मीडिया में अब चालीस पार के लोगों की भर्ती बंद!

बड़े बैनर के मीडिया संस्थानों ने 40 के बाद की भर्ती बन्द कर दी है. ये नए जमाने का नियम है. ये मीडिया मालिकों का अपना नियम है. ये मीडिया मालिक खुद को कानून से परे मानते हैं. यही कारण है कि इनके यहां जो 50 पार के पत्रकार बचे हैं, उन्हें निकालना भी शुरू …

अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये : रवीश कुमार

Ravish Kumar : अपनी शामों को मीडिया के खंडहर से निकाल लाइये…. 21 नवंबर को कैरवान (carvan) पत्रिका ने जज बीएच लोया की मौत पर सवाल उठाने वाली रिपोर्ट छापी थी। उसके बाद से 14 जनवरी तक इस पत्रिका ने कुल दस रिपोर्ट छापे हैं। हर रिपोर्ट में संदर्भ है, दस्तावेज़ हैं और बयान हैं। जब पहली बार जज लोया की करीबी बहन ने सवाल उठाया था और वीडियो बयान जारी किया था तब सरकार की तरफ से बहादुर बनने वाले गोदी मीडिया चुप रह गया।

नीमच का एक पत्रकार बता रहा है आजकल की पत्रकारिता की सच्चाई, जरूर पढ़ें

बात दिल की है. कहानी लंबी है. पढ़ेंगे तो जानेंगे ‘मेरी’ हकीकत क्या है… इन दिनों मीडिया का बोलबाला है. मीडियाकर्मी होना बड़ा चार्मिंग लगता है. लेकिन इस व्यवस्था के भीतर यदि झांक कर देखा जाए तो पता चलेगा, जो पत्रकार जमाने के दुःख दर्द को उठाता है, वो खुद बहुत मुश्किल में फंसा है. पत्रकारों को समाज अब बुरे का प्रतीक मानने लगा है. हम कहीं दिख जाएं तो लोग देखते ही पहला सवाल करते हैं- मुस्तफा भाई, खैरियत तो है… आज यहाँ कैसे? यानि यहाँ ज़रूर कुछ झंझट है, इसलिए आये हैं.

शातिराना अंदाज़ से मीडिया को बदनाम करने की साजिश

देश की आज़ादी से लेकर वर्तमान विकास तक जिस पत्रकारिता ने अपना अमूल्य योगदान दिया उसके साथ ही देश के संविधान ने सौतेला व्यवहार किया। यह संस्था वह कभी नहीं पा सकी स्थान नहीं पा सकी जिसकी यह हकदार थी।इस संस्था को पता ही नहीं चला कि कब इसके लोगों ने पत्रकारिता की पीठ में खंज़र भोंक दिया।आज भी चौथा स्तम्भ का अस्तित्व प्रसादपर्यंत है। आज चारों ओर पत्रकारिता के पेशे को बहुत ही घटिया नज़र से देखा जाने लगा है। जब कि आज भी यदि देश में कुछ अच्छा हो रहा है तो उसका पूरा श्रेय मीडिया को ही जाता है। लेकिन जो कुछ भी बुरा हो रहा है उसके लिए भी मीडिया ही जिम्मेदार है।

मायावती से तीखा सवाल पूछने वाली उस लड़की का पत्रकारीय करियर शुरू होने से पहले ही ख़त्म हो गया!

Zaigham Murtaza : अप्रैल 2002 की बात है। उत्तर प्रदेश में राष्ट्रपति शासन लगा था। मायावती की सत्ता में वापसी की आहट के बीच माल एवेन्यु में एक प्रेस वार्ता हुई। जोश से लबरेज़ मैदान में नई-नई पत्रकार बनी एक लड़की ने टिकट के बदले पैसे पर सवाल दाग़ दिया। ठीक से याद नहीं लेकिन वो शायद लार क़स्बे की थी और ख़ुद को किसी विजय ज्वाला साप्ताहिक का प्रतिनिधि बता रही थी। सवाल से रंग में भंग पड़ गया। वहां मौजूद क़रीब ढाई सौ कथित पत्रकार सन्न।

सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर हैं, सबके घर छापा पड़ना चाहिए!

Ramesh Chandra Rai : एनडीटीवी के मालिक के घर छापे पर हाय तौबा मची है। दरअसल सभी चैनलों औऱ अखबारों के मालिक चोर है। इसलिए सभी अखबार और चैनल मालिकों के घर छापा पड़ना चाहिए ताकि उनकी काली कमाई का पता चल सके। यह सभी पत्रकारों का उत्पीडन करते हैं। मोदी सरकार ने गलती यही की है कि एक ही घर पर छापा डलवाया है। यह पक्षपात है इसलिए हम इसकी निंदा करते हैं। सभी के यहां छापा पड़ता तो निंदा नहीं करता। दूसरी बात जितने लोग एक चैनल मालिक के यहां छापे पर चिल्ला रहे हैं वे लोग पत्रकारों के उत्पीड़न पर आज तक नहीं बोले हैं। कई पत्रकारों की हत्या कर दी गयी कई नौकरी से निकाल दिए गए औऱ उन्होंने आत्महत्या कर ली, उनका परिवार आज रोटी के लिए मारा मारा घूम रहा है लेकिन किसी ने आवाज़ नहीं उठाई। जहां तक पत्रकारिता की स्वतंत्रता की बात है तो पत्रकार नहीं बल्कि मालिक स्वतन्त्र हैं। आज पत्रकारों की औकात नही है कि मालिक की मर्जी के खिलाफ कुछ लिख सके।

मालिक के मरने पर सारे तनखइया पत्रकार मिलकर आत्मा की शांति के लिए प्रार्थना करते हैं!

किसी अखबार का मालिक मर जाए तो सब पत्रकार मिलकर उसकी आत्मा की शांति की प्रार्थना करते हैं… तनखइया पत्रकार की मजबूरियां आप क्या जानें साहब… है तो कड़वा सच… मालिक की मौत की खबर से अख़बार रंग दिए जाते हैं और अगर अख़बार कर्मचारी-पत्रकार की मौत हो तो दो अलफ़ाज़ की श्रद्धांजलि भी उनके अख़बार में नहीं छापी जाती… अख़बार वाले का कोई कार्यक्रम हो, प्रेस की कोई बैठक हो तो जनाब अख़बार से खबर गायब रहती है…..

पेशेवर लठैत बन चुका है मीडिया

बड़े-बुजुर्ग अक्सर कहते हैं कि अंग्रेज तो चले गए लेकिन चाय छोड़ गये। इसी तरह सामंतवाद समाप्त हो गया लेकिन लठैत छोड़ गया है। ये लठैत अपने सामंत के लिए कुछ भी करने को तैयार रहते थे। आज भी लठैत हैं। बड़े-बुजुर्गों का कहना है कि, मीडिया से बड़ा लठैत कौन है। हालांकि तब (1988 के आस पास) मुझे भी खराब लगता था। अब भी खराब लगता है जब मीडिया को बिकाऊ, बाजारू या दलाल कहा जाता है। माना कि देश की आजादी में मीडिया का योगदान सबसे अधिक नहीं तो सबसे कम भी नहीं था। तब अखबार से जुड़ने का मतलब आजादी की लड़ाई से जुड़ना होता था। अब देश आजाद है। मीडिया की भूमिका भी बदल गई। पहले मिशन था अब व्यवसाय हो गया है। पहले साहित्यकार व समाजसेवक अखबार निकालते थे अब बिल्डर और शराब व्यवसायी (भी) अखबार निकाल रहे हैं।

क्या विस चुनावों के बाद मीडिया के लिए बुरे दिन आएंगे?

यूपी चुनाव खत्म होने के बाद मीडिया में छाई गंदगी का सफाया तेजी से हो सकता है। बताया जाता है कि यूपी चुनाव में भाजपा बहुमत की उम्मीद कर रही थी लेकिन लाख कोशिशों के बाद त्रिशंकु विधानसभा जैसी स्थिति बनने की आशंका व्यक्त की जा रही है। और इसका ठीकरा न्यूज़ चैनलों पर फोड़ा जा सकता है। कभी दो नंबर की पायदान बनाए रखने वाले न्यूज चैनल को बंद होने की भविष्यवाणी मोदी भक्त अभी से कर रहे हैं।

वह चुनाव जीत जाएंगे और आप पत्रकारिता हार जाएंगे!

Ajay Prakash : मीडिया कहती है हम काउंटर व्यू छापते हैं। बगैर उसके कोई रिपोर्ट नहीं छापते। कल आपने विकास दर की रिपोर्ट पर कोई काउंटर व्यू देखा। क्या देश के सभी अर्थशास्त्री मुजरा देखने गए थे? या संपादकों को रतौंधी हो गयी थी? या संपादकों को ‘शार्ट मीमोरी लॉस’ की समस्या है, जो ‘एंटायर पॉलि​टिक्स का विद्यार्थी’, ‘वैश्विक अर्थशास्त्र’ का जानकार बना घूम रहा है और संपादक मुनीमों की तरह राम—राम एक, राम—राम दो लिख और लिखवा रहे हैं।

हे बाहरवीं में पढ़ने वालों, सब कुछ बनना लेकिन पत्रकार मत बनना

हे बारहवीं पास करने वाले या बारहवीं में पढ़ने वाले बच्चों, अपना कॅरियर चुनते समय तुम्हे कन्फ्यूजन हो रही होगी, सब कुछ चुनना पत्रकारिता मत चुनना. खासकर हिंदी की तो बिलकुल नहीं. इसलिए नहीं कि स्कोप नहीं है. बल्कि इसलिए कि यहाँ तुम्हारी कोइ कद्र नहीं है. ग्लैमर की दुनिया तुम्हें अपनी ओर खींचेगी…लेकिन बाहर से ये दुनिया जितनी खूबसूरत है, अन्दर से उतनी मैली. तुम्हें सोशल मीडिया से लेकर गली मोहल्लों में दलाल कहा जाएगा.

ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है

Dilnawaz Pasha : ये मीडिया को ‘विलेन बनाने’ का दौर है. भारत में ‘प्रेस्टीट्यूट’ शब्द को स्वीकार कर लिया गया है और एक धड़ा जमकर इसका इस्तेमाल कर रहा है. सरकार ने मंत्रालयों में पत्रकारों की पहुंच कम कर दी है. यहां तक कि प्रधानमंत्री अपनी यात्राओं में पत्रकारों को साथ नहीं ले जा रहे हैं, जैसा कि पहले होता था.

