पत्रकारिता के लिए उमेश चतुर्वेदी को सम्मनित किया गया

नई दिल्ली। वरिष्ठ गांघीवादी चिंतक और गांधी स्मारक निधि के मंत्री रामचंद्र राही ने कहा है कि साहित्य का मकसद संवेदना जगाना है। आज जब समाज में संवेदना मर रही है ऐसे समय में साहित्यकारों की अहम् भूमिका है। वे गांधी हिन्दुस्तानी साहित्य सभा और विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान की ओर से सन्निधि सभागार में काकासाहव कालेलकर सम्मान समारोह की अघ्यक्षता कर रहे थे। यह समारोह काकासाहेव कालेलकर के जन्मदिवस के उपलक्ष्य पर आयोजित किया गया था। समारोह में नए रचनाकारों पर टिप्पणी करते हुए कहा कि आज के युवा वर्ग में एक वेचैनी एक विचार को लेकर है। वह वैचारिक उ​हापोह की स्थिति में है। नफरत के वोये जा रहे बीज ने सामाजिक वातावरण को कलुषित किया है तो दूसरी ओर उदाकरणीकरण के प्रभाव से विषमता की खाई पटने की जगह बढ़ती जा रही है।

इस मौके पर श्री राही ने दिल्ली की वंदना यादव, बिहार भागलपुर की उषा सिन्हा और हिसार हरियाणा की वीना को काकासाहव कालेलकर समाजसेवा सम्मान और शिक्षा के लिए शामली के मनीष जैन और पत्रकारिता के लिए उमेश चतुर्वेदी को सम्मनित किया। राही ने कहा कि इस सम्मान से दूसरे लोगों को प्रेरणा मिलेगी और समाज की संवेदना भी जगेगी। आरंभ में वरिष्ठ पत्रकार प्रसून लतांत ने कहा कि पिछले डेढ़ साल से चल रही इस संगोष्ठी के माध्यम से नए रचनाकारों कोे जोड़ने और उन्हें प्रोत्साहित किया जा रहा है। वहीं विष्णु प्रभाकर प्रतिष्ठान के मंत्री अतुल प्रभाकर ने कहा कि अब प्रतिभाओं को प्रोत्साहित करने के लिए विष्णु प्रभाकर सम्मान के साथ काका साहव कालेलकर सम्मान भी आरंभ किया गया है।

समारोह के विशिष्ठ अतिथि पत्रकार अ​निल पांडे ने कहा कि पत्रकारिता और साहित्य दोनों से समाज का हित जुड़ा हुआ है और उसी दिशा में काम होना चाहिए। पुरस्कारों से कोई रचना कालजयी नहीं होती है बल्कि रचनाओं केा आम लोगों की लोकप्रियता उसे कालजयी बनाती है। इस अवसर पर ‘समाज और साहित्य’ पर केन्द्रित संगोष्ठी में काकासाहव कालेलकर की शिष्या सुश्री ​कुसुम शाह, गांधी शांति प्रतिष्ठान के मंत्री सुरेन्द्र कुमार और ए शिवशंकर, डॉ कायनात माजी, प्रभुदयाल, किशोर जायसवाल, ​कुमार कृष्णन आदि ने अपने विचार रखे। विषय प्रवेश शिवानंद द्विवेदी ने कराया। वही गजल और गीत खुशनुमा शाम का संचालन सन्निधि संगोष्ठी की संयोजिका किरण आर्या ने किया। प्रियंका राय, विवेक सहित कई रचनाकारों अपनी रचनाओं का पाठकर भाव वोध को अभिव्यक्ति प्रदान की।

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