
संजय कुमार सिंह
कोलकाता के आरजी कर मेडिकल कॉलेज अस्पताल में एक महिला चिकित्सक से बलात्कार और उसकी हत्या से संबंधित खबर आज भी टाइम्स ऑफ इंडिया में लीड और हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड है। कोलकाता के द टेलीग्राफ में तो लीड है ही। मध्य प्रदेश के महू कैनटोनमेंट क्षेत्र में सेना के दो अधिकारी के साथ मारपीट और इनकी एक महिला मित्र के साथ कथित रूप से सामूहिक बलात्कार के मामले का फॉलोअप आज नवोदय टाइम्स में है। इंडियन एक्सप्रेस में कल मूल खबर छपी थी आज फॉलो अप भी है। यह मामला ना सिर्फ सेना के अधिकारियों और उनके साथ की महिला से संबंधित है बल्कि इलाके में अपराध और अपराधियों के आतंक की भी कहानी है। अभी तक की खबर के अनुसार सभी आरोपी पकड़े भी नहीं गये है। आज की खबर का शीर्षक है, “बलात्कार पीड़ित सदमे में, अभी तक कोई बयान नहीं, कहा : ‘आरोपी को गोली मारो या मुझे’।” फ्लैग शीर्षक है, महू के पास सेना के अधिकारियों, मित्रों पर हमले में तीन गिरफ्तार।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर महू में हमला, बलात्कार के आरोप में पुलिस ने तीन को गिरफ्तार किया सिंगल कॉलम में है और पुलिस की दी हुई खबर है। उसकी उपलब्धि और प्रशंसा है। नवोदय टाइम्स का शीर्षक है, सैन्य अधिकारी की महिला मित्र से गैंगरेप पर विपक्ष हमलावर। राहुल, प्रियंका व मायावती ने सरकार को घेरा। आप कह सकते हैं कि कांग्रेस या मायावती इसे राजनीतिक रंग दे रहे हैं। अगर मैं इसे मान भी लूं तो देख लीजिये कि मीडिया ने ममता बनर्जी के खिलाफ या भाजपा की राजनीति को एक महीने से ज्यादा समय तक कैसा समर्थन दिया है और कांग्रेस की राजनीति को आज पहले ही दिन कैसा समर्थन दिया है। हालांकि, यह भी अब की स्थिति है और पहले ऐसा कुछ होने की संभावना भी नहीं थी। कांग्रेस की राजनीति को 10 साल अखबारों में नहीं के बराबर जगह मिली है। विरोध की बात अलग है।
महू मामले की जांच कर रहे अधिकारियों के अनुसार पीड़िता अभी तक बयान देने की स्थिति में नहीं है। हम उसके ठीक होने तक इंतजार करेंगे। इस मामले में तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है जिनके नाम हैं – अनिल, पवन और रितेश। इनमें रितेश को हत्या के एक मामले में 2019 में बरी किया गया था। आप समझ सकते हैं कि सेना के अधिकारियों और उनके साथ की महिला से मारपीट और जबरदस्ती के इस मामले में हिन्दी समाज क्यों शांत हैं। अपराधियों के नाम धर्म विशेष के होते तो अभी स्थिति कुछ और होती। पर मेरे लिये वह मुद्दा नहीं है। मुद्दा यह है कि बाकी तीन अभियुक्त गिरफ्तार नहीं हुए हैं। कुल हमलावर सात से आठ थे अभी तीन ही गिरफ्तार हुए हैं। वारदात आधी रात के बाद ढाई बजे हुई। हमलावरों में एक के पास पिस्तौल थी और वे इतने बेखौफ से थे कि चेहरे खुले हुए थे। गिरफ्तार लोगों का पुलिस रिकार्ड बताता है कि वे पहले भी कई मामलों में शामिल रहे हैं।
इसके मुकाबले कोलकाता की वारदात एक अस्पताल में एक पुलिस वाले ने की थी। वारदात सेमिनार हॉल में हुई थी और प्रवेश द्वार के सीसीटीवी फुटेज से अभियुक्त की पहचान हुई, उसे 12 घंटे में गिरफ्तार कर लिया गया (पुलिस वाला होने के कारण या बावजूद) ब्लूटुथ हेडफोन, नाखून के निशान आदि जैसे सबूत इकट्ठे हो गये इसके बावजूद जनता की मांग पर जांच सीबीआई को दे दी गई और सीबीआई ने अभी तक जांच में कुछ नया नहीं निकाला है। मेडिकल कॉलेज अस्पताल के प्राचार्य को भ्रष्टाचार के आरोप में जरूर गिरफ्तार किया गया है पर उसका संबंध बलात्कार और हत्या से नहीं है। इस मामले में सामूहिक बलात्कार के आरोप, सरकार की ओर से पीड़ित के