
कृष्ण पाल सिंह-
मनोज कुमार सिंह उत्तर प्रदेश में मुख्य सचिव पद से सेवानिवृत्त हो चुके हैं और उनके स्थान पर नये मुख्य सचिव के रूप में मुख्यमंत्री कार्यालय के अपर मुख्य सचिव के रूप में कमान संभाले हुए शशि प्रकाश गोयल को दायित्व ग्रहण कराया जा चुका है। इस फेरबदल को सम्पन्न हुए लगभग 1 सप्ताह बीत गया है लेकिन अभी भी मनोज कुमार सिंह के रिटायरमेंट को लेकर चर्चाएं बंद नहीं हुई हैं।
मनोज कुमार सिंह को एक तरह से बाध्यकारी परिस्थितियों में सेवा से विदाई लेनी पड़ी क्योंकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने उनके सेवा विस्तार के लिए सरकार की नीतियों को सफल बनाने में उनके योगदान की विस्तृत चर्चा करते हुए प्रबल संस्तुति भेजी थी। चूंकि केंद्र में भी भाजपा की सरकार है इसलिए कोई कारण नहीं था कि केंद्र के बॉस जो अपने ही लोग हैं उनकी संस्तुति को स्वीकार नहीं करते। लेकिन जैसा कि पूर्व पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार के मामले में हुआ केंद्र ने बहुत ही उपेक्षा पूर्वक उनकी संस्तुति को एक किनारे कर दिया।
मुख्यमंत्री को बताया तक नहीं गया कि मुख्य सचिव का सेवा विस्तार मंजूर नहीं किया जा रहा है। गत 31 जुलाई को शाम 5 बजे तक मनोज कुमार सिंह का कार्यकाल नियत था। तब तक वे और मुख्यमंत्री इस आशा में रहे कि अंतिम घड़ी तक केंद्र की हरी झण्डी दिखाने की खबर आ जायेगी। जब समय पूरा हो गया और केंद्र के रिस्पोंस का कुछ पता नहीं चला तब मन मारकर राज्य सरकार को उनके स्थान पर शशि प्रकाश गोयल की नियुक्ति का आदेश जारी करना पड़ा।
जाहिर है कि केंद्र सरकार का यह रवैया मुख्यमंत्री की बहुत फजीहत करने वाला था। ऐसा क्यों हुआ तो एक वजह तो स्पष्ट रूप से यह दिखती है कि केंद्रीय नेतृत्व का योगी के प्रति द्वेष अभी समाप्त नहीं हुआ है। योगी को हिंदू बयान वीरता के कारण प्रसिद्धि के आसमान पर उड़ने का अवसर जब मिल गया था तो वे इतराने लगे थे। ठसक में उनका भाव किसी की परवाह न करने वाला हो गया था। इसकी वजह से अमित शाह के तमाम मामलों में इशारे उन्होंने जानबूझकर झटक दिये। साफ है कि वे स्वर्णिम नजर आ रहे अपने दौर में खुद को दूसरा कल्याण सिंह साबित करने में लग गये थे।
कल्याण सिंह को भी सरकार चलाने के मामले में केंद्रीय नेतृत्व यहां तक कि संघ का भी हस्तक्षेप स्वीकार नहीं होता था। जो बात उन्हें हजम न हो तो वे न तो अटल-आडवाणी की सुनते थे और न रज्जू भैया की। इसकी कई मिसाले बताई जा सकती है। योगी भी शायद उनके जैसा बनने की सोचने लगे थे। लेकिन अटल-आडवाणी दूसरे लोग थे और मोदी-शाह को बनाने वाली मिटटी अलग है। उनमें उदारता दिखाने के विशाल हृदय का एकदम अभाव है। उनकी अधिनायक जैसी कठोरता और निर्ममता का ही परिणाम है कि आज पूरी पार्टी में उनका डर पसरा हुआ है। कोई उनके निर्णय का प्रतिवाद करना तो दूर उन्हें सलाह देने तक के लिए मुंह खोलने की जुर्रत नहीं रखता। लेकिन योगी फिर भी दुस्साहस कर रहे थे इसलिए उन्हें सबक सिखाने का निश्चय किया गया।
इसके बाद उत्तर प्रदेश में विवादों का बवंडर मच गया। मंत्रियों से लेकर विधायकों तक की जुबान मुख्यमंत्री के खिलाफ खुलवाई जाने लगी। बृजभूषण सिंह जैसे क्षत्रपों को भी इसके लिए आगे कर दिया गया। कुंभ में हुई भगदड़ में मौतों के मामले में भी उनसे पहले मोदी ने शोक संवेदना का संदेश ट्वीट करके उन्हें खलनायक बना दिया। संसद में मोदी ने महाकुंभ के सफल आयोजन की बधाई देते समय योगी के नाम का उल्लेख करना उचित नहीं समझा। इतना ही नहीं अमित शाह ने उन्हें बुलाकर आगाह किया कि पार्टी हित में आपका दायित्व बदलने पर सोचा जा सकता है जिसके लिए आप तैयार रहे तो वे बुरी तरह हड़बड़ा गये।
कुल मिलाकर ऐसा माहौल बन गया कि मुख्यमंत्री चारों तरफ से अपने को घिरा महसूस करने लगे और उनका मनोबल इन विकट आपदापूर्ण स्थितियों में जबाव दे गया तो आखिर योगी को केंद्रीय नेतृत्व के सामने साष्टांग होने के अलावा कोई चारा दिखना बंद हो गया। इसके बावजूद प्रधानमंत्री से उन्हें मुलाकात का समय नहीं मिल रहा था। आखिर में अमित शाह ने उनसे भेंट की। जिसमें योगी पूरी तरह पस्त थे। एक तरह से उन्होंने अमित शाह को आश्वस्त किया कि भविष्य में उनसे कोई गुस्ताखी नहीं होगी। वे केंद्रीय नेतृत्व के वफादार सिपाही के रूप में उनके हर दिशा निर्देश का पालन करते हुए काम करेंगे।
