने नई सरकार के मीडिया के प्रति रवैये को लेकर सवाल खड़े कर दिए हैं। क्या यह सिर्फ एक अस्थायी अव्यवस्था थी, या फिर प्रेस कवरेज पर किसी नए नियम की शुरुआत? आने वाले दिनों में स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।