परिवार को पैसे देने की पेशकश और सबूत मिटाने जैसे दूसरे कई आरोप लगाये गये थे। एक आरोप हैवानियत का भी था पर मुझे लगता है कि बलात्कार और हत्या अपने आप में हैवानियत है और कोई प्रेम से यह सब कर ही नहीं सकता है। फिर भी यह सब मुद्दा था जो एक महीने बाद भी साबित नहीं हुआ है और लगता है कि पुलिस, कोलकाता प्रशासन, अस्पताल आदि की कोई ढिलाई वारदात से पहले या बाद में नहीं थी। फिर भी आंदोलन अभी तक चल रहा है। वह सीबीआई के खिलाफ नहीं है, मुख्यमंत्री के खिलाफ हो गया है।
दूसरी ओर, मध्य प्रदेश के मामले में पुलिस प्रशासन की लापरवाही तो छोड़िये, तीनों पुराने अपराधी हैं फिर भी पुलिस की नजर में नहीं थे। रात ढाई बजे पिस्टल के साथ सात-आठ लोग सड़क पर थे और कैंट क्षेत्र में उनपर किसी की नजर नहीं थी, वारदात कर फरार हो सके यह सब अपने आप में ढीले-ढाले रुख का बयान है। मूल खबर इंडियन एक्सप्रेस में कल छपी थी मैंने यहां लिखा भी था पर आज फॉलोअप वैसा नहीं है, जैसा कोलकाता मामले का हुआ था। अखबारों में समाज के स्तर पर भी। कोलकाता का मामला शुरू से राजनीतिक रंग में था और अभी भी है। आज की खबर के अनुसार सुप्रीम कोर्ट की अपील पर भी हड़ताल वापस नहीं लेने वाले आंदोलनकारी जूनियर डॉक्टर की शर्त थी कि मुख्यमंत्री के साथ उनकी बातचीत का सीधा प्रसारण हो और चूंकि सरकार इसके लिए तैयार नहीं थी इसलिए डॉक्टर बातचीत के लिए नहीं आये। मुख्यमंत्री इंतजार करती रहीं। आज इसकी तस्वीर भी प्रमुखता से छपी है। मुझे लगता है कि मामला पीड़िता को न्याय दिलाने का ना पहले था ना अब है। अगर मुख्यमंत्री निशाने पर न भी हों तो डॉक्टर इस बहाने अपनी सुरक्षा सुनिश्चित करना चाहते हैं।
अगर मामला बलात्कार और हत्या का होता तो महू की खबर कम महत्वपूर्ण कैसे है? अगर हो भी तो आज ही टाइम्स ऑफ इंडिया में आगरा के मेडिकल कॉलेज में 11 साल की मरीज के साथ बलात्कार की खबर है। इस मामले में डॉक्टर को गिरफ्तार किया गया है। इसपर कोलकाता के डॉक्टर और वहां की खबर को तूल दे रहे संपादक क्या कहेंगे? अमर उजाला में (पहले पन्ने पर) महू की खबर नहीं है लेकिन पश्चिम बंगाल के राज्यपाल डॉ. सीवी बोस की खबर है। उन्होंने कहा है, सीएम का करेंगे सामाजिक बहिष्कार। मुख्य शीर्षक है, सीएम ममता के साथ मंच साझा नहीं करेंगे राज्यपाल। इसके साथ दो लाइन का शीर्षक और सात लाइन की खबर का शीर्षक है, “नहीं आये डॉक्टर, नाराज ममला बोलीं – इस्तीफा देने को तैयार”। नवोदय टाइम्स में ममता और कोलकाता की खबर तीन कॉलम में फोटो के साथ है। शीर्षक लगभग वही है जो अमर उजाला में सिंगल कॉलम में है। राज्यपाल की खबर यहां भी है। कहने की जरूरत नहीं है कि भाजपाई राज्यों के राज्यपाल ऐसा कुछ नहीं बोलते हैं जो खबर बने।
इंडियन एक्सप्रेस में भी कोलकाता और ममता बनर्जी की खबर लीड है। इसके साथ राज्यपाल का बयान भी है। महू की खबर राज्यपाल के बयान के बराबर तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक के साथ है। राज्यपाल की खबर में फ्लैग शीर्षक नहीं है जबकि सेना के अधिकारियों की खबर में फ्लैग शीर्षक पुलिस की कामयाबी है। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी की खबर आज जैसी छपी है उससे डॉक्टर्स का आंदोलन कमजोर हुआ है और ममता बनर्जी यह संदेश देने में कामयाब रही हैं कि डॉक्टर्स के आंदोलन में राजनीति है। आगे कैसे क्या होता है, देखा जाये पर जनता चाहती है तो इस्तीफा देने के लिए तैयार हूं कहकर उन्होंने गेंद को फिर जनता के पाले में डाल दिया है। कहने की जरूरत नहीं है डॉक्टर्स का इंतजार और फोटो ऑप देने की बजाय वे उनके आने पर वहां पहुंचने की व्यवस्था कर सकती थीं और खबर तो होगी ही कि डॉक्टर नहीं आयेंगे। मुझे लगता है कि ममता बनर्जी ने अखबारों के जरिये अपनी राजनीति कर ली है। अखबार और हिन्दी भाषी समाज की पोल खुली सो अलग।
