मीडिया में अब चालीस पार के लोगों की भर्ती बंद!

बड़े बैनर के मीडिया संस्थानों ने 40 के बाद की भर्ती बन्द कर दी है. ये नए जमाने का नियम है. ये मीडिया मालिकों का अपना नियम है. ये मीडिया मालिक खुद को कानून से परे मानते हैं. यही कारण है कि इनके यहां जो 50 पार के पत्रकार बचे हैं, उन्हें निकालना भी शुरू …

अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश

देश की आज़ादी से लेकर वर्तमान विकास तक जिस पत्रकारिता ने अपना अमूल्य योगदान दिया उसके साथ ही देश के संविधान ने सौतेला व्यवहार किया। यह संस्था वह कभी नहीं पा सकी स्थान नहीं पा सकी जिसकी यह हकदार थी।इस संस्था को पता ही नहीं चला कि कब इसके लोगों ने पत्रकारिता की पीठ में खंज़र भोंक दिया।आज भी चौथा स्तम्भ का अस्तित्व प्रसादपर्यंत है। आज चारों ओर पत्रकारिता के पेशे को बहुत ही घटिया नज़र से देखा जाने लगा है। जब कि आज भी यदि देश में कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका पूरा श्रेय मीडिया को ही जाता है। लेकिन जो कुछ भी बुरा हो रहा है उसके लिए भी मीडिया ही जिम्मेदार है।

मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न।

सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर हैं, सबके घर छापा पड़ना चाहिए!

Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

क्या विस चुनावों के बाद मीडिया के लिए बुरे दिन आएंगे?

यूपी चुनाव खत्म होने के बाद मीडिया में छाई गंदगी का सफाया तेजी से हो सकता है। बताया जाता है कि यूपी चुनाव में भाजपा बहुमत की उम्मीद कर रही थी लेकिन लाख कोशिशों के बाद त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है। और इसका ठीकरा न्यूज़ चैनलों पर फोड़ा जा सकता है। कभी दो नंबर की पायदान बनाए रखने वाले न्यूज चैनल को बंद होने की भविष्यवाणी मोदी भक्त अभी से कर रहे हैं।

वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे!

Ajay Prakash : मीडिया कहती है हम काउंटर व्यू छापते हैं। बगैर उसके कोई रिपोर्ट नहीं छापते। कल आपने विकास दर की रिपोर्ट पर कोई काउंटर व्यू देखा। क्या देश के सभी अर्थशास्त्री मुजरा देखने गए थे? या संपादकों को रतौंधी हो गयी थी? या संपादकों को ‘शार्ट मीमोरी लॉस’ की समस्या है, जो ‘एंटायर पॉलि​टिक्स का विद्यार्थी’, ‘वैश्विक अर्थशास्त्र’ का जानकार बना घूम रहा है और संपादक मुनीमों की तरह राम—राम एक, राम—राम दो लिख और लिखवा रहे हैं।

हे बाहरवीं में पढ़ने वालों, सब कुछ बनना लेकिन पत्रकार मत बनना

हे बारहवीं पास करने वाले या बारहवीं में पढ़ने वाले बच्चों, अपना कॅरियर चुनते समय तुम्हे कन्फ्यूजन हो रही होगी, सब कुछ चुनना पत्रकारिता मत चुनना. खासकर हिंदी की तो बिलकुल नहीं. इसलिए नहीं कि स्कोप नहीं है. बल्कि इसलिए कि यहाँ तुम्हारी कोइ कद्र नहीं है. ग्लैमर की दुनिया तुम्हें अपनी ओर खींचेगी…लेकिन बाहर से ये दुनिया जितनी खूबसूरत है, अन्दर से उतनी मैली. तुम्हें सोशल मीडिया से लेकर गली मोहल्लों में दलाल कहा जाएगा.

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

भईया, इससे अच्छा तो मजदूरी कर लेते, कहाँ से फंस गए मीडिया में!

आज कुछ काम से प्रेस क्लब गया हुआ था, हमेशा की तरह प्रेस क्लब के बाहर और भीतर चहल पहल थी, गेट के ठीक सामने एक कथित संस्थापित टीवी चैनल का कैमरामैन उदास मुद्रा में था, आदत से लाचार होकर पहले तो मैंने उनसे अभिवादन कर कुशलक्षेप पूछा, फिर जो जवाब आया, उसे सुन सुन्न रह गया, और ऐसा पिछले कई महीनों से लगातार जारी है, एक लम्बा मई मीडिया में गुजर चुका वो शख्स बड़ी ईमानदारी के साथ मुझसे कह रहा था, कि, “योगेश जी, ऐसा है, अगर हमको पता रहता कि मीडिया में इतनी ऐसी तैसी करने के बाद भी पगार कि चिंता रहती है, परिवार और पेट कि चिंता रहती है, तो कभी-भी मीडिया में तो नहीं आता, भले हो गाँव में खेतीबाड़ी कर लेता, पर सच में मीडिया में आने कि गलती नहीं करता.”

