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आज के अखबार : पुरजोर कोशिश में हैं कि प्रधानमंत्री की छवि को बट्टा न लगे, उनकी आक्रामकता बनी रहे

संजय कुमार सिंह

विपक्ष के तमाम नेताओं को डराने-धमकाने, परेशान करने, जेल में रखने, किसी भी तरह चुनाव में हराने और खरीदने की तमाम कोशिशों में नाकाम रहने पर वाशिंग मशीन में धोने वाली पार्टी के मुखिया नरेन्द्र मोदी ने कहा है, “कांग्रेस के लिए परिवार सबसे पहले”। खरगे परिवार के नहीं हैं, तब भी। यही नहीं, भाजपा के लिए देश सबसे पहले का भी दावा है। नागरिकों को बेड़ियों में सैनिक विमान से भेजने और स्वीकार करने के बाद भी। विदेश मंत्री ने कहा है, … ये अमेरिका की नीति है। सवाल है कि अगर ऐसा है भी तो अपमान नहीं है? भाजपा की सरकार क्या कर पाई? इस संबंध में सोशल मीडिया पर चर्चा है कि छोटे से देश कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने अपने देश के नागरिकों को ज़ंजीरों में बाँधकर भेजना मंज़ूर नहीं किया और अमेरिकी वायुसेना के विमान को अपने देश की धरती पर उतरने देने से इनकार कर दिया। कोलंबिया के राष्ट्रपति गुस्तावो पेट्रो ने अपना विमान भेजकर सम्मान के साथ अपने देश के नागरिकों को स्वदेश लाने की व्यवस्था की और खबर है कि अमरीकी पेट्रोलियम कंपनी के साथ अरबों के तेल खनन समझौते को रद्द कर दिया है।

मुझे नहीं पता कि यह सब सही है कि नहीं लेकिन सोशल मीडिया पर चर्चा है तो भारत सरकार को बताना चाहिये कि यह गलत है या यह कि भारत सरकार ने ऐसा क्यों नहीं किया। पर सरकार और प्रचारकों की नीति के अनुसार यह खबर गायब है और भारत सरकार कह रही है कि यही होता है, यही नियम है और यह सामान्य है, जैसे पहले भी ऐसा होता रहा हो। आप जानते हैं कि भिन्न मौकों पर विदेश में फंसे भारतीयों को निकालने के लिए भारत सरकार ने क्या किया है और उसका कितना प्रचार किया गया है। अभी वह सब मुद्दा नहीं है लेकिन अखबोरों के लिए ना कोलंबिया (पहले पन्ने की) खबर है और ना भारत के पुराने पराक्रम। जिसका चुनाव प्रचार भी हुआ है। मोदी जी युद्ध रुकवा देते हैं से लेकर क्या नहीं। पर इस मामले में यह लाचारी और इसे छिपाने के लिए कांग्रेस पर आरोप। विदेश मंत्री का बचाव। आज यही सब लीड है।

आइये देखें आज कौन सा अखबार सरकार की कैसी सेवा कर रहा है। विदेश मंत्री द्वारा सरकार का बचाव और उसकी खबर तथा विपक्ष पर प्रधानमंत्री के हमले की खबर को अखबारों ने तब लीड बनाया है जब इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है, (विदेश मंत्री) जयशंकर ने संसद में कहा, यह सुनिश्चित करने के लिए कि निर्वासितों के साथ बुरा सलूक न हो अमेरिका से बातचीत हो रही है। अमर उजाला ने पहले पन्ने पर दो कॉलम में टॉप पर छापा है, राजनाथ ने फोन पर की अमेरिकी रक्षा मंत्री से बात। जाहिर है, देश के सम्मान की चिन्ता सरकार को है, उसके लिए काम भी हो रहा है पर स्वीकार नहीं करना है और आज यह दावा करने तथा उसका प्रचार करने का समय नहीं है कि, अमेरिका से निर्वासन नया नहीं, सुनिश्चित कर रहे भारतीयों से न हो कोई दुर्व्यवहार (अमर उजाला)।