हरियाणा विधानसभा भंग
ऐसे में आज नवोदय टाइम्स की लीड है, हरियाणा विधानसभा भंग। उपशीर्षक है, राज्यपाल बंडारू दत्तात्रेय ने जारी की अधिसूचना। इसके साथ सिंगल कॉलम की एक खबर है, संवैधानिक संकट का यह पहला मामला है। अमर उजाला में यह सिंगल कॉलम की खबर है। शीर्षक है, हरियाणा विधानसभा 52 दिन पहले भंग। खबर में बताया गया है कि विधानसभा का सत्र नहीं बुलाये जाने के कारण विधानसभा भंग की गई है और यह भी बताया गया है कि राज्य में ऐसा तीन बार पहले भी हो चुका है। इस बार विधानसभा का सत्र क्यों नहीं बुलाया गया (या जा सका) इस बारे में पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। आप जानते हैं कि हरियाणा में भाजपा की सरकार है और हाल में नायब सैनी को मुख्यमंत्री बनाया गया था। नवोदय टाइम्स ने इसे ऐसे बताया है – सरकार के पास नहीं था विकल्प। 90 सदस्यों की विधानसभा में 81 विधायक हैं। बहुमत का आंकड़ा 41 है। भाजपा के पास इतनी सीटें हैं पर इस बार 14 विधायकों को टिकट नहीं दिया गया है। ऐसे में विधानसभा में ये लोग क्रॉस वोटिंग कर सकते थे और सरकार के लिए शर्मनाक स्थिति हो सकती थी। बाकी अखबारों में मुझे यह खबर इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी। नवोदय टाइम्स ने लिखा है कि विधानसभा सत्र नहीं बुलाये जा सकने के कारण विधानसभा भंग करने का यह पहला मामला है और कोविड काल में भी एक दिन के लिए सत्र बुलाये गये थे। इससे पहले जब विधानसभा भंग हुई है तो उसका मकसद था और वह समय से पहले चुनाव चुनाव करवाना था। आप इससे समझ सकते हैं कि यह खबर पहले पन्ने पर क्यों नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में एक खबर है जो बताती है कि कांग्रेस के टिकट बांटने में देरी और अंदरूनी खींचतान के कारण हरियाणा के चुनाव मैदान में बागियों ने नामांकन भर दिया है। विधानसभा भंग करने और कांग्रेस या दूसरे दलों के नामांकन से संबंधित कोई खबर मुझे दूसरे अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं दिखी।
उपराष्ट्रपति का राहुल गांधी पर हमला
अमर उजाला की लीड का शीर्षक यह भी है। उन्हें दुख है कि अहम पद पर बैठे लोगों को राष्ट्रहित का ज्ञान नहीं है। लीड का मुख्य शीर्षक है, सांविधानिक पद पर बैठे व्यक्ति का देश के दुश्मनों से मिलना असहनीय। अमर उजाला ब्यूरो की इस खबर के अनुसार उपराष्ट्रपति ने राहुल गांधी का नाम लिये बगैर यह सब कहा है। दिलचस्प है कि उपराष्ट्रपति राज्यसभा प्रशिक्षु कार्यक्रम में बोल रहे थे और अखबार ने लिखा है कि अमेरिकी सांसद इल्हान उमर कट्टर भारत विरोधी हैं। पर मुद्दा यह है कि भाजपा देश में अपने विरोधियों को दुश्मन मानती है और दुश्मन जैसा व्यवहार करती है तो क्या यह माना जाना चाहिये कि उसे दुश्मन और विरोधी का अंतर पता है। मुख्य न्यायाधीश के घर प्रधानमंत्री के जाने और पूजा करने की खबर और तस्वीर पर विपक्ष के हंगामे की खबर आज कई अखबारों में है। कुछेक में कल ही थी। अमर उजाला में यह खबर ना कल थी ना आज है। यहां कल भी राहुल गांधी के खिलाफ खबर थी, आज भी है। प्रधानमंत्री की प्रशंसा वाली खबर को प्रमुखता कल भी दी गई थी आज भी दी गई है। जो भी हो, विपक्ष के नेता की आलोचना का काम उपराष्ट्रपति का नहीं है पर वे भाजपा के लिए जिस तरह चीयर लीडर जैसा काम करते हैं उसमें ऐसा कहना अनोखा नहीं है और यह किसी दूसरे अखबार में पहले पन्ने पर नहीं है।



