
संजय कुमार सिंह
दिल्ली में 26 साल बाद खिला कमल (अमर उजाला) और खिला भरा-पूरा कमल (नवोदय टाइम्स) – आज के मेरे दोनों हिन्दी अखबारों की लीड का शीर्षक है। अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक है, भाजपा ने केजरीवाल को ध्वस्त कर दिया। द हिन्दू का शीर्षक है, भाजपा ने राजधानी को साफ कर दिया। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक है, राजधानी के लिए डबल इंजन। दि एशियन एज का शीर्षक है, 27 साल बाद दिल्ली में भाजपा की वापसी; आप को भारी झटके का सामना करना पड़ा। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक है, आम आदमी का फैसला : दिल्ली के लिए भाजपा। द टेलीग्राफ का शीर्षक है, दिल्ली में भाजपा ने आप को बाहर किया। यह जो जीता वही सिकंदर वाला मामला है और ऐसा लग रहा है कि भाजपा को उसके अच्छे काम (या प्रचार) के लिए वोट मिले हैं। तथ्य यह है कि उसने वोट मांगने लायक कोई काम किया होता तो उसपर वोट मांगती और उसने अपनी तारीफ करने या योग्यता बताने की बजाय विरोधियों की आलोचना करने का रास्ता चुना है। अखबारों को यह सब बताना चाहिये पर आज की खबरों से ऐसा नहीं लग रहा है।
इंडियन एक्सप्रेस में दो कॉलम की एक खबर का शीर्षक है, 13 सीटों पर कांग्रेस को इतने वोट मिले जितने से आम आदमी पार्टी हारी है। एक और खबर है जिसमें केजरीवाल की हार का कारण शहर की खराब हालत, रिश्वत के आरोप और एक दूसरे पर आरोप लगाने आदि को बताया है। तथ्य यह है कि केजरीवाल हारे नहीं उन्हें हराया गया है। न तो शराब घोटाले में दम है और न शीश महल के आरोप में। कहने की जरूरत नहीं है कि शीश महल की तुलना दूसरे मुख्यमंत्रियों और राजभवनों के खर्चों से की जानी चाहिये और अगर केजरीवाल ने कहा था कि वे आम आदमी की तरह रहेंगे तो नरेन्द्र मोदी ने भी कहा था कि झोला उठाकर चल देंगे। 50 दिन में सपनों का भारत दे रहे थे। 100 दिन में स्विस बैंक में रखा पैसा वापस आ रहा था आदि। अदाणी या इलेक्टोरल बांड का मामला किसी भी भ्रष्टाचार से बहुत बड़ा है। लेकिन मीडिया ने इन्हें मुद्दा नहीं बनाया। आम आदमी पार्टी के जवाब या आरोप को महत्व नहीं दिया। इसलिए भाजपा के आरोपों का असर हुआ है। दूसरी ओर, नरेन्द्र मोदी के मामले में आरोप ज्यादा सही होने के बावजूद उनकी लोकप्रियता बनी हुई है या बढ़ रही है। तथ्य यह है कि दिल्ली के चुनाव में भाजपा को 45.6 प्रतिशत वोट मिले हैं जबकि आम आदमी पार्टी को 43.6 प्रतिशत वोट मिले हैं। भाजपा का वोट कट्टर हिन्दुत्व के लिए है तो आप का वोट कट्टर ईमानदारी के लिए है और कम नहीं है। इसपर भाजपा ने सत्ता में होने के जो लाभ लिये हैं वो सर्वविदित है। इसलिए आम आदमी पार्टी की हार एंटी इनकमबेंसी के कारण भी हो सकती है और ऐसे में यह राहत की बात है कि बहुत कम वोटों से है।
इसीलिये कल सोशल मीडिया पर कई लोगों ने लिखा कि दिल्ली वालों ने आपदा को छोड़कर विपदा को चुन लिया है या सर्दी खांसी से तो बच गये बावासीर को गले लगा लिया। जो भी हो, आपदा नरेन्द्र मोदी की सरकार रही है और उसका असर नोटबंदी, जीएसटी से लेकर डॉलर के मुकाबले रुपये के मूल्य तक पर दिखाई देता है। भ्रष्टाचार के मामले में केजरीवाल की पार्टी के कई लोग जेल हो आये और आरोप साबित हुए बगैर सजा भोग ली पर केंद्र सरकार के भ्रष्टाचार की जांच भी नहीं हुई। कार्रवाई तो दूर उसपर संसद में चर्चा भी नहीं हुई। मीडिया का रुख लगातार भाजपा के समर्थन और आप के विरोध का रहा। कांग्रेस के मामले में उपेक्षा का रहता है। बंटोगे तो कटोगे जैसे नारे पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। संविधान की रक्षा की बात करने वाले इस मामले में संयम बरतते और खुद पर नियंत्रण रखते तो वह भी नहीं हुआ। हिन्दू मुसलमान करने के लिए कुमार विश्वास जैसे लोग खुलकर सामने आये। गाहे-बगाहे जज साब जैसे लोग भी सामने आते हैं और अनिल मसीह जैसे चुनाव कराने वाले लोग हैं जिनके खिलाफ कार्रवाई नहीं हुई है। कुल मिलाकर, केजरीवाल को बदनाम करने की भरपूर कोशिश हुई और कामयाब रही। अगर उनकी हार अहंकार के कारण है तो मनीष सिसोदिया की हार को क्या कहेंगे?