कहने की जरूरत नहीं है कि यह दुनिया भर में हमेशा ही सुनिश्चित होना चाहिये और कहीं कोई दुर्व्यवहार हो तो उसपर देश और सरकार को सख्त रवैया अपनाना चाहिये। किसी देश में स्थिति खबार हो तो अपने नागरिकों को सूचना देने का काम सभी देश करते हैं। भारत को भी करना ही चाहिये। इस संबंध में दिसंबर 2013 का एक मामला याद किया जा रहा है। यह न्यूयॉर्क में तैनात भारत के महावाणिज्य दूतावास की तत्कालीन उप महावाणिज्य दूत देवयानी खोबरागड़े से संबंधित है। तब अमेरिकी अधिकारियों ने संगीता रिचर्ड नामक भारतीय राष्ट्रीयता की महिला को न्यूयॉर्क में खोबरागड़े के लिए घरेलू नौकरानी के रूप में रोजगार दिलाने के लिए संयुक्त राज्य अमेरिका में प्रवेश पाने के लिए वीजा धोखाधड़ी करने और झूठे बयान देने का आरोप लगाया था। तब भारत सरकार ने इस मामले में आवश्यक कार्रवाई की थी। 

आज द टेलीग्राफ की लीड का मुख्य शीर्षक है, बेड़ियां पहनाने की अमेरिकी मनमानी उपशीर्षक है, पर विश्व गुरु ने निर्वासितों की मुश्किलों पर होंठ सिल रखे हैं। ऐसा ही शीर्षक द हिन्दू का है, केंद्र ने निर्वासितों के साथ अमेरिकी व्यवहार को कम कर दिया। उपशीर्षक में बताया गया है, भारतीयों को हथकड़ी लगाने और बेड़ियों में वापस भेजने पर संसद के दोनों सदनों में विरोध हुआ। जयशंकर कहते हैं कि ऐसे उपायों का उपयोग मानक (सामान्य) व्यवहार है, सरकार ने कहा है कि अमेरिका ने 2009 से अभी तक 15,000 भारतीयों को वापस भेजा है। अखबार ने शीर्षक में नहीं बताया है कि इन्हें बेड़ियां लगाई गई थीं कि नहीं या विदेश मंत्री ने इस बारे में क्या कहा।  पहले पन्ने पर जितनी खबर है उसमें इस बारे में कुछ नहीं है। यह जरूर कहा गया है, विदेश मंत्री ने जोर देकर कहा कि सदन के सामूहिक हित में है कि अवैध आवाजाही को हतोत्साहित किया जाये और सरकार का फोकस अवैध पलायन उद्योग पर कार्रवाई होना चाहिये।

वैसे तो इसमें कोई शक नहीं है और यह नया भी नहीं है लेकिन सरकार ने यह नहीं बताया कि उसने इस दिशा में अब तक क्या किया है। अमेरिका में रह रहे मेरे मित्र ने अमेरिकी सेंसस ब्यूरो और ऑनलाइन उपलब्ध आंकड़ों के हवाले से बताया कि भारत से वैध और अवैध दोनों तरीके से अमेरिका जाने वालों की संख्या बढ़ी है। जाहिर है, इसका कारण होगा और भारत सरकार उन कारणों को दूर करने में नाकाम रही है। कायदे से इसपर भी चर्चा होनी चाहिये लेकिन क्या सरकार इसपर चर्चा करायेगी। दूसरी ओर, अवैध रूप से विदेश भेजने वाले दलाल खुले आम काम करते हैं, हाल में ऐसे नागरिकों से भरे एक विमान को शक होने पर वापस भेजा गया था। तब भी पता चला था कि यह काफी पैसों वाला खेल है। पर सरकार ने इसे रोकने या ऐस धंधा करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई की हो ऐसी खबर सुनने में नहीं आई।

