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आज के अखबार : जजों के पैनल की ‘गोपनीय’ रिपोर्ट का ‘प्रचार’ बन जाना और जज का बेशर्म मीडिया ट्रायल

संजय कुमार सिंह

आप जानते हैं कि हाईकोर्ट के दो जजों के खिलाफ मामले हैं। एक मामला मुसलमानों के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी का है। संविधान विरोधी इस मामले में कार्रवाई के लिए विपक्ष के 55 सासंदों ने इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव का नोटिस दे रखा है। दूसरा मामला, दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति यशंवत वर्मा का है जो उनके घर के एक हिस्से में, उनकी अनुपस्थिति में आग लगने पर आग बुझाने के दौरान भारी नकदी देखे जाने (और वीडियो रिकार्ड होने) का आरोप है। इस मामले में कोई बरामदगी या पुलिस कार्रवाई नहीं हुई है। उसके अपने कारण और तर्क हैं। राज्यसभा के सदस्य और वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिबल के आरोपों से लग रहा है कि सरकार न्यायमूर्ति यादव को तो बचा रही है लेकिन न्यायममूर्ति वर्मा के खिलाफ कार्रवाई को लेकर जल्दी में है। वास्तविकता जो हो खबरें ठीक से न छपें, खुलासे ढंग से न किये जायें और कार्रवाई में भेदभाव दिखे तो मामला दिलचस्प हो जाता है और उसकी पठनीयता रहती है। आज न्यायमूर्ति वर्मा के मामले में एक ‘लीक’ का मामला है जो टाइम्स ऑफ इंडिया में बाईलाइन के साथ लीड है। इसका मतलब हुआ कि खबर के साथ रिपोर्टर का नाम है और ऐसा आम तौर पर तब होता है जब कोई खास खबर होती है रिपोर्टर का दावा होता है कि खबर सिर्फ उसी के पास है या (उप) संपादकगण समझते हैं कि खबर इतनी अच्छी है कि रिपोर्टर को श्रेय दिया जाना चाहिये। हालांकि, यह बीट का मामला है और मीडिया के लोगों को पता होता है कि किस अखबार में कौन सी बीट किसकी है और लोग जानते हैं कि खबर किसकी होगी या कैसे मिली है या क्यों छपी है। टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड की खासियत है कि न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ (या बारे में) खबर भी सबसे पहले टाइम्स ऑफ इंडिया में ही छपी थी और खबर के लिए रिपोर्टर, धनंजय महापात्र की प्रशंसा भी हुई थी।

आज टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर बताती है कि सुप्रीम कोर्ट के बनाये जजों के जांच पैनल ने कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा के घर से नकदी उनके निजी सचिव से उनकी बातचीत के बाद हटाई गई। खबर का इंट्रो है, भरोसेमंद स्टाफ ने स्टोररूम को साफ किया। खबर के साथ बॉक्स में खबर की खास बातें हैं जिसका शीर्षक है, वर्मा के बचाव को खारिज कर दिया गया। अखबार ने लिखा है कि जांच समिति की रिपोर्ट ने 21 मार्च की टाइम्स ऑफ इंडिया की स्टोरी का संदर्भ लिया जिससे इस खबर का खुलासा हुआ था। खबर में यह भी बताया गया है कि रिपोर्ट के अनुसार स्टोर रूम में शराब भी रखी थी और आग लगने से संभवतः बोतलें टूट गईं जिससे आग बढ़ गई। शराब की बोतलें कैबिनेट में रखी थीं जो स्विच बॉक्स के पास थीं … इसे जांच समिति ने नोटिस किया है। मुझे लगता है कि रिपोर्ट के इस अंश से यह बताने की कोशिश की गई है कि घर के एक कोने में स्थित यह स्टोर रूम दरअसल कैबिनेट में शराब जैसी चीज रखने के लिए उपयोग की जा रही थी, वहां नकदी भी थी तो रखी ही जाती होगी किसी ने फंसाने के लिए रखा यह दावा कमजोर है। बेशक, यह मेरा निजी आकलन है और मैं गलत हो सकता हूं पर जो स्थितियां हैं उसमें खबरों के साथ इस तरह का खेल नया या मुश्किल नहीं है। मैं पत्रकारिता के इन्हीं बारीकियों को रेखांकित करना चाहता हूं।

