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मीडिया में भविष्य से बड़ी हैं वर्तमान की चुनौतियां

दिल्ली : कोंस्टीट्यूशन क्लब (सभागार) में गत दिनो वरिष्ठ पत्रकार स्व. आलोक तोमर की चौथी पुण्यतिथि पर आयोजित सेमिनार में देश के दिग्गज पत्रकारों ने हिस्सा लिया और आलोक तोमर को याद किया। सेमिनार का नाम “यादों में आलोक” तथा मुख्य विषय “मीडिया की भविष्य की चुनौतियां” था, जिस पर आम से लेकर खास तक ने अपने विचार रखे और आने वाली परिस्थितियों पर मीडिया जगत को आगाह किया। इस दौरान किसी ने मीडिया को कोसा तो किसी ने सराहा। मिलीजुली प्रतिक्रियाओं के बीच सेमीनार की शुरुआत हुयी।

दिल्ली : कोंस्टीट्यूशन क्लब (सभागार) में गत दिनो वरिष्ठ पत्रकार स्व. आलोक तोमर की चौथी पुण्यतिथि पर आयोजित सेमिनार में देश के दिग्गज पत्रकारों ने हिस्सा लिया और आलोक तोमर को याद किया। सेमिनार का नाम “यादों में आलोक” तथा मुख्य विषय “मीडिया की भविष्य की चुनौतियां” था, जिस पर आम से लेकर खास तक ने अपने विचार रखे और आने वाली परिस्थितियों पर मीडिया जगत को आगाह किया। इस दौरान किसी ने मीडिया को कोसा तो किसी ने सराहा। मिलीजुली प्रतिक्रियाओं के बीच सेमीनार की शुरुआत हुयी।

पूरे कार्यक्रम का आयोजन “सुप्रिया मैम” की तरफ से हर वर्ष इसी तरह कराया जाता है। इसी बहाने “आलोक जी” को याद करके मीडिया के तमाम दिग्गजों को एक ही छत के तले इकठ्ठा करना भी होता है। ऐसा यदा-कदा ही होता है, जब कई चैनलों या अख़बारों के सीनियर्स एक ही साथ बैठे नज़र आएं, जैसा कि 20 मार्च को हुआ। फिलहाल सेमीनार में “मीडिया की चुनौतियों” पर राजनेताओं से लेकर वरिष्ठ पत्रकार तक ने अपनी बातें रखीं। उन सभी को सुनने के बाद मेरी भी कलम छटपटाने लगी है कुछ लिखने के लिए।

आपको बता दें की उस सेमीनार में “मैं” भी एक दर्शक, श्रोता के रूप में गया था, ऐसा मौका हमारे लिए पहलीवार था, जब सुप्रिया मैम ने मुझे इस सेमीनार में बुलाया,, मैं खुद को भाग्यशाली समझता हूँ कि मुझे इतने बड़े पत्रकारों को एक साथ देखने, सुनने का मौका मिला। सभी भविष्य की मीडिया को लेकर चिंतित थे। मुद्दे पर आता हूँ ,मै खुद को पत्रकार का ” प ” भी नहीं कह सकता और न ही समझता हूँ, लेकिन आज लिखना जरूर चाहता हूँ, और उसकी हमे स्वतंत्रता है।

”मीडिया की भविष्य की चुनौतियों ” पर लिखने से पहले हमे अपने वर्तमान को ही खंगालना होगा। हमे वर्तमान के मीडिया को ही गौर से देखना होगा की हमारे वर्तमान में ही कहीं न कहीं कोई खामी पनप चुकी है। तभी आज हमे भविष्य की चिंता करनी पड़ रही है। मतलब यह है कि वर्तमान के मीडिया की चुनौतियों पर विचार करना मैं पहले महत्वपूर्ण समझता हूँ। सेमीनार में बीबीसी के संपादक नीधीश त्यागी ने “आलोक तोमर” को समर्पित एक कविता लिखी थी जोकि मंच के माध्यम से पढ़ी गयी थी “ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग”। यह कविता भविष्य नहीं, वर्तमान मीडिया की खामियों को कुरेदती है। आज असल मायने में वही लीग पत्रकारिता में आ रहे हैं, जिन्हे कहीं कोई जगह नहीं मिल रही या कहें कि “ढंग का वाक्य न लिख पाने वाले लोग” ही पत्रकार का दर्ज़ा प्राप्त किये हुए हैं। 