कश्मीर में मीडिया पर बैन का कोई तुक नहीं बनता : रवीश कुमार

कश्मीर में अख़बार बंद है। इंडियन एक्सप्रेस के मुताबिक़ आज दूसरा दिन है जब वहाँ किसी को अख़बार नहीं मिला है। राज्य सरकार ने अख़बारों के छपने और वितरण पर रोक लगा दी है। दिल्ली की मीडिया में ख़बरें आई हैं कि कर्फ़्यू के कारण वितरण रोका गया है। छपी हुई प्रतियाँ ज़ब्त कर ली गई हैं। सोशल मीडिया और इंटरनेट भी बंद है। कर्फ़्यू के कई दिन गुज़र जाने के बाद राज्य सरकार को ख़्याल आया कि अख़बारों को बंद किया जाए। क्या कर्फ़्यू में दूध,पानी सब बंद है? मरीज़ों का इलाज भी बंद है? आधुनिक मानव के जीने के लिए भोजन पानी के साथ अख़बार भी चाहिए। सूचना न मिले तो और भी अंधेरा हो जाता है। अफ़वाहें सूचना बन जाती हैं और फिर हालात बिगड़ते ही हैं, मन भी बिगड़ जाते हैं। खटास आ जाती है।

भईया, इससे अच्छा तो मजदूरी कर लेते, कहाँ से फंस गए मीडिया में!

आज कुछ काम से प्रेस क्लब गया हुआ था, हमेशा की तरह प्रेस क्लब के बाहर और भीतर चहल पहल थी, गेट के ठीक सामने एक कथित संस्थापित टीवी चैनल का कैमरामैन उदास मुद्रा में था, आदत से लाचार होकर पहले तो मैंने उनसे अभिवादन कर कुशलक्षेप पूछा, फिर जो जवाब आया, उसे सुन सुन्न रह गया, और ऐसा पिछले कई महीनों से लगातार जारी है, एक लम्बा मई मीडिया में गुजर चुका वो शख्स बड़ी ईमानदारी के साथ मुझसे कह रहा था, कि, “योगेश जी, ऐसा है, अगर हमको पता रहता कि मीडिया में इतनी ऐसी तैसी करने के बाद भी पगार कि चिंता रहती है, परिवार और पेट कि चिंता रहती है, तो कभी-भी मीडिया में तो नहीं आता, भले हो गाँव में खेतीबाड़ी कर लेता, पर सच में मीडिया में आने कि गलती नहीं करता.”

विश्व प्रेस स्वतंत्रता दिवस पर ईमानदार व दलाल पत्रकारों को शुभकामनाएं

प्रिय यशवंत जी
संपादक, भड़ास4मीडिया

आज की पत्रकारिता जगत आप जैसे स्वतंत्र व निष्पक्ष पत्रकारों की वजह से ही बनी हुयी है। आप द्वारा लगातार छेड़े गये अभियान काफी बेहतर होते है। आपकी लिखने की शैली से तो इस समय कोई मुकाबला नही कर पाएगा। मैं भड़ास 4 मीडिया का काफी पुराना पाठक हूं और इसे कई वर्षों से पढ़ता चला आ रहा हूं। अपनी ही बिरादरी का जिस प्रकार से आप निष्पक्ष व निर्भीक होकर समाचार को फ्लैश करते है वह बड़ी ही काबिले तारीफ की बात है।

यह अखबार मालिक रोज सड़क पर बैठ कर प्रेस कार्ड की दुकान चलाता है

बनारस में एक सज्जन हैं जो ‘दहकता सूरज’ नामक अखबार के मालिक हैं. बुढ़ापे में जीवन चलाने के लिए ये अब रोज सुबह सड़क पर बैठ जाते हैं और दिन भर अपने अखबार का प्रेस कार्ड बेचते रहते हैं. रेट है पांच सौ रुपये से लेकर हजार रुपये तक. ये महोदय खुद को पत्रकार संघ का पदाधिकारी भी बताते हैं. कई लोगों को इनके इस कुकृत्य पर आपत्ति है और इसे पत्रकारिता का अपमान बता रहे हैं लेकिन क्या जब बड़े मीडिया मालिक बड़े स्तर की लायजनिंग कर पत्रकारिता को बेचते हुए अपना टर्नओवर बढ़ा रहे हैं तो यह बुढ़ऊ मीडिया मालिक अपना व अपने परिवार का जीवन चलाने के लिए अपने अखबार का कार्ड खुलेआम बेच रहा है तो क्या गलत है?

शाहरुख खान को देखकर पागल हो जाने वाली ये महिला पत्रकार क्या पत्रकारिता करने लायक हैं!

मीडिया में यंगस्टर आजकल बड़े लोगों संग सेल्फी लेने और सितारों के साथ अपना प्रेम जाहिर करने आते हैं… कल नोएडा में किडजेनिया के लांच समारोह में शाहरुख खान आए.. जाहिर है लाखों लड़कियों के दिलों की धड़कन शाहरुख आए तो पागल होना लाजमी था… जीआईपी मॉल के बाहर भीड़ लग चुकी थी… शाहरुख ने प्रेस कांफ्रेंस शुरू की… कुछ नई लड़कियों का ग्रुप जो जागरण, फैशन डॉट कॉम और कुछ अन्य संस्थाओं से आईं थी, उन्हें देख कर लग रहा था कि वो केवल खान को देखने आई हैं… उन्हें इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई लेना देना नहीं है … और हुआ भी वही…

PRESS से हो, तो क्या नियम-कानून तोड़ने का हक़ मिल गया तुम्हें?

Dinesh Dard : पलासिया से इंडस्ट्री हाऊस की ओर वाले पैदल पथ (फुटपाथ) पर यूँ तो अक्सर दुपहिया-चार पहिया वाहनों का दौड़ना चलता रहता है, जो नियम के ख़िलाफ़ है। मगर मान लो फुटपाथ खाली हो और आपका कहीं पहुँचना बहुत ही ज़रूरी हो, तो मजबूरी में उस पर से गुज़रना समझ में आता है। लेकिन उसमें भी एक अपराध बोध ज़रूर होना चाहिए कि उन्होंने पैदल यात्रियों का अधिकार छीना। मगर इनमें अपराध बोध तो दूर, इन्हें तो ये एहसास तक नहीं होता कि ये ग़लत कर रहे हैं।

जो-जो पत्रकार pm के साथ सेल्फी की फ़ोटो सोशल मीडिया पर डाले, कमेंट बॉक्स में ‘प्रेस टी च्यूट” ज़रूर लिखना

Yashwant Singh : आज मीडिया वालों का सेल्फी दिवस है। pm साब बेचारों को पूरा मौका दिए हैं। फिर भी मीडिया वाले साले कहते हैं कि हमारे pm जी असहिष्णु हैं! अबे चिरकुटों, असहिष्णु तो तुम खुद हो। मरे गिरे छटपटाये जा रहे हो सेल्फी के लिए। pm ने तुम लोगों की औकात फिर दिखा दी। बिकाऊ बाजारू के अलावा सच में ‘प्रेस टी च्यूट’ हो।

बीते दो दशकों में मीडिया की दशा-दिशा में आए बदलावों का वरिष्ठ पत्रकार एलएन शीतल द्वारा विस्तृत विश्लेषण

मीडिया के बदलते रुझान-1 : इन नवकुबेरों ने मिशन शब्द का अर्थ ही पागलपन कर दिया

 

अगर हम मीडिया के रुझान में आये बदलाव के लिए कोई विभाजन-रेखा खींचना चाहें तो वह विभाजन-रेखा है सन 1995. नरसिंह राव सरकार के वित्तमन्त्री मनमोहन सिंह द्वारा शुरू की गयी खुली अर्थव्यवस्था के परिणामस्वरूप अख़बारी दुनिया में व्यापक परिवर्तन हुए. पहला बदलाव तो यह आया कि सम्पादक नाम की संस्था दिनोदिन कमज़ोर होती चली गयी, और अन्ततः आज सम्पादक की हैसियत महज एक मैनेजर की रह गयी है.

पुण्य प्रसून बाजपेयी का विश्लेषण- मीडिया हाउसों की साख खबरों से इतर टर्न ओवर पर टिक गई है!

: सत्ता से दो दो हाथ करते करते मीडिया कैसे सत्ता के साथ खडा हो गया : अमेरिका में रुपर्ट मर्डोक प्रधानमंत्री मोदी से मिले तो मड्रोक ने मोदी को आजादी के बाद से भारत का सबसे शानदार पीएम करार दे दिया। मड्रोक अब अमेरिकी राजनीति को भी प्रभावित कर रहे है। ओबामा पर अश्वेत प्रेसीडेंट न मानने के मड्रोक के बयान पर बवाल मचा ही हुआ है। अमेरिका में अपने न्यूज़ चैनल को चलाने के लिये मड्रोक आस्ट्रेलियाई नागरिकता छोड़ अमेरिकी नागरिक बन चुके है, तो क्या मीडिया टाइकून इस भूमिका में आ चुके हैं कि वह सीधे सरकार और सियासत को प्रभावित कर सके या कहे राजनीतिक तौर पर सक्रिय ना होते हुये भी राजनीतिक खिलाडियों के लिये काम कर सके।

क्लीवेज दिखाना एंकर को पड़ा महंगा, चैनल ने किया सस्पेंड

अल्‍बीनिया में एक टीवी रिपोर्टर को न्‍यूज प्रजेंट करते समय क्‍लीवेज दिखाना और प्‍लेब्‍वॉय मैग्जीन ज्‍वाइन करना काफी महंगा पड़ गया। चैनल के नाराज अधिकारियों ने उसे तुरंत ही सस्‍पेंड कर दिया। साथ ही उसे अभी अपनी पढा़ई और जर्नलिज्‍म पर ध्‍यान देने की नसीहत दी। टीवी रिपोर्टर ने जिस समय ऐसा हाटॅ शूट दिया उस समय वह अंतरराष्‍ट्रीय खबरें पढ़ रही थी। अल्‍बीनिया में एक समाचार चैनल के लिए 21 साल की एन्‍की ब्रैकाज इंटरनेशनल लेवल की न्‍यूज पढ़ रही थीं, लेकिन अपने इस काम के दौरान उसने कुछ ऐसा कर दिया कि बाकी सभी लोग सन्न रह गए।

मोदी और केजरी स्टाइल का ‘आदर्श’ मीडिया… जो पक्ष में लिखे-बोले वही सच्चा पत्रकार!

: मीडिया समझ ले, सत्ता ही है पूर्ण लोकतंत्र और पूर्ण स्वराज! : मौजूदा दौर में मीडिया हर धंधे का सिरमौर है। चाहे वह धंधा सियासत ही क्यों न हो। सत्ता जब जनता के भरोसे पर चूकने लगे तो उसे भरोसा प्रचार के भोंपू तंत्र पर होता है। प्रचार का भोंपू तंत्र कभी एक राह नहीं देखता। वह ललचाता है। डराता है। साथ खड़े होने को कहता है। साथ खड़े होकर सहलाता है और सिय़ासत की उन तमाम चालों को भी चलता है, जिससे समाज में यह संदेश जाये कि जनता तो हर पांच बरस के बाद सत्ता बदल सकती है। लेकिन मीडिया को कौन बदलेगा? तो अगर मीडिया की इतनी ही साख है तो वह भी चुनाव लड़ ले… राजनीतिक सत्ता से जनता के बीच दो-दो हाथ कर ले… जो जीतेगा, उसी की जनता मानेगी!

