संजय कुमार सिंह
आज मेरे नौ में से आठ अखबारों में रूसी तेल पर अमेरिकी खबर पहले पन्ने पर है। अकेले दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। नवोदय टाइम्स और देशबन्धु में यह लीड नहीं है। बाकी के चार अंग्रेजी और हिन्दी के एक अखबार, अमर उजाला में यह खबर लीड है। अंग्रेजी अखबारों में विदेशी मामले को लीड बना देना देसी खबरों के मुकाबले ‘गंभीर’ खबर को महत्व देने जैसा तो हो ही जाएगा लेकिन हिन्दी अखबारों में एक अमर उजाला में यह लीड है तो पाठकों को अंदाजा होगा कि सरकार विरोधी तो छोड़िए सरकार को नुकसान पहुंचा सकने वाली खबरें नहीं के बराबर होती है। अभी यह सब सिर्फ यह बताने के लिए कि खबरों के चयन या लीड के मामले में अखबारों की संपादकीय स्वतंत्रता, भिन्नता या विवेक का अंतर बहुत कम रह गया है। शीर्षक से यह भले दिख जाता है लेकिन खबरों का चयन प्रभावित होना बहुत साफ है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, रूस के दो बड़े तेल उत्पादकों पर ट्रम्प का प्रतिबंध, खरीद घटाने की तैयारी में भारत। उपशीर्षक है, ट्रम्प ने फिर कहा, भारत साल के अंत तक खरीद बेहद कम कहर देगा, रोजनेफ्ट व लुकऑयल पर लगाई रोक। मोटे तौर पर यह ट्रम्प की उसी घोषणा की खबर है जिसका खंडन भारत सरकार ने किया था और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि उन्हें बात-चीत की सूचना नहीं है।
मेरा साफ मानना है कि इस स्तर की वार्ता की सूचना विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता को तभी होगी जब बताई जाएगी और अगर वह कुछ कह रहा है तो वही कहेगा जो कहने के लिए उससे कहा जाएगा और इसके मायने होंगे। यह सब हो चुकने के बाद आज इस खबर और भारत में इसकी प्रस्तुति का अर्थ यह भी हो सकता है कि मामला बड़ा है और देश, प्रधानमंत्री या सरकार द्वारा ट्रम्प के दावों-घोषणाओं पर स्पष्टीकरण नहीं होना खास है। कायदे से खबर यही होनी चाहिए थी लेकिन आज की सभी खबरों को पढ़ें तो अन्य संदेशों के साथ एक संदेश यह भी निकलेगा। आइए देखते हैं – देशबन्धु की खबर का शीर्षक ट्रम्प के हवाले से है, भारत रूसी तेल आयात तेजी से कम करेगा। यही खबर पहले थी जिसका खंडन तरह-तरह से हुआ। इस खबर के साथ एक सूचना है, साल के अंत तक शून्य हो जाएगा (भारत का रूसी तेल आयात)। लगभग यही बात उस दिन कही गई थी तो भारत सरकार ने इनकार किया था और आज नहीं किया है। जाहिर है, ऐसा अकारण नहीं होगा और कारण भारत सरकार को बताना चाहिए। न बताए तो मीडिया अटकल लगा ही सकता है लेकिन वह भी नहीं है। नवोदय टाइम्स की खबर का शीर्षक है, रूस की दो तेल कंपनियों पर अमरीकी प्रतिबंध। इसके साथ छपी एक खबर का शीर्षक है, रिलायंस कम कर सकता है या रोक सकता है, कच्चे तेल का आयात। अब अमेरिका ने रूस की तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाया, भारत की निजी कंपनियां आयात कम या बंद कर सकती हैं तो खबर और शीर्षक क्या हो? यहां क्यों नहीं है और आगे क्या है, आइए देखता-दिखाता हूं। द टेलीग्राफ का मुख्य शीर्षक है, रूसी तेल प्रतिबंधों की चपेट में। फ्लैग शीर्षक है, खरीदना बहुत मुश्किल है, रिलायंस ने पुनर्विचार शुरू किया। इसमें अंग्रेजी के कुछ शब्द कोट किए हुए हैं और शब्दों का खेल हो सकता है लेकिन मोटा-मोटी मामला यही है। खबर में भी लिखा है, आधिकारिक तौर पर रिलायंस ने रूसी तेल पर कटौती की किसी योजना का खुलासा नहीं किया है।