मैं सभी को ऐसा नहीं बोल रहा हूँ, लेकिन ज़मीनी स्तर पर देखा जाये तो संख्या बल में यही लोग ज्यादा निकलेंगे, जिन्हें पत्रकारिता का “प” भी नहीं मालूम है। उदहारण देना मैं उचित नहीं समझता हूँ, लेकिन यही हकीकत है। हमारे वरिष्ठतम लोग भी भलीभांति जानते हैं कि आज पत्रकारिता का स्तर कहां से कहां चला गया है और एक पत्रकार की अहमियत कितनी रह गयी है। फिर भी हम खामोशी का चोला ओढ़ कर बैठे हुए हैं भविष्य की चुनौतियां गिनने के लिए। अच्छा होगा कि हम भविष्य की फ़िक्र छोड़ दें और वर्तमान को सुधारने की कोशिश करें क्योंकि वर्तमान की समस्याएं ही भविष्य की गंभीर चुनौतियां बन जाएंगी

आज जो वास्तव में पत्रकार कहलाने के हक़दार हैं, उनकी तो उपेक्षा होती है। उन्हें फ्रीलांसर बन कर काम करने को मजबूर होना पड़ रहा है, जिन्हें कलम पकड़ने का ज्ञान नहीं, वह खुद को कलमकार बनाते डोल रहे हैं। आज के दौर में मीडिया से ज्यादा मीडियाकर्मी की समस्याएं और शिकायतें हैं, फिर चाहे वह किसी भी संस्था के पत्रकार हों।

समस्याएं जस की तस हैं। सर्वप्रथम छोटे चैनलों की आर्थिक स्थिति का खामियाजा उनके कर्मियों (पत्रकारों) को भुगतना पड़ता है जिससे पत्रकार पर पारिवारिक तथा मानसिक दोनों तरह का दबाव पड़ता है। वास्तविकता में आज किसी भी पत्रकार की नौकरी की कोई गारंटी नहीं है। शाम को ऑफिस से घर पहुंचा, और सुबह बिना बताए ही नौकरी से निकाल दिए गया। पत्रकारों की इतनी भरमार है और संसाधनों की कमी है, उसके बावजूद यहाँ मेहनत, प्रतिभा व काम के अनुसार प्रमोशन नहीं मिलता। सबसे बड़ी व न ख़त्म होने वाली तो यही समस्या है।

आखिर इसके लिए जिम्मेदार कौन हैं, हमारे सीनियर्स या कोई और। इसके साथ ही पत्रकार की जानमाल पर आ जाने पर मीडिया हाउसों द्वारा पल्ला झाड़ लिया जाता है। ऐसे हालात में संस्थान, क्या पत्रकार साथी भी मदद के लिए सामने नहीं आते। इसके अलावा चाटुकारिता के माध्यम से लगातार अच्छे मुकाम और मनचाही सैलरी पाने वाले चाटुकार (पत्रकार) भी पत्रकारों के लिए गंभीर समस्या बने हुए हैं। अगर ऎसी ही पत्रकारिता में चाटुकारिता का बोलबाला रहा तो पत्रकारों और पत्रकारिता दोनों के और भी दिन खराब हो जायेंगे। सभी खामियों पर आज से ही विचार करने की जरुरत है न कि भविष्य में। आगे चलकर तो यह बड़ी विकराल हो जाएगी। 

आज वैसे भी एक फौज तैयार की जा रही है पत्रकारों की, आखिर इसे तैनात कहां किया जायेगा, यह बड़ी चिंता का विषय है। प्राइवेट संस्थाओं द्वारा लगातार पत्रकार बनाने का बीड़ा उठाया जा रहा है, जिसमें कुछ भोले भाले लोगों को लालच देकर मोटी रकम जमा करवा ली जाती है। बड़े बड़े सब्जबाग दिखाकर उन्हें पत्रकार बनाया जा रहा है। इस सब के लिए जिम्मेदार कौन है? ऐसी ही तमाम और भी चुनौतियां मीडिया में व मीडिया के लिए ही पनप रही हैं। यहाँ तस्वीर देखकर तरक्की देने का रिवाज सा चल पड़ा है, जोकि घातक है। 

अगर कोई पत्रकार मीडिया में किसी बड़े पद पर नहीं बैठा है तो सुबह घर से निकलकर शाम तक मशक्कत के बाद ही उसके यहाँ रात को खाने का इंतजाम हो पाता है। ऐसी तस्वीर मैंने अपनी आँखों से देखी है लेकिन ऐसे हालात क्यों पनप रहे हैं, भारतीय पत्रकारिता जगत में पता नहीं, शायद हमारे सीनियर्स की अनदेखी के कारणों से यह दुर्दशा होती आ रही है। आज हमे पत्रकारों की जरूरत है, न कि चाटुकारों की, जो भारतीय लोकतंत्र के चौथे स्तम्भ को मजबूत कर सकें। 

(ड्रीम ठाकुर के ब्लाग से साभार)

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