राहुल गांधी के एक्शन से संघ परिवार के मीडिया नियंत्रण और सरकार नियंत्रण की चूलें हिलीं

राहुल गांधी की नई इमेज परिवर्तनकामी है, खुली है, यह कांग्रेस के मूल स्वभाव से भिन्न है। कांग्रेस का मूल स्वभाव सत्ता अनुगामी और छिपाने वाला रहा है, जबकि राहुल गांधी सत्ता से मुठभेड़ कर रहे हैं, पार्टी को खेल रहे हैं। वे इस क्रम में दो काम कर रहे हैं, पहला यह कि वे कांग्रेस की नीतियों में परिवर्तन कर रहे हैं, पुरानी नीतियों से अपने को अलगा रहे हैं, उन पर क्रिटिकली बोल रहे हैं। इससे नई राजनीतिक अनुभूति  अभिव्यंजित हो रही है।

मीडिया को इतनी भी आज़ादी नहीं होनी चाहिए!

हर पल सनसनी और उन्माद बेचता मीडिया ग़ुलाम है या ज़रूरत से ज़्यादा स्वतंत्र? एक चैनल ने “ख़ुलासा” किया है कि लोग आतंकवादियों को अधिक, शहीदों को कम जानते हैं। सवाल है कि जब आप दिन रात आतंकवादियों और अपराधियों की कहानियां दिखाएंगे, तो जनता किसे जानेगी? इसी तरह 15 अगस्त और 26 जनवरी पर सभी चैनलों के बीच एक होड़-सी लग जाती है कवि-सम्मेलन और सैनिकों के बीच कार्यक्रम कराने की। लेकिन इन सभी कार्यक्रमों का प्रधान स्वर होता है- पाकिस्तान को गरियाना और लड़वाने-कटवाने वाली कविताओं का पाठ कराना।

वो दौर भी आया, जब राधे मां को हर सामान्य विज्ञापन के नीचे छोटी सी जगह मिलने लगी

राधे मां पर कुछ भी लिखने से पहले ये बता दूं कि मैं राधे मां की कहानी पिछले कई साल से फॉलो कर रहा हूं। एक बार ये देखने बोरीवली तक पहुंच गया था कि आखिर ये राधे मां है कौन? इस कौतूहल की दो बड़ी वजह थीं। पहली तो ये कि वो मुंबई शहर के सबसे बड़े होर्डिंग्स पर वो दिन रात चमकती थी। मुझे ये सवाल परेशान करता था कि ये जो भी हैं वो शहर में इतने बड़े पैमाने पर विज्ञापन कैसे दे पाती हैं।

पत्रकारिता अब फोर्थ स्‍टेट नहीं, रि‍यल स्‍टेट : पी साईंनाथ

भारतीय पत्रकारि‍ता में एक बड़ा कद रखने वाले पी साईंनाथ हरि‍याणा व पंजाब में पत्रकारि‍ता के वि‍द्यार्थि‍यों व वि‍भि‍न्‍न शि‍क्षावि‍दों को संबोधि‍त करने पहुंचे। मंगलवार को उन्‍होंने कुरुक्षेत्र वि‍श्‍ववि‍द़यालय में संबोधन कि‍या व बुधवार को चि‍तकारा यूनि‍वर्सि‍टी राजपुरा पंजाब में संभाषण कि‍या।

पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाउसों के मालिक जिम्मेदार : आनंद बहादुर सिंह

वाराणसी। राजा टोडरमल के वंशज व सन्मार्ग अख़बार के 84 वर्षीय संपादक आनंद बहादुर सिंह ने देश में पत्रकारिता के गिरते स्तर के लिए मीडिया हाऊसों के मालिकों को जमकर कोसा। उन्होंने कहा कि अखबारों और चैनेलों पर समाचार के प्रकाशन और प्रसारण में अब पत्रकारों की सहभागिता कम हो गयी है।

स्वतंत्रता दिवस पर जागी राष्ट्रभक्ति, विज्ञापन टारगेट पूरा करने के लिए साम दाम दंड भेद शुरू

स्वतंत्रता दिवस नजदीक आ गया है और इसी के साथ समाचार पत्रों के मार्केटिंग विभाग में देशभक्ति का जज़्बा भी जाग उठा है। वे अब दिन रात अपने क्लाइंट्स को देशभक्ति का मतलब समझाने मे जुटे हुए है, जुटे भी क्यों ना? 

रुद्रपुर प्रेस क्लब पर अमर उजाला का अटैक, रिपोर्टर को नोटिस

रुद्रपुर (उत्तरांचल) : दुनिया भर के झगड़े सिर्फ झूठ और सच को सिद्ध करने में ही हो रहे हैं। दो पक्षों में से एक पक्ष सदैव अपने को सच्चा व दूसरे को झूठा बतलाता है और कोर्ट कचहरी तक झूठा भी अपने को सच ठहराने का प्रयास करता रहता है। अंत में न्यायालय ही गवाहों और तथ्यों के आधार पर झूठ को झूठ और सच को सच बताता है। रुद्रपुर में लगता है, न्याय की दकरार न, प्रशासन ने मनमाना तरीके से प्रेस क्लब पर ताले जड़वा दिए। इससे पत्रकारों में रोष है। 

पता होता तो लेख देने से पहले मैं ‘तहलका’ का पंचनामा कर डालता

कुछ माह पहले एक केस के सिलसिले में पत्रकारों के कानूनी अधिकार पर अधिवक्‍ता कोलिन गोंजाल्विस के एनजीओ एचआरएलएन में बैठक हुई। बैठक में मीडिया और पत्रकारों की आज़ादी व कानून पर एक राष्‍ट्रीय सेमिनार की परिकल्‍पना बनी। एक संगठन बनाने का आइडिया आया। दो दिन का वह प्रस्‍तावित राष्‍ट्रीय सेमिनार गत दिवस ही खत्‍म हुआ। रायसीना के जंगल में मोर नाच लिया। किसी ने नहीं देखा। जिन्‍होंने देखा, उनमें इक्‍का-दुक्‍का को छोड़ कोई किसी को नहीं जानता। 

केंद्र सरकार ने मीडिया को दिए 998 करोड़ से ज्यादा के विज्ञापन

दिल्ली : नरेंद्र मोदी सरकार ने अपने अब तक के कार्यकाल में मीडिया के लिए विज्ञापनों पर 998.34 करोड़ रुपए खर्च किए हैं। 

निगेटिव रिपोर्टिंग होने पर रोहतक पीजीआई में मीडिया की एंट्री बैन

रोहतक : हेल्थ यूनिवर्सिटी और पीजीआई प्रशासन ने मीडिया की एंट्री पर पूर्ण रूप से बैन लगा दिया है। प्रशासन ने संस्थान की निगेटिव रिपोर्टिंग होने के चलते यह निर्णय लिया है।

भारत का इलेक्ट्रॉनिक मीडिया सरकार की मर्जी पर !

यह बेहद चिंताजनक स्थिति है कि आज भारतीय मीडिया, खासकर इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अपने लिए निर्धारित मानदंडों और आचरण संहिता को भूलकर किसी न किसी राजनीतिक दल का अनुयायी या उग्र राष्ट्रवादी संगठनों की तरह व्यवहार करने लगा है। एंकर चीख चीख कर अशोभन लहजे में अपनी परम देश निष्ठा का परिचय दे रहे हैं। अपने अलावा किसी और को बोलने का मौका वे नहीं देना चाहते। खबरों का प्रसारण यहां राजनीतिक मंतव्यों के तहत हो रहा है। 

मारे जा रहे पत्रकारों की हृदयविदारक खबरों के बीच मीडिया और सत्ता के अश्लील लेन-देन

जब-जब इस देश में चुनाव का मौसम आता है निजी कंपनियों के दफ्तरों से बजबजाते नोएडा में तमाम नए समाचार चैनल कुकरमुत्ते की तरह पनपने लगते हैं. इन चैनलों का एकमात्र उद्देश्य चुनाव के समय पैसा बटोर कर बंद हो जाना होता है।

मीडिया एस्‍थेटिक्‍स : ‘लेने’ और ‘देने’ पर केंद्रित कर दिया राधे मां से बातचीत

मुझे रह-रह कर लगता रहा है कि यह देश अद्भुत है। इस अद्भुत देश में ”राधे मां” नाम की एक अद्भुत महिला के कथित कानूनी अपराध को मीडिया ने जिस तरह से एस्‍थेटिक्‍स के सवाल में तब्‍दील कर डाला है, वह भी अद्भुत है।

आतंक के खेल में एक मासूम के जिंदा पकड़े जाने का मीडिया टेरर

कुछ मित्रों ने जिंदा पकड़े गए आतंकवादी यानी कसब पर मेरी राय जाननी चाही है. मैंने मना किया तो कहने लगे कि लिखने से डरते हैं. अब ये हाल भी नहीं है कि कोई मुझे कुछ कहकर उकसा ले. पर अगर आप सुनना ही चाहते हैं तो लीजिए सुनिए….

लो, कर लो जी साढ़े आठ करोड़ वाली ‘मन की बात’, मोदी मेहरबान तो मीडिया पहलवान

वाह रे प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी, ऐसी कौन सी बात कर देते हैं कि सरकारी खजाने को उसे सुनने पर इस तरह न्योछावर कर दिया जा रहा है। पता चला है कि ‘मन की बात’ का सबसे ज्यादा मजा मीडिया लूट रहा है। केंद्र सरकार इस रेडियो कार्यक्रम के प्रचार प्रसार के लिए अब तक साढ़े आठ करोड़ रुपए फूंक चुकी है। इस कारस्तानी को आरटीआई के जरिए सार्वजनिक किया है आम आदमी पार्टी के मीडिया संयोजक मुल्कराज आनंद ने। 

मीडिया भी उसकी अंगुलियों पर नाच रहा

यह ‘सुपर पंच’ है! ‘मैं हिंदुओं को मारने आया था… मुझे हिंदुओं को मारने में मजा आता है…!’ तमाम खबरों के माथे पर बैठे इस हेडिंग ने एक झटके में वह काम कर दिया, जो पिछले कई दिनों से लगातार कभी अचानक कलाम की मौत का संयोग तो उसके बरक्स सचेतन कभी याकूब को फांसी, कभी डीएनए तो कभी पोर्न जैसे शिगूफ़ों की कूथम-कुत्था नहीं कर पा रही थी…! अब ललित-गेट क्या था… व्यापमं का व्यापक घोटाला क्या था… जाति जनगणना का सवाल कहां गया… इन सब सवालों को गहरी नींद में सुला दिया जा चुका है…!

