मीडिया में अब चालीस पार के लोगों की भर्ती बंद!

बड़े बैनर के मीडिया संस्थानों ने 40 के बाद की भर्ती बन्द कर दी है. ये नए जमाने का नियम है. ये मीडिया मालिकों का अपना नियम है. ये मीडिया मालिक खुद को कानून से परे मानते हैं. यही कारण है कि इनके यहां जो 50 पार के पत्रकार बचे हैं, उन्हें निकालना भी शुरू कर दिया है. Continue reading

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अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

जज लोया के दोस्त इसे सुनियोजित हत्या मान रहे हैं। अनुज लोया ने जब 2015 में जांच की मांग की थी और जान को ख़तरा बताया था तब गोदी मीडिया के एंकर सवाल पूछना या चीखना चिल्लाना भूल गए। वो जानते थे कि उस स्टोरी को हाथ लगाते तो हुज़ूर थाली से रोटी हटा लेते। आप एक दर्शक और पाठक के रूप में मीडिया के डर और दुस्साहस को ठीक से समझिए। यह एक दिन आपके जीवन को प्रभावित करने वाला है। साहस तो है ही नहीं इस मीडिया में। कैरवान पर सारी रिपोर्ट हिन्दी में है। 27 दिसंबर की रिपोर्ट पढ़ सकते हैं।

29 नवंबर 2017 को टाइम्स आफ इंडिया में ख़बर छपती है कि अनुज लोया ने बांबे हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस से मिलकर बताया था कि उसे अब किसी पर शक नहीं है। तब उसी दिन इन एंकरों को चीखना चिल्लाना चाहिए था मगर सब चुप रहे। क्योंकि चीखते चिल्लाते तब सवालों की बातें ताज़ा थीं। लोग उनके सवालों को पत्रिका के सवालों से मिलाने लगते। अब जब रिपोर्ट पुरानी हो चुकी है, अनुज लोया के बयान को लेकर चैनल हमलावार हो गए हैं। क्योंकि अब आपको याद नहीं है कि क्या क्या सवाल उठे थे।

मीडिया की यही रणनीति है। जब भी हुज़ूर को तक़लीफ़ वाली रिपोर्ट छपती है वह उस वक्त चुप हो जाता है। भूल जाता है। जैसे ही कोई ऐसी बात आती है जिससे रिपोर्ट कमज़ोर लगती है, लौट कर हमलावार हो जाता है। इस प्रक्रिया में आम आदमी कमजोर हो रहा है। गोदी मीडिया गुंडा मीडिया होता जा रहा है।

14 जनवरी को बयान जारी कर चले जाने के बाद गोदी मीडिया को हिम्मत आ गई है। वो अब उन सौ पचास लोगों को रगेद रहा है जो इस सवाल को उठा रहे थे जैसे वही सौ लोग इस देश का जनमत तय करते हों। इस प्रक्रिया में भी आप देखेंगे या पढ़ेंगे तो मीडिया यह नहीं बताएगा कि कैरवान ने अपनी दस रिपोर्ट के दौरान क्या सवाल उठाए। कम से कम गोदी मीडिया फिर से जज लोया की बहन का ही बयान चला देता ताकि पता तो चलता कि बुआ क्या कह रही थीं और भतीजा क्या कह रहा है।

क्यों किसी को जांच से डर लगता है? इसमें किसी एंकर की क्या दिलचस्पी हो सकती है? एक जज की मौत हुई है। सिर्फ एक पिता की नहीं। वैसे जांच का भी नतीजा आप जानते हैं इस मुल्क में क्या होता है।

अब अगर गोदी मीडिया सक्रिय हो ही गया है तो सोहराबुद्दीन मामले में आज के इंडियन एक्सप्रेस में दस नंबर पेज पर नीचे किसी कोने में ख़बर छपी है। जिस तरह लोया का मामला सुर्ख़ियों में हैं, उस हिसाब से इस ख़बर को पहले पन्ने पर जगह मिल सकती थी। सीबीआई ने सोमवार को बांबे हाईकोर्ट में कहा कि वह सोहराबुद्दीन एनकाउंटर मामले में बरी किए गए तीन आई पी एस अफसरों के ख़िलाफ़ अपील नहीं करेगी। इसे लेकर गोदी मीडिया के एंकर आक्रामक अंग्रेज़ी वाले सवालों के साथ ट्विट कर सकते थे। वंज़ारा को नोटिस नहीं पहुंच रहा है क्योंकि उनका पता नहीं चल रहा है। अदालत ने सीबीआई से कहा है कि वंज़ारा को पता लगाएं। एंकर चीख चिल्ला सकते हैं। चाहें तो।

आपको क्यों लग रहा है कि आपके के साथ ऐसा नहीं होगा? क्या आपने विवेक के तमाम दरवाज़े बंद कर दिए हैं? क्या आप इसी भारत का सपना देखते हैं जिसका तिरंगा तो आसमान में लहराता दिखे मगर उसके नीचे उसका मीडिया सवालों से बेईमानी करता हुआ सर झुका ले। संस्थाएं ढहती हैं तो आम आदमी कमज़ोर होता है। आपके लिए इंसाफ़ का रास्ता लंबा हो जाता है और दरवाज़ा बंद हो जाता है।

आप सरकार को पसंद कर सकते हैं लेकिन क्या आपकी वफ़ादारी इस मीडिया से भी है, जो खड़े होकर तन कर सवाल नहीं पूछ सकता है। कम से कम तिरंगे का इतना तो मान रख लेता है कि हुज़ूर के सामने सीना ठोंक कर सलाम बज़ा देते। दुनिया देखती कि न्यूज़ एंकरों को सलामी देनी आती है। आपको पता है न कि सलाम सर झुका के भी किया जाता है और उस सलाम का क्या मतलब होता है? क्या आप भीतर से इतना खोखला भारत चाहेंगे? न्यूज़ एंकर सर झुकाकर, नज़रें चुरा कर सत्ता की सलामी बजा रहे हैं।

आईटी सेल वाले गाली देकर चले जाएंगे मगर उन्हें भी मेरी बात सोचने लायक लगेगी। मुझे पता है। जब सत्ता एक दिन उन्हें छोड़ देगी तो वो मेरी बातों को याद कर रोएंगे। लोकतंत्र तमाशा नहीं है कि रात को मजमा लगाकर फ़रमाइशी गीतों का कार्यक्रम सुन रहे हैं। भारत की शामों को इतना दाग़दार मत होने दीजिए। घर लौट कर जानने और समझने की शाम होती है न कि जयकारे की।

पत्रकारिता के सारे नियम ध्वस्त कर दिए गए हैं। जो हुज़ूर की गोद में हैं उनके लिए कोई नियम नहीं है। वे इस खंडहर में भी बादशाह की ज़िंदगी जी रहे हैं। खंडहर की दीवार पर कार से लेकर साबुन तक के विज्ञापन टंगे हैं। जीवन बीमा भी प्रायोजक है, उस मुर्दाघर का जहां पत्रकारिता की लाश रखी है।

आप इस खंडहर को सरकार समझ बैठे हैं। आपको लगता है कि हम सरकार का बचाव कर रहे हैं जबकि यह खंडहर मीडिया का है। इतना तो फ़र्क समझिए। आपकी आवाज़ न सुनाई दे इसलिए वो अपना वॉल्यूम बढ़ा देते हैं।

जो इस खंडहर में कुछ कर रहे हैं, उन पर उन्हीं ध्वस्त नियमों के पत्थर उठा कर मारे जा रहे हैं। इस खंडहर में चलना मुश्किल होता जा रहा है। नियमों का इतना असंतुलन है कि आप हुज़ूर का लोटा उठाकर ही दिशा के लिए जा सकते हैं वरना उनके लठैत घेर कर मार देंगे। इस खंडहर में कब कौन सा पत्थर पांव में चुभता है, कब कौन सा पत्थर सर पर गिरता है, हिसाब करना मुश्किल हो गया है।

एनडीटीवी के चर्चित पत्रकार और एंकर रवीश कुमार की एफबी वॉल से.

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नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

एक अहम बात और है. दुकानदार हमें उधार देने से डरते हैं. बाज़ार में नगद रूपए लेकर भी कुछ खरीदने चले जाओ तो कई बार दुकानदार कह देता है ये वस्तु मेरे यहाँ नहीं है. रही बैंक की तो बैंक में ये गाईड लाइन फिक्स है कि पत्रकारों को लोन नहीं देना है क्योंकि इन्होंने लौटाया नहीं तो इनका क्या हम करेंगे? लोग धंधे व्यापार की बात हमारे सामने करने से परहेज करते हैं. किसी का हाल पूछो तो वो ऐसे बताएगा जैसे दुनिया का सबसे पीड़ित और दुखी व्यक्ति वही है क्योंकि उसे पता है यदि अच्छा बता दिया तो न मालूम क्या होगा.
यह तो समाज का आईना है. यदि प्रोफेशन की बात करें तो बड़ी बड़ी खबरें लिखने वाले पत्रकारों को एक दिहाड़ी मजदूर के बराबर तनख्वाह भी नहीं मिलती.

इसमें ज़्यादा बदतर हालत है आंचलिक पत्रकारों की. हम अधिकारियों और पुलिस वालों के साथ खड़े हुए दिखते हैं तो लोग सोचते हैं, इसकी खूब चलती है. लेकिन हकीकत यह है कि पास खड़ा अफसर या नेता सोचता है ये कब निकले. खबरों के लिए हमेशा ऊपर ताको. ऊपर वाले का आप पर लाड हो तो ठीक. वरना आपकी चाहे जितनी बड़ी खबर हो, रद्दी की टोकरी में जायेगी. आप रोते बिलखते रहो, खबर नहीं लगी. खबर जिनसे जुडी है,  नहीं लगने पर कह देंगे- सेटलमेंट कर लिया, इसलिए नहीं लगाई. अब उन्हें कैसे समझाएं कि भाई ऊपर की कथा कहानी अलग है. मुस्तफा भाई ने तो खबर पेल दी थी, रोये भी थे, लेकिन नहीं लगी तो क्या करें.

अब रिश्तों की बात करें तो मेरी आँख से पट्टी उस दिन हटी जब मैंने अपने दोस्त पुलिस अफसर को फोन लगाया. मेरा इनसे बीस साल पुराना याराना था. एक दिन दूसरे शहर में उनसे मिलने के लिए फोन लगाया तो वे बोले मैं बाहर हूं. इत्तेफाक से मैं जहां खड़ा रहकर फोन लगा रहा था, वे वहीं खड़े थे और अपने सहयोगी से कह रहे थे कि मुस्तफा मिले तो मेरी लोकेशन मत बताना. वह सहयोगी मुझे देख रहा था क्योंकि वो भी मेरा परिचित था. उसने यह बात बाद में मुझे बता दी. मैंने जब उनका इतना प्रेम देखा तो समझ में आया कि लोग बिठाकर जल्दी से चाय इसलिए मंगवाते हैं ताकि इनको फूटाओ. हम उसे याराना समझ लेते हैं और ज़िन्दगी भर इस खुशफहमी में जीते हैं कि हमें ज़माना जानता है.

इन्ही सब हालात के चलते अब स्थिति यह है कि मैंने तय किया कि जो नहीं जानता उसको कभी मत खुद को पत्रकार बताओ. ये बताने के बाद उसका नजरिया बदलेगा और आप उसे साक्षात यमदूत नज़र आने लगोगे. यह कुछ ज़मीनी हकीकत है जो बीस बाईस साल कलम घिसने के बाद सामने आयी है. पहले मैं सोचता था कि जिसे कोई काम नहीं मिलता वो स्कूल में मास्टर बन जाता है. लेकिन अब मेरी यह धारणा बदल गयी है. मेरा सोचना है कि जिसे कोई काम न मिले वो पत्रकार बने, वो भी आंचलिक. खबर छपे तो आरोप लग जाए कि पैसे मांगे थे, न दिए तो छाप दिया. न छपे तो कह दे, पैसे लेकर दबा दिया. यानि इधर खाई इधर कुआं.

देश में सुर्खियां पाने वाली अधिकाँश बड़ी खबरें नीचे से यानि अंचल से निकलती उठती हैं. लेकिन जब खबर बड़ी होती है तो माथे पर सेहरा दिल्ली भोपाल वाले बांधते हैं. आंचलिक पत्रकार की आवाज़ नक्कारखाने में तूती की तरह हो जाती है. उसकी कौन सुन रहा है. मैंने देखा जब स्व. सुंदरलाल पटवा का देवलोक गमन हुआ तब उनकी अंत्येष्टि पर पूरा मीडिया लगा था. दिल्ली भोपाल के पत्रकार अपने लाइव फोनो में न जाने क्या क्या कह रहे थे. लेकिन जिन आंचलिक पत्रकारों ने स्व. पटवा को कुकड़ेश्वर की गलियों मे घूमते देखा, उनके साथ जीवन जिया,  किसी चैनल वाले ने यह ज़हमत नहीं की कि अपने आंचलिक स्ट्रिंगर/रिपोर्टर की भी सुन ले. स्व.पटवा से जुडी बातें वो बेहतर बता पायेगा. किसी चैनल ने ये भी नहीं दिखाया कि कुकड़ेश्वर नीमच में उनके देवलोक गमन के बाद क्या हालात है. हर कोई सीएम और मंत्रिमंडल के सदस्यों के साथ अपने अज़ीज़ रिपोर्टर की वॉक स्पोक दिखा रहा था.

प्रदेश में कई पत्रकार संगठन हैं. वे बड़े बड़े दावे आंचलिक पत्रकारों की भलाई के लिए करते हैं. लेकिन जिन पत्रकारों को पच्चीस पच्चीस साल कलम घिसते हुए हो गए, ऐसे हज़ारों पत्रकार हैं जिनका अधिमान्यता का कार्ड नहीं बन पाया. कार्ड तो छोड़िये, जिले का जनसंपर्क अधिकारी उसे पत्रकार मानने को तैयार नहीं. फिर भी हम जमीनी पत्रकार और चौथा खंभा होने की खुशफहमी पाले बैठे हैं. हम हर रोज मरकर जीते हैं और फिर किसी को इन्साफ दिलाने की लड़ाई लड़कर खुद को संतुष्ट कर लेते हैं.

लेखक मुस्तफा हुसैन नीमच के पत्रकार हैं. वे 24 वर्षों से मीडिया में हैं और कई बड़े न्यूज चैनलों, अखबारों और समाचार एजेंसियों के लिए काम कर चुके हैं और कर रहे हैं. उनसे संपर्क 09425106052 या 07693028052 या mustafareporter@yahoo.in के जरिए किया जा सकता है.

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शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश

देश की आज़ादी से लेकर वर्तमान विकास तक जिस पत्रकारिता ने अपना अमूल्य योगदान दिया उसके साथ ही देश के संविधान ने सौतेला व्यवहार किया। यह संस्था वह कभी नहीं पा सकी स्थान नहीं पा सकी जिसकी यह हकदार थी।इस संस्था को पता ही नहीं चला कि कब इसके लोगों ने पत्रकारिता की पीठ में खंज़र भोंक दिया।आज भी चौथा स्तम्भ का अस्तित्व प्रसादपर्यंत है। आज चारों ओर पत्रकारिता के पेशे को बहुत ही घटिया नज़र से देखा जाने लगा है। जब कि आज भी यदि देश में कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका पूरा श्रेय मीडिया को ही जाता है। लेकिन जो कुछ भी बुरा हो रहा है उसके लिए भी मीडिया ही जिम्मेदार है।

आज मीडिया एक मंडी बन चुकी है जहाँ रंडियों का राज है, खूब मोलभाव जारी है। कोई भी जाकर खरीदारी कर सकता है। हर वर्ग के लिए एक दूकान सजी है जिसके पास जितनी तथा है वह उतनी ही कथा सुन पा रहा है। कोई इससे अछूता नहीं। मीडिया की हालत और बद से बद्दतर होने वाली है क्योंकि मीडिया पर कब्ज़ा बड़े-बड़े व्यवसायी घरानों का है जिसे भेद पाना संभव नहीं। जाहिर है ऐसे में जो लोग मीडिया में आने की गलती कर चुके हैं वह किसी न किसी तरह अपने आप को जिन्दा रखना ही चाहेंगे। अब उनका जिन्दा रहना भी लोगों को अखरने लगा है। इसमें कोई संदेह नहीं कि मीडिया में गिरावट हो चुकी है। लेकिन एक बड़ा सवाल यह भी है कि ऐसा कौन सा क्षेत्र है जहाँ गिरावट न दर्ज की जा रही हो। मीडिया उससे अछूता कैसे रह सकता है।

मीडिया भी एक उद्योग बन चुका है। बहुत शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश सरकारें कर रही हैं। मीडिया को बाज़ार में बिकता कंडोम बना दिया है। यह जो है नहीं वह हमेशा से बताया गया। लिखत-पढ़त में संविधान के केवल तीन ही अंग है विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका चौथे को मीडिया बताया गया।  जिस आधार पर मीडिया को चौथा स्तम्भ कहा गया उस आधार पर देश का हर नागरिक पत्रकार है खासकर वर्तमान में जब सोशल मीडिया का तेजी से विस्तार हो रहा है।  एक तरफ पूंजीपतियों का मीडिया पर कब्ज़ा है जिसे वही करना है जो सरकार चाहती है क्योंकि उनकी गर्दन सरकारों के हाथ में है। दूसरी ओर वह मीडिया वाले हैं जो अपने अखबार, न्यूज़ चैनल और अपने परिवार के जीवन यापन के लिए संघर्षरत हैं। इस दूसरे वर्ग के लिए न तो कोई मानदेय है और न ही कोई पूछनेवाला। अब इस दूसरे वर्ग की काबिलियत कहें या थेथरपन कि इनको गरियाते हुए ही सही कुछ समझ लिया जाता है।

आज सभी प्रोफेशन में या तो सैलरी है या फिर फीस. इस प्रोफेशन में न तो सैलरी है और न ही फीस। जैसे डाक्टर,वकील,इंजिनियर, आर्किटेक्ट, ज्योतिष, अध्यापक, मकैनिक  इन सबको या तो सरकार नौकरी देकर सैलरी देती है या फिर ये स्वयं मेहनत कर फीस लेकर काम करते हैं जिसे समाज और सरकार में मान्यता मिली है। अब बताईये पत्रकार क्या करे। कुछ पूंजीपतियों के यहाँ चाकरी करने वालों को छोड़ दें तो बाकी 80 फीसदी पत्रकार क्या करे और कहाँ जाए। सरकार के मानक पर खरे नहीं कि वह इन्हें विज्ञापन दे, जनता को इन्हें विज्ञापन देने से कोई लाभ नहीं।

सरकार ने बड़ी चालाकी से पत्रकारिता को छोड़ सभी प्रोफेशन में आने के लिए एक मानक तय की है लेकिन सम्पादक व पत्रकार बनाने के लिए उसके पास कोई मानक नहीं। भारत सरकार यह कभी नहीं पूछती कि अखबार या न्यूज़ चैनल चलाने वालों का शैक्षिक रिकार्ड क्या है। आखिर क्यों ? सरकार उसके अखबार,पत्रिका अथवा न्यूज़ चैनल के लिए मानक तय करती है। क्योंकि वह जानती है कि ये सब पूंजीपतियों का खेल है न कि बुद्धिजीवियों का। सरकारें यह भी जानती हैं कि कुछ दिनों में ही इनमे से 98 प्रतिशत बुद्धिजीवियों की जीविका बुद्धि पर आधारित न होकर सड़क से सदन तक दलाली और चाटुकारिता होकर सरकारी प्रतिनिधियों या नौकरों के तलवे चाटने को मजबूर होंगे। बाकी दो फीसदी बुद्धिजीवी केवल उधार की जिंदगी जीते हुए कभी सरकार को और कभी अपने आप को कोसते हुए पाए जायेंगे। इस तरह बिना सरकार के मर्ज़ी के कोई नहीं चल पायेगा वह चाहे करोड़पति हो या विपन्न पति। क्योंकि करोड़पति सरकारों से दोस्ती रखने को मजबूर है और विपन्नपति सरकार और सरकारी लोगों के रहमो – करम पाने को मजबूर है।

सबसे मजे की बात है कि अपने आपको चौथे स्तम्भ नामक अदृश्य पिलर के रक्षक होने का दावा विपन्न बुद्धिजीवी ही सबसे ज्यादा करते हैं। इनमे एक खास बात और है कि इनमे कुछ तो बुद्धिजीवी हैं और कुछ बनने का ढोंग करते हैं लेकिन कालांतर में यह फर्क करना भी मुश्किल हो जाता है। क्योंकि एक बेशर्मी से खा पीकर मोटा हो चुका है जिसे यह पता हो चला है कि ज्यादातर लोग ऐसे ही हैं और वह खूब बोलता है, और दूसरे का पेट पीठ में धंसा चला जाता है जिससे बोलने की तो शक्ति छोड़िए जनाब सोचने की भी शक्ति क्षीण हो जाती है, और इसमें वह आगे निकल जाता है जो सिर्फ ढोंग करता था। अब आप सब स्वयं मंथन करो कि ऐसी दशा में आप पत्रकारिता से क्यों और कैसी उम्मीद करोगे? इसमें पत्रकारों का क्या दोष है? उन्हें तो गुमराह कर उनके कंधे का मात्र इस्तेमाल किया जा रहा है। और आपको नहीं लगता कि उपरोक्त दशा में उनका इस्तेमाल होना लाज़मी है।

लेखक शिव कृपाल मिश्र लखनऊ के पत्रकार हैं.