हिन्दुस्तान टाइम्स का शीर्षक बहुत सामान्य और रूटीन है, प्रतिबंधों ने रिफाइनर (तेल संशोधन करने वाली कंपनी) को रूसी तेल पर पुनर्विचार के लिए मजबूर किया। द हिन्दू का शीर्षक भी रूटीन ही कहा जाएगा, अमेरिका ने रूस की प्रमुख तेल कंपनियों पर प्रतिबंध लगाए. भारतीय रिफइनर खरीदारी कम करने को ‘मजबूर’। उपशीर्षक है, क्रेमलिन की वार मशीन को धन देने के लिए रोजनेफ्ट और लुकऑयल पर प्रतिबंधों का हमला, दुनिया भर में इससे तेल की कीमत तीन प्रतिशत तक बढ़ जाएगी। यही नहीं, आगे लिखा है, ट्रम्प ने कहा भारत आयात कम करके साल के अंत तक तकरीबन शून्य पर पहुंच जाएगा। सरकारी दिशानिर्देशों से तालमेल में भारतीय फर्में पुनर्विचार कर रही हैं। जाहिर है, यह ट्रम्प की राजनीति, मजबूरी या नोबल पाने की कोशिश का हिस्सा हो सकता है। भारत के लिए इससे महत्वपूर्ण खबर यह होती कि नरेन्द्र मोदी के ‘माई फ्रेंड’ की इस कार्रवाई या मजबूरी का भारत पर क्या असर होगा, कैसे नरेन्द्र मोदी खास मौकों पर चुप्पी साध लेते हैं और विदेश मंत्रालयों के प्रवक्ता को अपने निजी सचिव की तरह आगे कर देते हैं। हालांकि, उनके निजी सचिव भी बिना पूछे या कहे ऐसा बयान नहीं दे सकते थे। टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक भले जो गुंजाइश है उसकी सीमा में रहते हुए हो, भारत के मतलब का लगता है। अमेरिकी प्रतिबंधों का असर देश पर आरआईएल, सरकारी उपक्रमों का रूस से आयात निलंबित करना तय। इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक सूचना तो देता है लेकिन अमेरिकी। इससे लगता है कि देश पर इसके प्रभाव, मोदी जी की भूमिका या उनके प्रधानमंत्री होने के मायने आदि से संबंधित खबर भारत और भारतीय पाठकों के लिए होनी चाहिए थी जो आज मुझे मेरे किसी अखबार में पहले पन्ने पर नहीं मिली। इंडियन एक्सप्रेस के शीर्षक में यह भी कहा गया है कि इसका मकसद मास्को को शांति वार्ता में भाग लेने के लिए मजबूर करना है। अगर ऐसा है तो विश्व गुरु भारत का रुख, संभावनाएं आदि जानने लायक हैं और इसका इंतजार रहेगा।
यह तो हुई आज की लीड की बात – अब अखबरों और खबरों की भी चर्चा कर लूं। हाल-फिलहाल की खबरों में कम से कम दो का फॉलोअप तो अखबारों में नहीं ही दिखा है। मीडिया में चर्चा भी नहीं है। खबरों, असल में तमाम तरह के प्रचार और इसमें व्हाट्सऐप्प यूनिवर्सिटी का योगदान शामिल है – से माहौल ऐसा बना दिया गया है कि लोगों को वोट चोरी के आरोपों में दम नहीं लग रहा है और दलील दी जा रही है कि सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित मांग नहीं मानी। मामला चाहे जो हो, चुनाव आयोग कर्नाटक एसआईटी के सवालों का जवाब नहीं दे रहा है। 