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कलम को कैद करने चली मोदी सरकार, मीडिया को बांधने की साजिश

उन्मेष गुजराथी

लोकसभा चुनाव के नजदीक आते ही भाजपा सरकार कलम को जंजीर पहनाने की साजिश रच रही है। फेक न्यूज पर पत्रकारों की मान्यता रद्द करने संबंधी नियम की घोषणा के बाद यू टर्न लेने वाली मोदी सरकार अब दूसरे रास्ते से पत्रकारों की आवाज को दबा देना चाहती है।

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गौरतलब है कि अब आनलाइन मीडिया को नियंत्रित करने के लिए नियम बनाने की ऐलान कर कमेटी भी बना दी गई है। ध्यान देने की बात यह है कि इस कमेटी में आॅनलाइन मीडिया से कोई प्रतिनिधि नहीं है। खबर है कि मोदी सरकार जल्द ही आनलाइन मीडिया के लिए नियम कानून और मानक बना तय कर देगी।

इस नए कानून के दायरे में आनलाइन न्यूज, डिजिटल ब्रॉडकास्टिंग, इंटरटेनमेंट और इंफोटेनमेंट कंटेंट मुहैया कराने वाली वेबसाइट्स आएंगी, जिससे साफ पता चलता है कि खुल कर लिखने की साहसिक पत्रकारिता दम तोड़ देगी। सवाल यह उठता है कि क्या पीएम मोदी आनलाइन पत्रकारिता पर इस तरह के अंकुश लगाकर 2019 के चुनाव में अपनी हर आलोचना और विरोध में उठे स्वर को कुचल देना चाहते हैं?

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मीडिया की अविश्वसनीयता के दौर में विश्वसनीय बनकर उभरी आनलाइन मीडिया

कथित मुख्यधारा की मीडिया की अविश्वसनीयता के दौर में आनलाइन मीडिया विश्वसनीय बनकर उभरी है। इसे बेहद सशक्त मीडिया कहा जा रहा है। गौरतलब है कि कई ऐसे वेबसाइट पिछले कुछ वर्षों में उभरे हैं, जिन्होंने जरूरी मुद्दों पर बेहद प्रभावशाली ढंग से पत्रकारिता की है। किसानों का मुद्दा हो या रोजगार का मुद्दा हो या फिर दलित- माइनॉरिटीज को प्रताड़ित किए जाने का मुद्दा हो सब पर आनलाइन मीडिया ने अपनी जबर्दस्त भूमिका निभाई है।

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ज्ञात को कि रोहित वेमुला की आत्महत्या, मॉब लिंचिंग और एमपी में किसानों पर फायरिंग सहित कई मुद्दों पर आनलाइन मीडिया ने भाजपा सरकार को कटघरे में खड़ा किया था, जबकि कथित मुख्यधारा की टीवी पत्रकारिता ठंडी बनी हुई थी।

आनलाइन मीडिया को सीढ़ी बनाकर उभरे मोदी

ज्ञात हो कि पिछले लोकसभा चुनाव से में नरेंद्र मोदी और उनकी टीम के लोग आॅनलाइन मीडिया के इस्तेमाल से ही सत्ता हासिल करने में सफल हुए थे। लेकिन अब ऐसा क्या हुआ कि वे आॅन लाइन मीडिया से डर रहे हैं। कहीं ऐसा तो नहीं है कि लगातार भाजपा सरकार द्वारा हो रही गलतियों को आॅनलाइन मीडिया धारदार ढंग से दिखा रही है, जिससे सरकार की पोल खुल रही है। याद कीजिए नोटबंदी के दौरान हो रही लोगों की तकलीफों को जब टीवी वाले नहीं दिखा रहे थे, तब आॅनलाइन मीडिया उसे खूब जोर-शोर से दिखा रही थी। इस तरह यह कहा जा सकता है कि लगातार अपनी खुल रही पोल से डरकर भाजपा सरकार ऐसे कदम उठा रही है।

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फेक न्यूज प्रकरण से दिखाई दिया स्मृति का दबदबा

फेक न्यूज पर पत्रकारों के ऊपर कार्रवाई को लेकर केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी के मंत्रालय के फैसलों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा पलटने पर कई तरह की बातें सामने आती हैं। आखिर स्मृति ईरानी ने प्रधानमंत्री मोदी या फिर पीएमओ में अन्य संबंधित अधिकृत मंत्रियों से विचार-विमर्श किए बिना यह फैसला कैसे ले लिया?

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गौरतलब है कि सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय के तानाशाही भरे फैसले पर पीएम मोदी ने कहा कि फर्जी खबर पर कोई भी फैसला प्रेस काउंसिल आॅफ इंडिया या एनबीए ही लेगा। इसमें सरकार की कोई दखलअंदाजी नहीं होगी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसके साथ ही स्मृति ईरानी के मंत्रालय को अपना आदेश वापस लेने के लिए भी कहा था। तो इससे यह साबित होता है कि भाजपा सरकार में स्मृति ईरानी का दबदबा है और वे एकमात्र इतनी ताकतवर मंत्री हैं कि पीएम मोदी से पूछे बिना ही फैसला ले सकती हैं।

खल रही है भाजपा में बुद्धिजीवियों की कमी

भाजपा सरकार जिस तरह से पत्रकारों के खिलाफ लगातार कदम उठा रही है, उससे वह खुद अपने पैर पर कुल्हाड़ी मार रही है। गौरतलब है कि भाजपा में पहले की तरह बुद्धिजीवियों का अभाव है।