अमित शाह ने उन्हें ऊपरी तौर से तो उन्हें अभयदान दे दिया लेकिन शायद केंद्रीय नेतृत्व यह तय कर चुका है कि उन्हें चैन से काम नहीं करने देना है ताकि भविष्य में भी उनके सिर उठाने के खतरे का सामना न करना पड़े।
उधर योगी को अभी तक प्रधानमंत्री नौसिखिये की तरह ही ट्रीट करते हैं। जिस तरह कोई उस्ताद ट्रेनी को लेकर किसी तरह का लिहाज बरतने की जरूरत महसूस नहीं करता। प्रधानमंत्री मोदी जब पिछली बार वाराणसी आये थे उस समय वहां 19 साल की एक लड़की के साथ 23 लोगों द्वारा अलग-अलग जगह पर ले जाकर रेप किये जाने का मामला गरमाया हुआ था। प्रधानमंत्री ने इस मामले में एयरपोर्ट पर उतरते ही वाराणसी के पुलिस आयुक्त, डिवीजनल कमिश्नर और डीएम से बात की जिसमें योगी आदित्यनाथ शामिल नहीं थे। यह अपने संसदीय क्षेत्र के बड़े मामले में उनके द्वारा सीधे कमान संभालने का संकेत था।
अभी 2 अगस्त को जब वे फिर वाराणसी आये तो उन्होंने इस बार भी यही किया। लोग मान रहे हैं कि मोदी ने ऐसा इसलिए किया ताकि लोग जान जाये कि वे मुख्यमंत्री की प्रशासनिक क्षमता पर विश्वास नहीं रखते। मुख्यमंत्री के कद को अदना करने की इसी रणनीति के तहत न तो उनके पसंद के डीजीपी को सेवा विस्तार देने का अनुग्रह किया गया और न ही मुख्य सचिव को। जाहिर है कि योगी आदित्यनाथ के इकबाल को तार-तार करने में कोई कसर नहीं छोड़ी जा रही है।
तो मनोज कुमार सिंह का सेवा विस्तार न होने का एक कारण तो यह है कि वे अहम की इस लड़ाई में बीच में पिस गये। दूसरा कारण जो बताया जा रहा है वह मोदी सरकार के गॉड फादर कहे जाने वाले उद्योगपति गौतम अडानी के कारोबारी हित से जुड़ा है। मिर्जापुर में वन क्षेत्र में एक कंपनी ने थर्मल पावर प्लांट स्थापित करने का उपक्रम किया तो हरित न्यायधिकरण आड़े आ गया। जब उस कंपनी को किसी तीन तिकड़म से सफलता नहीं मिली तो उसके मालिक गौतम अडानी के शरण में पहुंच गई। किस्सा कोताह यह है कि गौतम अडानी ने औने-पौने में उस कंपनी से यह प्रोजेक्ट हस्तगत कर लिया। थर्मल पावर प्लांट के लिए जब चाहरदीवारी बनने लगी तो एनजीटी को फिर खबर हुई जिस पर उसने बिना अडानी के नाम की परवाह किये काम रोकने के नोटिस जारी कर दिये।
मनोज कुमार सिंह मुख्य सचिव थे। उनके सामने नोटिस आया तो उन्होंने मुख्यमंत्री के कान में बात डाल दी। योगी आदित्यनाथ ने उनसे साफ कह दिया कि नियम के खिलाफ किसी को रियायत न दी जाये और इसके बाद मनोज कुमार सिंह ने अडानी का काम रुकवा दिया। जिस दिन उन्होंने अडानी का काम रोका उसी दिन उनकी नौकरी के डेथ वारंट पर हस्ताक्षर हो गये। होना यह चाहिए था कि मनोज कुमार सिंह समझते कि यह अडानी का काम है इसलिए उसे संभव बनाने का कौशल उन्हें दिखाना चाहिए था। वे एनजीटी को मैनेज करते और मुख्यमंत्री को समझाते कि इस थर्मल पावर प्लांट के लगने से प्रदेश को कितना लाभ होगा और आपको कितना यश मिलेगा।
मनोज कुमार सिंह यह कार्यकुशलता नहीं दिखा सके। जिससे अडानी भड़क गये और उनकी मर्जी खिलाफ देखी तो केंद्र सरकार में मनोज कुमार सिंह की सेवा विस्तार की फाइल कूड़े में फेंक दी गयी। अगर यह कारण सही है तो मानना पड़ेगा कि उनकी खुशी के लिए एक दम फिट अधिकारी चुना गया है। शशि प्रकाश गोयल को सभी को मैनेज रखने में महारत हासिल है। केंद्रीय विभागों के सारे सीनियरों से वे राब्ता बनाये रहते हैं। न्यायधिकरणों व अन्य प्रभावी संस्थाओं में भी उनकी खासी पैठ है। अमित शाह के तो वे विश्वास पात्र हैं ही संघ भी उन पर मेहरबान रहता है। इसके बावजूद मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को खुश रखने का मंत्र भी वे जानते हैं।
जाहिर है कि ऐसे खिलाड़ी अधिकारी को अडानी का काम कराने में सफल हो ही जाना है। साथ ही अडानी का जो इंट्रेस्ट है अमित शाह का स्वतः वही इंट्रेस्ट होगा। तो अब मिर्जापुर थर्मल पावर प्लांट तो क्या केंद्र की मंशा के किसी भी प्रोजेक्ट में लखनऊ के स्तर पर रुकावट नहीं आने वाली।