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मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न।

मायावती ने पलटकर पूछा तुम कौन हो?

लड़की से पहले एक पत्रकार ने जवाब दिया बहनजी पहली बार दिखी है एक मिनट रुकिए।

किस अख़बार से हो?

मान्यता है?

अंदर कैसे आईं?

ये विजय ज्वाला क्या है?

इस नाम का अख़बार तो हमने नहीं सुना।

अरे यार सीएम बनने वाली हैं। इनका अपमान कैसे कर सकती हो

नई आई हो? तमीज़ नहीं है।

सौ से ज़्यादा सवाल और सब कथित पत्रकारों के। एक भी बहनजी का नहीं। एक पत्रकार ने पुलिस बुला ली। लड़की पूरी रात हज़रत ग॔ज थाने में रही। मायावती के ओएसडी की तहरीर पर मुक़दमा हुआ। 6 दिन बाद ज़मानत मिली और पत्रकारिता शुरू होने से पहले ख़त्म। कांफ्रेंस में मौजूद एक बड़े पत्रकार बाद में रिलायंस के नौकर हो गए। एक दो प्रेस मान्यता समिति मे रहे। कुछ को सरकारी फ्लैट और प्लॉट जैसी सुविधाएं हासिल हैं। कुछ सीधे सीधे राजनीतिक कार्यकर्त्ता बन गए हैं।

लेकिन इन सबमें न उस नौसिखिया जैसा साहस है और न नाम मात्र की नैतिकता। लखनऊ शहर में क़रीब एक हज़ार मान्यता और दो हज़ार चप्पल घिस्सू पत्रकार हैं। एक शहर मे शायद ही कहीं इतने हों मगर सवाल पूछने का साहस किसी में नहीं है। अगर इक्का दुक्का क्रांतिवीर आ भी जाता है तो सरकार से पहले कथित प्रवक्ता उसे सही रास्ते पर ले आते हैं। यही वजह है कि दसवीं पास सिपाही इनका मान मर्दन करते हुए सोमवार को प्रेस क्लब मे घुस आए और एक पूर्व डीजी सहित 31 सामाजिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार करके ले गए। किसी ने नहीं पूछा कि क्या पत्रकार वार्ता करना गुनाह है? या फिर इनमें कोई चोर, उचक्का या अपराधी है?

सवाल अब भी उठाए जाएंगे लेकिन सरकार पर नहीं। प्रेस कांफ्रेंस और इसे करने वालों की नीयत सवालों के घेरे में है। सरकार आज से 20 साल पहले वाली भी सर्वोपरि थी और आज वाली भी। पत्रकारिता۔۔۔ माफ कीजिएगा, चाटुकारिता के मानक न तब बदले थे और न अब। सो प्रेस क्लब में सरकार के हमले को अघोषित इमर्जेंसी, प्रेस पर हमला या पत्रकारिता पर आघात मानने की भूल न करें। ये ज़रूर हो सकता है कि प्रेस क्लब में पुलिस किसी पत्रकार ने ही बुलाई हो। वैसे भी लखनऊ को इराक़ के कूफा शहर जैसा ऐसे ही थोड़े माना जाता है।

पत्रकार ज़ैगम मुर्तजा की एफबी वॉल से.

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सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर हैं, सबके घर छापा पड़ना चाहिए!

Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

Shrikant Asthana : तलवा चाटने और अपनी बात न कह सकने वाले दरअसल कभी पत्रकार थे ही नहीं- भले उन्होंने अखबारी नौकरी में ही पूरा जीवन बिताया हो। पिछले दो दशको में चारणों-भाटों, और अधीनस्थों के शोषण में सक्रिय सहयोग के लिए तैयार चरित्रों को ही छांट कर सम्पादक बनाया गया है। उत्पीड़न का असल औजार तो मालिक की हां में हां मिलाने वाले ये दलाल ही रहे हैं। पत्रकार है तो औकात है। वह बोलेगा मालिक के खिलाफ भी, भांड़ सम्पादक के खिलाफ भी या हर गलत शख्स या बात के खिलाफ। पर पत्रकार हैं कितने देश भर में? पहले पत्रकार तो सामने आयें…

Dayanand Pandey : लोगों को जान लेना चाहिए कि भारत में अब मीडिया नहीं है। मीडिया की दुकानें हैं, मीडिया के दलाल हैं। संविधान में भी तीन खंभों का ही ज़िक्र है। विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका। बस। मीडिया के नाम पर चौथा खंभा जो है वह काल्पनिक है, संवैधानिक नहीं। फिर भी चौथा खंभा अगर है तो वह पूंजीपतियों का खंभा है, दलालों का खंभा है, गरीबों का खंभा नहीं है, गरीबों के लिए नहीं है। निर्बल और लाचार के लिए नहीं है। सर्वहारा के लिए नहीं है। कारपोरेट घरानों का है मीडिया, इसकी सारी सेवा कारपोरेट घरानों के लिए है। सिर्फ़ इनकी ही तिजोरी भरने के लिए है, इनकी लायजनिंग करने के लिए है, इनका ही स्वार्थ साधने के लिए है। बहुत सारे राजनीतिज्ञ भी इनके लिए सिर्फ़ कुत्ते हैं। दुम हिलाते हुए कुत्ते। इस मीडिया में काम करने वाले भी दलाल और चाकर हैं। गली वाले कुत्तों से भी बदतर। अरबों खरबों के साम्राज्य वाले इस मीडिया के ज्यादतर चाकर एक दिहाड़ी मज़दूर से भी कम वेतन पाते हैं। लोगों को यह बात भी जान लेनी चाहिए।

कई अखबारों में काम कर चुके वरिष्ठ पत्रकार रमेश राय, श्रीकांत अस्थाना और दयानंद पांडेय की एफबी वॉल से.

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मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

अव्वल तो अख़बार में काम करने वाले बेचारे हैं तो पत्रकार… लेकिन वोह किसी विज्ञापन एजेंसी, किसी कम्प्यूटर एजेंसी, किसी प्रिंटिंग एजेंसी, किसी लेबर सप्लायर के यहां, कार्यरत कमर्चारी बताये जाते है… ऐसे में यह सब मुमकिन भी नहीं… क्या मजीठिया, क्या दूसरे आयोग… सब बेकार हैं… सारी रिपोर्ट बेकार है भाई…. अख़बार एक रोशनी, अख़बार का मालिक एक रोशनी, लेकिन अख़बार कर्मचारी पत्रकार हो चाहे जो भी हो, एक दिया, जिसके तले, अँधेरा है.

और, इसकी वजह सिर्फ आपसी फूट, सर फुटव्वल, संगठनों पर दारु भाइयों का क़ब्ज़ा, प्रेस क्लबों में शराब के शौक़ीनों का जमावड़ा है, जो सिर्फ अपनी बात करते हैं. पत्रकारों को उनके कल्याण, उनके उत्थान, उनके लिए संघर्ष, बड़े अखबारों के क्रूर प्रबंधन से उन्हें न्याय दिलवाने की बात चाहे राष्ट्रीय स्तर पर हो, चाहे राज्य स्तर पर हो, चाहे क्षेत्रीय स्तर पर हो, किसी भी संगठन ने एक संगठित और व्यवस्थित आंदोलन के रूप में आवाज नहीं उठाई है…

पत्रकार संजय तिवारी और अख्तर खान अकेला की एफबी वॉल से.

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पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

अखबार मालिक ही नहीं मालिक का एजेंट संपादक भी यही सवाल दाग देता है कि अखबार निकालने में करोड़ों खर्च होते हैं कोई करोड़ों रुपए समाजसेवा पर क्यों खर्च करेगा। बस यही से शुरू होता है खेल। पहले विज्ञापन के नाम पर या आड़ में होता था अब पेड न्यूज जैसी तमाम चीजें शामिल हो गई है। इन्ही तमाम चीजों में एक है लठैती। मीडिया धीरे-धीरे ही सही पेशेवर लठैत होता जा रहा है। एक कहावत है कि,” पूत के पांव हमेशा पालने में ही नहीं रहते”। विज्ञापन के मायाजाल से ही इसने केंचुल बदलना शुरू किया। पाठकों को सूचना देना, गरीबों-मजलूमों की आवाज बनने के बजाए मालिकों, नेताओं की ढाल बनने लगा। अब यह ढाल वार रोकने तक ही सीमित नहीं वह प्रहार भी करने लगा। यह प्रहार गरीब निरीह जनता के लिए नहीं मालिकों और नेताओं के लिए होने लगी। यानी मीडिया लठैत हो गया। सामंतयुगीन व्यवस्था में लठैत अपने मालिक के लिए ” कुछ भी” करने को तैयार रहते थे वो भी सेवाभाव से। आज मीडिया भी तैयार रहता है सेवाभाव से। आज का मीडिया लाठी लिये मालिक के धंधों को हांकता रहता है।

आज एक नया शब्द सुनने को मिल रहा है वह है कारपोरेट मीडिया। अब ये काँपोरेट मीडिया क्या है अपुन अभी तक नहीं समझ पाये हैं। जब बड़े घराने मीडिया के “धंधे” में आये तो मोटामोटी एक ही बात भेजे में घुसेड़ी जाती थी कि, ये अपने अन्य धंधों की रक्षा के लिए अखबार (तब टीवी चैनल नहीं थे) निकालते हैं। अपने अन्य धंधों के होने वाले मुनाफे का कुछ प्रतिशत अखबार को दे दें तो वह चाहे घाटे में रहे या फायदे में कोई फर्क नहीं पड़ता था। अब बिड़ला के हिंदुस्तान अखबार को ही ले लें। बिड़ला जी के पचासों धंधे थे उसके मुनाफे से कुछ फीसद अखबार को दे दिया तो अखबार चाहे जैसे चले कोई फर्क नहीं पड़ता चाहे घाटे में ही रहे। लेकिन अब ऐसा नहीं है क्योंकि बंटवारे के बाद एक पारिवारिक सदस्य को सिर्फ अखबार ही मिला है।

बात लठैत की। हाल के चुनावों व उसके मीडिया की भूमिका किसी लठैत से कम नहीं रही। लठैत की सबसे बड़ी खूबी यह भी होती है कि वह अपने मालिक के इशारों को अच्छी तरह से समझता है। मीडिया भी समझने लगा है। मसलन कब उसे किसे कितना महत्व देना है। किसकी रैली, रोड शो या जनसभा को कितना कवर करना है। बसपा का एक नारा था, ”जिसकी जितनी आबादी, उतनी उसकी हिस्सेदारी”। मीडिया भी पार्टी प्रचारकों की लाइव कवरेज भी कुछ इसी आधार पर करता रहा। भाजपा का सबसे ज्यादा, बाकी में कांग्रेस, सपा और बसपा ही होते थे जबकि चुनाव में आरएलडी, जेडयू, राजद, यूकेडी, अकाली और वामपंथी भी थे। नेताओं के साथ विशेष कवरेज भी विशेष तक ही सीमित रही। गोया अन्य दलों के प्रमुख गाजर-मूली हैं।

ये तो रही चुनाव के आगे-पीछे की कवरेज। उसके बाद भी मीडिया की भूमिका लठैत की ही होती है। वह कौन सा अखबार और चैनल है जो अपने मालिक के खिलाफ एक लाइन भी लिख दे। दैनिक जागरण में नरेंद्र मोहन के खिलाफ कभी एक लाइन छपा है। राष्ट्रीय सहारा के सहारा श्री लखनऊ में गिरफ्तार हुए किसी संस्करण में एक लाइन खबर नहीं थी, क्यों। क्योंकि लठैत कि यह भी खूबी होती है कि वह मालिक के आगे शीश नवाये रखता है। मालिक तो मालिक के करीबी के खिलाफ भी तब तक खबर नहीं छपती जब तक की वह बुरी तरह से फंस न जाए। रामदेव के करीबी बाल कृष्ण फर्जी डिग्री के मामले में देहरादून में गिरफ्तार हुए। राष्ट्रीय सहारा के अन्य  संस्करण की जाने दीजिए देहरादून में भी एक लाइन खबर नहीं छपी। हां इंदौर से रामदेव का खंडन हर अंक के पहले पेज पर छपा। (अखबार की फाइल गवाह है)

यही लठैत कभी भी विज्ञापन देने वाले पर तब तक खबर नहीं लिखते जब तक वह बुरी तरह से घिर न जाए या मालिक हरी झंडी न दे दे। विज्ञापन देने वाले इनके लिए पार्टी होते हैं। आजकल एक नया रिवाज शुरू हो गया है। स्क्रीन पर एक ही नेता की दो-दो फोटो वो भी एक साथ। मसलन, विज्ञापन की जगह एल बैंड के रूप में आदित्य नाथ और समाचार में भी वो भी एक ही समय में। आने वाले दिनों में दांये-बांये, ऊपर नीचे भी हो सकती है। अखबार का मास्टहेड एक ही दिन तीन-तीन होता है यानी  पहले पेज की तरह तीन तो कभी चार पेजों पर अखबार का नाम होता है।

यह भी एक तरह से मीडिया की लठैती ही है। कभी मीडिया की लाठी कमजोरों के लिए, उत्पीड़ितों के लिए उठती थी अब किसके लिए उठती है और क्यों उठती है सब जान गये हैं। भाजपा से राज्यसभा की शोभा बढ़ाने वाले जी मीडिया के मालिक सुभाष चंद्रा के खिलाफ जीटीवी की लाठी जीटीवी के लठैत उठा सकते हैं क्या?

अरुण श्रीवास्तव
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क्या विस चुनावों के बाद मीडिया के लिए बुरे दिन आएंगे?

यूपी चुनाव खत्म होने के बाद मीडिया में छाई गंदगी का सफाया तेजी से हो सकता है। बताया जाता है कि यूपी चुनाव में भाजपा बहुमत की उम्मीद कर रही थी लेकिन लाख कोशिशों के बाद त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है। और इसका ठीकरा न्यूज़ चैनलों पर फोड़ा जा सकता है। कभी दो नंबर की पायदान बनाए रखने वाले न्यूज चैनल को बंद होने की भविष्यवाणी मोदी भक्त अभी से कर रहे हैं।

एनडीटीवी के मनोरंजन चैनल का लाइसेंस रद्द किया जा चुका है। विभिन्न संस्थानों में कार्यरत एक पत्रकार जो अब न्यूज़ चैनल के मालिक हैं उनके चैनल पर खुफिया विभाग पहले से ही आंखे ततेरे हुए है। बताया जाता है कि इसमें एक कांग्रेसी नेता और दाऊद का पैसा लगा हुआ है। मतलब साफ है कि काला कारोबार करने वाले कुछ लोग मीडिया का लोचा पहनकर उपदेश दे रहे हैं, देश की दशा तय कर रहे हैं, चर्चा का विषय तय कर रहे हैं और यह बात कुछ राजनेताओं को बिल्कुल पसंद नहीं।

प्रिंट मीडिया का भी यही हाल
यही हाल प्रिंट मीडिया का है, डीएव्हीपी को इतना जटिल बना दिया गया है कि इसका फायदा सिर्फ ब्रांडेड संस्थानों और भाजपा समर्थित पुराने मीडिया संस्थानों को ही मिलेगा। वहीं मजीठिया वेतनमान ना देकर सुप्रीम कोर्ट और सरकार की शक्तियों को चुनौती देने प्रेस मालिकों से सरकार परेशान है। इससे भारत की छवि विश्व स्तर पर धूमिल हुई है कि भारत में मीडिया मालिक काफी सशक्त हैं। उनके सामने सरकार, न्यायपालिका लाचार है। इसलिए बड़े प्रेस मालिकों को इसके लिए राजी करने का प्रयास किया जा रहा है कि वे पूरा ना सही पर इतना वेतनमान तो दें जिससे सरकार और न्यायपालिका की लॉज बची रहे।

पत्रकार क्या करें?
मीडिया पर सरकार का सफाई अभियान चलेगा तो कुलमिलाकर प्रभावित पत्रकार ही होंगे। और इसमें कब किसका नंबर आ जाए कुछ नहीं कहा जा सकता। ऐसे में पत्रकारों की जिम्मेदारी बनती है कि जाते-जाते ही सही देश को राजनीतिक चर्चा से ऊबार कर सभी के लिए रोजगार के अधिकार, किसानों के सभी फसलों की सरकारी खरीद हो। स्वच्छ न्यायपालिका, कार्यपालिका के लिए पूरा काम-काज आनलाइन करने जैसे मांगों पर चर्चा करने की जरूरत है। इसके लिए समाचार प्रकाशित करने, लेख लिखने और बहस करने की जरूरत है। एक पत्रकार होने के नाते हमारा दायित्व बनता है कि लोगों की विचारधारा को सही दिशा दें।

2014 के एक लेख ‘वर्तमान समय पत्रकारों के लिए अघोषित आपातकाल” के लेख में मोदी का विकास कार्य, युद्ध की ओर बढ़ती सरकार और मोदी सरकार के काम का असर 2017 में दिखेगी जैसी बातों की संभावना पहले ही थी। सपना सच्चाई से मिलता तो है वास्तविक दर्द और सपने के दर्द में अंतर होता है।

महेश्वरी प्रसाद मिश्र

पत्रकार

maheshwari_mishra@yahoo.com


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वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे!