‘मजीठिया’ पर पीएम की चुप्‍पी कर्मचारियों का खून पीने वाले मीडिया मालिकों के पक्ष में

DNA या यूं कहें Deoxyribonucleic acid, the molecule that carries genetic information about all living. अर्थात डीएनए वह अणु है जो सभी जीवधारियों की आनुवंशिक सूचनाओं का संवहन करता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नीतीश कुमार के बारे में डीएनए खराब होने की टिप्‍पणी करके एक नई बहस को हवा दे दी है। लेकिन अब तक प्रधानमंत्री ने जिन हरकतों को अंजाम दिया है, उससे उनका भी डीएनए सवालों के घेरे में आ गया है। वह अपने को चाय वाला बता कर गरीबों से निकटता का प्रदर्शन भले ही करें, लेकिन उनके डीएनए में गरीब विरोधी और कारपोरेट समर्थक व्‍यक्ति की पहचान उभर कर सामने आई है। यह अलग बात है कि उनके मनसूबों पर लगातार पानी फिर रहा है।

सहारा मीडिया दस साल के लीज पर विदेशी कंपनी के हवाले, पहली सितंबर से चार्ज संभालेगी

राष्ट्रीय सहारा ग्रुप प्रबंधन ने अपना पूरा मीडिया तंत्र पहली सितंबर से विदेशी कंपनी की साझेदारी में संचालित करने का निर्णय लिया है। अब सहारा मीडिया में उस कंपनी की 15 प्रतिशत और सहारा की 85 प्रतिशत साझेदारी होगी। मीडिया कर्मियों की सैलरी भी अब उसी कंपनी के माध्यम से जारी होगी। पता चला है कि इस हाई प्रोफाइल डील में सहारा उर्दू दिल्ली के ग्रुप एडिटर फैजल का हाथ रहा है। कंपनी के चेयरमैं सुव्रतो रॉय ने अपने शीर्ष अधिकारियों तक से कहा है कि तकनीकी कराणों से कंपनी का नाम अभी सार्वजनिक नहीं किया जा सकता है। वह कंपनी कौन सी है, इसको लेकर अटकलें लगाई जा रही हैं। 

जयप्रकाश त्रिपाठी की पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ को ‘बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार’

उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान की ओर से आज वर्ष 2014 में प्रकाशित पुस्तकों पर सम्मान एवं पुरस्कारों की घोषणा कर दी गई। इसके अंतर्गत संस्थान ने पत्रकारित पर केंद्रित पुस्तक ‘मीडिया हूं मैं’ को ‘बाबूराव विष्णु पराड़कर पुरस्कार’ से सम्मानित करने का निर्णय लिया है।

मीडिया को नींद नहीं आई रात भर, चलता रहा ‘फांसी’ लाइव

ऐसा शायद पहली बार रहा, या कह सकते हैं मुंबई अटैक जैसा ही कमोबेश। याकूब मेमन की फांसी की रात। जो सो चुके थे, उन्हें सुबह पता चला होगा लेकिन पूरी रात मीडिया का ‘फांसी’ लाइव चलता रहा देश की राजधानी से नागपुर जेल तक। सुप्रीम कोर्ट भी शायद पहली बार इस तरह जागा और एक मनहूस सुबह याकूब के आखिरी दम की खबरें ले उड़ी देश-दुनिया भर में…। 

इतनी घटिया हरकत से भी बाज नहीं आ रहा घबराया हुआ जागरण प्रबंधन

जागरण कर्मियों की एकजुटता से घबराया हुआ प्रबंधन कितनी गिरी हुई हरकत कर सकता है। इसका एक सटीक उदाहरण हाल ही में सामने आया है। 

मजीठिया वेतनमान : दैनिक जागरण के मीडिया कर्मी भर रहे प्रपत्र-सी, आप क्‍यों रहें पीछे !

दैनिक जागरण के स्‍थायी, अनुबंधकर्मी और अंशकालिक मीडिया कर्मियों ने प्रपत्र-सी को भर लिया है और जो रह गए हैं, वह भी इन्‍हें जल्‍द ही भरने जा रहे हैं। ऐसे में अन्य अखबारों के मीडिया कर्मी पीछे क्‍यों रह रहे हैं। यदि किसी के पास प्रपत्र-सी नहीं है तो जल्‍द इसे साइट से डाउनलोड कर ले। नहीं तो जागरण के साथियों से संपर्क करे, वे मदद करेंगे। यदि जागरण छोड़ने के बाद किसी अन्‍य संस्‍थान में कार्य कर रहे हैं तो भी प्रपत्र-सी को भरने के लिए पुराने सहयोगियों से संपर्क कर सकते हैं।

उत्तराखंड : एक भ्रष्ट अफसर का आखिरी वक्त तक गुणगान करता रहा बेशर्म मीडिया

उत्तराखण्ड के 15 साल बता रहे हैं कि उसे अपना समझने की हिमाकत न तो राज्य सत्ता ने की है और न ही नौकरशाहों ने। सब ने उसे खाला का घर बना दिया है। जहां, जब तक डट सकते हो, डटे रहो। एक मुख्य सचिव बी आर एस के नाम पर सूचना आयुक्त बन 5 साल का जुगाड़ कर लेता है, तब दूसरा आता है और फिर तीसरा, संघर्ष और शहादतों से लिए राज्य में ये तमाशा क्या है?

असिस्टेंट प्रोफेसर-प्रिंट मीडिया की नियुक्ति में मनमानी पर मंत्रालय ने किया जवाब तलब

भड़ास पर छपी खबर का असर : राष्ट्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण संस्थान नई दिल्ली नई में गत 25 जून को हुए सहायक आचार्य प्रिंट मीडिया के चयन में मनमानी पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय ने यहां के निदेशक से जवाब तलब किया है। इस पद के लिए इंटरनल कैंडिडेट को विशेष लाभ देते हुए उसे स्क्रीनिंग एवं चयन सूची में प्रथम स्थान पर रखने एवं नियुक्ति सूची में प्रथम रैंक पर केंद्रीय स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के सचिव ने स्पष्टीकरण मांगा है। इस पद के लिए पहले से ही संभावना जताई जा रही है कि संस्थान के निदेशक ने निजी लाभ के लिए ऐसे अभ्यर्थी का चयन कराया है जो ओबीसी श्रेणी की अर्हता पूरी नहीं करता है और उसकी शैक्षिक योग्यता भी संदिग्ध है।

झाबुआ में चिकित्सा-विमर्श : मीडिया को मेडिकल से क्या काम, सेहत से खेल रहे अस्पताल

झाबुआ : कंठ तक भ्रष्टाचार में डूबी देश की चिकित्सा व्यवस्था और उसके प्रति नितांत अगंभीर कारपोरेट मीडिया घरानों ने करोड़ो-करोड़ परेशानहाल लोगों से अपनी चिंताएं पूरी तरह हटा ली हैं। संसाधनहीन लोगों और गरीबों के प्रति जैसी उदासीनता सरकारी और प्राइवेट चिकित्सा संस्थान बरत रहे हैं, वही हाल खुद को चौथा खंभा कहने वाला मीडिया का भी है। प्रायः लगता है कि जैसे, देश की पूरी चिकित्सा व्यवस्था पैसे के भूखे इन गिरोहबाजों के चंगुल में फंस गई है। मीडिया घराने चिकित्सा क्षेत्र के विज्ञापनों को लेकर जितने आकुल-व्याकुल दिखते हैं, काश उतना आग्रह परेशान और असहाय मरीजों की मुश्किलों पर भी होता।  

मीडिया का आपातकाल : उजाले के भीतर छिपा है गहन अंधेरा

पहले थोड़ा आपातकाल की यादें ताजा कर दूं। आपातकाल के दौरान एक कविता लिखी गई, ठेठ अवधी में- माई आन्‍हर बाबू आन्‍हर, हमे छोड़ कुल भाई आन्‍हर, केके केके दिया देखाईं, बिजली एस भौजाई आन्‍हर…. यह कविता यदि आप नहीं समझ पा रहे हैं तो इसका अर्थ भी बता देता हूं। मां अंधी है, पिता अंधे हैं। भाई भी अंधे हैं। किसको किसको दीपक दिखाऊं, बिजली की तरह चमक दमक वाली भाभी भी तो अंधी हैं। आपातकाल के दौरान इस कविता में निहित लक्षणा, व्‍यंजना मोटी बुद्धि के लोगों की समझ में नहीं आई और कवि का कुछ बुरा नहीं हुआ।

मैं बड़ा चापलूस टाइप का व्‍यक्ति था

फेसबुक पर मैं जैसा दिखता हूं, वैसा हूं नहीं। मैं बड़ा चापलूस टाइप का व्‍यक्ति हुआ करता था। अनायास ही किसी मतलब के व्‍यक्ति की तारीफ कर देना मेरी आदत में शुमार था। लेकिन मेरी इस चापलूसी से मुझे कोई लाभ नहीं मिला। कारण। चापलूसी की कला इतनी विकसित हो चुकी थी कि वहां मेरे लिए कोई स्‍पेस नहीं रह गया था।

एचटी मीडिया की शुद्ध कमाई में इजाफा

हिंदुस्तान मीडिया वेंचर्स लि. (एचएमवीएल) का एकल आधार पर शुद्ध लाभ चालू वित्त वर्ष की पहली तिमाही में 23.11 प्रतिशत बढ़कर 41.71 करोड़ रुपये रहा।

मुलायम-अमिताभ प्रकरण : दैनिक हिन्‍दुस्‍तान लखनऊ ने पहली खबर दबा दिया, दूसरी खिलाफ खबर छाप दिया!

अच्‍छा, इस हालत को क्‍या कहा-माना जाए कि एक खबर को दबा लिया गया है। इतना ही नहीं, इस असल खबर से जुड़ी एक दूसरी खबर उस खबर के खिलाफ छाप दी गयी। इतना भी होता तो बर्दाश्‍त कर लिया जाता। सम्‍पादक ने उससे जुड़ा एक साक्षात्‍कार छाप दिया है। सम्‍पादक है। यह कमाल किया है दैनिक हिन्‍दुस्‍तान के सम्‍पादक केके उपाध्‍याय ने। अरे जनाब, यह करने से पहले आप जरा इतना तो सोच लेते कि आप सम्‍पादन कर रहे हैं या तेल-चटाई का धन्‍धा खोले बैठे हैं। 

वरिष्ठ पत्रकार कुमार सौवीर

पत्रकार साथियों कायर न बनो, भागो नहीं, मीडिया को बदलो, ताकत का एहसास कराओ

प्रिय पत्रकार साथियों, आए दिन सुना जा रहा है कि मीडिया प्रबन्धन या संपादकों की मोनोपोली के चलते हमारे साथी त्याग पत्र देकर भाग रहे हैं। युद्ध क्षेत्र से भागना कायरता है और कायर व बुजदिल सैनिक को सम्मान नहीं मिलता बल्कि उसकी आने वाली पीढ़ी को भी समाज के अपमान का सामना करना पड़ता है। हमारे साथी जिस समस्या से आजिज आकर त्याग पत्र देकर मीडिया से दूर होना चाहते हैं, क्या वे मीडिया से दूर रह कर अपने न्याय की लड़ाई लड़ सकते हैं? 