आज इस मामले में दैनिक भास्कर की खबर काफी विस्तार से है और संसद में हंगामे से लेकर वापस भेजे गये लोगों की पीड़ा का पूरा विवरण देकर बताया गया है कि विदेश मंत्री ने क्या कहा। दैनिक भास्कर की खबर का मुख्य शीर्षक है, “कमाने गये थे… ‘आतंकी’ की तरह लौटे”। ऐसा नहीं है कि वे कमाने गये थे, अवैध ढंग से गये थे तो उसमें भारत सरकार की कोई भूमिका नहीं है और भारत सरकार इसे समान्य व्यवहार कहकर हाथ झाड़ सकती है। अव्वल तो सरकार ने ही स्वीकार किया है कि अवैध रूप से विदेश भेजने वाला उद्योग है जिसपर कार्रवाई की जानी चाहिये। लेकिन वैध ढंग से जाने वालों की संख्या बढ़ रही है तो यहां भी कुछ किये जाने या कम से कम उसपर विचार करने की जरूरत है लेकिन संसद की कार्यवाही आपने देखी हो तो स्पष्ट है कि सरकार इसपर किसी तरह की चर्चा के लिए तैयार नहीं है।

जो भी हो, मेरी चिन्ता अखबारों की खबर है और उससे जो दिख रहा है वह स्पष्ट है। जहां तक प्रवासियों की असुविधा की बात है, उन्हें सेना के मालवाहक विमान से भेजा गया है जिसमें न तो ढंग से बैठने की सुविधा होती है ना पर्याप्त शौंचालय होते हैं। यात्रा का समय ज्यादा होता है सो अलग। उसपर भी यात्रियों के हाथों और पैरों में बेड़ियां थीं फिर भी प्रधानमंत्री ने कहा है और अखबारों ने छापा है,  कांग्रेस के लिए परिवार प्रथम (नवोदय टाइम्स)। यह अलग बात है कि अखबार ने इसके साथ, राहुल पर परोक्ष हमला और कांग्रेस का यह बयान भी अलग से छापा है, पीएम का भाषण हमें गालियां दने के अलावा कुछ नहीं। कहने की जरूरत नहीं है कि दिल्ली चुनाव से पहले प्रधानमंत्री यह सब कर रहे थे तो समझा जा सकता था पर अब भी वही जारी है जबकि मतदान हो चुके हैं और मतगणना कल है। भारतीय नागरिकों और इस तरह भारत और यहां की सरकार का अपमान करने के अमेरिकी कदम पर संसद में हंगामा स्वाभाविक है और उसकी सही रिपोर्ट करने की जगह आज के बाकी अखबारों में  जो है वह इस प्रकार है।

हिन्दुस्तान टाइम्स ने विदेश मंत्री के कहे (सरकार की ओर से स्पष्टीकरण) को लीड बनाया है, “निर्वासन अमेरिकी नियमों के अनुसार : विदेश मंत्री संसद में”। सेकेंड लीड की शीर्षक है, “कांग्रेस से सबका साथ-सबका विकास की अपेक्षा गलत : मोदी”। उधर सरकार और प्रशासन का जो हाल है वह सुप्रीम कोर्ट में ही तय होता है। पहले पन्ने की एक खबर का शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के गवर्नर की खिंचाई की, अधिकारों की संभावनाओं पर सवाल किया। यह सभी राज्यों में आम है। और ऐसे राज्यपाल को तरक्की मिलने का उदाहरण भी है। द हिन्दू में यह खबर सेकेंड लीड है, सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल से पूछा, 12 विधेयकों को तीन साल तक लंबित रखने का ‘कुल’ मतलब क्या है।  यहां एक और खबर का शीर्षक है, राज्यपालों पर केरल की अपील सुप्रीम कोर्ट मार्च में सुनेगा।

दि एशियन एज में प्रधानमंत्री का आरोप लीड है और विदेश मंत्री का बचाव सेकेंड लीड। सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु के राज्यपाल से संबंधित मामले का शीर्षक यहां इस प्रकार है, विधेयकों में देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने तमिलनाडु के राज्यपाल से आठ प्रमुख सवाल पूछे। खबर के अनुसर, अदालत ने कहा है, लगता है अपनी प्रक्रिया अपना ली है। इसपर सुनवाई आज है। अमर उजाला में खबर है, अमेरिकी रक्षा मंत्री से राजनाथ सिंह ने बात की। दि एशियन एज का शीर्षक है, राजनाथ सिंह और अमेरिकी विदेश मंत्री ने भारत-अमेरिका रक्षा संबंधों को मजबूत करने में सहमति जताई। टाइम्स ऑफ इंडिया ने विदेश मंत्री को खुला मैदान दे दिया है। शीर्षक है, निर्वासित किये जाने वालों को बेड़ी लगाना नया नहीं है, महिलाओं को हथकड़ी नहीं लगाई गई थी। आप जानते हैं कि निर्वासितों को लेकर आया अमेरिकी विमान अमृतसर में उतरा था और उसे कवर करने के लिए पत्रकारों को नहीं जाने दिया दिया गया और मीडिया में उसकी कोई तस्वीर नहीं है। लेकिन विदेश मंत्री ने संसद में यह जानकारी दी है और टाइम्स ऑफ इंडिया उसे प्रचार दे रहा है।