Ajay Prakash : मीडिया कहती है हम काउंटर व्यू छापते हैं। बगैर उसके कोई रिपोर्ट नहीं छापते। कल आपने विकास दर की रिपोर्ट पर कोई काउंटर व्यू देखा। क्या देश के सभी अर्थशास्त्री मुजरा देखने गए थे? या संपादकों को रतौंधी हो गयी थी? या संपादकों को ‘शार्ट मीमोरी लॉस’ की समस्या है, जो ‘एंटायर पॉलि​टिक्स का विद्यार्थी’, ‘वैश्विक अर्थशास्त्र’ का जानकार बना घूम रहा है और संपादक मुनीमों की तरह राम—राम एक, राम—राम दो लिख और लिखवा रहे हैं।

हालत देखिए कि संपादकों की मुनीमगीरी से मिले साहस में वह विद्यार्थी अमर्त्य सेन जैसे अर्थशास्त्रियों का मखौल उड़ा रहा है और हम पत्रकारिता के युवा हैं जो पेट भरपाई के एवज में जादुई आंकड़ों के कट—पेस्ट को सही साबित करने में एड़ी से चोटी लगा रहे हैं।

सवाल है कि क्या इन संपादकों को अपने ही अखबारों में छपी रपटें और टीवी का फुटेज नहीं दिखा? लगातार दो महीने जिससे अखबार भरे रहे, टीवी चैनलों का बहुतायत समय नोटबंदी की समस्याओं पर केंद्रित रहा, वह समस्या क्या एकाएक जादुई ढंग से दुरुस्त हो गयी। आईएमएफ की रिपोर्ट, एनआरआई द्वारा देश से ले जाया गया 12 लाख करोड़ रुपया, 13 लाख लोगों की बेरोजगारी, 60 प्रतिशत नरेगा मजदूरों की बढ़त सब बेमानी साबित हो गए। और एकाएक विकास दर 7 प्रतिशत से अधिक पहुंच गया।

क्या तथ्य, आंकड़े, शोध, समझदारी, साहस संपादकों के लिए ‘चूरन’ वाली नोट हो गए हैं कि जब जैसा मन किया तब तैसा छाप दिया। या सत्ता के दबाव में वह इतने रीढ़विहिन हो गए हैं जो सत्ता के बयान को जनता के मन की बात मान लेने की ‘मजबूर जिद’ के शिकार हैं? या फिर पत्रका​रिता इंदिरा गांधी के उस दौर से गुजर रही है, जब बैठने के लिए कहने पर संपादक लेटने के लिए दरी साथ लिए घुमते थे।

सामान्य ज्ञान से भी आप सोचें तो जिन दिनों में देश ठप था, रुपए की आवाजाही मामूली थी, मानव संसाधन का बहुतायत पंक्तियों में खड़ा था, चाय और पान की दुकानों तक पर बिक्री के लाले पड़े थे, उन दिनों में विकास दर कैसे बढ़ सकती है?

और नहीं बढ़ सकती तो अगर उत्तर प्रदेश चुनाव जीतने के बाद मोदी और उनकी पार्टी के अध्यक्ष ​अमित शाह बढ़ी विकास दर को नया चुनावी जुमला बोल दें फिर आप कहां के रह जाएंगे ?

क्या आप नहीं मानते कि वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे?

सोशल मीडिया पर बेबाक टिप्पणी के लिए चर्चित पत्रकार अजय प्रकाश की एफबी वॉल से. उपरोक्त स्टटेस पर आए ढेर सारे कमेंट्स में से कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं…

Zeeshan Akhtar एक राष्ट्रीय अखबार ने छापा कि देश बल्ले बल्ले कर रहा है…
Bhanwar Meghwanshi शानदार टिप्पणी अजय जी। बधाई
Arvind Shekhar जीडीपी बढ़ने की वजह है आधार वर्ष बदला गया है सांख्यिकी के विशेषज्ञ से बात करके देखें। सच सामने आ जाएगा।
Vishnu Rajgadia समय इनका भी सच बताएगा। जो संपादक अपने वर्गीकृत विज्ञापनों के जरिये बेरोजगार युवाओं को “धनी महिलाओं से दोस्ती करके पैसे कमाने” की जुगुप्सा जगाकर ठगते हैं, उनसे आप क्या उम्मीद करते हैं भाई?
Puspendra Kumar एक्सपोर्ट और एग्री प्राडक्शन ग्रोथ का सहारा ले रही सरकार। कल एक खबर में पढ़ा था कि पिछले साल वाले बेस को (रिविजन से) घटाकर ग्रोथ को पंप किया गया है। ऐसे में दुनिया ग्रास जीडीपी माडल पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है।

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हे बाहरवीं में पढ़ने वालों, सब कुछ बनना लेकिन पत्रकार मत बनना

हे बारहवीं पास करने वाले या बारहवीं में पढ़ने वाले बच्चों, अपना कॅरियर चुनते समय तुम्हे कन्फ्यूजन हो रही होगी, सब कुछ चुनना पत्रकारिता मत चुनना. खासकर हिंदी की तो बिलकुल नहीं. इसलिए नहीं कि स्कोप नहीं है. बल्कि इसलिए कि यहाँ तुम्हारी कोइ कद्र नहीं है. ग्लैमर की दुनिया तुम्हें अपनी ओर खींचेगी…लेकिन बाहर से ये दुनिया जितनी खूबसूरत है, अन्दर से उतनी मैली. तुम्हें सोशल मीडिया से लेकर गली मोहल्लों में दलाल कहा जाएगा.

भले ही तुम मोहल्ले के पानी बिजली और सीवर के लिए नेता से सवाल पूछ रहे हो,  मगर उस टीवी में बैठे कुछ गिने चुने नमूनों की वजह से तुझे दलाल कहा जाएगा… बिकाऊ कहेंगे भले ही तुम 2000 रुपये किराए के एक कमरे के मकान में दो दोस्तों के साथ शेयरिंग में रह रहे हो. भले ही 40 रूपया डाईट वाला खाना खा रहे हो, दिल्ली जल बोर्ड का पानी पीकर बीमार पड़ रहे हो. लेकिन तुम बिकाऊ हो क्योंकि तुम पत्रकार हो…

तुम्हें नेताओं के हाथ की कठपुतली कहा जाएगा भले ही नेता तुम्हें देखते ही दूर भागता हो…. तुम्हे बिकाऊ मीडिया कहकर संबोधित किया जाएगा, जबकि तुम्हारी कुल सैलरी तुम्हारे काल सेंटर वाले दोस्त की सैलरी के गाड़ी के पेट्रोल के बराबर होगी… तुम सोचोगे इज्जत के लिए पत्रकारिता चुनूंगा, लेकिन तुम्हारी इज्जत रोज सरे आम नीलाम होगी… तुम कहोगे विचारधारा के लिए पत्रकारिता चुनूंगा लेकिन विचारधारा का बलात्कार कर दिया जायेगा.

अगर तुम ये सोचेगे की बुद्धीजीवियों के साथ रहोगे तो कुछ सीखोगे, लेकिन वो पढ़े लिखे लोग खुद नौकरी बचाओ समिति के सदस्यों की तरह जंग लड़ते नजर आएंगे… तब तुम्हें एहसास होगा कि सेल्समेन बन जाते तो ज्यादा इज्जत होती… अगर तुम लड़के हो वो भी टेलेंटिड तो लिपस्टिक लगे होठों के आगे तुम्हारा हुनर दम घोटता नजर आयेगा… हां, यहां आगे जाने के लिए या तो तुम्हें दलाल बनना पड़ेगा या फिर चापलूस…

तो हे बारहवीं वालों, यहाँ आओगे तो ये ध्यान रखना, यहाँ एथिक्स नहीं, कारपरेट जगत काम कर रहा है… और हे इन बच्चों के मां-बाप, तुम भी सुन लो, पत्रकारिता के जरिए इनके सुनहरे भविष्य का सपना संजोए जिंदगी की गाड़ी को आगे बढाने की कामना छोड़ दो क्योंकि पत्रकारिता का भविष्य खुद अंधकारमय हो चुका है।    

राजेश कुमार
एंकर
चैनल वन न्यूज
rajesh.targotra@gmail.com

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ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

अमरीका में ट्रंप प्रशासन ने स्पष्ट संकेत दिए हैं कि वो ‘मीडिया को ही विपक्ष’ बना लेंगे. डोनल्ड ट्रंप कई बार मीडिया संस्थानों के लिए भद्दी भाषा का प्रयोग कर चुके हैं और कई स्थापित चैनलों को फ़र्ज़ी तक कह चुके हैं. ऐसा करके वो अपने एक ख़ास समर्थक वर्ग को ख़ुश भी कर देते हैं.

दुनिया में नया ऑर्डर स्थापित हो रहा है. इसमें पत्रकारों को भी अपनी नई भूमिका तय करनी होगी. जब अपनी बात पहुँचाने के लिए नेताओं के पास ‘सोशल मीडिया’ है तो वो ‘स्थापित मीडिया’ से दूरी बनाने में परहेज़ क्यों करेंगे?

मुझे लगता है कि ऐसे बदलते परिवेश में वो ही पत्रकार कामयाब होंगे और पहचान पाएंगे जो संस्थानों के समकक्ष स्वयं को स्थापित कर लेंगे. ‘बाइट-जर्नलिस्टों’ की जगह ‘विषय विशेषज्ञों’ की पूछ होगी.

जिस दौर में स्थापित मीडिया को विलेन बनाया जा रहा है उस दौर में पत्रकारों के पास ज़मीनी रिपोर्टिंग करके ‘हीरो’ बनने का मौक़ा भी है.

पत्रकार दिलनवाज पाशा की एफबी वॉल से.

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कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

वहाँ पहले भी हालात के बिगड़ने पर अखबारों के छपने पर रोक लगती रही है। पर पहले के नाम पर कब तक आज वही सब होता रहेगा। क्या वहाँ आतंकवाद अख़बारों के कारण फैला था? क्या बुरहान वहाँ की मीडिया की देन है? क्या मौजूदा हालात के लिए स्थानीय मीडिया ही ज़िम्मेदार है? क्या वहाँ समस्या के कारण को ढूँढ लिया गया है? उन्हीं अख़बारों से ही तो ख़बर आई थी कि अनंतनाग तीर्थयात्रा मार्ग में स्थानीय मुस्लिमों ने कर्फ़्यू तोड़ कर यात्रियों की मदद की। यह भी ख़बर आई कि मुस्लिमों ने अपने पड़ोसी कश्मीरी पंडित की माँ के जनाज़े को कंधा दिया है। यह भी खबर आई कि कई कश्मीरी पंडित फिर से भाग आए हैं। सुरक्षाबलों की ज़्यादतियों को भी अख़बार छाप रहे थे। लोगों और सेना दोनों के पक्ष छप रहे थे। इन खबरों से लोग वहाँ की विविधता को देख पा रहे थे। अख़बारों पर पाबंदी लगाकर कश्मीर और शेष भारत के लोगों से यह मौका छिन लिया गया है।

कश्मीर के अख़बारों को कश्मीर के लिए बंद किया गया है या शेष भारत के लिए? पहले भी वहाँ ऐसा तनावपूर्ण माहौल रहा है लेकिन मुझे लगता है कि पहली बार लोग कश्मीर की ख़बरों के बारे में गहराई से रूचि ले रहे थे। कश्मीर की वेबसाइट की ख़बरें पढ़ी जा रही थीं और साझा हो रही थीं दावे से तो नहीं कह सकता लेकिन पहली बार लगा कि कश्मीर की मीडिया की ख़बरें शेष भारत तक पहुँच रही हैं। दिल्ली से चलने वाली कई वेबसाइट पर कश्मीर की मीडिया और दिल्ली की मीडिया के कवरेज का तुलनात्मक अध्ययन हो रहा था। कश्मीर समाचार पत्रों के नाम भारत में जाने जा रहे थे। उनके संपादक तथाकथित राष्ट्रीय चैनलों में आकर बोलने लगे।

इससे दोनों जगहों के पाठकों के बीच एक बेहतर समझ बन रही थी। संवाद बन रहा था। कश्मीर की जटिलता से भागने वाले मेरे जैसे पाठकों के पास भी तुलनात्मक अध्ययन का ज़रिया उपलब्ध था। कश्मीर के लोगों को भी लगा होगा कि उनकी बात कही जा रही है। लिखी जा रही है। अख़बार बंद करने से यह संदेश जाएगा कि स्थिति सरकार के नियंत्रण से बाहर है और सरकार वहाँ के लोगों से संवाद नहीं करना चाहती है। आख़िर सरकार अपना पक्ष किन माध्यमों के ज़रिये लोगों के बीच रखेगी।

मुझे समझ नहीं आ रहा कि कश्मीरी मीडिया की ख़बरों में ऐसा क्या था जो वहाँ के लोग नहीं जानते हैं और जो वहाँ से बाहर के लोग नहीं जानते हैं? क्या उबलता कश्मीर लिख देने से हालात में उबाल आ जाता है? अगर ये सही है और ये अतिसंवेदनशील सूचना नहीं है तो इसे छपने में क्या दिक्कत है? अगर कश्मीर मीडिया कथित रूप से प्रोपेगैंडा कर रहा था तो क्या हम आश्वस्त है कि दिल्ली का मीडिया ये काम नहीं कर रहा होगा? क्या यही भाव दिल्ली की मीडिया की ख़बरों और संपादकीय लेखों में नहीं है? फ़र्ज़ी ख़बरों के सहारे कैराना को कश्मीर बताकर कौन किसे उबाल रहा था इस पर भी वक्त निकाल कर सोचना चाहिए।

कश्मीर के कई हलकों से आवाज़ आई कि दिल्ली का कुछ मीडिया झूठी बातों को प्रचारित कर माहौल बिगाड़ रहा है।युवा आई ए एस अधिकारियों से लेकर शेष भारत के तमाम लोग दिल्ली की मीडिया पर सवाल उठा रहे हैं कि कुछ एंकर ऐसे बावले हो गए हैं जिनके कारण हालात और ख़राब हो सकते हैं। आई ए एस शाह फ़ैसल ने साफ साफ नाम लेकर लिखा कि कौन कौन से चैनल हैं जो अफवाह फैला रहे हैं। एक अधिकारी ने तो बकायदा नाम लेकर लिखा है कि एक चैनल माहौल बिगाड़ रहा है।मैं नहीं कहता कि इस आधार पर चैनल के बारे में कोई फ़ैसला कर ही लेना चाहिए लेकिन इस पर चुप्पी भी बता रही है कि कौन किस तरफ है। अगर सरकार की चिन्ता माहौल न बिगड़ने देने की है तो क्या उसने वहाँ के लोगों को आश्वस्त किया है कि वह दिल्ली मीडिया के कुछ तत्वों की भी पड़ताल करेगी। अव्वल तो यह काम सरकार का है नहीं फिर भी उसे यह ध्यान रखना चाहिए कि उस पर पक्षपात का आरोप न लगे।

बैन का कोई तुक नहीं बनता। न यहाँ न वहाँ । एक अंतर और दिखा। कश्मीर का मीडिया कश्मीर से बात कर रहा था और दिल्ली का मीडिया कश्मीर के बहाने उत्तर भारत में फैले उन्हीं पुरानी धारणाओं को भड़का रहा था जो ट्रकों पर लिखे होते हैं। दूध माँगोगे तो खीर देंगे, कश्मीर माँगोगे तो चीर देंगे। लेकिन पाबंदी कश्मीर की मीडिया पर लगा दी गई। इससे तो हम कहीं नहीं पहुँचेंगे। ट्रक तो ओवरलोडिंग के जुर्माने से बचने के लिए चुंगी पर रिश्वत देकर निकल जाएगा और हमें दे जाएगा दो टकिया राष्ट्रवाद। जैसे कश्मीर का सवाल दूध भात का सवाल हो।

हर दूसरा विशेषज्ञ लिख रहा है कि केंद्र और राज्य सरकारों को कश्मीर के लोगों से बात करनी चाहिए तो फिर वहाँ के अख़बारों को कश्मीर की और कश्मीर से बात करने की सज़ा क्यों दी गई? वहाँ के अख़बार वहाँ के लोगों से ही तो बात कर रहे थे। सामान्य पाठक कैसे जानेगा कि वहाँ क्या हो रहा है। वहाँ के लोगों में भी भरोसा बनता कि उनकी बातें शेष भारत तक पहुँच रही हैं और लोग उनके बारे में बात कर रहे हैं। हिंसा के रास्ते से कश्मीर को लौटाने के लिए सब यही तो कहते हैं कि बातचीत होती रहे। थोड़े दिनों बाद सारे डाक्टर अपनी पर्ची पर यही लिखेंगे कि सरकार बात करे।

इस वक्त सरकार का काम अख़बार कर रहे हैं। वहाँ के लोगों से वहाँ की बात कर रहे हैं। इससे एक संवाद क़ायम होता है। सही और विविध सूचनाएँ लोगों में आत्मविश्वास पैदा करती हैं। लोकतंत्र के प्रति इस विश्वास को ज़िदा रखती हैं कि बोला-सुना जा रहा है। प्रेस पर पाबंदी है और प्रेस चुप है। हम सबको चुप रहना अब सहज लगता है। उस सोशल मीडिया में भी चुप्पी है जो बिना बुलाए लोकतंत्र के बारात में नाचने आ गया है कि हमीं अब इसके अभिभावक हैं। वह भी चुप है। बोलने की पाबंदी के ख़िलाफ़ सबको बोलना चाहिए। वाजपेयी जी के शब्दों में यह अच्छी बात नहीं है।

एनडीटीवी के वरिष्ठ पत्रकार रवीश कुमार के ब्लाग कस्बा से साभार.

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भईया, इससे अच्छा तो मजदूरी कर लेते, कहाँ से फंस गए मीडिया में!

आज कुछ काम से प्रेस क्लब गया हुआ था, हमेशा की तरह प्रेस क्लब के बाहर और भीतर चहल पहल थी, गेट के ठीक सामने एक कथित संस्थापित टीवी चैनल का कैमरामैन उदास मुद्रा में था, आदत से लाचार होकर पहले तो मैंने उनसे अभिवादन कर कुशलक्षेप पूछा, फिर जो जवाब आया, उसे सुन सुन्न रह गया, और ऐसा पिछले कई महीनों से लगातार जारी है, एक लम्बा मई मीडिया में गुजर चुका वो शख्स बड़ी ईमानदारी के साथ मुझसे कह रहा था, कि, “योगेश जी, ऐसा है, अगर हमको पता रहता कि मीडिया में इतनी ऐसी तैसी करने के बाद भी पगार कि चिंता रहती है, परिवार और पेट कि चिंता रहती है, तो कभी-भी मीडिया में तो नहीं आता, भले हो गाँव में खेतीबाड़ी कर लेता, पर सच में मीडिया में आने कि गलती नहीं करता.”

मैं जैसे उनके लिए उनके दर्द को बांटने वाला, उनकी पीड़ा समझने वाला साथी था, वो बिना रुके, उदासपूर्ण भावभंगिमा के साथ मुझसे अपना घाव साझा करते रहे. आगे वो वरिष्ठ कैमरामैन कहते रहे, “जब मैं स्कूली जीवन में था, तब पेपर पढ़कर, टीवी देखकर सपना पालता था, कि मैं भी इसी लाइन में जाऊँगा, घरवाले कहते थे, बीटा या पुलिस बनना, या पत्रकार, दौड़ में कमजोर हूँ, पुलिस तो नहीं बना, न उतने पैसे थे, पर हाँ, सोचा पत्रकार तो बन ही सकता हूँ, तब से अब तक, किसी भी मज़बूर को देखता हूँ, तो अपने रिपोर्टर से कहता हूँ, सर ये स्टोरी बना दीजिये, डेस्क वालों से काम के अलावा कुछ और बात करना सूझता नहीं, साला, खुदपर भी गुस्सा आता है, जिन विचारों को यहाँ डीपीआर और पीआर का पर्दा बनाए रोज़ नंगा कर दिया जाता है, भला वैसे ‘उचित’ विचार मेरे मन से खत्म क्यों नहीं होते?