केजरीवाल सरकार ने मीडिया पर कार्रवाई का सर्कुलर वापस लिया

नई दिल्‍ली : एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी के मुताबिक केजरीवाल सरकार ने मीडिया संगठनों के खिलाफ मानहानि के मामले दायर करने संबंधी विवादास्पद सर्कुलर को वापस ले लिया है। केजरीवाल के नेतृत्व वाली सरकार की ओर से जारी सर्कुलर पर सुप्रीम कोर्ट ने स्थगनादेश दे दिया था। सर्कुलर वापस लेने का फैसला लगभग दो महीने बाद आया है।

व्यापमं : वामदलों का प्रदर्शन आज, किसी पर भरोसा नहीं, चौथे खम्भे को देंगे ज्ञापन

बादल सरोज : चार वामपंथी दलों के साझे आव्हान पर 8 जुलाई को व्यापमं के मुख्यालय पर एक प्रदर्शन किया जाएगा। इस प्रदर्शन के जरिये जो मानें उठायी जाएंगी उनमे प्रदेश को मौतों की महामारी से बचाने के लिए मुख्यमंत्री शिवराज सिंह के तत्काल इस्तीफा देने , मामले की सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में सीबीआई जांच कराने , एसआईटी और एसटीएफ की भी जांच कर यह पता लगाने कि उन्होंने कितने सबूत मिटाकर किन किन को बचाया है, शामिल हैं। 

स्त्री विमर्श के बहाने….वाह रे मीडिया, तो तू इसलिए भांड कहलाता है !

कुछ दिनों पहले अमरीकी मीडिया सहित गॉसिप पिपासु अंतरराष्ट्रीय मीडिया को एक खास खबर हाथ लग गई। ऑलंपियन ब्रूस जेनर ने अपना लिंग परिवर्तन करा महिला होकर विश्व को दिखा दिया। ब्रूस जेनर कीपींग अप विद कर्देशियन रियलिटी धारावाहिक की सोशलाइट किम कर्देशियन के स्टेप पिता हैं। उनकी पत्नी क्रिस जेनर को तीन सितारा पुत्रियां – कर्टनी, किम और क्लोय हैं, जबकि उनके साथ उनकी दो पुत्रियां कायली, केंडल हैं। खास बात यह है कि बकौल ब्रूस यह निर्णय काफी कठिन था और वे बचपन से ही महिला बनना चाहते थे।विदेशी मीडिया उनके रोते – भावुक होकर कहानी कहने के इंटरव्यू लेने में जुट गया… मेरे मन में आया कि अगर ये बूढ़ऊ मेरे सामने पड़ जाए तो दो चप्पल की मारूं….. बूढ़ऊ, जिंदगी भर पूरे मजे लूट लेने के बाद तुझे सठिया उमर में यह करामात सूझी है। और कुछ नहीं बचा था?? करावाना था तो बाली उमर में ही क्यों न कराया, कईंयों का भला होता वहां,… पांच युवा पुत्रियों और एक पुत्र का पिता होकर अब नाना बनने के बाद तेरे ये खयालात उड़ने लगे…(मुझे शांत होना चाहिए क्योंकि ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं। आप के अलग हो सकते हैं)

पहले चित्र में ब्रूस जेनर लिंग परिवर्तन के बाद, दूसरे चित्र में अपनी बॉलोजिकल पुत्रियों के साथ 

अक्षय पर बाय लाइन पाने की होड़ में व्यापमं और मीडिया का सच

जयदीप कर्णिक : मैं अक्षय सिंह को नहीं जानता। ऐसे ही मैं निर्भया, आरुषि और जेसिका लाल को भी नहीं जानता था। मैं तो तेजस्वी तेस्कर को भी नहीं जानता। इन सबमें क्या समानता है? और इस सबका राकेश ओमप्रकाश मेहरा की फिल्म रंग दे बसंती से क्या लेना-देना है? अगर आपने फिल्म देखी है और पिछले दो दिन में अचानक व्यापमं घोटाले को मिली राष्ट्रव्यापी कवरेज को आप देख रहे हैं तो आप ख़ुद ही तार आपस में जोड़ लेंगे।

मीडिया संस्थानों में चुपचाप चल रहा ‘व्यापम’ जैसा घिनौना खेल

इन दिनों देशभर में ‘व्यापम’ भर्ती घोटाले पर बवाल मचा है। ये घोटाला अपने नज़दीकी, रिश्तेदार या अयोग्य लोगों को धनबल के आधार पर सरकारी नौकरियों और मेडिकल-इंजीनियरिंग में प्रवेश दिलाने का है। घोटाले के उजागर होने के बाद से ही देशभर में मानो भूचाल आ गया है। ऐसे में मीडिया संस्थानों के आंतरिक भर्ती-भ्रष्टाचार पर कहावत याद आती है कि जिसके घर शीशे के होते हैं, पत्थरों से वैर नहीं पालता। बीते दिनों डीडी न्यूज़ में 10-12 पदों के लिए 500 से ज़्यादा अनुभवी पत्रकारों की भर्ती परीक्षा आयोजित की गयी थी, जिसके पैटर्न की सूचना प्रकाशित करना भी प्रसार भारती ने उचित नहीं समझा। राज्यसभा टीवी ने अयोग्य लोगों को भर्ती करने का अभियान जारी रखा हुआ है। इन भर्ती परीक्षाओं में ओएमआर शीट का इस्तेमाल न किये जाने, प्रश्नपत्रों की गोपनीयता संदिग्ध होने सहित कईं खामियां देखी गयीं जो व्यापम की तर्ज पर घोटाले की तरफ इशारा करती हैं। निजी मीडिया संस्थानों में तो और भी बुरे हाल हैं। ताज़ा मामला देश के सबसे बड़े मीडिया संस्थान होने का दावा करने वाले ज़ी न्यूज़ समूह का है। आज तक, इण्डिया टीवी से लेकर एनडी टीवी और न्यूज़ नेशन से लेकर न्यूज़ 24 तक ऐसा कोई मीडिया संस्थान नहीं जो हायर एन्ड फायर का घिनौना खेल खेल कर हज़ारों होनहार पत्रकारों का भविष्य तबाह करने की इस दौड़ में शामिल न हो। 

नई दुनिया के मालिक रहे अभय छजलानी खेल संगठनों के नाम पर कमा रहे किराया

मध्यप्रदेश में कांग्रेस सरकार ने अपने कार्यकाल में विभिन्न समाचार पत्रों को अनेक तरह से उपकृत किया था। इसी का एक उदाहरण है इंदौर के अपने समय के प्रतिष्ठित समाचार पत्र नईदुनिया के प्रधान संपादक रहे अभय छजलानी को बेशकीमती और पॉश इलाके रेसकोर्स रोड पर खेल संगठन बनाने के नाम पर उपकृत किया जाना। जानकारी के खेल गतिविधियों के नाम पर इंदौर के खेल संगठन सरकार से रियायती जमीनें लेकर उनका व्यावसायिक उपयोग करके अपनी जेब भर रहे हैं। 

कोर मीडिया और सोशल मीडिया में बेहतर तालमेल पर जोर

रायपुर (छत्तीसगढ़) : न्यू सर्किट हाउस में समन्वय संस्था की कार्यशाला में कोर मीडिया और सोशल मीडिया के बीच बेहतर तालमेल और दोनों में गुणात्मक सुधार पर चर्चा की गई। वक्ताओं ने कहा कि प्रिंट व इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के समानांतर एक और मीडिया शैली का विकास पिछले कुछ वर्षों के दौरान हुआ है। आम लोगों द्वारा संचालित इस नई मीडिया शैली को सोशल मीडिया कहा जाता है। बहुत से सोशल मीडिया एक्टिविस्ट और पत्रकारों की राय है कि इन दोनों माध्यमों में यदि बेहतर समन्वय हो तो मीडिया और मजबूती के साथ समाज के लिए काम कर सकेगा।

घाटे से जूझ रहे बीबीसी में होगी 1000 से अधिक कर्मियों की छुट्टी

इस समय घाटे से जूझ रहा बीबीसी (ब्रिटिश ब्राडकास्टिंग कारपोरेशन) अपने एक हजार से अधिक कर्मचारियों की छंटनी करने वाला है। इसकी सुगबुगाहट से अंदर ही अंदर रोष की सूचनाएं हैं।

केरल विधानसभा में मीडिया पर हमले का विरोध

मीडिया और एक विधायक पर यूडीएफ के कार्यकर्ताओं की ओर से किए गए कथित हमले के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए माकपा के नेतृत्व वाले एलडीएफ विपक्ष के सदस्यों ने केरल विधानसभा से बर्हिगमन किया। विपक्ष, मलयालम टीवी चैनल ‘रिपोर्टर’ के प्रमुख संपादक एम वी निकेश कुमार और केसीबी के विधायक के बी गणेश कुमार के पत्थनापुरम स्थित आवास पर हुए कथित हमले के मुद्दे पर स्थगन प्रस्ताव लाने की अनुमति चाहता था। विधायक ने हाल ही में कांग्रेस के नेतृत्व वाले सत्ताधारी यूडीएफ से अपने संबंध तोड़ लिए थे।

रिलायंस जिओ मीडिया को टीवी कंटेंट डिस्‍ट्रीब्‍यूशन के लिए मिली प्रोवीजनल मंजूरी

रिलायंस इंडस्‍ट्रीज लिमिटेड (आरआईएल) ने सोमवार को कहा कि उसकी सब्सिडियरी रिलायंस जिओ मीडिया को संपूर्ण भारत में डिजीटल केबल टीवी क्षेत्र में मल्‍टी सर्विस ऑपरेटर के तौर पर काम करने के लिए सरकार से प्रोवीजनल रजिस्‍ट्रेशन हासिल हो चुका है।

काटजू की बात पर मीडिया और सरकार दोनो खामोश क्यों, चीफ जस्टिस पर लगे आरोपों की जांच क्यों नहीं ?