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर ईमानदार व दलाल पत्रकारों को शुभकामनाएं

प्रिय यशवंत जी
संपादक, भड़ास4मीडिया

आज की पत्रकारिता जगत आप जैसे स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारों की वजह से ही बनी हुयी है। आप द्वारा लगातार छेड़े गये अभियान काफी बेहतर होते है। आपकी लिखने की शैली से तो इस समय कोई मुकाबला नही कर पाएगा। मैं भड़ास 4 मीडिया का काफी पुराना पाठक हूं और इसे कई वर्षों से पढ़ता चला आ रहा हूं। अपनी ही बिरादरी का जिस प्रकार से आप निष्पक्ष व निर्भीक होकर समाचार को फ्लैश करते है वह बड़ी ही काबिले तारीफ की बात है।

यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

शाहरुख खान को देखकर पागल हो जाने वाली ये महिला पत्रकार क्या पत्रकारिता करने लायक हैं!

मीडिया में यंगस्टर आजकल बड़े लोगों संग सेल्फी लेने और सितारों के साथ अपना प्रेम जाहिर करने आते हैं… कल नोएडा में किडजेनिया के लांच समारोह में शाहरुख खान आए.. जाहिर है लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन शाहरुख आए तो पागल होना लाजमी था… जीआईपी मॉल के बाहर भीड़ लग चुकी थी… शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस शुरू की… कुछ नई लड़कियों का ग्रुप जो जागरण, फैशन डॉट कॉम और कुछ अन्य संस्थाओं से आईं थी, उन्हें देख कर लग रहा था कि वो केवल खान को देखने आई हैं… उन्हें इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई लेना देना नहीं है … और हुआ भी वही…

PRESS से हो, तो क्या नियम-कानून तोड़ने का हक़ मिल गया तुम्हें?

Dinesh Dard : पलासिया से इंडस्ट्री हाऊस की ओर वाले पैदल पथ (फुटपाथ) पर यूँ तो अक्सर दुपहिया-चार पहिया वाहनों का दौड़ना चलता रहता है, जो नियम के ख़िलाफ़ है। मगर मान लो फुटपाथ खाली हो और आपका कहीं पहुँचना बहुत ही ज़रूरी हो, तो मजबूरी में उस पर से गुज़रना समझ में आता है। लेकिन उसमें भी एक अपराध बोध ज़रूर होना चाहिए कि उन्होंने पैदल यात्रियों का अधिकार छीना। मगर इनमें अपराध बोध तो दूर, इन्हें तो ये एहसास तक नहीं होता कि ये ग़लत कर रहे हैं।

जो-जो पत्रकार pm के साथ सेल्फी की फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाले, कमेंट बॉक्स में ‘प्रेस टी च्यूट” ज़रूर लिखना

Yashwant Singh : आज मीडिया वालों का सेल्फी दिवस है। pm साब बेचारों को पूरा मौका दिए हैं। फिर भी मीडिया वाले साले कहते हैं कि हमारे pm जी असहिष्णु हैं! अबे चिरकुटों, असहिष्णु तो तुम खुद हो। मरे गिरे छटपटाये जा रहे हो सेल्फी के लिए। pm ने तुम लोगों की औकात फिर दिखा दी। बिकाऊ बाजारू के अलावा सच में ‘प्रेस टी च्यूट’ हो।

बीते दो दशकों में मीडिया की दशा-दिशा में आए बदलावों का वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल द्वारा विस्तृत विश्लेषण

मीडिया के बदलते रुझान-1 : इन नवकुबेरों ने मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन कर दिया

 

अगर हम मीडिया के रुझान में आये बदलाव के लिए कोई विभाजन-रेखा खींचना चाहें तो वह विभाजन-रेखा है सन 1995. नरसिंह राव सरकार के वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप अख़बारी दुनिया में व्यापक परिवर्तन हुए. पहला बदलाव तो यह आया कि सम्पादक नाम की संस्था दिनोदिन कमज़ोर होती चली गयी, और अन्ततः आज सम्पादक की हैसियत महज एक मैनेजर की रह गयी है.

पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिक गई है!

: सत्ता से दो दो हाथ करते करते मीडिया कैसे सत्ता के साथ खडा हो गया : अमेरिका में रुपर्ट मर्डोक प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो मड्रोक ने मोदी को आजादी के बाद से भारत का सबसे शानदार पीएम करार दे दिया। मड्रोक अब अमेरिकी राजनीति को भी प्रभावित कर रहे है। ओबामा पर अश्वेत प्रेसीडेंट न मानने के मड्रोक के बयान पर बवाल मचा ही हुआ है। अमेरिका में अपने न्यूज़ चैनल को चलाने के लिये मड्रोक आस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ अमेरिकी नागरिक बन चुके है, तो क्या मीडिया टाइकून इस भूमिका में आ चुके हैं कि वह सीधे सरकार और सियासत को प्रभावित कर सके या कहे राजनीतिक तौर पर सक्रिय ना होते हुये भी राजनीतिक खिलाडियों के लिये काम कर सके।