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पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के समय भाजपा में अरुण शौरी, जसवंत सिंह, यशवंत सिन्हा जैसे बुद्धिजीवी कहे जाने वाले नेता सक्रिय थे, लेकिन अब इस पार्टी में ऐसे नेताओं का अभाव है। माना जा रहा है कि इस तरह के बुद्धिजीवी नेताओं के पार्टी में सक्रिय नहीं रहने के कारण भाजपा लगातार गलत फैसले ले रही है।

गौरतलब है कि किसानों, व्यापारियों, छात्रों और अब पत्रकारों या आनलाइन मीडिया के खिलाफ भाजपा की नीतियों की जमकर आलोचना हो रही है। खुद भाजपा में अच्छी छवि वाले नेता शत्रुघ्न सिन्हा लगातार पार्टी की नीतियों के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं।

‘सरकार कर रही मडिया की पुलिसिंग’

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फेक न्यूज के बहाने मीडिया पर अंकुश लगाने के खिलाफ एडिटर्स गिल्ड आफ इंडिया ने तुरंत सरकार को चेतावनी दी थी। फेक न्यूज के बारे में सूचना प्रसारण मंत्रालय के नोटिफिकेशन पर गिल्ड ने कहा था कि कि ऐसा करके सरकार मीडिया में गलत तरीके से दखल दे रही है। वह मीडिया की पुलिसिंग में लगी है। फेक न्यूज के बहाने पत्रकारों की सदस्यता रद्द करने और उनके खिलाफ शिकायतों की शुरूआत से पत्रकारों की प्रताड़ना का नया सिलसिला शुरू हो जाएगा। बाद में सरकार ने पत्रकारों के विरोध को देख इस नोटिफिकेशन को वापस ले ले लिया था।

सरकार ने छोटे अखबारों पर गिराई गाज

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मोदी सरकार ने छोटे-मझोले अखबारों पर गाज गिरा दी है। जीएसटी के कारण छोटे अखबार तंगहाली की कगार पर हैं। गौरतलब है कि सरकारी विज्ञापनों पर टिके हुए छोटे अखबारों को डीएवीपी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) के जरिए विज्ञापन दिए जाते रहे हैं, लेकिन जबसे नरेंद्र मोदी की सरकार बनी है, राहें मुश्किल हो गर्इं हैं। डीएवीपी ने विज्ञापन जारी करने के नियमों में बेहद सख्ती कर दी है। डीएवीपी 20 लाख से कम टर्नओवर वाले प्रकाशकों पर भी जीएसटी पंजीकरण कराने के लिए अपना प्रेशर डालता रहा है।

जीएसटी से बेरोजगार बन रहे पत्रकार

जीएसटी से पत्रकार बेरोजगार बन रहे हैं। जब से मोदी सरकार ने न्यूज प्रिंट पर जीएसटी लागू किया, तब से अखबारों की बंदी और पत्रकारों की बेरोजगारी शुरू होने का खतरा मंडराने लगा। जीएसटी कौंसिल की मीटिंग से थोड़ी बहुत आशा बची थी, लेकिन वह भी खत्म हो गई। संभावना जताई जा रही थी कि लघु समाचार पत्रों को बचाने के लिए न्यूज प्रिंट पर से जीएसटी हटाया जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। पिछले दिनों वित्त मंत्री अरुण जेटली की अध्यक्षता में जीएसटी कौंसिल की बैठक हुई और इसमें अखबारों को कोई राहत नहीं दी गई।

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अखबारों पर मंडराते खतरे का साल होगा 2019

छोटे अखबारों के लिए 2019 सबसे अधिक खतरनाक साल होगा। सरकार की डीएवीपी पॉलिसी (विज्ञापन और दृश्य प्रचार निदेशालय) 2016 और जीएसटी के कारण 90 फीसदी अखबारों के दफ्तर पर अगले साल ताला लग सकता है। लागत से कम पर अखबार की बिक्री नहीं हो, इसके लिए मोनोपोली कमीशन भी सहयोग नहीं कर रहा है। गौरतलब है कि छोटे उद्योगों को बचाने लिए सरकार की कई पॉलिसी हैं, लेकिन अखबारों को मरने से बचाने के लिए सरकार के पास कोई योजना नहीं है।

महाराष्ट्र पत्रकार संरक्षण कानून का एक साल, लेकिन इंप्लिमेंटेशन नहीं

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महाराष्ट्र पत्रकार संरक्षण कानून के एक साल पूरे हुए हैं, लेकिन इसको लेकर कोई इंप्लिमेंटेशन (कार्यान्वयन) नहीं होने से यह महत्वपूर्ण नहीं रह गया है। गौरतलब है कि एक साल पहले 7 अप्रैल को ही महाराष्ट्र विधानसभा ने पत्रकारों और मीडिया घरानों पर हमले रोकने से संबंधित विधेयक पारित कर दिया था। इस कानून के बाद महाराष्ट्र में पत्रकारों और मीडिया हाउस पर हमला गैरजमानती अपराध हो गया।

गौरतलब है कि मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने विधानसभा में ‘महाराष्ट्र मीडियापर्सन्स एंड मीडिया इंस्टीट्यूशन्स (प्रीवेंशन आफ वायलेंस एंड डेमेज आर लॉस आफ प्रॉपर्टी) अधिनियम, 2017’ निचले सदन में पेश किया था और विपक्षी सदस्यों की अनुपस्थिति में इसे बिना चर्चा के पारित कर दिया गया था। लेकिन इस कानून को अमल में नहीं लाने से पत्रकारों को कोई फायदा नहीं हुआ। लेकिन इससे सरकार ने अपनी पीठ जरूर थपथपा ली।

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Unmesh Gujarathi
Resident Editor,
DabangDunia
www.unmeshgujarathi.com

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