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मजीठिया का पैसा मिलने के बाद कोई चने की दुकान खोलेगा तो कोई गाड़ी चलाएगा!

मजीठिया पाने के बाद क्या क्या करेंगे पत्रकार…. मजीठिया क्रांति पर साझा किया विचार… मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे देश भर के पत्रकारों से वाट्सअप ग्रुप मजीठिया क्रान्ति पर ये जानने का प्रयास किया गया कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने या नौकरी छूटने के बाद वे क्या करेंगे तो कुछ साथियों के जवाब जोश भरने के लिए काफी थे। राजस्थान पत्रिका के अरुण जी ने अपने विचार शेयर किया कि… ”मैंने तो प्लान कर रखा है, आज टर्मिनेट कर दे संस्थान, मैं अपना धंधा शुरू कर दूंगा। मजीठिया मिले या न मिले मेरे दिमाग से नौकरी का खौफ ख़त्म हो गया है। मैं हर समय यह सोचता हूँ कि मुझमे क्या क़ाबलियत है। हमारा दिमाग और हाथ पैर सही है। जो दिव्यांग है वो भी जीवन जीते हैं। मै राजस्थान पत्रिका सीकर में हूँ। मेरा ट्रान्सफर भोपाल से सीकर किया गया था पिछले साल 17 अगस्त 2015 को। आज पूरे एक साल हो गए। आप सभी में क़ाबलियत है। बस उसे पहचानने की ज़रूरत है। संस्थान हम सबको 24 घंटे बिजी रखता है ताकि हम कुछ नया या अलग हटकर न सोच सकें। पैसे भी इतने दिए जाते हैं कि आप जमा ना कर सकें। मैं भोपाल में फ्रंट पेज देखता था। 8 साल पत्रिका में बिताये लेकिन खबर से बाहर नहीं निकल सका। ट्रान्सफर होने के बाद मैं सीकर में ज़िले की खबरे पढता हूँ। दिनभर खाली। कोई tv नहीं। संस्थान के न्यूज़रूम में भी नहीं। खबरों का दबाव ख़त्म। बाजार घूमता हूं तो देखता हूँ कौन कैसे धंधा कर रहा है और बारीकिया ढूंढता हूँ धंधे की। मैंने सीकर में ड्राइविंग भी सीखी। क्या पता कौन सा काम करना पड़े। खुद को तयार कर रहा हूँ आगे जीवन कैसे चलेगा।”

मजीठिया पाने के बाद क्या क्या करेंगे पत्रकार…. मजीठिया क्रांति पर साझा किया विचार… मजीठिया वेज बोर्ड की लड़ाई लड़ रहे देश भर के पत्रकारों से वाट्सअप ग्रुप मजीठिया क्रान्ति पर ये जानने का प्रयास किया गया कि मजीठिया वेज बोर्ड का लाभ पाने या नौकरी छूटने के बाद वे क्या करेंगे तो कुछ साथियों के जवाब जोश भरने के लिए काफी थे। राजस्थान पत्रिका के अरुण जी ने अपने विचार शेयर किया कि… ”मैंने तो प्लान कर रखा है, आज टर्मिनेट कर दे संस्थान, मैं अपना धंधा शुरू कर दूंगा। मजीठिया मिले या न मिले मेरे दिमाग से नौकरी का खौफ ख़त्म हो गया है। मैं हर समय यह सोचता हूँ कि मुझमे क्या क़ाबलियत है। हमारा दिमाग और हाथ पैर सही है। जो दिव्यांग है वो भी जीवन जीते हैं। मै राजस्थान पत्रिका सीकर में हूँ। मेरा ट्रान्सफर भोपाल से सीकर किया गया था पिछले साल 17 अगस्त 2015 को। आज पूरे एक साल हो गए। आप सभी में क़ाबलियत है। बस उसे पहचानने की ज़रूरत है। संस्थान हम सबको 24 घंटे बिजी रखता है ताकि हम कुछ नया या अलग हटकर न सोच सकें। पैसे भी इतने दिए जाते हैं कि आप जमा ना कर सकें। मैं भोपाल में फ्रंट पेज देखता था। 8 साल पत्रिका में बिताये लेकिन खबर से बाहर नहीं निकल सका। ट्रान्सफर होने के बाद मैं सीकर में ज़िले की खबरे पढता हूँ। दिनभर खाली। कोई tv नहीं। संस्थान के न्यूज़रूम में भी नहीं। खबरों का दबाव ख़त्म। बाजार घूमता हूं तो देखता हूँ कौन कैसे धंधा कर रहा है और बारीकिया ढूंढता हूँ धंधे की। मैंने सीकर में ड्राइविंग भी सीखी। क्या पता कौन सा काम करना पड़े। खुद को तयार कर रहा हूँ आगे जीवन कैसे चलेगा।”