”देश के चीफ़ जस्टिस ऑफ इंडिया का मामला है । क़रीब दस महीनों से प्रधानमंत्री समेत क़ानूनी बिरादरी के महानुभावों और मीडिया में ठोकरें खा रहा है । इसकी जाँच क्यों नहीं होनी चाहिए?” अपने एफबी वाल पर शीतल पी सिंह लिखते हैं – ” देश के प्रधानमंत्री ने मना कर दिया है कि वे गौतम अडानी के बारे में, उनके (प्रधानमंत्री के सरकारी घर में ) आने जाने के बारे में किसी RTI का कोई जवाब नहीं देंगे ? सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश मार्कण्डेय काट्जू पिछले आठ महीने से सुप्रीम कोर्ट के चीफ़ जस्टिस के बारे में उन तक पहुँचे दस्तावेज़ों की जाँच की माँग करते प्रतीक्षारत हैं ? व्यावसायिक tycoon और वक़्त फ़िलहाल वांछित ललित मोदी के हवाले से देश के सबसे बड़े अख़बार ने कहा है कि महामहिम राष्ट्रपति की सबसे प्रमुख सहयोगी/सलाहकार/सचिव ओमिता पाल देश के सबसे बड़े हवाला कारोबारी की भागीदार हैं ? इससे बड़े सवाल एक साथ देश के सामने कब थे ? जस्टिस मार्कंडेय काटजू की एक गंभीर टिप्पणी ने भारत के मुख्य न्यायाधीश एचएल दत्तू पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। काटजू का कहना है कि भ्रष्टाचार के आरोप सही हैं तो दत्तू को भारत का मुख्य न्यायाधीश नहीं होना चाहिए। इस मामले की जांच जरूरी है। दत्तू पर लगे आरोपों की फाइल काटजू ने तत्कालीन कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद, वरिष्ठ अधिवक्ता शांति भूषण, उनके बेटे प्रशांत भूषण, टाइम्स ऑफ इंडिया के धनंजय महापात्रा, इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू के पत्रकारों को उपलब्ध करा दी थी। 

भारत के चीफ जस्टिस एचएल दत्तू एवं जस्टिस मार्कंडेय काटजू

भविष्य डिजिटल मीडिया का : एमआइसीए डॉइरेक्टर

कोलकाता : मुद्रा इंस्टीट्यूट ऑफ कम्यूनिकेशंस, अहमदाबाद (एमआइसीए) के निदेशक डॉ नागेश राव ने कहा है कि भविष्य डिजिटल मीडिया का भविष्य है। इसलिए उद्योग की मांग को देखते हुए एमआइसीए डिजिटल मार्केटिंग के विशेष कोर्स करा रहा है. डॉ नागेश राव ने पत्रकारों को बताया कि किसी ब्रांड को स्थापित करने, उसकी रणनीतिक ढंग से मार्केटिंग करने और अपनी बात को अपने टारगेट ऑडियंस तक क्रिएटिव तरीके से पहुंचाने से जुड़े पाठ्यक्रमों के क्षेत्र में एमआइसीए एक जाना-माना नाम है.

पढ़ते रहें भड़ास, लामबंद हो अब उत्पीड़ित-वंचित मीडिया बिरादरी

हम किसी भी कीमत पर इस कारपोरेट मीडिया के तिलिस्म को किरचों में बिखेरना चाहते हैं। मजीठिया के नाम पर धोखाधड़ी से जिन्हें संशोधित वेतनमान के सिवाय कुछ भी हासिल नहीं हुआ है और अपने अपने दफ्तरों में गुलामों जैसी जिनकी जिंदगी है, बेड़ियां उतार फेंकने की चुनौती वे अब स्वीकार करें। 

 

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर छह महीने तक मीडिया से बात नहीं करेंगे

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने कहा है कि वह छह महीने तक मीडिया से बात नहीं करेंगे। इससे पहले गोवा के पूर्व मुख्यमंत्री पर्रिकर शायद ही कभी मीडिया के सवालों पर जवाब देने से कतराए हों। वह पिछले तीन दिनों से गोवा में हैं। विभिन्न मुद्दों पर उनके बयान की मीडिया आलोचना कर रहा है। 

मौजूदा मीडिया बनाम आपातकाल के दौर की पत्रकारिता

क्या मौजूदा वक्त में मीडिया इतना बदल चुका है कि मीडिया पर नकेल कसने के लिये अब सरकारों को आपातकाल लगाने की भी जरुरत नहीं है। यह सवाल इसलिये क्योंकि चालीस साल पहले आपातकाल के वक्त मीडिया जिस तेवर से पत्रकारिता कर रहा था आज उसी तेवर से मीडिया एक बिजनेस मॉडल में बदल चुका है, जहां सरकार के साथ खड़े हुये बगैर मुनाफा बनाया नहीं जा सकता है। और कमाई ना होगी तो मीडिया हाउस अपनी मौत खुद ही मर जायेगा। यानी 1975 वाले दौर की जरुरत नहीं जब इमरजेन्सी लगने पर अखबार के दफ्तर में ब्लैक आउट कर दिया जाये। या संपादकों को सूचना मंत्री सामने बैठाकर बताये कि सरकार के खिलाफ कुछ लिखा तो अखबार बंद हो जायेगा। या फिर पीएम के कसीदे ही गढ़े। अब के हालात और चालीस बरस पहले हालात में कितना अंतर आ गया है। 

पत्रकारिता को उसका पुराना मिशन और चेहरा दिया जगेन्द्र ने

लगता है लोगों का इतिहासबोध कमजोर पड़ता जा रहा है। पढ़ने की शगल खत्म होती जा रही है, खास तौर पर राजनीतिक जीवधारी, अब किताबों से दूर होते जा रहें हैं। राजनीति की नई कोपलें तो अपनी इतिहास और भूगोल दोनों की सामान्य जानकारी से भी दूर होती जा रही हैं। वर्तमान में जीने वाली पीढ़ी अतीत से शायद कुछ सीखना ही नहीं चाहती। जबकि पहले के राजनेता अध्ययन में रूचि लेते थे और देश व दुनिया के इतिहास और आंदोलन की कहानी पढ़ते थें, पढ़ते ही नहीं थे, बल्कि अध्ययन से अपनी विचारधारा को भी परिपक्व और पुष्ट करते थें। गाँधी, नेहरू, लोहिया, जे.पी, दीन दयाल उपाध्याय आदि अनेक राजनेता और ‘जननायक’ स्वअध्ययन में गहरी रूचि लेने वाले थे।

क्यों मीडिया को शीशे के घर में कैद करना चाहती है सत्ता?

साल भर पहले जब प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द इस्तेमाल किया तो संकेत तभी मिल गये थे कि सत्ता बदलते ही सत्ता के निशाने पर मीडिया तो होगा। लेकिन उस वक्त यह अंदेशा बिलकुल नहीं था कि मीडिया नामक संस्थान की साख को भी खत्म करने की दिशा में कदम बढेंगे। क्योंकि मनमोहन सिंह के दौर में राडिया कांड से चंद बडे नाम वाले पत्रकारों के संग क्रोनी कैपटलिज्म का खेल जब खुलकर उभरा तो मीडिया की साख पर बट्टा तो लगा लेकिन यह भरोसा भी जागा की देश में सत्ता बदलेगी तो मीडिया के भीतर पत्रकारों की अहमियत बढ़ेगी क्योंकि प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार ने ही न्यूज ट्रेडर शब्द कहकर दागी पत्रकारों को संकेत दे दिये हैं। लेकिन नई सत्ता ने साल भर के भीतर ही खुले संकेत दे दिये कि मीडिया की निगरानी सत्ता को बर्दाश्त नहीं है। 

पूंजी-पोषित नेता और सत्ता-पोषित मीडिया : क्षमा करना जागेंद्र सिंह, इस चक्रव्यूह में हम अकेले !

शाहजहांपुर के जगेंद्र सिंह हत्याकांड से थोड़ा हटकर, मौजूदा पूरे मीडिया परिवेश पर सोचें तो साफ साफ लगता है कि टकराव पत्रकारिता और सियासत के बीच नहीं, बल्कि दो जरायम वर्गों के बीच है। भ्रष्ट सत्ता-पोषित मीडिया खबर की धौंस में यदि राजनेताओं या उनकी पार्टियों की लूट में हिस्सेदारी के बूते अपना कारपोरेट चेहरा चमकाना चाहता है और पत्रकारों का एक बड़ा तबका पुलिस, प्रशासन, नेता, माफिया ठिकानों पर चौथ-कर्मकांडों से उपकृत होते रहना चाहता है, तो मान लेना चाहिए कि इस टकराव की जड़ें कहीं और हैं। स्थितियां बहुत ही भयानक हैं। जगेंद्र हत्याकांड में तो उसकी मद्धिम सी आहट भर सुनाई देती है। 

यूपी : मीडिया सलीब पर और इंसाफ मुजरिमों की मुट्ठी में !

समाजवादी पार्टी के वरिष्ठ नेताओं को लगता है कि उनके मंत्रियों को फंसाया जा रहा है, साथ ही कहना है कि सरकार पर दबाव बनाये रखने के लिए विरोधी दलों के नेता आये दिन मंत्रियों के त्याग पत्र मांगते रहते हैं। आरोप यह भी है कि समाजवादी पार्टी पर मीडिया हमलावर रहता है। समाजवादी पार्टी के नेताओं की इस दलील का आशय यह है कि उनकी सरकार में सब कुछ ठीक है एवं सभी मंत्री संवैधानिक दायरे में रह कर ही कार्य कर रहे हैं, जिन्हें सिर्फ बदनाम किया जा रहा है, लेकिन यह स्पष्ट होना शेष है कि समाजवादी पार्टी के नेता डॉ. भीमराव अंबेडकर द्वारा लिखित संविधान के दायरे में रहने की बात करते हैं, या समाजवादी पार्टी का कोई और संविधान है?

मीडिया पर भारी पड़ सकता है महाराष्ट्र सरकार का हलफनामा

एक जनहित याचिका के जवाब में महाराष्ट्र सरकार ने बॉम्बे हाईकोर्ट में एक हलफनामा दायर किया है। उसमें कोर्ट को बताया गया है कि आरोपी और पीड़ित की निजता बनाए रखने के लिए पुलिस को दिशा-निर्देश जारी किया है, जिसमें आरोपी का नाम, उसकी तस्वीर और उससे जुड़ी कोई भी जानकारी मीडिया को देने के लिए मना किया गया है। सवाल उठ रहे हैं कि कहीं ये महाराष्ट्र में मीडिया ट्रायल के नाम पर मीडिया पर पाबंदी की कोशिश तो नहीं है? 