18 महीने में 18 बार मांगने पर भी नहीं दिया है। सुप्रीम कोर्ट में जो याचिका खारिज हुई वह इस बारे में नहीं थी और इंडियन एक्सप्रेस में खबर छपी थी कि मामले की जांच के सिलसिले में एसआईटी ने भाजपा नेता और पूर्व विधायक की संपत्ति पर छापा मारा है। विपक्ष के किसी नेता के यहां छापे की खबर को जो तूल दी जाती है वह वोट चोरी जैसे गंभीर मामले में छापे की खबर को नहीं है। इसलिए, आम पाठकों और भोले-भाले हिन्दुओं को गलतफहमी होना स्वाभाविक है। बहुसंख्य हिन्दू, हिन्दुओं की सरकार के लिए यह सामाजिक स्थिति हो सकती है। शिक्षा आदि से प्रभावित हो सकती है। लेकिन हिन्दुओं की सरकार वोट चोरी से बहुमत में होने का दावा करे यह सही नहीं हो सकता है और सुप्रीम कोर्ट के फैसले-आदेशों का उपयोग वोट चोरी के आरोप की गंभीरता खत्म करने के लिए किया जाए – यह बिल्कुल अनुचित और अनैतिक है। लेकिन सब चल रहा है।
पूर्व जजों को लोकपाल बनाना अपने आप में रिटायरमेंट के बाद लाभ देना है जो पहले से मुद्दा रहा है। भाजपा के साथ नरेन्द्र मोदी इसका विरोध करते रहे हैं और अब खबर है कि न सिर्फ ऐसे लोगों को लोकपाल में जगह दी गई है उनके लिए बीएमडब्ल्यू भी खरीदी जा रही है। बेशक यह सब गलत नहीं होगा, कानूनन ही हो रहा होगा लेकिन खबर तो है और नहीं है तो इमरजेंसी भी कानूनन ही लगी थी। अभी की अघोषित इमरजेंसी की बात करो तो 1975 के बाद भी पैदा हुए लोग दलील देते हैं कि ऐसा होता तो हम आप सरकार के काम की चर्चा सोशल मीडिया पर नहीं कर सकते थे। जाहिर है, यह सब उन्हें बताया गया है, समझा दिया गया है और वे इसपर विश्वास करते हैं। दूसरी ओर, उन्हें यह नहीं पता है कि इमरजेंसी में ज्यादती सबके साथ नहीं हुई थी और अभी विरोधियों के साथ जो सब हो रहा है वह इमरजेंसी जैसा न हो पर कम भी नहीं है। यह सब मीडिया के साथ-साथ सरकार समर्थकों, प्रचारकों, सोशल मीडिया टीम और आईटी सेल का किया धरा है। एक दलील यह है कि कांग्रेस को इसका मुकाबला करना चाहिए। लेकिन मेरा सवाल यह है कि कांग्रेस को यह मुद्दा नहीं लगता हो, उसने हार मान ली हो या वह जानती हो कि उसके पास योग्य लोग नहीं हैं कि वह सरकार चला सके तो क्या जो हो रहा है उसे चलने दिया जाएगा और कोई रोक नहीं लगनी चाहिए। उदाहरण, लोकपाल में शिकायत का है। भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने राजीव गांधी पर आरोप लगाए, कांग्रेस ने निशिकांत दुबे पर लगाए। भाजपा आईटी सेल के प्रमुख ने निशिकांत दुबे पर लगे आरोप का बचाव किया और जो कहा वह यही कि कांग्रेस ने उस आरोप को प्रचारित किया है जिसकी शिकायत करने वाला खुद इस मामले को फॉलो नहीं कर रहा है या पिछली तारीख पर नहीं किया। इसके साथ लोकपाल का एक आदेश सार्वजनिक किया गया। इसमें और चीजों के साथ बात स्पष्ट थी कि लोकपाल में शिकायत करने वाले को सुनवाई के समय मौजूद होना होता है, शपथपत्र के बावजूद अपेक्षित है और आने-जाने का खर्चा या उसकी भरपाई आसान नहीं है। सामान्य नियम तो नहीं है।