आमतौर पर कहा यह जा रहा है कि कांग्रेस के मैदान में होने से केजरीवाल को नुकसान हुआ। नवोदय टाइम्स में अकु श्रीवास्तव ने लिखा भी है, बंटोगे तो कटोगे, अब समझ में आ रहा होगा इंडिया को इसका अर्थ। इसी में बताया गया है कि मामला बंटने का नहीं है केजरीवाल की लोकप्रियता ही कम हुई है। 20759 वोट खोये केजरीवाल ने शीर्षक से छपी टिप्पणी में कहा गया है कि 2020 में उन्हें 46758 वोट मिले थे इस बार सिर्फ 25999 वोट मिले हैं। जाहिर है मामला बंटने कटने का नहीं है। उनके खिलाफ प्रचार का असर है और जेल में रहने के कारण लोगों ने उनकी ईमानदारी पर शक किया जबकि वह पीएमएलए कानून के कारण है और उसकी अलग कहानी है। यही नहीं, अगर केजरीवाल ने सत्ता पाने के बाद शीश महल बनवा भी लिया तो भाजपा ने न सिर्फ मुख्यालय बनवाया है झंडेवालां में 12 मंजिल के तीन टावर भी बने हैं। सबमें कम ताम-झाम नहीं है और अंदर की तस्वीरें आम नहीं हैं। जाहिर है यह सब सोच समझ कर किया गया है। कुल मिलाकर, मेरा मानना है कि भाजपा की जीत उसकी अच्छाई या अच्छे कामों के लिए नहीं है पर खबरों से ऐसा लग रहा है कि उसने अच्छा प्रदर्शन किया है तो वह जनता की राय में अच्छी है। मुझे लगता है कि वोट हिन्दू-मुसलमान के साथ-साथ अन्य अनैतिक कारणों से भी मिले हैं। इसकी न जांच हुई न चर्चा है।
उदाहरण के लिए मतदाता सूची से खिलवाड़। महाराष्ट्र के मामले में जो तथ्य सामने आये हैं उससे लगता है कि आरोप निराधार नहीं हैं। और मामला छोटा-मोटा या साधारण नहीं है। फिर भी कई लोग चुनाव आयोग के बचाव में लगे हैं। इसके अलावा, आम आदमी पार्टी चाहे जितनी बुरी हो, भाजपा से बुरी नहीं है। बी टीम तो कहा ही जाता है। इन सबके अलावा, आम आदमी पार्टी ने सत्ता में रहते हुए ऐसा कुछ नहीं किया जिससे उसके वोट घटें। शिक्षा के क्षेत्र में इतना काम किया है कि उसके वोट बढ़ने चाहिये थे। दूसरी ओर, भाजपा या नरेन्द्र मोदी ने ऐसा कोई काम नहीं किया है कि उनके वोट बढ़ें। घटने के कई कारण हैं। विदेश में डंका बजने का सच हमने हाल में देख लिया और उसका बचाव भी। ऐसे में आम आदमी पार्टी की हार उसकी लोकप्रियता कम होने से भी हुई है और इसमें भाजपा के प्रचार तंत्र का पूरा योगदान है। मुझे लगता है कि आम आदमी पार्टी ने भारतीय राजनीति में कुछ अच्छे लोगों को लाने का काम किया है और भाजपा का मुकाबला करने में भले चूक गई उसे अभी खत्म नहीं माना जाना चाहिये। वैसे भी भाजपा जब 26 साल बाद सत्ता पा सकती है तो आम आदमी पार्टी की हार का कारण सबको पता है।