कभी सोचता हूँ मीडिया लाइन ही छोड़ दूँ, फिर सोचता हूँ, इसमें सम्मान मिलता है, बस इसी लत ने कमज़ोर करके रख दिया है, देखते हैं, कब तक जीवन चलता है, वर्ण गाँव लौटकर, पिताजी का खेती में हाथ बताऊंगा.” इतना कहकर वो तो चले गए, पर इस चर्चा में, इन बातों में जो सवाल था, वो यकीनन, कहने और न कहने वाले हर पत्रकार के भीतर रोज़ ज्वारभाटा कि तरह फूटता है, मैंने जब अपनी पत्रकारिता कि पढाई शुरू कि थी, तब ‘उस’ पीड़ित कैमरामैन की तरह मेरे भी एक अच्छे, सशक्त मीडियाकर्मी बनने का अरमान था, किस्मत से वो अभी भी ज़िंदा है, पर पत्रकारिता क्षेत्र में अच्छे अच्छे विचाारों को जिस तरह रोज़ मरते देखना पड़ता है, वो यकीनन हैरान कर देने वाला रहता है, विधानसभा सत्र के दौरान कई तथाकथित ‘वरिष्ठ’ पत्रकरों को जब किसी मंत्री, अधिकारी के बाल, गाल, जूते, दाढ़ी की तारीफ करते, हाथ की ऊँगली में ऊँगली फंसाए देखने पर ‘बाल’ मन सोचता है, क्या यही सब पत्रकारिता है? क्या यही पत्रकारिता का धर्म है? क्या यही वरिष्ठता है?

जहाँ कोई गरीब जब अपना दर्द साझा करने आये, तो हम आईडी हटा लेते हैं, जल्दी जाना है, खबर भेजने की बात का बहाना बना, खिसक लेते हैं, पर जब कोई पॉवरफुल नेता, मंत्री, अधिकारी बाइट दे, उससे पहले, उन्हें पूरा मसला, सवाल समझा देते हैं, उसमे क्या पूछा जाए, क्या नहीं पूछा जाये, वो भी मंत्री, अधिकारी, नेता तय करता है, और हम पूछते हैं, क्या यही कलमवीर होने की पहचान है कि हम आईडी, कलम थामे चापलूसी कि हर सीमा रेखा अपने कपड़े निकालकर लांघ दें? अगर यही पत्रकारिता कि परम्परा है, तो क्या आनेवाली पत्रकारों की पीढ़ी को इसी घटिया परम्परा का निर्वहन करना होगा? सवाल काफी सारे हैं, और ये सवाल ज़हन में, इस फील्ड में शायद हर प्रदेश में, हर जिलों में, हर तहसील, हर गाँव की पत्रकारिता में होंगे ही, पर इसका मतलब कतई ये नहीं है कि इनके चरण वंदन कि परम्परा का निर्वहन किया जाये, पत्रकार हैं, जो मन में है, पूछेंगे, माध्यम कोई भी हो, प्रिंट मीडिया में हों, इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में हों, साप्ताहिक, मासिक पत्रिकाओं में काम करें, या स्वतंत्र रहें, पर सवाल तो पूछेंगे, सीधा सवाल पूछेंगे, ना की, मंत्री जी फलां बारे में बोलेंगे क्या? कहकर ‘वफादारी’ निभाएंगे, पत्रकारिता की आनेवाली पीढ़ी को ये तय करना होगा कि वो डिग्री हाथ में लेने के बाद किस तरह की पत्रकारिता करना चाहेंगे?

पीत पत्रकारिता का जन्म तो बरसों पहले हो गया था, पर आज की पत्रकारिता प्रणाम, शरण में हाथ जोड़ने, रसूखदारों के हाथों में ऊँगली फंसाने, नेताओं की कुर्सियों में प्रवक्ता के तौर पर बैठ भैया, चाचा का रिश्ता बनाने के नए पत्रकारिता से युवा पीढ़ी को जूझना होगा, ये भी देखने होगा, कि किस तरह ‘रेप’ कि शिकार किसी पीड़िता के बारे में संबंधित अधिकारी से बाइट लेने के बाद किस तरह से कथित ‘रिपोर्टर’ हंसी ठिठोली कर अपना ‘धर्म’ निभाते हैं, ये भी देखना होगा, कि किस तरह दुआ, सलाम, खबरिया सूत्र बनाने के बहाने चापलूसी का चोला पहना जाता है, ये भी देखना होगा कि किस तरह से जनसपंर्क के अधिकारीयों के चरण वंदन से ‘कइयों’ को बिना किसी नियम, धरम के ‘अधिमान्यता’ कि रेवड़ी मिलती है, और शायद ये भी, कि जो पीता है, वही पत्रकार होता है, की बात सुन, कभी कोई ‘पत्रकार’ किसी रसूखदार के साथ बार में जाम भी टकराते दिख जाए, ये विचार, प्रेस क्लब में मिले उस कैमरापर्सन साथी से बातचीत के बाद आये, ऐसा बिलकुल नहीं है, और ना ही ये मेरे बस विचार हैं, बल्कि ये विचार हम सब ऐसे पत्रकारों के हैं, जो फील्ड में शायद रोज़ सफेद, खाकीपोशों के सामने रोज़ कई ‘पत्रकारों’ की भावभंगिमा, उनके आदत व्यवहार से देखते, परखते हैं.

योगेश मिश्रा
पत्रकार
छात्र, केटीयू
रायपुर
9329905333
8827103000

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विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर ईमानदार व दलाल पत्रकारों को शुभकामनाएं

प्रिय यशवंत जी
संपादक, भड़ास4मीडिया

आज की पत्रकारिता जगत आप जैसे स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारों की वजह से ही बनी हुयी है। आप द्वारा लगातार छेड़े गये अभियान काफी बेहतर होते है। आपकी लिखने की शैली से तो इस समय कोई मुकाबला नही कर पाएगा। मैं भड़ास 4 मीडिया का काफी पुराना पाठक हूं और इसे कई वर्षों से पढ़ता चला आ रहा हूं। अपनी ही बिरादरी का जिस प्रकार से आप निष्पक्ष व निर्भीक होकर समाचार को फ्लैश करते है वह बड़ी ही काबिले तारीफ की बात है।

आपका जेल जाना और ‘जानेमन जेल’ किताब लिखना पत्रकारिता जगत के इतिहास में कायम हो चुका है जो सभी जानते हैं। आपकी जानेमन जेल किताब काफी उम्दा है। मैं अपने मुद्दे पर आता हूं। मैं नसीर कुरैशी प्रधान संपादक सत्यम् न्यूज़ भदोही से हूं। आज 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस है। मैने सोचा कि आज के दिन ईमानदार व कुछ दलाल पत्रकारों के बारे में लिखा जाए, जो आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं। अगर आपको व आपकी टीम को अच्छा लगे तो अपने इस पाठक को अपने भड़ास 4 मीडिया में थोड़ा सा जगह देकर इसको फ्लैश करने की कृपा करें।

धन्यवाद
नसीर कुरैशी


विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस : पत्रकारिता जैसे मिशन में दलाल और भांड़ किस्म के पत्रकारों की घुसपैठ

आज 3 मई विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के अवसर पर भदोही जनपद के निडर, बेखौफ व अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करने वाले पत्रकार साथियों को ढेर सारी शुभकामनाएं और हमारी उन्हें श्रध्दांजलि जो पत्रकार साथी अपने कर्तव्यों का निर्वाहन करते हुए अपने प्राणों की आहुति दे गये। बताते चलें कि आज 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्वस्तर पर प्रेस की आजादी को सम्मान देने के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ की महासभा द्वारा 3 मई को विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस घोषित किया गया जिसे विश्व प्रेस दिवस के रूप में भी जाना जाता है। प्रेस स्वतंत्रता को लेकर तरह-तरह कार्यक्रमो का आयोजन किया जाता है जिसमें पत्रकारों के हित व उत्थान के लिए चर्चाएं होती थीं लेकिन अब यह पूरी तरह बदल चुका है।

इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि पत्रकारिता जैसे मिशन में दलाल व भांड किस्म के पत्रकारों की घुसपैठ हो गयी है। जो नेताओं व अधिकारियों की चाटुकारिता करते हैं। आज पत्रकारिता की आड़ में बड़े-बड़े कारनामे किये जो रहे है। इससे भदोही जनपद भी अछूता नही है। पत्रकारिता में भांडगिरी भदोही में कुछ ज्यादा ही है। यहां हर कोई अपने को पत्रकारों को मठाधीश साबित करने के लिए नेताओं व अधिकारियों के तलवे चाटते हैं। भदोही के इन्ही भांड व दलाल किस्म के पत्रकारों के चलते भदोही के कुछ निडर व साहसी पत्रकारों को काफी परेशानी का सामना भी करना पड़ा था। जब भदोही कोतवाली में तैनात एक पूर्व बेलगाम इंस्पेक्टर से मुखबिरी व चुगलखोरी कर भदोही के भांड व दलाल पत्रकारों ने यहां के साहसी व निडर पत्रकारों को बलि का बकरा बनवाया था। आज भी इन भांड व  दलाल किस्म के पत्रकार जमकर थाने व तहसीलों की दलाली करते हैं। तथा नेताओं व अधिकारियों के तलवे चाटते देखे जा सकते है।

नसीर कुरैशी
प्रधान संपादक
सत्यम् न्यूज़
भदोही

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यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

अगर आप भी बनारस जाएं तो ये बुजुर्ग लेकिन गरीब अखबार मालिक कोदई चौकी सड़क पर बैठे मिल जाएंगे. दहकता सूरज नामक अखबार का प्रेस कार्ड आप भी इन्हें पांच सौ या हजार रुपया देकर बनवा सकते हैं. इनके पास बाकायदे रसीद बुक होती है जिस पर वह एमाउंट चढ़ाते हैं और आपके पैसे के बदले आपको रसीद व प्रेस कार्ड देते हैं. मतलब कि काम बिलकुल ये पक्का वाला करते हैं. रास्ते से गुजरने वाले लोग रुक रुक कर इस दुकान को देखते हैं और कुछ लोग 500 से 1000 रुपया देकर प्रेस कार्ड बनवा लेते हैं तो कुछ लोग पत्रकारिता की हालत पर तरस खाते हुए बुजुर्ग शख्स को कोसते हुए आगे बढ़ लेते हैं.

ये बुजुर्ग अखबार मालिक न तो अपने किसी इंप्लाई का मजीठिया वेज बोर्ड वाला हक मारता है और न ही पेड न्यूज करता है, क्योंकि ये अपना अखबार अब छापता ही नहीं है. यह न तो झूठे प्रसार के आंकड़े बताता है और न ही सांठगांठ करके सरकारी विज्ञापन छापता है, क्योंकि ये अपना अखबार अब छापता ही नहीं है. यह तो बस दो चार प्रेस कार्ड बेचकर अपना व अपने परिवार का जीवन चला लेता है. बताइए, क्या यह आदमी पापी है या हम सब के पापों के आगे इसका पाप बहुत छोटा है?

वाराणसी से प्रहलाद मद्धेशिया की रिपोर्ट.

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शाहरुख खान को देखकर पागल हो जाने वाली ये महिला पत्रकार क्या पत्रकारिता करने लायक हैं!

मीडिया में यंगस्टर आजकल बड़े लोगों संग सेल्फी लेने और सितारों के साथ अपना प्रेम जाहिर करने आते हैं… कल नोएडा में किडजेनिया के लांच समारोह में शाहरुख खान आए.. जाहिर है लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन शाहरुख आए तो पागल होना लाजमी था… जीआईपी मॉल के बाहर भीड़ लग चुकी थी… शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस शुरू की… कुछ नई लड़कियों का ग्रुप जो जागरण, फैशन डॉट कॉम और कुछ अन्य संस्थाओं से आईं थी, उन्हें देख कर लग रहा था कि वो केवल खान को देखने आई हैं… उन्हें इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई लेना देना नहीं है … और हुआ भी वही…

एक नामी चैनल की पत्रकार ने जब शहरुख से असहिष्णुता पर सवाल पूछा तब पी.आर. और शाहरुख खान, दोनों ने जवाब देने से मना कर दिया… पर फैशनेबल महिला पत्रकारों के ग्रुप को इससे कुछ लेना देना न था… इसी ग्रुप की एक लड़की ने जल्द ही माइक पकड़ कर बोला- शाहरुख आईलव यू… आप मेरी जान हैं…. शाहरुख ने भी उतर दिया… i will marry u…

ये सुन वो नई नवेली पत्रकार पागल हो गई और शाहरुख के सामने ही बचकानी हरकत करने लगी… अभी ये खत्म ही नहीं हुआ था कि उसी ग्रुप की दूसरी लड़की खड़ी हुई और बोली… शाहरुख मैं पत्रकारिता को अलग रखती हूं और ये कहूंगी कि मैं आपकी सबसे बड़ी फैन हूं, मैं यंहा सिर्फ आपके साथ फोटो लेने आई हूं।

सवाल ये है कि क्या एडिटर लोग अपने पत्रकारों को समझा कर नहीं भेजते… आप वहां काम करने जा रही हैं न ही उसकी फैन बनने… अगर आप उसे सर पर चढाएंगे तो वो आपको कुछ नहीं समझेगा… आज समझ आया कि सलमान खान क्यों प्रेस कॉन्फ्रेंस में यंग लड़कियों से बात नहीं करते, क्यों सलमान किसी युवा को इंटरव्यू नहीं देते। अगली बार संस्थान ऐसी जगहों पर उसको भेजे जो पत्रकार ही हो, न कि फैन बनकर पहुंचे।

युवा पत्रकार विपुल कश्यप की रिपोर्ट. संपर्क : kashyap.vipul28@gmail.com

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PRESS से हो, तो क्या नियम-कानून तोड़ने का हक़ मिल गया तुम्हें?

Dinesh Dard : पलासिया से इंडस्ट्री हाऊस की ओर वाले पैदल पथ (फुटपाथ) पर यूँ तो अक्सर दुपहिया-चार पहिया वाहनों का दौड़ना चलता रहता है, जो नियम के ख़िलाफ़ है। मगर मान लो फुटपाथ खाली हो और आपका कहीं पहुँचना बहुत ही ज़रूरी हो, तो मजबूरी में उस पर से गुज़रना समझ में आता है। लेकिन उसमें भी एक अपराध बोध ज़रूर होना चाहिए कि उन्होंने पैदल यात्रियों का अधिकार छीना। मगर इनमें अपराध बोध तो दूर, इन्हें तो ये एहसास तक नहीं होता कि ये ग़लत कर रहे हैं।

पैदलपथ से दनदनाते हुए निकल जाना तो जैसे ये अपना अधिकार समझते हैं। उस पर बेशर्मी की हद ये, कि अगर कोई पैदल यात्री पैदलपथ पर चल रहा है, तो पीछे से हॉर्न बजा-बजाकर रास्ता देने को कहेंगे।

दुःख की बात तो ये है कि इन बेशर्मों में सबसे अव्वल तो वही युवा वर्ग है, जिनके दम पर हम फिर से विश्वगुरु बनने का सपना देख रहे हैं। अरे लानत है ऐसे बद्तमीज़ और पढ़े-लिखे अनपढ़ युवाओं पर, जो नियम-अनुशासन का पालन करना अपनी जवानी की तौहीन समझते हैं। यार विश्वगुरु के पथ पर बाद में क़दम बढ़ाना, पहले अपने शहर की सड़कों पर तो चलना सीख लो।

युवाओं के अलावा मैंने कई बार उन बेशर्मों की कारों को भी फुटपाथ से गुज़रते देखा है, जिनके काँच पर “+” (डॉक्टर) का निशान लगा होता है। एक बार मैंने रास्ता नहीं दिया, तो भीतर से ही दयनीय चेहरा बनाकर इशारा करने लगे कि, जैसे- “बस, यहीं तक जाना है।” आख़िर मुझे रास्ता देना ही पड़ा। और वो डॉक्टर अपने परिवार के साथ नियम-कानून का पोस्टमार्टम करता हुआ निकल गया।

इसी तरह नियमों की धज्जियां उड़ाने वालों में शिक्षक वर्ग के तथाकथित अनपढ़ शिक्षक भी आते हों, तो कह नहीं सकता। क्योंकि इनके वाहनों पर तो डॉक्टर-वकील जैसा कोई निशान होता नहीं है, जो मैं पहचान जाऊँ।

ख़ैर, अब वो क़िस्सा बताता हूँ जिसकी वजह से आज मुझे इतना तल्ख़ लहजा अख्तियार करना पड़ा। दरअस्ल, आज फिर मेरा उसी फुटपाथ से गुज़रना हुआ। दोपहिया वाहन तो सड़क छोड़ मेरे अगल-बगल से गुज़र गए। मगर इस बार मेरे पीछे कार थी, जो हॉर्न दे-देकर चलना हराम किए दे रही थी। मैंने पलटकर देखा, तो ड्राईवर के बगल वाली सीट पर एक सांवली-सी मोटी औरत/लड़की बैठी थी। शायद वही पत्रकार हो। उसकी साइड वाली ही स्क्रीन पर लाल हर्फ़ों में लिक्खा था PRESS. अरे भई, PRESS वाले हो, तो क्या तुम्हें कानून-कायदा तोड़ने का लाइसेंस मिल गया ?

कार पर PRESS लिक्खा देखना था कि मेरा पारा चढ़ गया। आख़िर, मैं भी पत्रकारिता से जो तआल्लुक़ रखता हूँ। प्रेस का नुमाइंदा और इतना ग़ैरज़िम्मेदार। बस, यही सोचकर गुस्सा आ गया। मैंने सख़्त ऐतिराज़ जताते हुए उसकी ओर रुख़ किया। कार (MP09…..9767 पूरा नम्बर याद नहीं रहा) की खिड़की का शीश चढ़ा हुआ था। मैंने इशारे में ही उसको बताया कि “अक्कल के अंधे, सड़क के रास्ते जा ना। फुटपाथ पर क्या अंधे की तरह भटक रहा है।” बहरहाल, भैंस के आगे बीन बजाने से क्या लाभ ? और यह सब ये लोग आगे इंडस्ट्री हाउस तिराहे पर “रेड सिग्नल” होने की वजह से करते हैं। ज़रा देर सिग्नल के ग्रीन होने का इंतेज़ार नहीं कर सकते।

ख़ैर, अब दिक्कत ये है कि पत्रकार जैसे ज़िम्मेदार लोग ही अगर ऐसी ग़ैरज़िम्मेदाराना हरकत करेंगे, तो बाकी लोगों से उम्मीद ही क्या की जा सकती है ? मुझे तो लगता है कि ज़रूर ये कोई प्रेसनोटिया छाप और प्रेस कॉन्फ्रेंस में गिफ़्ट के लिए लार टपकाने टाइप की पत्रकार रही/रहा होगी/होगा। चाहे जो भी हो, करते तो ये पत्रकार वर्ग की नुमाइंदगी ही है ना। समाज को आईना दिखाने वाला यही वर्ग अगर ऐसी गुस्ताख़ियाँ करेगा, तो ग़लत करने वाले दूसरे लोगों को किस मुँह से सच्चाई का पाठ पढ़ा सकेगा ? और मान लो, अगर तुम अव्वल दर्ज़े के बेशरम हो।

ख़ुद ग़लत होकर दूसरों को अनुशासित रहने का और सच्चाई का उपदेश (ज्ञान) दे रहे हो, तो अपनी आवाज़ में ईमानदारी वाला वज़न कहाँ से लाओगे ? वो वज़न तो तुमको तुम्हारी ईमानदारी और ज़मीर की ताक़त से ही मिलेगा, किसी ब्यूरोचीफ़ या संपादक की चरणवंदना करने से नहीं।

(बेजा लफ़्ज़ों के लिए मुआफ़ी चाहता हूँ।)

इंदौर के युवा पत्रकार और गीतकार दिनेश दर्द के फेसबुक वॉल से.