यह सब तब है जब कुंभ नहाने वालों की संख्या सरकार को रोज मालूम हो रही थी, बताया जा रहा था और प्रचार हो रहा था। कुंभ में व्यवस्था जैसी हो, वहां मरने वालों की संख्या, उनका नाम पता आज-तक नहीं बताया गया है। जबकि दुनिया भर से लोगों को निमंत्रण के बाद वहां न सिर्फ भगदड़ मची बल्कि आग भी लग गई। हालांकि कोई हताहत नहीं हुआ पर कुंभ में लापता लोगों की संख्या भी नहीं मालूम है और जिस ढंग से लोग परेशान हैं उससे लगता है कि कंट्रोल रूम जैसी कोई चीज भी नहीं है। जबकि पहले कोई हादसा हो तो तुंरत कंट्रोल रूम बनाकर उसके नंबर सार्वजनिक कर दिये जाते थे। सुप्रीम कोर्ट में तमिलनाडु के राज्यपाल का मुद्दा द हिन्दू में सेकेंड लीड है लेकिन कई अखबारों के लिए पहले पन्ने की खबर भी नहीं है। इसका शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने कहा, लगता है तमिलनाडु के राज्यपाल ने विधेयकों पर सहमति देने की अपनी प्रक्रिया बना ली है।

नवोदय टाइम्स की लीड का शीर्षक है, अमेरिका से निर्वासित भारतीयों पर संसद में हंगामा। उपशीर्षक है, जयशंकर ने कहा – निर्वासन कोई नई बात नहीं है। यहां विज्ञापन से भरे पहले पन्ने की दूसरी खबर है, दो और एग्जिट पोल में (दिल्ली में) भाजपा सरकार का दावा। दूसरे पहले पन्ने की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस के लिए परिवार प्रथम। यानी अखबार ने मोदी के आरोप को कम महत्व नहीं दिया है। दूसरे नंबर पर रखा है और इस खबर में क्या है वह आप जानते हैं। कांग्रेस या परिवार से नरेन्द्र मोदी को क्या परेशानी है और क्यों है यह समझना अब मुश्किल नहीं है। फिर भी प्रधानमंत्री राहुल गांधी में ही फंसे हुए हैं और उनके पास कोई दूसरा मुद्दा नहीं है। वे अपनी तारीफ में यही कह और कहलवा सकते थे कि 18 घंटे काम करते हैं, बिना छुट्टी काम कर रहे हैं आदि। दूसरी ओर राहुल गांधी गंभीरता से मुद्दों की बात कर रहे हैं और उनके सामने डट कर खड़े हैं। यही नहीं, उनकी ही नहीं, आरएसएस की भी पोल खोल रहे हैं तो राहुल गांधी से परेशान स्वाभाविक है जबकि उनकी शिकायत पर कांग्रेस में काफी बदलाव हुए हैं। और नरेन्द्र मोदी जिन चीजों के लिए कांग्रेस की आलोचना करते थे वो सब अब भाजपा में नजर आ रही हैं तब भी नरेन्द्र मोदी और उनके प्रचारक वैसे ही हैं। इंडियन एक्सप्रेस में तमिलनाडु में पत्रकारों के फोन जब्त करने पर एसआईटी की खिंचाई शीर्षक से खबर है। इस टीम में सभी महिलायें थीं और हाईकोर्ट ने प्रेस की आजादी का बचाव करते हुए कहा है कि निगरानी का डर वलोकतंत्र के चौथे स्तंभ, मीडिया पर हमला है।    

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