उत्तरांचल में क्रशर माफिया के हाथों की कठपुतली बना इलैक्ट्रॉनिक मीडिया

क्रशर माफिया से जूझ रहे उत्तरांचल के ग्रामीणों पर लाठीचार्ज हुआ। सीता देवी, हेमंती देवी, दस-दस दिनों तक भूख हड़ताल पर बैठीं, लेकिन अपने को जनता का हितैषी बाताने वाले श्रीनगर, गढ़वाल, उतराखंड के इलैक्ट्रानिक मीडिया ने अपने कैमरे कभी भी इन पीड़ित ग्रामीणों की ओर नहीं घुमाये। घुमाये भी तो उसे प्रसारण के लिए नहीं भेजा। भेजें भी कैसे, नगर के अधिकांश इलैक्ट्रानिक मीडिया के पत्रकार क्रशर माफिया के मित्र जो ठहरे। जी हां  श्रीनगर से लगे टिहरी जिले के मलेथा गांव में जल-जगंल-जमीन के खिलाफ पिछले आठ महीने से एक आन्दोलन चल रहा है।

ब्रह्माकुमारी संगठन के पैसे से माउंट आबू में मीडिया चिंतन

ब्रह्माकुमारी संगठन हर वर्ष मीडिया पर अपनी पकड़ बनाए रखने के लिए देश भर से पत्रकारों को माउंट आबू में आमंत्रित करता है। जमकर सेवा सत्कार होती है। इस तरह मीडिया को अपने अपने पाले में पालने पोषने के और भी कई तरह के जतन देश में जारी हैं। पत्रकारों को ऐश कराकर अपनी बातें कहलवाने, प्रसारित कराने का ये वहीं तरीका है, जो प्रधानमंत्रियों, मुख्यमंत्रियों, राजनेताओं, अफसरशाहों आदि के साथ सरकारी पैसे पर आयोजित यात्राओं पर होता है।

एक ऐसे वक्त में : आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर पाबंदी और ये मीडिया की दुकानें

आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगी पाबंदी पर अरुंधति रॉय का बयान : कार्यकर्ता-लेखिका अरुंधति रॉय ने यह बयान आईआईटी मद्रास द्वारा छात्र संगठन आंबेडकर-पेरियार स्टडी सर्किल पर लगाई गई पाबंदी (नामंजूरी) के संदर्भ में जारी किया है. एक दूसरी खबर के मुताबिक, एपीएससी को लिखे अपने पत्र में भी उन्होंने यही बात कही है कि ‘आपने एक दुखती हुई रग को छू दिया है – आप जो कह रहे हैं और देख रहे हैं यानी यह कि जातिवाद और कॉपोरेट पूंजीवाद हाथ में हाथ डाले चल रहे हैं, यह वो आखिरी बात है जो प्रशासन और सरकार सुनना चाहती है. क्योंकि वे जानते हैं कि आप सही हैं. उनके सुनने के लिहाज से आज की तारीख में यह सबसे खतरनाक बात है.’ 

सुप्रीम कोर्ट के फैसले दो, सवाल एक मीडिया बड़ा या न्याय पालिका !

भारतीय लोकतंत्र की अन्योन्याश्रित चार प्रमुख शक्तियां हैं- विधायिका, न्यायपालिका, कार्यपालिका और मीडिया। लेकिन कई एक ताजा प्रसंग अब ये संदेश देने लगे हैं कि अभी तक सिर्फ राजनेता, अफसर और अपराधी ही ऐसा करते रहे हैं, अब भारतीय मीडिया भी  डंके की चोट पर सुप्रीम कोर्ट के आदेशों का मजाक बनाने लगा है। मजीठिया वेज बोर्ड से निर्धारित वेतनमान न देने पर अड़े मीडिया मालिकों को जब सुप्रीम कोर्ट ने अनुपालन का फैसला दिय़ा तो उसे कत्तई अनसुना कर दिया गया। इस समय मीडिया कर्मी अपने हक के लिए दोबारा सुप्रीम कोर्ट की शरण में हैं। इस पूरे मामले ने ये साफ कर दिया है कि भारतीय मीडिया को न्यायपालिका के आदेशों की परवाह नहीं है। इस तरह वह हमारी लोकतांत्रिक व्यवस्था का खुला मखौल उड़ा रहा है। इतना ही नहीं, लोकतंत्र के चार स्तंभों में से एक होने के नाते उसकी यह धृष्टता भारतीय न्याय-व्यवस्था के प्रति आम आदमी की अनास्था को प्रोत्साहित भी करती है। मीडिया कर्मियों को मजीठिया वेतनमान देने की बजाए कई बड़े मीडिया घराने तो पुलिस की मदद से मीडिया कर्मियों का गुंडों की तरह उत्पीड़न करने लगे हैं। इसी दुस्साहस में वह सुप्रीम कोर्ट के हाल के एक और आदेश को ठेंगा दिखाते हुए सरकारी विज्ञापनों में नेताओं की फोटो छापने से भी बाज नहीं आ रहा है। भारतीय मीडिया (प्रिंट एवं इलेक्ट्रॉनिक दोनो) यह साबित करने की लगातार कुचेष्टा कर रहा है कि उसकी हैसियत देश के सर्वोच्च न्यायालय से ऊपर है।

मीडियाकर्मियों पर पद की अवमानना का आरोप, स्पीकर ने सदन में आने पर रोक लगाई

पश्चिम बंगाल विधानसभा में मीडियाकर्मियों को सत्र शुरू होने के कुछ देर बाद सदन की पत्रकार दीर्घा में प्रवेश नहीं करने के स्पीकर के आदेश के मामले ने तूल पकड़ लिया। विपक्ष ने एक सुर से स्पीकर विमान बनर्जी के फैसले पर सवाल उठाए। 

डकैतों का मीडिया इंटरव्यू : मलखान से निर्भय तक

आज बदनामशुदा अपराधियों के इंटरव्यू छापने से भी मीडिया को परहेज नहीं है क्योंकि भले ही उनके महिमा मंडित होने की वजह से समाज का भीषण अहित होता हो लेकिन उनका इंटरव्यू सेलेबिल होता है और व्यावसायिक पत्रकारिता के दौर में खबर को प्रमुखता देने का मानक यही है कि उसमें ग्राहक को आकर्षित करने की क्षमता कितनी है लेकिन जब पंजाब और जम्मू कश्मीर का आतंकवाद नहीं आया था जिसकी धमक अपने-अपने राज्यों तक सीमित नहीं रही बल्कि देश की राजधानी और शीर्ष सत्ता केंद्रों को भी इस आतंकवाद ने अपनी चपेट में लेने का दुस्साहस किया, तब तक क्राइम की इवेंट के रूप में राष्ट्रीय स्तर तक चंबल के डकैतों से जुड़ी समाचार कथाओं की न्यूज वैल्यू सबसे ज्यादा मानी जाती थी। 

सोशल मीडिया का राजा फेसबुक, 380 करोड़ लोग हुए इसके दीवाने

फेसबुक सोशल मीडिया का नया राजा बन गया है. वर्चुअल वर्ल्ड में फेसबुक की लोकप्रियता ने दिन दूनी और रात चौगुनी तरक्की की है. ऐसी कामयाबी सोशल मीडिया में दुनिया में किसी को अब तक हासिल नहीं हुई. फेसबुक स्मार्टफोन पर अपने सभी प्रतिद्वंद्वी ऐप्स में बढ़ते यूज़र्स के कारण अव्वल दर्जे का हीरो बन गया है. फेसबुक के यूज़र्स की संख्या 3.8 बिलियन यानी 380 करोड़ तक पहुंच गई है, जो कि दुनिया की जनसंख्या का 50 फीसदी है.

उद्योगपतियों के मीडिया-प्रभुत्व से पत्रकारिता की गरिमा तार-तार : अम्बिका चौधरी

उत्तर प्रदेश के काबिना मंत्री अम्बिका चौधरी ने हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर मीडिया को आईना दिखाते हुये कहा कि अपनी आंतरिक व वाह्य बुराइयों को खत्म करने के लिये मीडिया कर्मियों को संगठित होकर आगे आना होगा। विकलांग व पिछड़ा वर्ग कल्याण मंत्री चौधरी उत्तर प्रदेश श्रमजीवी पत्रकार यूनियन की बलिया इकाई से सम्बद्व प्रेस क्लब बिल्थरा रोड के बैनरतले हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर आयोजित ‘ वैश्विक परिवेश में पत्रकारिता और चुनौतियां‘ विषयक संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में बोल रहे थे। 

समारोह में अतिथियों को स्मृति चिन्ह भेंट करने की एक झलक

मीडिया सेंटर खाली करने वाले के लिए तो नहीं रुका जन संपर्क अधिकारी का तबादला!

बैतूल (म.प्र.) : प्रदेश सरकार के सुशासन की पोल तब खुल कर रह गई जब एक सहायक सूचना अधिकारी को सूचना अधिकारी के रूप में पदोन्नति मिलने के बाद उसे दतिया भेजने के बजाय उसका तबादला निरस्त करवा दिया गया। भोपाल में बैठे अधिकारी इसे कलक्टर, विधायक, जनप्रतिनिधि तथा पत्रकारों की अनुशंसा बता रहे हैं। 

टीवी मीडिया तो विकसित होने से पहले ही पसर गया, बस सेठजी की रखैल टाइप खबर आना रहा बाकी

व्यावहारिक पत्रकारिता में कई आयाम एक साथ काम करते हैं। उसमें संपादकीय टीम की दृष्टि, ध्येय, प्रस्तुतिकरण और प्रतिबद्धता के साथ भाषा का मुहावरा भी शामिल है। इनसे मिलकर ही एक मुकम्मल सूचना उत्पाद बनता है, जिसे आप प्रारंभिक तौर पर अखबार या मैगजीन के रूप में पहचानते हैं। हमारी पत्रकारिता की शुरुआत के समय हर अखबार और मैगजीन का कलेवर, विषयों का चयन, प्रस्तुतिकरण और भाषा का व्याकरण अलग-अलग था। यहां तक कि फॉन्ट और ले आउट भी, जैसे धर्मयुग और साप्ताहिक हिंदुस्तान या दिनमान और रविवार। आज भी इंडियन एक्सप्रेस और द हिंदू या इकोनॉमिक्स टाइम्स और बिजिनेस स्टेण्डर्ड देख कर इसे समझा जा सकता है ।

जनता और सरकार के बीच की कड़ी हैं पत्रकार, विश्वास न तोड़ें : आईपीएस तृप्ति भट्ट

ऋषिकेश : यहां 31 मई को नगरपालिका स्वर्ण जयंती सभागार में पत्रकारिता दिवस पर आयोजित कार्यक्रम में आइपीएस तृप्ति भट्ट ने कहा कि मीडिया जनमत को प्रभावित करने की क्षमता रखता है। इसलिए इस क्षेत्र में संवेदनशील होकर काम करने की जरूरत है।

सोशल मीडिया कहते हैं इसे, ‘शोषण मीडिया’ तो नहीं!