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जो-जो पत्रकार pm के साथ सेल्फी की फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाले, कमेंट बॉक्स में ‘प्रेस टी च्यूट” ज़रूर लिखना

Yashwant Singh : आज मीडिया वालों का सेल्फी दिवस है। pm साब बेचारों को पूरा मौका दिए हैं। फिर भी मीडिया वाले साले कहते हैं कि हमारे pm जी असहिष्णु हैं! अबे चिरकुटों, असहिष्णु तो तुम खुद हो। मरे गिरे छटपटाये जा रहे हो सेल्फी के लिए। pm ने तुम लोगों की औकात फिर दिखा दी। बिकाऊ बाजारू के अलावा सच में ‘प्रेस टी च्यूट’ हो।

आज फिर समझ आया कि चिरकुट मालिकों ने गधों को संपादक बनाया और गधे संपादकों ने लुच्चे लफंगों को रिपोर्टर भर्ती किया। इसके बाद जो होना था वो आज मीडिया सेल्फी डे के मौके पर हुवा। जो-जो पत्रकार pm के साथ सेल्फी की फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाले, कमेंट बॉक्स में ‘प्रेस टी च्यूट” ज़रूर लिखना। ध्यान से। आओ सालों सेल्फी ले के। सोशल मीडिया वाले डंडा में तेल पिला के तुम लोगों को अगोर ही रहे हैं।

भड़ास के एडिटर यशवंत सिंह के फेसबुक वॉल से.

इस स्टेटस पर आए कुछ कमेंट्स यूं हैं..

Ashutosh Shukla : अगोरेंगे।

Dhananjay Srivastava : ऐसे लोगों को लखेदना बहुत जरुरी है 🙂 अगोरने पर जैसे ही हाथ लगें, लिहो लिहो कर के लखेदना चाहिए.

Hariom Garg : बिलकुल सही पकड़े हैं.

Rajeev Tewari : अगोर रहे हैं, आएं साले!

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बीते दो दशकों में मीडिया की दशा-दिशा में आए बदलावों का वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल द्वारा विस्तृत विश्लेषण

मीडिया के बदलते रुझान-1 : इन नवकुबेरों ने मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन कर दिया

 

अगर हम मीडिया के रुझान में आये बदलाव के लिए कोई विभाजन-रेखा खींचना चाहें तो वह विभाजन-रेखा है सन 1995. नरसिंह राव सरकार के वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप अख़बारी दुनिया में व्यापक परिवर्तन हुए. पहला बदलाव तो यह आया कि सम्पादक नाम की संस्था दिनोदिन कमज़ोर होती चली गयी, और अन्ततः आज सम्पादक की हैसियत महज एक मैनेजर की रह गयी है.

दूसरा बदलाव यह आया कि मीडिया में बाज़ार का दख़ल उत्तरोत्तर बढ़ता चला गया. बढ़ते विज्ञापनों के कारण अख़बारों के पेजों की संख्या बढ़ती गयी, ज़्यादा से ज़्यादा पेज रंगीन करने की होड़ ने रफ़्तार पकड़ ली, और अख़बार मिशन से व्यवसाय, और व्यवसाय से धन्धे में तब्दील हो गये. और…जब कोई व्यवसाय धन्धा बन जाये तो मर्यादाओं का चीरहरण होने में देर नहीं लगती.

विज्ञापन हथियाने के लिए चाटुकारिता और ब्लैकमेलिंग के हथियार खुलकर चलाये जाने लगे. तीसरा और सबसे दुःखद बदलाव यह आया कि बाज़ारवाद के कारण जिन लोगों ने देखते-देखते बेशुमार दौलत के टापू खड़े कर लिये, उन्होंने उन टापुओं पर अपना कब्ज़ा बनाये रखने के लिए नये-नये अख़बार निकाल लिये, धड़ाधड़ चैनल शुरू कर दिये. इन नये कुबेरों का नैतिकता से दूर-दूर तक कोई वास्ता नहीं है. ऐसे लोगों के शब्दकोश में तो मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन लिख दिया गया है.

ऐसे नव-कुबेरों का प्रतिनिधित्व करता है एक समाचार-पत्र समूह, जिसके सन 1992 में मात्र पाँच संस्करण होते थे, जिनकी कुल प्रसार संख्या मात्र डेढ़ लाख कॉपियाँ थीं, आज देश का सबसे बड़ा मीडिया समूह है, जिसके न जाने कितने अन्य धन्धे देश भर में फैले हैं. चैनलों की भीड़ ने, आपसी होड़ के चलते, तथाकथित ख़बरों के जरिये महज़ सनसनी फैलाना ही अपना परम धर्म मान लिया है.

मजबूरन अख़बारों को भी इस भेड़चाल का शिकार होना पड़ा है. अगर हम चौथे बदलाव की बात करें तो मीडिया-ट्रायल का चलन लगातार बढ़ता जा रहा है. हालांकि कई मामलों में मीडिया-ट्रायल के फ़ायदे भी हुए हैं, लेकिन ज़्यादातर मामलों में हमारे न्यूज़ चैनलों में घुसे जेम्सबाण्डों और स्वयंभू जजों को नतीज़ों पर पहुँचने की जल्दी इतनी ज़्यादा होती है कि वे अपनी इन हरकतों से मामलों की तार्किक जाँच-पड़ताल और न्याय-प्रक्रिया को अपूरणीय नुकसान पहुँचाने से भी गुरेज नहीं करते. आरुषी हत्याकाण्ड इसका माकूल उदहारण है.

समाचारों और विचारों में बाज़ार इस कदर हावी है कि ख़बर और विज्ञापन में अन्तर कर पाना बेहद मुश्किल काम हो गया है. बाज़ार का इससे ज़्यादा साफ़ असर क्या होगा कि ख़रीदारी के लिए शुभ माने जाने वाला पुष्य नक्षत्र की आवृत्ति साजिशाना ढंग से बहुत ज़्यादा बढ़ गयी है. यहाँ तक कि कुछ अख़बार तो श्राद्ध पक्ष के दौरान भी पुष्य नक्षत्र के आगमन के प्रायोजित समाचार छापकर पाठकों को बेवकूफ़ बनाने से बाज नहीं आते. तमाम अख़बार ख़रीदारी के लिए तरह-तरह के मेले लगाने को अपना परम कर्त्तव्य मान बैठे हैं. यह पाठकों के खिलाफ़ एक गहरी मीडियाई साजिश है.

पाँचवाँ और आख़िरी बदलाव सुकून देने वाला बदलाव है. पहले सम्पादक नाम के प्राणी को विज्ञापनदाता और विज्ञापन लाने वाले स्टाफ से इस कदर जन्मजात चिढ़ होती थी कि वह विज्ञापनदाता पार्टी के ख़िलाफ़ ख़बर छापने को अपने वज़ूद की बुनियादी शर्त मानता था, और विज्ञापन-कर्मी उनके लिए हेय प्राणी होते थे. लेकिन अब यह ‘सबके साथ सबके विकास’ का युग है. अब सम्पादक के दायित्वों के साथ प्रबन्धकीय दायित्व भी जुड़ गये हैं और आज उद्योग-व्यवसाय के हितों का ख्याल रखने का जिम्मा वे बखूबी निभाने लगे हैं.

(जारी)

लेखक एलएन शीतल वरिष्ठ पत्रकार हैं और नवभारत ग्रुप के सीनियर ग्रुप एडिटर हैं. शीतल से संपर्क फेसबुक के इस लिंक Facebook.com/lnshital.1958 के जरिए कर सकते हैं

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पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिक गई है!

: सत्ता से दो दो हाथ करते करते मीडिया कैसे सत्ता के साथ खडा हो गया : अमेरिका में रुपर्ट मर्डोक प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो मड्रोक ने मोदी को आजादी के बाद से भारत का सबसे शानदार पीएम करार दे दिया। मड्रोक अब अमेरिकी राजनीति को भी प्रभावित कर रहे है। ओबामा पर अश्वेत प्रेसीडेंट न मानने के मड्रोक के बयान पर बवाल मचा ही हुआ है। अमेरिका में अपने न्यूज़ चैनल को चलाने के लिये मड्रोक आस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ अमेरिकी नागरिक बन चुके है, तो क्या मीडिया टाइकून इस भूमिका में आ चुके हैं कि वह सीधे सरकार और सियासत को प्रभावित कर सके या कहे राजनीतिक तौर पर सक्रिय ना होते हुये भी राजनीतिक खिलाडियों के लिये काम कर सके।

अगर ऐसा हो चला है तो यकीन मानिये अब भारत में भी सत्ता-मीडिया का नैक्सेस पेड न्यूज़ से कही आगे निकल चुका है। जहाँ अब सत्ता के लिये खबरों को नये सिरे से बुनने का है या कहे सत्तानुकुल हालात बने रहे इसके लिये दर्शको के सामने ऐसे हालात बनाने का है जिस देखते वक्त दर्शक महसूस करें कि अगर सत्ता के विरोध की खबर है तो खबर दिखाने वाला देश के साथ गद्दारी कर रहा है। यानी पहली बार मीडिया या पत्रकारिता की इस धारणा को ही मीडिया हाउस जड़-मूल से खत्म करने की राह पर निकल पडे हैं कि पत्रकारिता का मतलब यह कतई नहीं है कि चुनी हुई सरकार के कामकाज पर निगरानी रखी जाये। यानी सत्ता को जनता ने पांच साल के लिये चुना है तो पाँच बरस के दौर में सत्ता जो करे जैसा करे वह देश हित में ही होगा। जाहिर है यह बेहद महीन लकीर है है जहाँ मीडिया का सत्ता के साथ गठजोड़ मीडिया को भी राजनीतिक तौर खड़ा कर दें और सत्ता भी मीडिया को अपना कैडर मान कर बर्ताव करें। यह घालमेल व्यवसायिक तौर पर भी लाभदायक साबित हो जाता है।

यानी सत्ता के साथ खड़े होने की पत्रकारिता इसका एहसास होने ही नहीं देती है कि सत्ता कोई लाभ मीडिया हाउस को दे रही है या मीडिया सत्ता की राजनीति का प्यादा बनकर पत्रकारिता कर रही है। इसके कई उदाहरणों को पहले समझें। बिहार चुनाव में किसी भी अखबार या न्यूज चैनल की हेडलाइन नीतिश कुमार को पहले अहमियत देती है। उसके बाद प्रधानमंत्री मोदी का नंबर आयेगा और फिर लालू प्रसाद यादव का। यानी कोई भी खबर जिसमें नीतिश कह रहे होगें या नीतिश को निशाने पर लिया जा रहा होगा वह खबर नंबर एक हो जायेगी। इसी तर्ज पर मोदी जो कह रहे होगें या मोदी निशाने पर होगें उसका नंबर दो होगा।

कोई भी कह सकता है कि जब टक्कर इन्हीं दो नेताओं के बीच है, तो खबर भी इन्ही दो नेताओं को लेकर होगी। तो सवाल है कि जब सुशील मोदी कहते है कि सत्ता में आये तो गो-वध पर पांबदी होगी। तो उस खबर को ना तो कोई पत्रकार परखेगा और ना ही अखबार में उसे प्रमुखता के साथ जगह मिलेगी। लेकिन जब नीतिश इसके जबाब में कहगें कि बिहार में तो साठ बरस से गो-वध पर पाबंदी है तो पत्रकार के लिये वह बड़ी खबर होगी। इसी तर्ज पर केन्द्र का कोई भी मंत्री बिहार चुनाव के वक्त आकर कोई भी बडे से बडा नीतिगत फैसले की जानकारी चुनावी रैली या प्रेस कान्फ्रेस में दे दें। उसको अखबार में जगह नहीं मिलेगी। ना ही प्रधानमंत्री मोदी के किसी बडे फैसले की जानकारी देने को अखबार या न्यूज चैनल दिखायेगें। यानी पीएम मोदी के बयान में जब तक नीतिश –लालू को निशाने पर लेने का मुलम्मा ना चढा हो, वह खबर बन ही नहीं सकती। यानी खबरों का आधार नेता या कहे सियासी चेहरो को उस दौर में बना दिया गया जब सबसे ज्यादा जरुरत ग्राउंड रिपोर्टिंग की है और उसके बाद चेहरों की प्राथमिकता सत्ता के साथ गढजोड़ के जरीये कुछ इस तरह से पाठकों में या कहें दर्शकों में बनाते हुये उभर कर आयी, जिससे ग्राउंड रिपोर्टिंग या आम जनता से जुड़े सरकारी फैसलों को परखने की जरुरत ही ना पड़े। उसकी एवज में सरकार के किसी भी फैसले को सकारात्मक तौर पर तमाम आयामों के साथ इस तरह रखा जाये जिससे पत्रकारिता सूचना संसार में खो जाये।

मसलन झारखंड विश्व बैंक की फेरहिस्त में नंबर 29 से खिसक कर नंबर तीन पर आ गया। इसकी जानकारी प्रधानमंत्री मोदी बांका की अपनी चुनावी रैली में यह कहते हुये देते है कि नीतिश बिहार को 27 वें नंबर से आगे ना बढा पाये, तो खबरों के लिहाज से नीतिश पर हमले या उनकी नाकामी या झारखंड में बीजेपी की सत्ता आने के बाद उसके उपलब्धि से आगे कोई पत्रकारिता जायेगी ही नहीं। यानी झारखंड में कैसे सिर्फ खनन का लाइसेंस नये तरीके से सत्ता के करीबियो को बांटा गया और खनन प्रक्रिया का लाभ झरखंड की जनता को कम उघोगपतियों को ज्यादा हो रहा है। इसपर कोई रिपोर्टिंग नहीं और वर्ल्ड बैंक की रिपोर्ट झारखंड के लोगो की बदहाली या इन्फ्रास्ट्रक्चर की दिशा में सबकुछ कैसे ठप पडा है या फिर रोजगार के साधन और ज्यादा सिमट गये हैं, इस पर केन्द्रित होता ही नहीं है। तो नयी मुशकिल यह नहीं है कि कोई पत्रकार इन आधारों को टटोलने क्यों नहीं निकलता। मुश्किल यह है कि जो प्रधानमंत्री कह दें या बिहार में जो नीतिश कह दें उसके आगे कोई लकीर इस दौर में पत्रकारिता खिंचती नहीं है या पत्रकारिता के नये तौर तरीके ऐसे बना दिये गये है जिससे सत्ता के दिये बयान या दावो को ही आखरी सच करार दे दिया जाये।

अब यह सवाल उठ सकता है कि आखिर ऐसे हालात पेड मीडिया के आगे कैसे है और इस नये हालात के मायने है क्या? असल में मीडिया के सरोकार जनता से हटते हुये कैसे सत्ता से ज्यादा बनते चले गये और सत्ता किस तरह मीडिया पर निर्भर होते हुये मीडिया के तौर तरीकों को ही बदलने में सफल हो गया। समझना यह भी जरुरी है। मौजूदा वक्त में मीडिया हाउस में कारपोरेट की रुची क्या सिर्फ इसलिये है कि मीडिया से मुनाफा बनाया कमाया जा सकता है? या फिर मीडिया को दूसरे धंधो के लिये ढाल बनाया जा सकता है, तो पहला सच तो यही है कि मीडिया कभी अपने आप में बहुत लाभ कमाने का धंधा रहा ही नहीं है। यानी मीडिया के जरीये सत्ता से सौदेबाजी करते हुये दूसरे धंधो से लाभ कमाने के हालात देखे जा सकते है। लेकिन मौजूदा हालात जिस तेजी से बदले है या कहे बदल रहे है उसमें मीडिया की मौजूदगी अपनी आप में सत्ता होना हो चला है और उसकी सबसे बडी वजह है, बाजार का विस्तार। उपभोक्ताओं की बढती तादाद और देश को देखने समझने का नजरिया।

तमाम टेक्नॉलाजी या कहें सूचना क्रांति के बाद कहीं ज्यादा तेजी से शहर और गांव में संवाद खत्म हुआ है। भारत जैसे देश में आदिवासियों का एक बडा क्षेत्र और जनसंख्या से कोई संवाद देश की मुख्यधारा का है ही नहीं है। इतना ही नहीं दुनिया में आवाजाही का विस्तार जरुर हुआ लेकिन संवाद बनाना कहीं ज्यादा तेजी से सिकुड़ा है, क्योंकि सुविधाओ को जुगाडना, या जीने की वस्तुओं को पाने के तरीके या फिर जिन्दगी जीने के लिये जो मागदौल बाजारनुकुल है उसमें सबसे बडी भूमिका टेक्नोलॉजी या मीडिया की ही हो चली है। यानी कल तो हर वस्तु के साथ जो संबंध मनुष्य का बना हुआ था वह घटते-घटते मानव संसाधन को हाशिये पर ले आया है। यानी कोई संवाद किसी से बनाये बगैर सिर्फ टेक्नालॉजी के जरीये आपके घर तक पहुँच सकती है। चाहे सब्जी फल हो या टीवी-फ्रिज या फिर किताब खरीदना हो या कम्यूटर। रेलवे और हवाई जहाज के टिकट के लिये भी अब उफभोक्ताओं को किसी व्यक्ति के संपर्क में आने की कोई जरुरत है ही नहीं। सारे काम, सारी सुविधा की वस्तु, या जीने की जरुरत के सामान मोबाइल–कम्यूटर के जरीये अगर आपके घर तक पहुंच सकते है तो उपभोक्ता समाज के लिये मीडिया की जरुरत सामाजिक संकट, मानवीय मूल्यो से रुबरु होना या देश के हालात है क्या या किसी भी धटना विशेष को लेकर जानकारी तलब करना क्यों जरुरी होगा?