क्लीवेज दिखाना एंकर को पड़ा महंगा, चैनल ने किया सस्पेंड

अल्‍बीनिया में एक टीवी रिपोर्टर को न्‍यूज प्रजेंट करते समय क्‍लीवेज दिखाना और प्‍लेब्‍वॉय मैग्जीन ज्‍वाइन करना काफी महंगा पड़ गया। चैनल के नाराज अधिकारियों ने उसे तुरंत ही सस्‍पेंड कर दिया। साथ ही उसे अभी अपनी पढा़ई और जर्नलिज्‍म पर ध्‍यान देने की नसीहत दी। टीवी रिपोर्टर ने जिस समय ऐसा हाटॅ शूट दिया उस समय वह अंतरराष्‍ट्रीय खबरें पढ़ रही थी। अल्‍बीनिया में एक समाचार चैनल के लिए 21 साल की एन्‍की ब्रैकाज इंटरनेशनल लेवल की न्‍यूज पढ़ रही थीं, लेकिन अपने इस काम के दौरान उसने कुछ ऐसा कर दिया कि बाकी सभी लोग सन्न रह गए।

मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

राहुल गांधी के एक्शन से संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलीं

राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है, खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपाने वाला रहा है, जबकि राहुल गांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं, पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं, पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति  अभिव्यंजित हो रही है।

मीडिया को इतनी भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए!

हर पल सनसनी और उन्माद बेचता मीडिया ग़ुलाम है या ज़रूरत से ज़्यादा स्वतंत्र? एक चैनल ने “ख़ुलासा” किया है कि लोग आतंकवादियों को अधिक, शहीदों को कम जानते हैं। सवाल है कि जब आप दिन रात आतंकवादियों और अपराधियों की कहानियां दिखाएंगे, तो जनता किसे जानेगी? इसी तरह 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सभी चैनलों के बीच एक होड़-सी लग जाती है कवि-सम्मेलन और सैनिकों के बीच कार्यक्रम कराने की। लेकिन इन सभी कार्यक्रमों का प्रधान स्वर होता है- पाकिस्तान को गरियाना और लड़वाने-कटवाने वाली कविताओं का पाठ कराना।

वो दौर भी आया, जब राधे मां को हर सामान्य विज्ञापन के नीचे छोटी सी जगह मिलने लगी

राधे मां पर कुछ भी लिखने से पहले ये बता दूं कि मैं राधे मां की कहानी पिछले कई साल से फॉलो कर रहा हूं। एक बार ये देखने बोरीवली तक पहुंच गया था कि आखिर ये राधे मां है कौन? इस कौतूहल की दो बड़ी वजह थीं। पहली तो ये कि वो मुंबई शहर के सबसे बड़े होर्डिंग्स पर वो दिन रात चमकती थी। मुझे ये सवाल परेशान करता था कि ये जो भी हैं वो शहर में इतने बड़े पैमाने पर विज्ञापन कैसे दे पाती हैं।

पत्रकारिता अब फोर्थ स्‍टेट नहीं, रि‍यल स्‍टेट : पी साईंनाथ

भारतीय पत्रकारि‍ता में एक बड़ा कद रखने वाले पी साईंनाथ हरि‍याणा व पंजाब में पत्रकारि‍ता के वि‍द्यार्थि‍यों व वि‍भि‍न्‍न शि‍क्षावि‍दों को संबोधि‍त करने पहुंचे। मंगलवार को उन्‍होंने कुरुक्षेत्र वि‍श्‍ववि‍द़यालय में संबोधन कि‍या व बुधवार को चि‍तकारा यूनि‍वर्सि‍टी राजपुरा पंजाब में संभाषण कि‍या।

पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाउसों के मालिक जिम्मेदार : आनंद बहादुर सिंह

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज व सन्मार्ग अख़बार के 84 वर्षीय संपादक आनंद बहादुर सिंह ने देश में पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाऊसों के मालिकों को जमकर कोसा। उन्होंने कहा कि अखबारों और चैनेलों पर समाचार के प्रकाशन और प्रसारण में अब पत्रकारों की सहभागिता कम हो गयी है।

स्वतंत्रता दिवस पर जागी राष्ट्रभक्ति, विज्ञापन टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद शुरू

स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ गया है और इसी के साथ समाचार पत्रों के मार्केटिंग विभाग में देशभक्ति का जज़्बा भी जाग उठा है। वे अब दिन रात अपने क्लाइंट्स को देशभक्ति का मतलब समझाने मे जुटे हुए है, जुटे भी क्यों ना? 

रुद्रपुर प्रेस क्लब पर अमर उजाला का अटैक, रिपोर्टर को नोटिस

रुद्रपुर (उत्तरांचल) : दुनिया भर के झगड़े सिर्फ झूठ और सच को सिद्ध करने में ही हो रहे हैं। दो पक्षों में से एक पक्ष सदैव अपने को सच्चा व दूसरे को झूठा बतलाता है और कोर्ट कचहरी तक झूठा भी अपने को सच ठहराने का प्रयास करता रहता है। अंत में न्यायालय ही गवाहों और तथ्यों के आधार पर झूठ को झूठ और सच को सच बताता है। रुद्रपुर में लगता है, न्याय की दकरार न, प्रशासन ने मनमाना तरीके से प्रेस क्लब पर ताले जड़वा दिए। इससे पत्रकारों में रोष है।