इसी तरह दैनिक भास्कर के प्रिंसपल करस्पांडेंट धर्मेन्द्र प्रताप सिंह ने अपने जो विचार शेयर किए उसके मुताबिक़ किसी ने यूं ही नहीं कहा था कि आवश्यकता अविष्कार की जननी है… मुझे ही देख लीजिए। पिछले करीब २१ वर्षों से “दैनिक भास्कर” में हूं। इस दौरान मेरे मन में कभी “भास्कर” से अलग जाकर पत्रकारिता करने का विचार ही नहीं आया। इसका कारण बड़ा स्पष्ट है- दरअसल, मेरे यहां आने से पहले यह अखबार जहां मध्य प्रदेश का नंबर वन था, वहीं निरंतर प्रगति करते हुए “भास्कर” अब भारत का नंबर वन अखबार बन चुका है! बेशक, इसका कोई प्रत्यक्ष लाभ मुझे नसीब नहीं हुआ… लेकिन अन्य अखबारों के अंदरूनी हालात से परिचित होने के कारण मुझे “भास्कर” का पत्रकार कहलाने में सदैव गर्व की अनुभूति हुई! दूसरे, मालिकों में भी ज्यादातर लोग मुझे सीधे जानते-पहचानते हैं… विशेषकर, गिरीश अग्रवाल जी, जिन्होंने मेरी नियुक्ति की है! सो, सौगंध की भी जरूरत पड़ने पर मैं अक्सर “भास्कर” का ही नाम लेता आया हूं! अब रहा प्रश्न “भास्कर” से भिड़ने का तो इसकी मुख्य वजह ठेकेदारनुमा संपादक एवं कुछ अन्य बिचौलिये हैं। ये स्वयं तो लाखों का पैकेज ले रहे हैं, किंतु बदले में वे संस्थान को क्या देंगे? इसके जवाब में ये एक ऐसा राग अलापते हैं कि मालिकान भी झांसे में आ जाते हैं- ‘सबसे पहले दर्जन भर कर्मचारियों को बाहर का रास्ता दिखाऊंगा!’ जाहिर है कि मालिकों को भी लगता है कि फिर तो यह हमें मुफ्त में पड़ रहा है, भले ही इस चक्कर में उसके सबसे भरोसेमंद साथी (कर्मचारी) की बलि क्यों न ले ली जाए! खैर, आज यह सब लिखने की मेरी वजह अगर प्रशांत बोड़के जी हैं तो मैं उन्हें आश्वस्त कर दूं कि मुझ पर चाहे जो भी गुजरे, मैं आत्महत्या करने के बारे में तो कभी सोचूंगा भी नहीं। हां, आगामी कल को लेकर कुछ योजनाएं जरूर बना रखी हैं… एक योजना अपने सभी साथियों से शेयर करना चाहूंगा। मित्रों, हमारे मुकदमे का निर्णय कुछ भी आए। एक बात तय है कि हम अपने-अपने संस्थानों में ज्यादा दिनों तक बने नही रह पाएंगे… जीत हासिल कर लेने के बाद भी परिस्थितियां ऐसी निर्माण कर दी जाएंगी कि हमें रोजगार के दूसरे विकल्प तलाशने ही होंगे। इसलिए मैंने तय कर रखा है कि मुंबई के ऐसे जितने भी कालेज हैं, जहां पत्रकारिता की डिग्री ‘प्रदान’ की जाती है, उसी के ठीक सामने चना-कुरमुरा (भेल) आदि बेचूंगा… और हां, हमारी दुकान पर एक बड़ा-सा बोर्ड जरूर होगा- “धर्मेन्द्र प्रताप सिंह… एक्स प्रिंसिपल करेस्पॅान्डेंट… देश का सबसे बड़ा एवं ‘अ’विश्वसनीय अखबार- “दैनिक भास्कर”। अत: आपमें से किसी को भी उसकी फ्रेंचाइजी चाहिए तो बुकिंग आज ही करा लीजिए (नोट: अभी देश-विदेश में मेरी कोई शाखा नहीं है!)।

इसी तरह नासिक के दैनिक भास्कर के पत्रकार प्रशांत बोडके का कहना है कि मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से मुझे मेरा बकाया मिल जाए तो मैं थोक में प्याज का धंधा करूँगा नासिक में।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आर टी आई एक्टिविस्ट
9322411335
[email protected]

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