मेरी शंका की पुष्टि आज छपी दूसरी खबरों से होती है। वैसे भी हमारा देश मीडिया ट्रायल करता रहा है और इसका भी पूरा विकास हुआ है। द टेलीग्राफ में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, विश्वास तोड़ने का मामला, जज के खिलाफ कार्रवाई का प्रस्ताव। यहां यह खबर अखबार के ब्यूरो के हवाले से है और इस प्रकार है, तीन सदस्यों वाले जजों के पैनल ने दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व जज न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश की है जिनके घर पर नोटों के बेहिसाब बंडल संदिग्ध आग में नष्ट हो गये थे। कहने की जरूरत नहीं है कि उसी रिपोर्ट के आधार पर लिखी खबर में यहां कार्रवाई का कोई नया (ठोस) कारण नहीं बताया गया है और टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट में बिना कहे जो कहने या बताने की कोशिश की गई है उसकी पुष्टि नहीं की गई है। बेशक, जजों की जांच पुलिसिया जांच से अलग होगी और जब पुलिस ने अपराध कबूल करने के वीडियो (स्टिंग) पेश किये तो बचाव पक्ष ने दलील दी कि यह नाटक का रिहर्सल है। इसी तरह, छात्रा से तेल मालिश के वीडियो से जो अपराध साबित होता है उससे एक प्रभावशाली पूर्व मंत्री को बचाने के लिए दलील दी गई कि यह वीडियो उनसे वसूली के लिये बनाया गया था। पुलिस के इन सबूतों को मानना नहीं मानना जजों का काम है और यह उनके विवेक का मामला होता है। हालांकि यह तब की बात है जब न्याय की देवी की आंखों पर पट्टी होती थी। अब खुली आंखों से देखकर किया जाने वाला न्याय क्या और कैसा है – अलग मुद्दा है। तथ्य यह है कि विकास हुआ है। वीडियो पर विश्वास नहीं करना या बचाव पक्ष की दलील मान लेना भी वीडियो बनाने या पेश करने वाले के विश्वास की हत्या है लेकिन अभी वह मेरी चिन्ता का विषय नहीं है।

आज यह खबर द हिन्दू में भी है। अखबार की सेकेंड लीड, इस खबर का शीर्षक है, जज के यहां नकद मामले की लापरवाह हैंडलिंग के लिए अधिकारियों को दोषी ठहराया गया। खबर में बताया गया है कि तीन जजों की 3 मई की रिपोर्ट को उस समय के मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने गोपनीय तौर पर प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति को भेजा था जिसे लीगल वेबसाइट लीफलेट ने बुधवार को साझा किया है। गोपनीय रिपोर्ट का मौके पर लीगल वेबसाइट तक पहुंच जाना और उससे आम लोगों में असर नहीं होता तो उसका टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड बन जाना भी पत्रकारिता, रिपोर्टिंग और लीक छापने की महत्वपूर्ण घटनाओं में है और इससे भी विश्वास की हत्या संभव है। लेकिन यह सब मुद्दा नहीं बनेगा क्योंकि सरकार एक बड़े उद्देश्य से काम कर रही है और प्रधानमंत्री का घोषित उद्देश्य संतुष्टीकरण है। यह अलग बात है कि पंकज चतुर्वेदी ने फेसबुक पर लिखा है और इसे ऑपरेशन सिन्दूर जैसा या न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ लीक रिपोर्ट की तरह प्रचार नहीं मिला है कि 12 सौ करोड़ रुपये के राम मन्दिर में न जल निकासी की व्यवस्था है और न ही इसमें एसी लग पाएंगे। भूतल की तरह राम दरबार के गर्भगृह में भी खामियां हैं। इसमें भी जलनिकासी की व्यवस्था नहीं की गई है। इससे राजा राम के जलाभिषेक के बाद पानी का निस्तारण चुनौती बन गया है। नियमतः राजा राम का जलाभिषेक पूजन रोजाना किया जाता है। राजा राम को स्नान व अभिषेक कराने के बाद जो जल फर्श पर गिरता है, उसका निस्तारण पुजारियों के लिए किसी चुनौती से कम नहीं है। इसी के चलते न तो रामलला और न ही राजाराम का रोजाना पंचामृत अभिषेक किया जाता है। क्योंकि पंचामृत अभिषेक दूध, दही, घी, शहद व शक्कर को मिलाकर किया जाता है। इसके बाद फिर मूर्ति को कई बार धोना पड़ता है। इससे अधिक पानी फर्श पर गिरेगा, जिसका निस्तारण कठिन काम हो जाएगा। इसलिए विशेष अवसरों पर ही रामलला समेत राजा राम का विशेष अभिषेक किया जाता है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने भी न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ जांच पैनल की लीक रिपोर्ट को सेकंड लीड बनाया है। “नकदी पर हाईकोर्ट के जज का नियंत्रण था : सुप्रीम कोर्ट पैनल”। इसमें कहा गया है, …पैनल ने यह निष्कर्ष निकाला है कि नकदी से जज का संबंध होने का कोई सीधा सबूत न हो यह तो संभव है लेकिन निष्कर्ष निकालने वाले मजबूत सबूतों का संकेत है कि नकद पर उनका गुप्त या सक्रिय नियंत्रण है जो एक संवैधानिक कोर्ट के जज के रूप में उनपर होने वाले विश्वास के खिलाफ है। पैनल ने कहा है कि यह गंभीर न्यायिक कदाचार है और महाभियोग की कार्रवाई शुरू करने योग्य है। इंडियन एक्सप्रेस में भी यह खबर पहले पन्ने पर है और शीर्षक के अनुसार पैनल ने कहा है कि न्यायमूर्ति वर्मा, परिवार की सहमति के बिना स्टोर में नकदी नहीं हो सकती थी। 64 पन्ने की रिपोर्ट में अंतर्निहित जिम्मेदारी और कदाचार को रेखांकित किया गया है। एक पाठक के रूप में मुझे लगता है कि घटना के वक्त न्यायमूर्ति वर्मा वहां नहीं थे और उन्होंने कहा है कि उन्हें नहीं पता कि वहां नकदी कैसे पहुंची या किसने रखी तो अंतर्निहित जिम्मेदारी और दुराचार का मामला तब बनेगा जब यह साबित हो कि जब वे घर पर थे तब भी नकदी थी या वहां कब से रखी थी। आग बुझाने वाले दमकलकर्मियों को नकदी मिलने और दिखने का यह मतलब नहीं हो सकता है कि वह वहां अनंतकाल से रखी थी या रखी ही रहती थी। जजों ने अपनी रिपोर्ट में लिखा है तो निश्चित रूप से कारण होगा पर अखबारों के जरिये जो किया जा रहा है वह साबित नहीं हो रहा है या उससे सवाल उठ रहे हैं।

इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में पैनल की रिपोर्ट की आदर्शवादी बातें कही गई हैं पर एक पाठक के रूप में मैं उनसे सहमत नहीं हूं क्योंकि जज लोया की संदिग्ध मौत के मामले की जांच कराने की मांग पर जजों के बयान या गवाही का कुछ और मतलब निकाला गया था। यहां जज के अपने मामले में जज के बयान पर यकीन नहीं किया जा रहा है और आदर्शों का जिक्र किया जा रहा है जबकि उस मामले में तमाम आदर्शों के उल्लंघन का जवाब नहीं है फिर भी जांच की जरूरत नहीं समझी गई। वह जज की मौत यानी न्याय के मार्ग में रोड़े का गंभीर मामला था। जांच का फैसला महाराष्ट्र सरकार का करना था और जो सरकार ऐसा फैसला कर सकती थी वह कैसे गिराई गई और कैसे बनी रही तथा कैसे फिर बहुमत पा गई – मामले की जांच की जरूरत को गंभीर करती है लेकिन उसकी कोई चर्चा नहीं और यह सिर्फ कुछ लोगों के विश्वास की हत्या का नहीं संविधान की हत्या का मामला है – तब भी। अगर जज के पास आय से ज्यादा धन होने का मामला गंभीर है तो किसी जज का संविधान विरोधी बयान या विचार भी उतना ही महत्वपूर्ण है। लेकिन सरकार एक मामले में जज को बचा रही है और दूसरे में कार्रवाई की जल्दी में है फिर भी ज्यादातर अखबार निष्पक्ष नहीं होकर सरकार की योजना का साथ दे रहे हैं। कम से कम उसपर सवाल तो नहीं ही कर रहे हैं। इस स्थिति में जो मामले याद आते हैं उनकी भी चर्चा नहीं है। और तो और आज भिन्न अखबारों में पहले पन्ने पर जो छपा है उसमें सिर्फ हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है कि ये खुलासे तब हुए हैं जब संसद का मानसून सत्र कुछ ही दिन दूर रह गया है और आगामी सत्र में न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ लोकसभा और राज्यसभा में महाभियोग की कार्रवाई शुरू हो सकती है जबकि न्यायमूर्ति के खिलाफ कार्रवाई की कोई सूचना नहीं है।

टाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है, पैनल (समिति) ने न्यायमूर्ति वर्मा की इस दलील को नहीं माना कि स्टोर रूम उनके नियंत्रण में नहीं था जो उनके बंगले के आवासीय हिस्से का भाग नहीं था और जो दूसरों की पहुंच में नहीं था। इंडियन एक्सप्रेस ने रिपोर्ट के इस हिस्से का उदारता से वर्णन किया है और बताया है कि सरकारी घर के आवंटन का क्या मतलब होता है और क्या जिम्मेदारी होती है। मुद्दा यह है कि पुलिस और फायर वालों ने जांच क्यों नहीं की और सबूत क्यों नहीं संभाले। यहां अगर मामला साबित नहीं हो रहा है तो इसलिए कि सबूत नहीं है और उसके लिए ही जिम्मेदार हैं जो वहां नकदी होने की रिपोर्ट दे रहे हैं। द हिन्दू ने बताया है कि अधिकारियों ने अपनी निष्क्रयता के कारण बताये और क्या दलील दी। हमने फिल्मों में और वैसे भी देखा है कि घटना स्थल को कैसे सुरक्षित रखा जाता है। अगर यह अधिकारियों को पता नहीं था या गंभीरता नहीं समझ पाये तो यह संयोग है या प्रयोग? घटना वाले परिसर को महीनों-वर्षों सील रखने के उदाहरण हैं और इस मामले में ऐसा कुछ नहीं किया जाना सामान्य कैसे हो सकता है? दूसरी ओर, न्यायमूर्ति यादव के खिलाफ 55 विपक्षी सांसदों ने राज्यसभा में महाभियोग चलाने का प्रस्ताव दायर किया है। मार्च में सुप्रीम कोर्ट को राज्यसभा सचिवालय से एक मिली एक औपचारिक चिट्ठी में कहा गया है कि महाभियोग प्रस्ताव पहले ही दायर किया जा चुका है। इसलिए यह मामला अब संसद के अधीन है और सुप्रीम कोर्ट की इन-हाउस जांच प्रक्रिया संवैधानिक टकराव पैदा कर सकती है। इस आधार पर सुप्रीम कोर्ट ने अपनी जांच रोक दी और कॉलेजियम के सदस्यों को इस निर्णय से अवगत कराया गया। अंततः कार्रवाई चाहे जो हो या न हो, यह साबित हो चुका है कि भारत देश में, वर्तमान व्यवस्था में जजों को भी न्याय मिलना मुश्किल है और न्याय जो हो, जैसा हो न्याय होता हुआ नहीं लगता है या लग रहा है।  न्यायपालिका की आजादी और फैसले, ईनाम और दबाव के कई मामले हैं और सब का वर्णन पढ़ने के लिए अच्छी कहानी है। खबर तो है ही पर कहीं दिखी?

मेरे आठ अखबारों में आज यह खबर सिर्फ दि एशियन एज में पहले पन्ने पर नहीं है। कहने की जरूरत नहीं है कि खबर का स्रोत जाने या बताये बगैर यह खबर नहीं है। गोपनीय चिट्ठी अगर लीक हो गई है तो वेबसाइट की एक्सक्लूसिव खबर है और उस आधार पर खबर देने से पहले उसकी सत्यता की पुष्टि की जानी चाहिये वरना ऑपरेशन सिन्दूर के तहत घर-घर सिन्दूर भेजने की खबर और उसका खंडन हम जानते हैं। जब सबको पता है कि उनका उपयोग किया जा रहा है तो जानते-समझे उपयोग होना विज्ञापनों की शर्त नहीं हो सकती है। यह सरकार की विशेष सेवा है जो विचारधारा और विचारधारा वाले लोगों को मीडिया में प्लांट किये जाने के कारण है। अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट की जांच में कदाचार साबित जस्टिस वर्मा को हटाने की सिफारिश। रिपोर्ट के आधार पर इसमें जो खास बात लिखी है वह यह कि, अनुमान आधारित सशक्त साक्ष्यों के जरिये यह स्थापित होता है कि जले हुए नोट 15 मार्च को तड़के जस्टिस वर्मा के सरकारी आवास …. के स्टोर रूम से ही निकाले गये थे। मुझे लगता है कि रिपोर्ट का यह हिस्सा तब महत्वपूर्ण होता जब शिकायत जले हुए नोट मिलने की होती। पर ऐसा कोई मामला है नहीं और सबको पता है कि आग बुझाने के समय देखे गये नोट बाद की सफाई में हटा दिये गये और ना जब्त किये गये ना उन्हें सुरक्षित रखने की कोई व्यवस्था थी। बरामद होने की एफआईआर भी नहीं है। नवोदय टाइम्स में यह खबर दो कॉलम में है। “कैश कांड : जस्टिस वर्मा को हटाने का प्रस्ताव”। आमतौर पर इसमें ही सब बातें हैं जो पहले कही जा चुकी है। एकमात्र नई बात यह है कि पूर्व मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना ने राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर न्यायमूर्ति वर्मा के खिलाफ महाभियोग चलाने की सिफारिश की है। अखबार ने इसे अलग से हाईलाइट किया है और इसके साथ रिपोर्ट के हवाले से यह भी कहा गया है कि कदाचार पाया गया।

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