इस मामले में जो शिकायत थी – वह कांग्रेस की प्रेस कांफ्रेंस के अनुसार, सासंद निशिकांत दुबे के शपथपत्रों पर आधारित थी। इसकी जांच चुनाव आयोग को खुद करवानी चाहिए थी। नहीं हुई, करने पर शिकायत कर्ता से अपेक्षा और शिकायत सार्वजनिक करने पर लचर बचाव। जाहिर करता है कि कायदे कानून-कैसे हैं और उनका कैसे उपयोग हो रहा है। अभी मुद्दा वह नहीं है। मुद्दा यह है कि इसके बाद खबर आई कि लोकपाल के सात सदस्यों के लिए बीएमडब्ल्यू कार खरीदी जा रही है। यह खबर लीक हो गई, की गई या करवाई गई – मैं नहीं जानता लेकिन इससे लोकपाल नामक संस्था की साख तो खराब ही होगी। और अगर यह सुप्रीम कोर्ट के साथ किया जा चुका है तो लोकपाल के साथ क्यों नहीं किया जा रहा होगा। इस लिहाज से मामला गंभीर है लेकिन इस खबर का फॉलो अप मुझे नहीं दिखा। चर्चा वैसी नहीं है जैसा मामला है और सबसे गंभीर बात यह कि सरकार के एक खास और प्रिय तथा मुंहफट सांसद – के खिलाफ मामला है। उसे कमजोर करने की कोशिश आईटी सेल कर रहा है और ऐसी सेवा देने वालों के लिए सरकारी खर्च पर महंगी कार खरीदी जा रही है। इन कारों का उपयोग वे लोग करेंगे जो पहले ही ईनाम के रूप में पद प्राप्त कर चुके हैं। वेतन, भत्ते तो पा ही रहे हैं। सामान्य कारें होंगी ही, अब महंगी कारों की योजना है। यह भ्रष्टाचार को इलेक्टोरल बांड और अनिल मसीह की तरह संस्थागत रूप देने जैसा मामला है और इसपर खबर नहीं है। दूरदर्शन पर भी नहीं जिसके एंकर को सबसे मोटी तनख्वाह यह सरकार दे रही है। इसलिए मुझे लगता नहीं है कि इस लोक तंत्र में लोक के पास कुछ रह गया है। फिर भी जो नहीं बोल रहा है, डर रहा है उसकी बात छोड़िए लोग सरकार का प्रचार और बचाव भी कर रहे हैं। विरोधियों को अर्बन नक्सल कहा जा रहा है और हिन्दू होने भर से बुलडोजर न्याय का भी समर्थन और बचाव चल रहा है। यह सब तब जब प्रधानमंत्री और उनके प्रचारक दावा करते हैं कि इस सरकार पर भ्रष्टाचार का आरोप नहीं है। चुनाव आयोग एसआईआर का लाभ नहीं बता पाया लेकिन देश भर में करने की तैयारी चल रही है। जनगणना बाद में होगी।
यह सब इसलिए कि देश में स्वतंत्र पत्रकारिता की हालत ऐसी है कि राहुल गांधी को उनके पिता, दादी, परदादा के काम के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है और वो लोग भी ठहरा रहे हैं जिनके बाप दादा कांग्रेस में रहे हैं। आईटी सेल के लोगों से पैसे देकर गाली दिलवाने का मामला तो पहले से था, भारत रत्न देकर दिल जीता जा चुका है, भाजपा और संघ की राजनीति साधी जा चुकी है और अब आरोप है कि पैसे देकर लोगों के वोट कटवाए गए हैं। ऐसे में एक नए प्रचारक पद्म सम्मानित हैं। दूसरी ओर, देश में शिक्षा इलाज की व्यवस्था नहीं है, शिक्षा पर बजट कम हुआ है, इलाज बीमा भरोसे कर दिया गया है, स्वदेशी और आत्मनिर्भरता का प्रचार है, सत्यपाल मलिक जैसे राज्यपाल जो व्हिसल ब्लोअर थे उन्हें फंसा कर परेशान किया गया तब हजारों करोड़ के हथियारों की खरीद हो रही है। उसी देश में, उन्हीं लोगों के प्रतिनिधियों द्वारा लगभग मनमाने ढंग से जहां बोफर्स के छोटे से सौदे में कमीशन देने और लेने का आरोप था, कितनी राजनीति हुई, कुछ नहीं मिला और अब शिक्षा स्वास्थ्य की खबरें तो नहीं छपती हैं, हथियारों की खरीद की खबर अमर उजाला में पहले पन्ने पर है। जनता के लिए आत्मनिर्भरता और स्वदेशी की सीख, लोकपाल के लिए महंगी विदेशी गाड़ियां और सेना के लिए आधुनिक उपकरण।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल–चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।