खासकर भारत जैसे तीसरी दुनिया के देश में जहाँ उपभोक्ताओं की तादाद किसी भी यूरोप के देश से ज्यादा हो और दो जून के लिये संघर्ष करते लोगो की तादाद भी इतनी ज़्यादा हो कि यूरोप के कई देश उसमें समा जाये, तो पहला सवाल यही है कि समाज के भी की असमानता और ज्यादा बढे सके। इसके लिए मीडिया काम करेगा या दूरिया पाटने की दिशा में रिपोर्ट दिखायेगा। जाहिर है मीडिया भी पूंजी से विकसित होता माध्यम ही जब बना दिया गया है और असमानता की सबसे बडी वजह पूंजी कमाने के असमान तरीके ही सत्ता की नीतियों के जरीये विस्तार पा रहे हो तो रास्ता जायेगा किधर। लेकिन यह तर्क सतही है। असल सच यह है कि धीरे-धीरे मीडिया को भी उत्पाद में तब्दील किया गया। फिर मीडिया को भी एहसास कराया गया कि उत्पाद के लिये उपभोक्ता चाहिये। फिर उपभोक्ता को मीडिया के जरीये ही यह सियासी समझ दी गई कि विकास की जो रेखा राज्य सत्ता खिंचे वही आखरी सच है। ध्यान दें तो 1991 के बाद आर्थिक सुधार के तीन स्तर देश ने देखे। नरसिंह राव के दौर में सरकारी मीडिया के सामानांतर सरकारी मंच पर निजी मीडिया हाउस को जगह मिली। उसके बाद वाजपेयी के दौर में निजीकरण का विस्तार हुआ। यानी सरकारी कोटा या सब्सीडी भी खत्म हुई।

सरकारी उपक्रम तक की उपयोगिता पर सवालिया निशान लगे। मनमोहन सिंह के दौर में बाजार को पूंजी के लिये पूरी तरह खोल दिया गया। यानी पूंजी ही बाजार का मानक बन गई और मोदी के दौर में पहली बार उस भारत को मुख्यधारा में लाने के लिये पूंजी और बाजार की खोज शुरु हुई जिस भारत को सरकारी पैकेज तले बीते ढाई दशक से हाशिये पर रखा गया था। पहली बार खुले तौर पर यह मान लिया गया कि 80 करोड भारतीयों को तभी कुछ दिया जा सकता है जब बाकी तीस करोड़ उपभोक्ताओं के लिये एक सुंदर और विकसित भारत बनाया जा सके। लेकिन इस सोच में यह कोई समझ नहीं पाया कि जब पूंजी ही विकास का रास्ता तय करेगी तो सत्ता कोई भी हो वह पूंजी पर ही निर्भर होगी और वह पूंजी कही से भी आये और सत्ता के पूंजी पर निर्भर होने का मतलब है वह तमाम आधार भी उसी पूंजी के मातहत खुद को ज्यादा सुरक्षित और मजबूत पायेगें जो चुनी हुई सत्ता के हाथ में नहीं बल्कि पूंजी के जरीये बाजार से मुनाफा बनाने के लिये देश की सीमा नहीं बल्कि सीमाहीन बाजार का खुलापन तलाशेगें।

ध्यान दें तो मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिकी है। सेल्स या मार्केटिंग टीम न्यूज रुम पर भारी पडने लगी, तो संपादक भी मैनेजर से होते हुये पूंजी बनाने और जुगाड कराने से आगे निकलते हुये सत्ता से वसूली करते हुये खुद में ही सत्ता बनने के दरवाजे पर टिका। प्रोपराइटर का संपादक हो जाना। समाचार पत्र या न्यूज चैनल के लिये पूंजी का जुगाड करने वाले का संपादक हो जाना। यह सब 2014 के लोकसभा चुनाव से पहले चलता रहा। लेकिन जिस तर्ज पर 2014 के लोकसभा चुनाव ने सत्ता के बहुआयामी व्यापार को खुल कर सामने रख दिया उसमें खबरो की दुनिया से जुडे पत्रकारो और मालिको को सामने पहली बार यह विकल्प उभरा कि वह सरकार की नीतियो को उसके जरीये बनाये जाने वाली व्यवस्था के साथ कैसे हो सकते है और राज्य के हालात खुद ब खुद उसे मदद दे देगा या फिर उसे खत्म कर देगा। यानी साथ खड़े हैं तो ठीक नहीं तो दुश्मन। यह हालात इसलिये पेड न्यूज से आगे आकर खडे हो गये क्योंकि चाहे अनचाहे अब राज्य को अपने मीडिया बजट का बंदर बाँट अपने साथ खड़े मीडिया हाउस में बाँटने के नहीं थे। बल्कि सत्ता की अकूत ताकत ने खबरों को परोसने के सलीके में भी सत्ता की खुशबू बिखरनी शुरु कर दी। सामाजिक तौर पर सत्ता मीडिया के साथ कैसे खड़ी होगी यह मीडिया के सत्ता के लिये काम करने के मिजाज पर आ टिका।

दिल्ली में प्रधानमंत्री मोदी उन्हीं पत्रकारो के साथ डिनर करेगें जो उनकी चापलूसी में माहिर होगा और पटना में नीतिश कुमार उन्ही पत्रकारो को आगे बढाने में सहयोग देगें जो उनके गुणगाण करने से हिचकेगा नहीं। इसलिये कोई पत्रकार दिल्ली में मोदी हो गया तो कोई पत्रकार पटना में नीतिश कुमार और जो-जो पत्रकार सत्ता से खुले तौर पर जुडा नजर आया उसे लगा कि वह खुद में सत्ता है। यानी सबसे ताकतवर है। असर में बिहार चुनाव इस मायने में भी महत्वपूर्ण हो चला है कि पहली बार नायको की खोज से चुनाव जा जुडा है। यानी 1989 में लालू यादव मंडल के नायक बने तो 2010 में नीतिश सुशासन के नायक बने और 2014 के चुनाव में नरेन्द्र मोदी देश के विकास नायक बन कर उभरे। ध्यान दें तो इसके अलावे सिर्फ दिल्ली के चुनाव ने केजरीवाल के तौर पर नायक की छवि गढी। लेकिन केजरीवाल का नायककत्व पारंपरिक राजनीतिक को बदलने के लिये था ना कि नायक बन कर उसमें ढलने के लिये। लेकिन 2015 के आखिर में बिहार चुनाव की जीत हार में तय यही होना है कि विदेशी पूंजी और खुले बाजार व्यवस्था के जरीये भारत को बदलने वाला नायक चाहिये या फिर जातिय गठबंधन के आसरे सामाजिक न्याय की सोच को आगे बढाने वाला नायक चाहिये।

जाहिर है बिहार जिस रास्ते पर जायेगा उसका असर देश की राजनीति पर पडेगा, क्योंकि चुनाव के केन्द्र में नरेन्द्र मोदी की नायक छवि है और दूसरी तरफ चकाचौंध नायकत्व को चुनौती देने वाले नीतिश – लालू है। यानी यही हालात यूपी में भी टकरायेगें। अगर बिहार लालू नीतिश का रास्ता चुनता है तो यकीन मानिये मुलायम-मायावती भी दुश्मनी छोड गद्दी के लिये साथ आ खडे होगें ही। यानी 2 जून 1995 का गेस्ट हाउस कांड एक याद भर रह जायेगा और इससे पहले जो थ्योरी गठबंधन के फार्मूले में फेल होती रही वह फार्मूला चल पडेगा। यानी दो बराबर की पार्टियों में गठबंधन। जाहिर है राजनीतिक बदलाव का असर मीडिया पर भी पडेगा। क्योंकि सत्ता के साथ वैचारिक तौर पर खड़े होकर पूंजी या मुनाफा बनाने से आगे खुद को सत्ता मानने की सोच को मान्यता मिले या सत्ता के सामाजिक सरोकार का ताना-बाना बुनते हुये कारपोरेट या पूंजी की सत्ता को ही चुनौती देनी वाली पत्रकारिता रहे। फैसला इसका भी होना है, लेकिन दोनो हालात छोटे घेरे में मीडिया को वैसे ही बड़ा कर रहे है जैसे अमेरिका में मड्रोक सत्ता को प्रभावित करने की स्थिति में है वैसे ही भारत में सत्ता के लिये मीडिया सबसे असरकारक हथियार बन चुका है। फर्क इतना ही है कि वहा पूंजी तय कर रही है और भारत में सत्ता की ताकत।

आजतक न्यूज चैनल से जुड़े वरिष्ठ पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के ब्लाग से साभार.

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क्लीवेज दिखाना एंकर को पड़ा महंगा, चैनल ने किया सस्पेंड

अल्‍बीनिया में एक टीवी रिपोर्टर को न्‍यूज प्रजेंट करते समय क्‍लीवेज दिखाना और प्‍लेब्‍वॉय मैग्जीन ज्‍वाइन करना काफी महंगा पड़ गया। चैनल के नाराज अधिकारियों ने उसे तुरंत ही सस्‍पेंड कर दिया। साथ ही उसे अभी अपनी पढा़ई और जर्नलिज्‍म पर ध्‍यान देने की नसीहत दी। टीवी रिपोर्टर ने जिस समय ऐसा हाटॅ शूट दिया उस समय वह अंतरराष्‍ट्रीय खबरें पढ़ रही थी। अल्‍बीनिया में एक समाचार चैनल के लिए 21 साल की एन्‍की ब्रैकाज इंटरनेशनल लेवल की न्‍यूज पढ़ रही थीं, लेकिन अपने इस काम के दौरान उसने कुछ ऐसा कर दिया कि बाकी सभी लोग सन्न रह गए।

एन्‍की ब्रैकाज ने अपने सीनियर को इंप्रेस करने के लिए व अचानक से खुद को हाईलाइट करने के लिए अपने दोनों स्तन के काफी हिस्से उघाड़ दिए। काफी खुले हुए आउट फिट्स पहनने के कारण स्तन का अधिकांश हिस्सा दिख रहा था। वह अपने स्‍क्रीन टेस्‍ट को प्रभावशाली बनाना चा रही थी। उसका सपना था वर्ल्‍ड न्‍यूज चैनल में धमाकेदार एंट्री करने का। हुआ भी ऐसा ही। एंकर को प्‍लेब्‍वॉय फोटोशूट का ऑफर मिल गया और उन्‍होंने इसे ज्‍वाइन कर लिया। उसे और भी कई धमाकेदार ऑफर मिले।

एन्‍की ब्रैकाज इस बात से काफी खुश है कि एक स्‍क्रीन टेस्‍ट में वह क्‍लीवेज दिखाकर अचानक से पूरे अल्‍बीनिया में छा गई। सोशल साइट्स पर भी उसकी चर्चा होने लगी। मेललाइन को उसने बताया कि उसे लगता है कि टीवी की दुनिया में जर्नलिस्‍ट के लिए जॉब मिलना काफी रिस्‍की है। ऐसे में उसे अचानक से फेमस होने का यही रास्‍ता नजर आया। यह काफी असान और लोगो के बीच छाने का चांस था। हालांकि उनके इस ऑडीशन से टीवी चैनल के अधिकारी उनसे काफी नाराज हो गए। चैनल हेड ने रिपोर्टर की इस हरकत पर उसे काफी डांट लगाई। इसके बाद उसे बाहर का रास्‍ता दिखा दिया। इस दौरान उन्‍होंने उसे अपनी पढाई पर ध्‍यान देने और जर्नलिज्‍म के एथिक्‍स पढने की भी सलाह दी।

चैनल हेड का कहना है कि वह अल्‍बीनिया में एक लोकल चैनल जजार चला रहे हैं। इसके लिए उन्‍होंने कुछ दिन पहले एन्‍की ब्रैकाज की कुछ पिक्‍स वगैरह देखी तो वह उन्‍हें काफी ठीक लगी। उन्‍हें कैमरे के सामने जिस फेस की जरूरत थी वह उसके हिसाब से फिट बैठ रही थी। सबसे खास बात तो यह है कि अल्‍बीनिया की राजधानी तिराना की रहने वाली एन्‍की ब्रैकाज पब्‍लिस रिलेशन की पढाई यूनिवर्सिटी से कर रही है। इस पर उन्‍होंने उसे न्‍यूज पढ़ने का आफॅर दे दिया, लेकिन उसने प्रोफेशन की सीमाएं तोड़ दी। ज्ञात हो कि अल्‍बीनिया में लगभग 60 फीसदी मुस्‍लिम कम्‍युनिटी है इसलिए यहां नंगापन को काफी बुरा माना जाता है।

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मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

इस अंदाज को 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद बीजेपी ने कहना चाहा। मोदी सरकार ने अपनाना चाहा। इसी राह को केजरीवाल सरकार कहना चाहती है। अपनाना चाहती है। और, पन्नों को पलटें तो मनमोहन सरकार में भी आखिरी दिनों यही गुमान आ गया था जब वह खुले तौर पर अन्ना आंदोलन के वक्त यह कहने से नहीं चूक रही थी कि चुनाव लड़कर देख लीजिये। अभी हम जीते हैं तो जनता ने हमें वोट दिया है, तो हमारी सुनिये। सिर्फ हम ही सही हैं। हम ही सच कह रहे हैं। क्योंकि जनता को लेकर हम ही जमींदार हैं। यही है पूर्ण ताकत का गुमान। यानी लोकतंत्र के पहरुये के तौर पर अगर कोई भी स्तंभ सत्ता के खिलाफ नजर आयेगा तो सत्ता ही कभी न्याय करेगी तो कभी कार्यपालिका, कभी विधायिका तो कभी मीडिया बन कर अपनी पूर्ण ताकत का एहसास कराने से नहीं चूकेगी। ध्यान दें तो बेहद महीन लकीर समाज के बीच हर संस्थान में संस्थानों के ही अंतर्विरोध की खिंच रही है।

दिल्ली सरकार का कहना है, मानना है कि केन्द्र सरकार उसे ढहाने पर लगी है। बिहार में लालू यादव को इस पर खुली आपत्ति है कि ओवैसी बिहार चुनाव लड़ने आ कैसे गये। नौकरशाही सत्ता की पसंद नापसंदी के बीच जा खड़ी हुई है। केन्द्र में तो खुले तौर पर नौकरशाह पसंद किये जाते हैं या ठिकाने लगा दिये जाते हैं लेकिन राज्यो के हालात भी पसंद के नौकरशाहों को साथ रखने और नापसंद के नौकरशाहों को हाशिये पर ढकेल देने का हो चला है। पुलिसिया मिजाज कैसे किसी सत्ता के लिये काम कर सकता है और ना करे तो कैसे उसे बाहर का रास्ता दिखाया जा सकता है, यह मुबंई पुलिस कमिश्नर मारिया के तबादले और तबादले की वजह बताने के बाद उसी वजह को नयी नियुक्ति के साथ खारिज करने के तरीको ने बदला दिया। क्योंकि मारिया जिस पद के लाय़क थे वह कमिश्नर का पद नहीं था और जिस पद से लाकर जिसे कमिश्नर बनाया गया वह कमिश्नर बनते ही उसी पद के हो गये, जिसके लिये मारिया को हटाया गया। यानी संस्थानों की गरिमा चाहे गिरे लेकिन सत्ता गरिमा गिराकर ही अपने अनुकूल कैसे बना लेती है, इसका खुला चेहरा पीएमओ और सचिवों को लेकर मोदी मॉडल पर अंग्रेजी पत्रिका आउटलुक की रिपोर्ट बताती है तो यूपी सरकार के नियुक्ति प्रकरण पर इलाहबाद हाईकोर्ट की रोक भी खुला अंदेशा देती है कि राजनीतिक सत्ता पूर्ण ताकत के लिये कैसे मचल रही है। और, इन सभी पर निगरानी अगर स्वच्छंद तौर पत्रकारिता करने लगे तो पहले उसे मीडिया हाउस के अंतर्विरोध तले ध्वस्त किया गया। और फिर मीडिया को मुनाफे के खेल में खड़ा कर बांटने सिलसिला शुरू हुआ। असर इसी का है कि कुछ खास संपादक-रिपोर्टरो के साथ प्रधानमंत्री को डिनर पसंद है और कुछ खास पत्रकारों को दिल्ली सरकार में कई जगह नियुक्त कर सुविधाओं की पोटली केजरीवाल सरकार को खोलना पसंद है।

इसी तर्ज पर क्या यूपी क्या बिहार हर जगह ‘निगाहों में भी मीडिया को और निशाने पर भी मीडिया को’ लेने का खुला खेल हर जगह चलता रहा है। तो क्या यह मान लिया जाये कि मीडिया समूहों ने अपनी गरिमा खत्म कर ली है या फिर मुनाफे की भागमभाग में सत्ता ही एकमात्र ठौर हर मीडिया संस्थान का हो चला है। इसलिये जो सत्ता कहे उसके अनुकूल या प्रतिकूल जनता के खिलाफ चले जाना है या फिर सत्ता मीडिया के इसी मुनाफे के खेल का लाभ उठाकर सबकुछ अपने अनुकूल चाहती है। और वह यह बर्दाश्त नहीं कर पाती कि कोई उस पर निगरानी रखे कि सत्ता का रास्ता सही है या नहीं। इतना ही नहीं सत्ता मुद्दों को लेकर जो परिभाषा गढ़ता है उस परिभाषा पर अंगुली उठाना भी सत्ता बर्दाश्त नहीं कर पा रही है। हिन्दू राष्ट्र भारत कैसे हो सकता है, कहा गया तो सत्ता के माध्यमों ने तुरंत आपको राष्ट्रविरोधी करार दे दिया। अब आप वक्त निकालिये और लड़ते रहिये हिन्दू राष्ट्र को परिभाषित करने में।

इसी के समानांतर कोई दूसरा मीडिया समूह बताने आ जायेगा कि हिन्दू राष्ट्र तो भारतीय रगों में दौड़ता है। अब दो तथ्य ही मीडिया ने परिभाषित किये। जो सत्ता के अनुकूल, उसे सत्ता के तमाम प्रचार तंत्र ने पत्रकारिता करार दिया बाकियों को राष्ट्र विरोधी। इसी तर्ज पर किसी ने विकास का जिक्र किया तो किसी ने ईमानदारी का। अब विकास का मतलब दो जून की रोटी के बाद वाई फाई और बुलेट ट्रेन होगा या बुलेट ट्रेन और डिजिटल इंडिया ही। तो मीडिया इस पर भी बंट गई। जो सत्ता के साथ खड़ा, वह देश-हित में सोचता है। जो दो जून की रोटी का सवाल खड़ा करता है, वह बिका हुआ है। किसी पत्रकार ने सवाल खड़ा कर दिया कि सौ स्मार्ट सिटी तो छोडिये सिर्फ एक स्मार्ट सिटी बनाकर तो बताईये कि कैसी होगी स्मार्ट सिटी। तो झटके में उसे कांग्रेसी करार दिया गया। किसी ने गांव के बदतर होते हालात का जिक्र किया तो सत्ता ने भोंपू तंत्र बजाकर बताया कि कैसे मीडिया आधुनिक विकास को समझ नहीं पाता। और जब संघ परिवार ने गांव की फिक्र की तो झटके में स्मार्ट गांव का भी जिक्र सरकारी तौर पर हो गया।

इसी लकीर को ईमानदारी के राग के साथ दिल्ली में केजरीवाल सरकार बन गयी तो किसी पत्रकार ने सवाल उठाया कि जनलोकपाल से चले थे लेकिन आपका अपना लोकपाल कहां है तो उस मीडिया समूह को या निरे अकेले पत्रकार को ही अपने विरोधियो से मिला बताकर खारिज कर दिया गया। पांच साल केजरीवाल का नारा लगाने वाली प्रचार कंपनी पायोनियर पब्लिसिटी को ही सत्ता में आने के बाद प्रचार के करोड़ों के ठेके बिना टेंडर निकाले क्यों दे दिये जाते हैं। इसका जिक्र करना भी विरोधियो के हाथों में बिका हुआ करार दिया जाता है। जैन बिल्डर्स को लेकर जब दिल्ली सरकार से तार जोड़ने का कोई प्रयास करता है तो उसे बीजेपी का प्रवक्ता करार देने में भी देर नहीं लगायी जाती। और, इसी दौर में मुनाफे के लिये कोई मीडिया संस्थान सरकार से गलबिहयां करता है या फिर सत्ता नजदीक जाता है कि किसी एक मीडिया संस्थान से गलबहियां कर उससे पत्रकारो के बीच अपनी साख बनाये रखी जाती है तो बकायदा मंच पर बैठकर केजरीवाल यह कहने से नहीं हिचकते कि हम तो आपके साझीदार हैं।

यानी कैसे मीडिया को खारिज कर और पत्रकारों की साख पर हमला कर उसे सत्ता के आगे नतमस्तक किया जाये, यह खेल सत्ता के लिये ऐसा सुहावना हो गया है जिससे लगने यही लगा है कि सत्ता के लिये मीडिया की कैडर है। मीडिया ही मुद्दा है। मीडिया ही सियासी ताकत है और मीडिया ही दुश्मन है। यानी तकनीक के आसरे जन जन तक अगर मीडिया पहुंच सकती है और सत्ता पाने के बाद कोई राजनीतिक पार्टी एयर कंडिशन्ड कमरों से बाहर निकल नहीं सकती तो फिर कार्यकर्ता का काम तो मीडिया बखूबी कर सकती है। और मीडिया का मतलब भी अगर मुनाफा है या कहें कमाई है और सत्ता अलग अलग माध्यमों से यह कमाई कराने में सक्षम है तो फिर दिल्ली में डेंगू हो या प्याज। देश में गांव की बदहाली हो या खाली एकाउंट का झुनझुना लिये 18 करोड़ लोग। या फिर किसी भी प्रदेश में चंद हथेलियों में सिमटता समूचा लाभ हो, उसकी रिपोर्ट करने निकलेगा कौन सा पत्रकार या कौन सा मीडिया समूह चाहेगा कि सत्ता की जड़ों को परखा जाये।

पत्रकारों को ग्राउंड जीरो पर रिपोर्ट करने भेजा जाये तो क्या मौजूदा वक्त एक ऐसे नेक्सस में बंध गया है, जहां सत्ता में आकर सत्ता में बने रहने के लिये लोकतंत्र को ही खत्म कर जनता को यह एहसास कराना है कि लोकतंत्र तो राजनीतिक सत्ता में बसता है। क्योंकि हर पांच बरस बाद जनता वोट से चाहे तो सत्ता बदल सकती है। लेकिन वोटिंग ना तो नौकरशाही को लेकर होती है ना ही न्याय पालिका को लेकर ना ही देश के संवैधानिक संस्थानों को लेकर और ना ही मीडिया को लेकर। तो आखिरी लाइन उन पत्रकारों को धमकी देकर हर सत्ताधारी अपने अपने दायरे में यह कहने से नहीं चूकता की हमें तो जनता ने चुना है। आप सही हैं तो चुनाव लड़ लीजिये। और फिर मीडिया से कोई केजरीवाल की तर्ज पर निकले और कहे कि हम तो राजनीति के कीचड़ में कूदेंगे तभी राजनीति साफ होगी। और जनता को लगेगा कि वाकई यही मौजूदा दौर का अमिताभ बच्चन है। बस हवा उस दिशा में बह जायेगी। यानी लोकतंत्र ताक पर और तानाशाही का नायाब लोकतंत्र सतह पर।

लेखक पुण्य प्रसून बाजपेयी जाने-माने पत्रकार हैं और आजतक न्यूज चैनल में वरिष्ठ पद पर कार्यरत हैं. उनका यह लिखा उनके ब्लाग से साभार लेकर भड़ास पर प्रकाशित किया गया है.