आधुनिक युग में सोशल मीडिया को एक अहम स्थान हासिल है। लेकिन निजी, राजनीतिक और धार्मिक लड़ाइयों की जंग भी विभिन्न सोशल मीडिया साइट्स पर शुरू हो गई है जिससे सोशल मीडिया को लोग अब शोषण मीडिया के रूप में भी देखने लगे हैं। 

हमे मीडिया हरा देता है, इससे आजाद हो ताजा हवा में सांस लेना चाहते हैं : अमिताभ बच्चन

मुंबई : बॉलीवुड के महानायक अमिताभ बच्‍चन का कहना है कि आप मीडिया से कभी नहीं जीत सकते. हाल ही में अमिताभ फिल्‍म ‘पीकू’ से दर्शकों से काफी वाहवाही लूट चुके हैं. फिल्‍म 100 करोड़ के कल्‍ब में शामिल हो गई है. फिल्‍म में दीपिका पादुकोण और इरफान खान भी थे.

क्या ग़ज़ब के लिखते हो, बात ही नहीं करते हो

प्राइम टाइम के लिए रोज़ाना कई लेखों से गुज़रना पड़ता है । इन लेखों से अब बोर होने लगा हूं। कई बार लगता है कि अख़बारों के संपादकीय पन्नों पर छपने वाले इन लेखों की संरचना( स्ट्रक्चर) का पाठ किया जाना चाहिए। ज़्यादातर लेखक एक या दो तर्क या सूचना के आधार पर ही तैयार किये जाते हैं।  पहले तीन चार पैराग्राफ को तो आप आराम से छोड़ भी सकते हैं। भूमिका में ही सारी ऊर्जा खत्म हो जाती है। लेखक माहौल सेट करने में ही माहौल बिगाड़ देता है । आप किसी भी लेख के आख़िर तक पहुंचिये, बहुत कम ही होते हैं जिनसे आप ज्यादा जानकर निकलते हैं। नई बात के नाम पर एक दो बातें ही होती हैं। हर लेख यह मानकर नहीं लिखा जा सकता कि पढ़ने वाला पाठक उससे जुड़ी ख़बर से परिचित नहीं है इसलिए भूमिका में बता रहे हैं।  ख़ुद मैं भी इस ढांचे का कैदी बन गया हूं, कई बार लगता है कि कैसे ख़ुद को आज़ाद करूं।

झीरम घाटी : अंदाजा नहीं था इतनी बड़ी घटना है, हम लगातार खबर अपडेट कर रहे थे

रायपुर (छत्तीसगढ़) : ऐसी खबरें आती रहती थीं! कोई नई बात तो नहीं थी नक्सली हमला. सितंबर के महीने से मई तक लगभग नौ माह गुजार ही लिए थे रायपुर में. एक हिंदी साइट के लिए पूरे छत्तीसगढ़ की जिम्मेदारी निभाते हुए एक अच्छा नेटवर्क भी बन ही गया था. नक्सली हमलों की खबर पर सबसे ज्यादा नजर रखनी होती थी.

मीडिया से बजरंगी भाईजान का गुस्सा अभी तक उतरा नहीं

लगता है, फिल्म किक के समय से ही बरकरार बजंरगी भाईजान का गुस्सा अभी मीडिया से उतरा नहीं हैं। उनका कहना है कि मीडिया की वजह से वो नहीं हैं, मीडिया उनकी वजह से है। मीडिया कमेंटेटर चुटकी लेते हुए कहने लगे हैं कि अच्छा बदला ले रहे हैं सलमान खान मीडिया से, किक के बाद तो किक-पर-किक मारे चले जा रहे हैं।

मीडिया में आरएसएस के एजेंट, दुष्प्रचार के लिए ‘सूत्रों’ के हवाले से झूठी खबरें : लालू

पटना : राजद प्रमुख लालू यादव ने अपने आवास पर संवाददाता सम्मेलन में मीडिया पर प्रहार करते हुए अखबार और पत्रकार का नाम लेकर कहा कि ये लोग राजद व जदयू के बीच दूरी बनाए रखना चाहते हैं। कुछ पत्रकार आरएसएस के एजेंट का काम कर रहे हैं। बिना पुष्ट किए सूत्रों के हवाले से तथ्यहीन खबरें प्रसारित-प्रचारित की जा रही हैं। विलय को लेकर हमारी जो बातचीत चल रही है, हम उसे मीडिया को बताना जरूरी नहीं समझते हैं। मीडिया को भी गलत अटकलें लगाने से बाज आना चाहिए।

मीडिया की मंडी में वह परिवर्तन का समय था

सन 1992 मेरे लिए बड़ी भागदौड़, बदलाव और चुनौतियों का साल था। हाईकोर्ट की अवमानना के मुकदमे के साथ ही ये मेरे विवाह का साल भी था। अक्टूबर में मेरी शादी हो गई और मेरी आवारगी, मस्तमौलापन सब तिरोहित हो गया। जिम्मेदारियां बढ़ गईं। घर के खूंटे से जो बंध चुके थे। पत्नी का आग्रह था कि अकेले नाटक नहीं देखूं, तो मेरा आग्रह था कि वे शाम को रवीन्द्र मंच पर पहुंच जाएं। मैं भी ऑफिस से सीधे रवीन्द्र मंच पहुंच जाऊंगा। फिर साथ में नाटक या कोई और कल्चरल प्रोग्राम देखते हुए घर लौट आएंगे, पर वो तैयार नहीं थीं। 

अमित शाह मीडिया के हेड मास्टर और तेज तर्रार पत्रकार भीगी बिल्ली

विदेशों में जमा काला धन देश वापस लाकर आम जनता में बंटवाने के चुनावी वायदे और भाषणों को जुमला बता चुके भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने अब राम मंदिर, धारा 370 सहित कई मुद्दों पर सफेद झूठ परोस दिया। अमित शाह मीडिया के हेड मास्टर की तरह पत्रकारों को झिड़क देते हैं। एंकर आए दिन अरविंद केजरीवाल के सामने तो बड़े दबंग और तेज-तर्रार बनते हैं लेकिन अमित शाह के सामने भिगी बिल्ली बन जाते हैं। 

साहब! मीडिया पैसे खा रहा, नेता देश को और जनता भूखे मर रही

वाराणसी : अभी कुछ दिन पहले केन्द्र सरकार के एक वर्ष पूरे हो गये और इस दौरान बीजेपी सरकार या कहें कि मोदी सरकार ने अपनी शेखी बघारने और अपने द्वारा एक वर्ष में पूरे किये गये कार्यों को जनता के सामने बताने के लिये खूब धन खर्च किया। यदि यही करोड़ों रूपये किसी जनपद पर खर्च कर दिये गये होते तो वह दुनिया का सबसे सुन्दर जनपद बन ​गया होता। मैं यह नहीं कहता कि सरकार को अपनी बातें लोगों के सामने नहीं बतानी चाहिए लेकिन क्या यह जरूरी है, अभी तक तो काम बोलता है कि बातें करने वाले नमो के कामों की बोलती बंद कैसे हो गयी।

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा- मीडिया ट्रायल था बोफोर्स कांड

अपने स्वीडन दौरे से पहले एक स्वीडिश अखबार को इंटरव्यू में राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने कहा है कि बोफोर्स कांड मीडिया ट्रायल था। उनकी इस टिप्पणी से एक नया विवाद पैदा हो गया है. 

भारतीय मीडिया की नेपाल में किरकिरी

काठमांडू ! भारतीय मीडिया का एक वर्ग गलत कारणों से नेपाल में सुर्खियां बटोर रहा है। भारतीय मीडिया, विशेष रूप से इलेक्ट्रॉनिक मीडिया पर सनसनी फैलाने के आरोप लगाए गए हैं, वह भी ऐसे समय में जब नेपाल भूकंप की मार से उबर रहा है। नेपाल की प्रोबायोटेक इंडस्ट्रीज के उप मुख्य कार्यकारी अधिकारी दिनेश गौतम ने आईएएनएस को बताया, “नेपाल में भारतीय पत्रकारों के प्रति लोगों में बहुत नाराजगी है, क्योंकि भारतीय पत्रकारों ने भूकंप त्रासदी की रपट तैयार करने में पक्षपातपूर्ण दृष्टिकोण अपनाया।” 

वेबसाइट के माध्यम से एकेडमिक मीडिया शिक्षण-प्रशिक्षण की नई पहल

आज हम सूचना युग में रह रहे हैं। इस युग की एक विशेषता यह है कि इसमें पत्रकारिता और जन-संचार का तेजी से विस्‍तार हुआ है। मीडिया ने आज एक बड़े उद्योग का रूप धारण कर लिया है। हमारे देश में समाचारपत्रों और टेलीविजन समाचार चैनलों का तेजी से विस्‍तार हो रहा है और इसी के अनुरूप मानव संसाधनों की मांग भी बढ़ती चली जा रही है। इन मानव संसाधनों की पूर्ति के लिए अनेक विश्‍वविद्यालयों और संस्‍थानों में पत्रकारिता और जन-संचार के अनेक पाठ्यक्रम चल रहे हैं। इन पाठ्यक्रमों की गुणवत्‍ता पर प्रश्‍नचिन्‍ह उठते रहे हैं और यह भी माना जाता है कि समाचार मीडिया की जरूरतों और इन पाठ्यक्रमों में दिये जाने वाले शिक्षण-प्रशिक्षण के बीच एक दूरी बनी हुई है।

लोक को खारिज कर रहा टीवी-तंत्र अर्थात् भारतीय मीडिया की दोगलई

मीडिया स्वयं को जनता का वक़ील नियुक्त करके शुरुआत करता है ! सारे सवाल जो वह तंत्र के सामने दरपेश करता है, वह “लोक” के लिये करने का बैनर माथे पर लगाकर करता है। तभी लोकतंत्र बनता है। देश का सबसे तेज़ चिल्लाने वाला टाइम्स नाउ का एंकर अरनब गोस्वामी कहता है “नेशन वान्ट्स टु नो” ! “नेशन”देश के 125 करोड़ लोग हैं। 

ताक पर पत्रकारिता, तकनीकी दौर में रास्ता रेशमी कालीन पर

30 मई हिन्दी पत्रकारिता दिवस पर विशेष : साल 1826, माह मई की 30 तारीख को ‘उदंत मार्तंड’ समाचार पत्र के प्रकाशन के साथ हिन्दी पत्रकारिता का श्रीगणेश हुआ था. पराधीन भारत को स्वराज्य दिलाने की गुरुत्तर जवाबदारी तब पत्रकारिता के कांधे पर थी. कहना न होगा कि हिन्दी पत्रकारिता ने न केवल अपनी जवाबदारी पूरी निष्ठा के साथ पूर्ण किया, अपितु भविष्य की हिन्दी पत्रकारिता के लिये एक नयी दुनिया रचने का कार्य किया. स्वाधीन भारत में लोकतंत्र की गरिमा को बनाये रखने तथा सर्तक करने की जवाबदारी हिन्दी पत्रकारिता के कांधे पर थी.