
पंकज चतुर्वेदी-
दिल्ली में कल ‘आलोचना’ के सम्पादक आशुतोष कुमार के घर भी गया था। वह कविता पर बहस और आलोचना की संस्कृति के इस अभाव पर चिन्तित हैं। उनके मुताबिक़ : “बीते पच्चीस-तीस वर्षों में एक सांस्कृतिक शिफ़्ट घटित हुआ है, जिसके कारण आलोचना पृष्ठभूमि में चली गई है और अक्सर केवल रचनाएँ सामने हैं। समकालीन कविता से मुठभेड़ करने वाली आलोचना ग़ायब है। अगर लगभग पाँच सौ कवि सक्रिय हैं- जो कि हैं- तो यह बताने वाला कोई नहीं है कि इनमें पचास कवि कौन-से हैं, जिनका अवदान महत्त्वपूर्ण है और किन कारणों से महत्त्वपूर्ण है? इसकी वजह यह भी है कि आलोचना के प्रति रचनाकार ज़रा भी सहिष्णु नहीं रह गए हैं। ऐसे में वह माहौल ही नहीं है, जिसमें आलोचना-कर्म के लिए लोग प्रेरित और उत्साहित महसूस करें।”
‘आलोचना’ के उनके साथी सम्पादक संजीव कुमार ने इस बार ‘हंस’ की वार्षिक संगोष्ठी के एक सत्र में 15 नवम्बर को वक्तव्य देते हुए टी.एस. इलियट के हवाले से कहा कि “प्रत्येक रचनाकार के भीतर एक आलोचक होता है और रचना करते समय वह सक्रिय रहता है कि क्या लिखें और कैसे लिखें!”
इस सही बात की रौशनी में सवाल उठता है कि विगत लगभग तीन दशकों से स्वयं कवियों ने कविता पर वैचारिक और आलोचनात्मक लेखन बन्द क्यों कर दिया है, जबकि उनके भीतर भी एक आलोचक सक्रिय रहता होगा?
क्या इसका कारण भूमंडलीकरण से बनी वैश्विक सभ्यता है, जिसके चलते पूरी दुनिया में पूँजी के वर्चस्व और विजय की दुंदुभी बज रही है और साहित्य संसार में समाजवादी सरोकार ज़्यादातर क्षीण और निस्तेज पड़ गए हैं?
पूँजी का जब भी आधिपत्य होता है, आलोचना की संस्कृति को ठेस पहुँचती है। रचनाकारों में परस्पर प्रेम नहीं, प्रतियोगिता की भावना प्रधान हो जाती है। इसके चलते एक-दूसरे के अवदान पर खुले विमर्श के बजाय रणनीतिक चुप्पियों, निन्दा और दुरभिसन्धियों का निम्नगामी परिवेश रहता है।
नतीजा क्या है? पुरस्कार तो हैं, पर विचार नहीं है। ब्लर्ब और संस्तुतियाँ हैं, आलोचना नहीं। प्रतियोगिता है, प्रेम नहीं। निर्ममता है, संवेदना नहीं। ऐसे में पुरस्कृत कवि के लेखन की विडम्बना, अगर है- को कौन सामने लाएगा और अ-पुरस्कृत के महत्त्वपूर्ण अवदान, अगर है- को कौन उजागर करेगा, जो कि आलोचना का सबसे ज़रूरी कर्तव्य है?
आठवें दशक के प्रायः सभी अहम कवियों- मंगलेश डबराल, राजेश जोशी, उदय प्रकाश, अरुण कमल, विजय कुमार, असद ज़ैदी- ने काफ़ी आलोचनात्मक लेखन किया, मगर उसके बाद यह धारा अवरुद्ध हो गई। ज़्यादातर महत्त्वपूर्ण कवियों ने जैसे मान लिया है कि वे केवल कविता लिखेंगे, उस पर विचार और आलोचना उनका काम नहीं है। अगर वे थोड़ा-बहुत कुछ लिखते या कहते भी हैं, तो अपने और अपनी कविता के बारे में।
समूचे परिदृश्य को, दूसरे रचनाकारों के अवदान को लेकर उनके विचार क्या हैं, इसे पढ़ना और जान पाना लगभग असम्भव है।
अगर वे गद्य लिखते भी हैं, तो आलोचनात्मक गद्य नहीं, कहानियाँ और उपन्यास लिखते हैं। ऐसी रचनात्मक सक्रियता स्वागत-योग्य है, क्योंकि प्रसाद, निराला, अज्ञेय, मुक्तिबोध, रघुवीर सहाय, श्रीकान्त वर्मा, राजकमल चौधरी, कुँवर नारायण जैसे बड़े कवियों ने कहानियाँ और उपन्यास बहुत लिखे, लेकिन आलोचना भी बहुत की। अपने समय की रचनाशीलता को लेकर वे ख़ामोश नहीं थे। जैसी चुप्पी बीते तीन दशकों से छाई है, आधुनिक हिन्दी कविता के इतिहास में ऐसा दौर पहले शायद कभी नहीं था।
इन स्थितियों के बारे में सोचता तो बराबर रहा हूँ, लेकिन दोस्तों के उकसाने पर विचलन जब बहुत बढ़ जाता है–जैसे कि अभी बढ़ा हुआ है–तो लिख भी देता हूँ। आप सबके समक्ष प्रस्तुत इसलिए कर रहा हूँ कि ख़ामोशी की इस व्यापक परिघटना के कारणों को आपके विचारों के आलोक में समझना चाहता हूँ। हो सकता है, मैं ही ग़लत दिशा में सोच रहा होऊँ। अपनी हालत के मद्देनज़र वीरेन डंगवाल की ये कविता-पंक्तियाँ याद आती हैं :
“मृत्यु का अभेद्य प्रसार।
इस उजाड़ झुटपुटे में कोई नहीं
रास्ता बताने वाला।”