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राहुल गांधी के एक्शन से संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलीं

राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है, खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपाने वाला रहा है, जबकि राहुल गांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं, पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं, पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति  अभिव्यंजित हो रही है।

कांग्रेस के शिखर नेतृत्व में यह प्रवृत्ति रही है कि वह नीतियों पर हमले कम करता रहा है लेकिन राहुल इस मामले में अपवाद हैं, वे मनमोहन सिंह के जमाने में भी नीतिगत मसलों पर निर्णायक हस्तक्षेप करते थे और इन दिनों तो वे भिन्न तेवर में नजर आ रहे हैं। इस क्रम में समूची कांग्रेस की मनोदशा में परिवर्तन घटित हो रहा है।

आज राहुल गांधी पहल करके जनता के मसलों को उठा रहे हैं, जनांदोलनों के बीच में जा रहे हैं। हाल ही में पूना फिल्म एवं टीवी संस्थान और पूर्व सैनिकों के आंदोलन स्थल पर राहुल गांधी का जाना शुभलक्षण है। राहुल गांधी पूना संस्थान के छात्रों के जुलूस के साथ राष्ट्रपति से मिलने गए, यह सामान्य घटना नहीं है।

कांग्रेस ने कभी इस तरह के जनांदोलनों में, अन्य के द्वारा संचालित आंदोलन में शिरकत नहीं की है। मेरी जानकारी में राहुल गांधी से पहले कभी किसी कांग्रेसी शिखर नेता ने जनांदोलन के साथ खड़े होकर राष्ट्रपति को मांगपत्र पेश नहीं किया। यह नया फिनोमिना है और इसका स्वागत होना चाहिए।

यह बात साफ नजर आ रही है कि राहुल गांधी जो कह रहे हैं वैसा ही वे आचरण कर रहे हैं और उसी दिशा में राजनीतिक चक्र घूम भी रहा है।

जगदीश्वर चतुर्वेदीभूमि अधिग्रहण कानून को लेकर कांग्रेस ने जो कहा उसे तकरीबन करके दिखा दिया है, मोदी सरकार कई बार अध्यादेश निकालकर भी इस कानून को लागू नहीं कर पाई है। साथ ही भाजपा करप्ट है यह संदेश आम जनता में सम्प्रेषित करने में राहुल गांधी पूरी तरह सफल रहे हैं। इससे मोदी सरकार की साख में बट्टा लगा है, उनके भाषणों की लय टूटी है। चमक फीकी पड़ी है।

राहुल गांधी के नए रूप ने कांग्रेसी राजनीति को पारदर्शी, आक्रामक और सेल्फ क्रिटिकल बनाया है। बार-बार हर कदम पर कांग्रेस को अपनी ही सरकार के नीतिगत फैसलों की आत्मालोचना भी करनी पड़ रही है। इससे कांग्रेस में नई संस्कृति बन रही है और इससे भाजपा-संघ बहुत परेशान हैं। यही वजह है कि वे हर मसले पर राहुल गांधी पर व्यक्तिगत हमले कर रहे हैं, अ-राजनीतिक कमेंटस कर रहे हैं।

दूसरी बड़ी बात यह है कि राहुल के एक्शनों पर मीडिया से लेकर राजनीतिक दलों तक सकारात्मक राय बन रही है और इससे नए किस्म की कांग्रेस के जन्म की संभावनाएं पैदा हो रही हैं।

हस्तक्षेप से साभार

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मीडिया को इतनी भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए!

हर पल सनसनी और उन्माद बेचता मीडिया ग़ुलाम है या ज़रूरत से ज़्यादा स्वतंत्र? एक चैनल ने “ख़ुलासा” किया है कि लोग आतंकवादियों को अधिक, शहीदों को कम जानते हैं। सवाल है कि जब आप दिन रात आतंकवादियों और अपराधियों की कहानियां दिखाएंगे, तो जनता किसे जानेगी? इसी तरह 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सभी चैनलों के बीच एक होड़-सी लग जाती है कवि-सम्मेलन और सैनिकों के बीच कार्यक्रम कराने की। लेकिन इन सभी कार्यक्रमों का प्रधान स्वर होता है- पाकिस्तान को गरियाना और लड़वाने-कटवाने वाली कविताओं का पाठ कराना।

सतही मीडिया-संपादकों और 1000-2000 रुपये के लिए तुकबंदी करने वाले फूहड़ कवियों को क्या पता कि देशभक्ति फ़ौज को लड़ने-मरने के लिए प्रेरित करते रहना और पड़ोसी देश को गरियाते रहना भर ही नहीं होती। भारत क्या इतना पूर्वाग्रही और बंद दिमाग वाला देश है, जिसपर चौबीसों घंटे सिर्फ़ एक पड़ोसी देश ही हावी रहता है? मेरी राय में यह उन्माद फ़ैलाने वाली पथभ्रष्ट पत्रकारिता है, जिसका लोगों के दिल-दिमाग पर ख़तरनाक असर होता है।

राष्ट्रकवि दिनकर की अमर कृति “कुरुक्षेत्र” की शुरुआती पंक्तियां याद आती हैं-

“वह कौन रोता है वहां

इतिहास के अध्याय पर

जिसमें लिखा है नौजवानों के लहू का मोल है…”

और

“जो आप तो लड़ता नहीं

कटवा किशोरों को मगर

आश्वस्त होकर सोचता

शोणित बहा, लेकिन गई बच लाज सारे देश की!”

वे कौन लोग हैं, जो चौबीसों घंटे भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध-उन्माद बेचना चाहते हैं? वे कौन लोग हैं, जो हिन्दुओं और मुसलमानों के बीच लगातार एक दीवार खड़ी किए रखना चाहते हैं? वे कौन लोग हैं, जो हिन्दू आवाज़ के नाम पर साक्षी महाराज, योगी आदित्यनाथ, साध्वी प्राची और प्रवीण तोगड़िया जैसे लोगों को और मुस्लिम आवाज़ के नाम पर असदुद्दीन ओवैसी और आज़म ख़ान जैसे लोगों को शह देते रहते हैं?

दंगाई प्रवृत्ति के इन लोगों के साथ कोई अदालत लगाता है, कोई प्रेस कांफ्रेंस करता है, कोई सीधी-टेढ़ी बात करता है। इन लोगों को इतना दिखाना क्यों ज़रूरी है? दंगाइयों का प्रत्यक्ष और परोक्ष महिमांडन करना क्या ज़िम्मेदार पत्रकारिता है? मुझे जानकारी मिली है कि इनमें कई लोग मीडिया मैनेजमेंट पर मोटा ख़र्च करते हैं। वे चाहते हैं कि उनकी उन्मादपूर्ण बातों के इर्द-गिर्द कॉन्ट्रोवर्सीज़ लगातार गरम रहें और हमारा आज़ाद राष्ट्रभक्त मीडिया यह काम बखूबी करता रहता है।

कभी-कभी मुझे लगता है कि मीडिया को इतनी भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए। इतनी आज़ादी उसे ढीठ, निर्लज्ज और ग़ैर-ज़िम्मेदार बना रही है। अगर यकीन नहीं हो, तो एक उदाहरण से समझिए इसे। देश का एक बहुत बड़ा मीडिया ब्रांड न्यूज़ चैनल के लाइसेंस पर 24 घंटे में 12-14 घंटे लटकन बाबा, बादल वाले बाबा, लकी आंटी, लकी गर्ल, लकी अंकल और एस्ट्रो अंकल जैसे अंधविश्वास फैलाने वाले फूहड़ कार्यक्रम दिखाता है। उसे रोकने-टोकने वाला कोई नहीं। दूसरे प्रमुख मीडिया समूहों की तरह वह मीडिया समूह भी “सेल्फ-रेगुलेशन” का हिमायती है।

जिस फ्रॉड निर्मल बाबा के ख़िलाफ़ चैनलों ने दिन-रात ख़बरें दिखाई, उसी से पैसे खाकर आज भी उसके प्रोमोशनल कार्यक्रम दिखा रहे हैं। ये लोग “सुखविंदर कौर” को “सुखविंदर कौर” नहीं लिख-बोल सकते। ये उस फ्रॉड महिला को बार-बार “राधे मां” लिखेंगे और बोलेंगे। कोई फ्रॉड अपना नाम “भगवान राम” या “भगवान कृष्ण” रख लेगा, तो हमारा मीडिया उसे “भगवान राम” और “भगवान कृष्ण” ही कहेगा। कोई अपने को ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ईसा, अल्लाह, कुछ भी घोषित कर दे, तो हमारा मीडिया उसे ब्रह्मा, विष्णु, महेश, ईसा, अल्लाह ही कहेगा। ऐेसे विवेक पर घिन आती है!

पिछले दस-पंद्रह साल में जिन लोगों ने जितने सतही और फूहड़ कार्यक्रम बनाए, वे उतना आगे बढ़े। जिन लोगों ने जितनी “जिस्मपरोसी” की, उन्होंने सफलता के उतने झंडे गाड़े। जिन लोगों ने अपराध की ख़बरों को सनसनीखेज़ बनाकर दिखाया और मज़े लिये, वे दूरदर्शी समझे गए। एक चैनल ने एक “अपराधी-नुमा” एंकर क्या पेश किया, अन्य चैनलों में भी वैसे ही एंकर पेश करने की होड़ लग गई। बताया जाता है कि एक चैनल ने तो एक “शराबी” को ही ऐसे एक कार्यक्रम का एंकर बना डाला। ऐसे कार्यक्रमों की एंकरिंग के लिए ड्रामे का कोर्स करके निकले “ड्रामेबाज़” ढूंढ़े जाने लगे।

देशभक्ति को उन्माद फैलाने का नारा समझने वाले हमारे मीडिया में आज देश की ग्राउंड रियलिटी से जुड़ी रिपोर्ट्स नदारद हैं। दिन-रात बहस कराने में तल्लीन रहने वाले चैनलों पर बुनियादी मुद्दों पर बहसें गायब हैं। अगर कार्यक्रम का नाम “हल्ला बोल” या “धावा बोल” भी रख देंगे, तो चर्चा करेंगे किसी नेता के बयान पर। दो-दो कौड़ी के ज़मीन से कटे हुए नेता राष्ट्रीय चैनलों पर छाए रहते हैं।

फिल्म, सीरियल और क्रिकेट के सितारों का थूकना-खांसना भी बड़ी खबरें हैं। उनके ट्वीट्स को भी हमारा मीडिया इतना अधिक स्पेस देता है, जितना देश के अलग-अलग हिस्सों में बुनियादी सवालों को लेकर हो रहे आंदोलनों को भी नहीं देता। अनुपात-ज्ञान बुरी तरह गड़बड़ाया हुआ है। हर वक़्त चटखारा, कॉन्ट्रोवर्सी, सनसनी, उन्माद, ग्लैमर। ख़बरों की पूरी की पूरी समझ ही सड़ गई है। फॉर्मूला फिल्मों जैसे “फॉर्मूला चैनल” चल रहे हैं। उनपर “फॉर्मूला कन्टेन्ट” परोसा जा रहा है, जिसके बड़े हिस्से पर “पेड” होने का संदेह है।

लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कहलाने वाले मीडिया का अगर यही हाल रहा तो ग़रीब और कमज़ोर लोगों की आवाज़ें इस देश में घुट-घुटकर मर जाएंगी। एक तरफ़ कुछ करप्ट कॉरपोरेट्स ने इसे अपने मुनाफे का माल बना लिया है, दूसरी तरफ़ सभी सरकारें इसे भ्रष्ट करने के लिए विज्ञापन के रूप में घूस और मोटा माल खिला रही हैं। इस विज्ञापन के एवज में सरकारें पॉजिटिव रिपोर्ट्स चाहती हैं। जनता की समस्याओं और परेशानियों से जुड़ी ज़मीनी ख़बरों को रोका जाता है।

ऐसा इसलिए हो रहा है क्योंकि आज देश की अधिकांश सरकारें भ्रष्ट और बुनियादी तौर पर जन-विरोधी हैं। व्यक्तिवादी और तानाशाही प्रवृत्ति वाले नेताओं की पूरी फसल तैयार हो गई है। व्यवस्था में बैठे लोगों को अपनी सात पुश्तों के लिए दौलतें इकट्ठा करनी हैं, इसलिए ज़मीन पर उतना दिखाई नहीं देता, जितने की उम्मीद लोग लगाए बैठे हैं। और जब काम हो नहीं रहा, तो राजनीति कैसे चमके? इसलिए झूठा प्रचार ही एकमात्र विकल्प है। इसलिए वे लोगों के जीवन में आमूलचूल सुधार लाकर नहीं, बल्कि मीडिया मैनेजमेंट के सहारे अपनी छवि चमकाना चाहते हैं।

आप सहमत नहीं होंगे, लेकिन मेरी व्यक्तिगत राय यह है कि प्राइवेट मीडिया को सरकारी विज्ञापन बंद होना चाहिए। सरकारें सरकारी मीडिया को सशक्त बनाएं और अपने विज्ञापन वहीं दिखाएं। सरकारी विज्ञापन के लालच में कुकुरमुत्ते की तरह “कोठा-कल्चर” वाले मीडिया हाउसेज उगते जा रहे हैं, जो न तो जनता के प्रति प्रतिबद्ध हैं, न पत्रकारों के प्रति। जिन्हें पत्रकारिता के “प” से भी कोई लेना-देना नहीं, ऐसे लोग इन मीडिया हाउसेज को चला रहे हैं। यह अफ़सोसनाक और दुर्भाग्यपूर्ण है।

आख़िर में, एक सवाल छोड़ रहा हूं- आज जितनी ग़ैर-ज़िम्मेदारी हम मीडिया में देख रहे हैं, वह इसकी ज़रूरत से ज़्यादा आज़ादी है या फिर कोई ग़ुलामी है या शासकों की साज़िश? इसे जनता से काट दो और ग्लैमर व पावर की ऐसी अफ़ीम सुंघा दो कि इसके बिना वह बेचैन हो उठे। सोचिए कि आम जन से विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका का कटाव तो बढ़ ही रहा है, अगर मीडिया भी कट गया, तो क्या होगा? जनता की आवाज़ें दब जाएंगी या फिर दबी हुई आवाज़ों का एक दिन भयानक विस्फोट होगा? जो भी होगा, दोनों ही परिस्थितियों में लोकतंत्र का नुकसान तय है।

पत्रकार अभिरंजन कुमार के फेसबुक वॉल से

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वो दौर भी आया, जब राधे मां को हर सामान्य विज्ञापन के नीचे छोटी सी जगह मिलने लगी

राधे मां पर कुछ भी लिखने से पहले ये बता दूं कि मैं राधे मां की कहानी पिछले कई साल से फॉलो कर रहा हूं। एक बार ये देखने बोरीवली तक पहुंच गया था कि आखिर ये राधे मां है कौन? इस कौतूहल की दो बड़ी वजह थीं। पहली तो ये कि वो मुंबई शहर के सबसे बड़े होर्डिंग्स पर वो दिन रात चमकती थी। मुझे ये सवाल परेशान करता था कि ये जो भी हैं वो शहर में इतने बड़े पैमाने पर विज्ञापन कैसे दे पाती हैं।

पहले कौतूहल से कई साल पहले पर्दा उठ गया। तब पता चला था कि दरअसल राधे मां उन्हीं गुप्ता जी के घर में रहती हैं जो शहर के विज्ञापन वाले होर्डिंग्स का बिज़नेस करते हैं। उनका मूल धंधा तो मिठाई बनाने और बेचने का था लेकिन नई पीढी आई तो उसे बिल बोर्ड, साइन बोर्ड में व्यापार नज़र आया और उन्होंने शहर में बड़ी जगहों पर अपना काम शुरू कर दिया।

ये व्यापारिक गणित ही था जो राधे मां को शहर के होर्डिंग्स पर जगह देता था। जो लोग विज्ञापन का बाज़ार जानते हैं वो समझते हैं कि कैसे साल में एक दौर आता है जब होर्डिंग्स पर विज्ञापन कम मिलते हैं। ऐसे दौर में गुप्ता जी ने अपने मीडिया संसाधनों का इस्तेमाल किया और होर्डिंग्स खाली छोड़ने की बज़ाए राधे मां की फोटो चिपकाने लगे। उनकी माता की चौकी और भंडारे के विज्ञापन उन खाली दिनों में खूब दिखते।

फिर वो दौर भी आया जब राधे मां को हर सामान्य विज्ञापन के नीचे छोटी सी जगह मिलने लगी। शायद ये वो दौर था जब राधे मां के भक्त इन विज्ञापनों से खूब बढ़ने लगे थे। राधे मां के कार्यक्रमों में शामिल होने के लिये सीधे टल्ली बाबा से संपर्क करने को कहा जाता था। ये टल्ली बाबा नाम ही ऐसा है कि उनको किसी और मार्केंटिंग की जरूरत ही नहीं।

टल्ली बाबा अपनी माता की चौकियों के उम्दा मैनेजर साबित हुए। गुप्ता जी की मिठाई का कारोबार पीछे छूट गया, अब वो राधे मां से पहचाने जाने लगे। शहर में कई लोग राधे मां का ठिकाना यानी गुप्ता जी का घर बताने लगे। अब विज्ञापन का धंधा चमकने लगा था और जैसे जैसे विज्ञापन चमके त्यों त्यों राधे मां बढ़ती चलीं गईं।

जैसे हर मीडिया के कारोबार में होता है कि प्रोडक्ट बेचने वाले के रूप रंग और दिखने का ख्याल रखा जाता है। वही ध्यान राधे मां के मामले में रखा गया। वो कैसे आयेगी, कैसे दिखेगी इसका फैसला राधे मां कम, वो लोग ज्यादा रख रहे थे जो उन्हें ‘मैनेज’ करते हैं। जब दिखने का सवाल पूरा हो गया तो बड़ा सवाल आया कि बोलना भी प्रभावशाली होना चाहिये।

बाबाओं- माँओं के बाज़ार में राधे मां बोलने की कला में बड़ी मिसफिट थीं। तो तय हुआ कि मां तो सिर्फ दर्शन देंगी। बोलने का काम छोटी मां और टल्ली बाबा को दे दिया गया। यानी आस्था के कारोबार में छोटी सी आउटसोर्सिंग हुई।

जाहिर सी बात है कि अब तक ब्रांड की कमज़ोरियों को पूरा ढक लिया गया था। जिस दौर में हर बाबा- मां, आस्था से लेकर संस्कार पर आने के लिये लाखों खर्च करने को तैयार हों वहां राधे मां के मैनेजर कभी अपने प्रवचनों के लिए इन चैनलों के पास नहीं गए। बोलने की कमी को पूरा करने के लिए संगीत का सहारा भी लिया गया।

बॉलीवुड वालों से विज्ञापन वालों के रिश्ते अच्छे हुए तो राधे मां के दरबार में गायकों की कमी नहीं रही। मां दर्शन देती, टल्ली बाबा और छोटी मां संवाद संभालते, बॉलीवुड गाना गाता और भक्त झूमते। मां सीधे भक्तों के बीच नज़र आए इसलिए वो भी बीच बीच में नाच लेतीं। पैकेजिंग बढ़िया हो चुकी थी।

ब्रांडिग और बिज़नेस ठीक चल रहा था कि अचानक से दो तीन साल पहले एक न्यूज़ चैनल को राधे मां में टीआरपी नज़र आई। अब क्या था जो विज्ञापन अब तक राधे मां के प्रचार प्रसार के लिये इस्तेमाल हुआ वही उन पर उलटा पड़ने लगा।

उस चैनल के बड़े अधिकारी से फोन पर मैंने बात भी की थी। तब पता चला था कि मां का डांस और चौकी का दर्शक ‘लुत्फ’ उठा रहे हैं। अब राधे मां सामूहिक मनोरंजन के लिए इस्तेमाल होने लगीं।

ताज़ा विवाद राधे मां पर किसी दहेज प्रताड़ना के केस से जुड़ा है। वो इस केस में सातवें नंबर की आरोपी हैं। लेकिन मीडिया की दिलचस्पी कुछ ऐसी है कि मानो वही पहली और आखिरी वहीं हैं। इसका ये मतलब कतई नहीं है कि राधे मां कानून का सामना न करें।

जो भी केस राधे मां पर हैं उन सबको खंगाल कर देख लें कोई गंभीर आपराधिक मामला पहली नज़र में नहीं दिखता लेकिन जब ब्रांडिग के गणित उल्टे पड़ते हैं तो खेल कैसे हाथ से निकल दूसरे के पास चला जाता है इस उदाहरण अब राधे मां हैं। इस उल्टे गणित में अब दूसरे लोग तय करते हैं कि राधे मां में जनता की दिलचस्पी कब तक है? कब तक व्हाट्स अप और फेस बुक पर राधे मां कुछ नया मनोरंजन दे सकती हैं।

जब ये सब ख़त्म हो जाएगा तो यकीन मानिये न्यूज़ चैनलों को राधे मां के पीड़ितों की चिंता खत्म हो जाएगी। गुप्ता जी को बिज़नेस और ब्रांडिग की समझ है इसलिये कई खाली पड़े होर्डिंग्स पर से राधे मां की तस्वीर उतार ली गई है.. जहां थी उसे खरोंच दिया गया है।

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पत्रकारिता अब फोर्थ स्‍टेट नहीं, रि‍यल स्‍टेट : पी साईंनाथ

भारतीय पत्रकारि‍ता में एक बड़ा कद रखने वाले पी साईंनाथ हरि‍याणा व पंजाब में पत्रकारि‍ता के वि‍द्यार्थि‍यों व वि‍भि‍न्‍न शि‍क्षावि‍दों को संबोधि‍त करने पहुंचे। मंगलवार को उन्‍होंने कुरुक्षेत्र वि‍श्‍ववि‍द़यालय में संबोधन कि‍या व बुधवार को चि‍तकारा यूनि‍वर्सि‍टी राजपुरा पंजाब में संभाषण कि‍या।

अपनी सधी शैली में मुम्‍बइया हिंदी में भाषण देकर पी साइनाथ ने युवाओं का दि‍ल जीत लि‍या। इससे एक ओर युवा उनके वक्तव्य में मीडि‍या की मर्यादा, कि‍सानों की समस्‍याओं व सेठाश्रयी मीडि‍या द्वारा दोहन जैसे गंभीर मुद्दों को आसानी से समझ पाए, साथ ही उनके कटाक्ष से क्या युवा, क्‍या प्रोफेसर, सब हंस-हंस कर लोट पोट हो गए।

साईंनाथ ने कहा कि‍ मीडि‍या को फ्रोर्थ इस्‍टेट कहते हुए ध्‍यान रखें कि‍ ये अब रि‍यल इस्‍टेट ज्‍यादा है। फि‍र बोले की टीवी 18 ग्रुप सबसे बड़ा मीडि‍या ग्रुप है। इससे क्‍या फर्क पडता है। ये अम्‍बानी सेठ के रि‍लायंस का छोटा सा वि‍भाग है। सेठ लोग मीडि‍या में बस वही दि‍खाना चाहते हैं, जि‍ससे उनके अपने व्‍यापारि‍क हि‍तों की पूर्ति‍ होती है।

उन्‍होंने कहा कि‍ कि‍सानों की आत्‍महत्‍याएं तो मीडि‍या में मुद्दा ही नहीं रहीं। एक वे दि‍न थे कि‍ उनकी कि‍सान आत्‍महत्‍या व गरीबी पर सीरि‍ज को कोई अखबार छापने को तैयार न था। ये कहकर कि ये सब बकवास मामले हैं, पाठक को नहीं भाएंगे। जब टाइम्‍स आफ इंडि‍या जैसे तैसे इसे छापने को राजी हुआ तो पाठकों की प्रति‍क्रि‍याओं के अंबार लग गए। उन्‍होंने कहा कि‍ भारत जैसे देश में अमेरि‍का की तरह पाठक को समझने के लिए बड़े सर्वे तो होते नहीं। यहां पाठक क्‍या चाहता है, इसका खाका कुछ सेठ लोग और उनके चमचे अपनी जरूरत के अनुसार तय कर लेते हैं।

समाचार चैनलों की चर्चाओं पर चुटकी लेते हुए बोले कि‍ इन चर्चाओं में बैठे चार-च कार्टूनों को जमीनी हकीकत का तो पता नहीं होता, बस जो मुंह में आता है, बोलते रहते हैं। ऐसा लगता है कि‍ कुछ चर्चा प्रति‍भागी तो टीवी स्‍टूडि‍यो में ही रहने लगे हैं, अपने घर कम ही जाते हैं। शायद कइयों को तो सूरज की रोशनी देखे भी महीनों हो गए होंगे।

उन्‍होंने कहा कि‍ पि‍छले कुछ समय में जो हंगामे संसार भर में खोजी रि‍पोर्ट के नाम पर हुए, वो लोग पेशेवर पत्रकार नहीं थे। चाहे जूलि‍यन असांज हो या कई दूसरे। मुख्‍यधारा की पत्रकारि‍ता से सच समाने आने की उम्‍मीद बे-मायने है क्‍योंकि‍ इसमें पत्रकार स्‍टेनोग्राफर है, वो बेचारा क्‍या कर सकता है।

उन्‍होंने सोशल मीडि‍या के पीछे की ठगी को भी जमकर उजागर कि‍या। कहा कि‍ कैसे कोई सोशल मीडि‍या यूजर को यूज कर रहा है। युवाओं के लि‍ए ये जानकारी बड़ी महत्‍वपूर्ण थी। दूसरा पक्ष ये था कि‍ पी साईंनाथ का धमाका करने वाला भाषण उन स्‍थानीय मठाधीश स्‍ट्रिंर्स को गंवारा न गुजरा, जि‍नकी पत्रकारि‍ता के मायने कुछ अलग ही हैं। कई स्‍थानीय पत्रकारि‍ता मठाधीश पी साईंनाथ को उलझाने के लि‍ए उनके आसपास जमा हो गए। सवाल बड़े दागे, बेचारों ने टूटी फूटी अंग्रेजी भी झाड़ी, लेकि‍न साईंनाथ तो फि‍र कुछ अलग मि‍ट्टी के बने हैं, उन्‍होंने ऐसे प्रश्‍नकर्ताओं को बहुत सधे हुए जवाब दि‍ए। फि‍र वो बेचारे बोले – चलो सर आप हमारे साथ एक फोटो ही खिंचवा लो।

पत्रकार सोनू कुमार से संपर्क : kumarsonu256@gmail.com

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पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाउसों के मालिक जिम्मेदार : आनंद बहादुर सिंह

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज व सन्मार्ग अख़बार के 84 वर्षीय संपादक आनंद बहादुर सिंह ने देश में पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाऊसों के मालिकों को जमकर कोसा। उन्होंने कहा कि अखबारों और चैनेलों पर समाचार के प्रकाशन और प्रसारण में अब पत्रकारों की सहभागिता कम हो गयी है।

जनपद के भदैनी स्थित अपने आवास पर विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि देश की आजादी में बड़ी भूमिका निभाने वाले चौथे स्तम्भ के रूप में स्थापित मीडिया हाऊसों के मालिक अब व्यवसाय का जरिया मान लिए हैं। देशहित और जनहित के समाचारों को विज्ञापन से तौला जाने लगा है। समाज में अनैतिक कार्य करने वाले समाचार पत्रों और चैनलों को विज्ञापन भेजकर खुद को महफूज समझते हैं और जनता और समाज से खिलवाड़ करते हैं।

उन्होंने कहा कि सिस्टम और समाज में हो रहे अनैतिक कार्य को जनता तक पहुंचाने और सरकार की कुम्भकर्णी निद्रा तोड़ने का मीडिया एक सशक्त माध्यम है लेकिन जब मीडिया अपने स्तर को गिरा देगा तो इस समाज का कल्पना करना मुश्किल है। धीरे-धीरे मीडिया में कारपोरेट जगत की इंट्री होने से पत्रकारिता अपनी विश्वसनीयता खो चुकी है। कुछ पत्रकार भी अपना धर्म भूलकर दलाली में उतर आए हैं लेकिन अभी भी ऐसे पत्रकार हैं, जो खुलकर लिखना-पढ़ना चाहते हैं लेकिन वह मीडिया हाऊस के मालिकों के हस्तक्षेप के कारण बंदिशों में जकड़े हुए हैं।

श्री सिंह ने कहा कि केंद्र सरकार को मीडिया जगत में अनैतिक कार्यों में लिप्त और भ्रष्टाचारियों को आने से रोकना चाहिए। यदि ऐसा नहीं होता है तो यह देश और समाज के लिए खतरनाक साबित हो सकता है।

अवनिन्द्र कुमार सिंह से संपर्क avanindrreporter@gmail.com

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स्वतंत्रता दिवस पर जागी राष्ट्रभक्ति, विज्ञापन टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद शुरू

स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ गया है और इसी के साथ समाचार पत्रों के मार्केटिंग विभाग में देशभक्ति का जज़्बा भी जाग उठा है। वे अब दिन रात अपने क्लाइंट्स को देशभक्ति का मतलब समझाने मे जुटे हुए है, जुटे भी क्यों ना? 

पिछले साल का टारगेट जो रिवाइज्ड हो गया है। अपने टारगेट पूर्ति के लिए ये लोग किसी भी घटना या दुर्घटना को एक अवसर की तरह देखते है। इसका ताजा उदाहरण कलाम साहब के निधन पर कमर्शियल सप्लीमेंट पब्लिश कर देश के बड़े अखबार दे चुके हैं। बात करते है आने वाले त्यौहार स्वतंत्रता दिवस की। मार्केटिंग टीम ने कमर कस ली है, ग्रामीण और शहरी रिपोर्टर्स को टारगेट दे दिए गए हैँ। 

टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद चाहे जो करना पड़े करेंगे, आखिर पापी पेट का सवाल जो है। इनकी मज़बूरी तो आप समझ ही गए होंगे लेकिन मुझे विज्ञापनदाताओं की मज़बूरी आज तक समझ नहीं आयी। समाचार पत्र मे देशभक्ति का विज्ञापन प्रकाशित करवाने से देश का कुछ भला नहीं होने वाला है, यह बात एक छोटा बच्चा भी समझ सकता है। बेहतर तो यह होता की उस पैसे से किसी गरीब के बच्चे को स्कूल भेजा जाये ताकि देश का भविष्य शिक्षित हो सके। मगर ऐसा होगा नहीं क्योंकि इनमें से ज्यादातर लोग छपास रोग से ग्रस्त हैं तो किसी की दुःखती रग इन अखबारों के संवाददाताओ/संपादकों के हाथ मे है। 

मुझे तरस आता है ऐसे लोगों पर जिन्होंने आज तक कभी झंडारोहण मे भाग नहीं लिया लेकिन समाचार पत्रों मे बड़े बड़े विज्ञापन प्रकाशित करवा अपनी देशभक्ति का सार्वजनिक रूप से ऐलान करते हैं। मैं यह सब क्यों लिख रहा हूँ, यह मुझे भी नहीं पता। लेकिन देशभक्ति के नाम पर होने वाला यह तमाशा अब बंद होना चाहिये। अगर मेरी बातों से किसी की देशभक्ति को ठेस पहुँची हो तो मुझे क्षमा करें ? लेकिन मैं भी इस आजाद देश का नागरिक हूँ और इस देश का संविधान मुझे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता प्रदान करता है। जय हिन्द !

कुलदीप सिद्धू के एफबी वाल से

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रुद्रपुर प्रेस क्लब पर अमर उजाला का अटैक, रिपोर्टर को नोटिस

रुद्रपुर (उत्तरांचल) : दुनिया भर के झगड़े सिर्फ झूठ और सच को सिद्ध करने में ही हो रहे हैं। दो पक्षों में से एक पक्ष सदैव अपने को सच्चा व दूसरे को झूठा बतलाता है और कोर्ट कचहरी तक झूठा भी अपने को सच ठहराने का प्रयास करता रहता है। अंत में न्यायालय ही गवाहों और तथ्यों के आधार पर झूठ को झूठ और सच को सच बताता है। रुद्रपुर में लगता है, न्याय की दकरार न, प्रशासन ने मनमाना तरीके से प्रेस क्लब पर ताले जड़वा दिए। इससे पत्रकारों में रोष है। 

सभी जानते हैं कि न्यायालय के बाद अगर जनता किसी पर भरोसा करती है तो वो है प्रिंट और इलैक्ट्रानिक मीडिया। किसी भी विवाद के बारे में जब मीडिया कुछ लिखता या बताता है तो जनता उसे सच के करीब इसलिए मानती है कि एक पत्रकार ने अपने नैतिक धर्म को निभाते हुए दोनों पक्षों के तथ्यों की जांच-पड़ताल के बाद ही सच्चाई जनता के सामने रखी होगी। इसी कारण पत्रकारिता आज भी सत्य की वाहक मानी जाती है।

इसके विपरीत जब कोई पत्रकार अपने क्षुद्र स्वार्थों की पूर्ति व प्रशासनिक चापलूसी के चलते किसी भी मामले में दोनों पक्षों को ठीक से जाने बिना एक पक्षीय तथ्य जनता के सामने परोसता है, तब जनता के बीच तथ्यहीन सामग्री के कारण तरह-तरह के भ्रम और आशंकाएं पैदा होती हैं। ऐसे में पत्रकार की अपनी छवि खराब होती है और पत्रकारिता कलंकित होती है। ऐसे ही उदाहरण के तौर पर रुद्रपुर में प्रेस क्लब भवन के बारे में अमर उजाला, दैनिक जागरण, उत्तरांचल दर्पण, वसुंधरा दीप, न्यूजप्रिंट आदि में खबरें छपीं। लिखा गया कि ‘खंडहर बना 40 लाख का प्रेस क्लब भवन, शासन नहीं ले रहा सुध, नशेड़ियों का अड्डा बनी बिल्डिंग, कब्जे में लिया प्रेस क्लब भवन, प्रेस क्लब भवन पर प्रशासन का ताला, प्रशासन ने लिया कब्जे में प्रेस क्लब भवन, प्रेस क्लब भवन पर एसडीएम ने लिया कब्जा, पत्रकारों के विवाद में डीएम का दखल- आखिर जड़ ही दिए सूचना विभाग ने ताले, प्रेस क्लब भवन जिला सूचना अधिकारी के कब्जे में। सांध्य दैनिक अमन केसरी ने तो छापा कि ‘बिना नोटिस दिए प्रेस क्लब भवन सील’ आदि-आदि…।

जनता को हैरानी होगी यह जानकर कि इन पत्रकारों के प्रेस क्लब के मामले में किसी भी पत्रकार ने प्रेस क्लब भवन के तथ्यों को जानने के लिए जहमत नहीं उठाई और वह सब छाप दिया जो उनके मन में आया। प्रेस क्लब के मजबूत व अच्छी स्थिति में खड़े भवन को अमर उजाला के पत्रकार ने खंडहर, जुआरी, शराबियों, नशेड़ियों का अड्डा ही बता दिया। उसी खबर का संज्ञान लेकर जिलाधिकारी ने भी प्रेस क्लब के बारे में वस्तुस्थिति जानने की कोशिश तक नहीं की और तुगलकी फरमान देकर बिना किसी शिकायत, लिखित सूचना या नोटिस दिये प्रेस क्लब भवन से केयरटेकर को आनन-फानन में निकलवाकर ताले जड़वा दिए। ताला लगने से पूर्व जब प्रेस क्लब अध्यक्ष, जिलाधिकारी के पास अपना पक्ष रखने गये तो उनकी एक न सुनी और बोले आप जाइये, प्रेस क्लब भवन सरकारी भवन है, हम अपना ताला डाल रहे हैं। 

कायदे से जिलाधिकारी को प्रेस क्लब अध्यक्ष से प्रेस क्लब की वास्तविक स्थिति जाननी चाहिए थी, या यदि कोई सूचना प्रेस क्लब भवन के दुरुपयोग की उन्हें जानकारी मिली थी तो उसके बारे में स्पष्टीकरण मांगते। यह भी नहीं तो कम से कम प्रेस क्लब भवन को सील करने विषयक सूचना तो लिखित में देनी ही चाहिए थी। जिलाधिकारी की इस कार्रवाई से प्रेस क्लब ऊधम सिंह नगर (रुद्रपुर) रजि0 के लोग ही नहीं, अन्य अनेक पत्रकार भी हतप्रभ हैं कि जिलाधिकारी को आनन-फानन में ऐसा करने करने की क्या जरूरत पड़ गई। या डीएम ने यह कार्रवाई किसी के बरगलाने पर की है। दूसरी ओर चौथे स्तंभ के पत्रकार किसी भी संस्था का पक्ष लिए बिना किसी स्वार्थी व्यक्ति के कहने मात्र पर कुछ भी छाप कर संस्था की प्रतिष्ठा धूल में मिला देंगे?

हालांकि पुष्ट नहीं, पर सूत्रों से मिली खबरों के अनुसार प्रेस क्लब की प्रतिष्ठा को बेवजह धूल में मिलाने का काम अमर उजाला के यशस्वी पत्रकार भाष्कर पोखरियाल ने कर दिखाया है। पत्रकारिता को कलंकित करने वाले ऐसे पत्रकार को शायद पत्रकारिता का दायित्व बोध कम और अमर उजाला के पत्रकार होने का अहम ज्यादा है। उसने एक बेसिर-पैर की खबर छापकर पत्रकार बिरादरी में रोष और समाज में एक भ्रम फैला दिया है। 

प्रश्न उठता है कि क्या प्रेस क्लब भवन पर ताला जड़ जाने से अमर उजाला में छपी तथ्यहीन खबर पुष्ट हो गयी ? सच्चाई के सारे तथ्य गायब हो गये ? प्रेस क्लब भवन के बारे में अमर उजाला द्वारा लिखा गया भ्रामक समाचार ही अंतिम सत्य था जिसे जिलाधिकारी ने आंख मूंद कर सच मान लिया और तुगलकी कार्यवाही कर डाली। नहीं, अब नहीं, वास्तविक सच अभी आना और लिखा जाना बाकी है, जिसे कानूनी तौर पर सत्य सिद्ध होकर दूध का दूध और पानी का पानी होना है। सत्य का अंतिम सहारा सिर्फ न्यायालय होता है, व्यक्ति विशेष नहीं।

बी.सी. सिंघल, अध्यक्ष प्रेस क्लब ऊधम सिंह नगर (रुद्रपुर) ऊधम सिंह नगर (उत्तराखण्ड) से संपर्क : 9837776565

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