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सियासत

शुक्रिया मोदी जी, लड़कों को घरों से निकाल लठियाने लतियाने के लिए!

Samar Anarya : मुखर्जीनगर दिल्ली में अपना इलाहाबाद था, अपने अंडरग्राउंड हो जाने का अड्डा था. जेएनयू से मन भरा तो 1997 से दोस्त रहे ‘विनम्र दक्षिणपंथी’ Prashant, Ritesh, गुड्डू, और छोटे भाई शशि के आशियाने पर.. दिनों दिन और शामें बत्रा की. और Aradhana के घर न भाग गए तो Kamlesh नवाब, मनोज, प्रांजल भाई के साथ रात रात भर 29 (गजब खेल है, दीवाने ही समझ सकते हैं) खेलना. सबसे कमाल मगर बत्रा की शामें ही होतीं थीं.

Samar Anarya : मुखर्जीनगर दिल्ली में अपना इलाहाबाद था, अपने अंडरग्राउंड हो जाने का अड्डा था. जेएनयू से मन भरा तो 1997 से दोस्त रहे ‘विनम्र दक्षिणपंथी’ Prashant, Ritesh, गुड्डू, और छोटे भाई शशि के आशियाने पर.. दिनों दिन और शामें बत्रा की. और Aradhana के घर न भाग गए तो Kamlesh नवाब, मनोज, प्रांजल भाई के साथ रात रात भर 29 (गजब खेल है, दीवाने ही समझ सकते हैं) खेलना. सबसे कमाल मगर बत्रा की शामें ही होतीं थीं.

गरमागरम बहसों से लेकर खांटी इलाहाबादी कमीनेपन तक से भरी हुई. और मिल जाते थे अक्सर अजनबी चेहरे- अरे समर भैया? आप यहाँ? खैर, बहसों में वामपंथी अक्सर अकेला मैं ही होता था, मध्यमार्गी प्रांजल और ज्यादातर लोग भारी संघी/मोदिये. जेएनयू जैसे ‘अंग्रेजीदां’ और ‘आभिजात्य’ संस्थानों से निकले हम जैसे क्रांतिकारियों (बात गलत थी, मैं इलाहाबाद से ही वामपंथी हो गया था, 1996 में ही) के बरक्स मोदी में अपना और अपने कस्बाई सपनों का उद्धार देखते थे. उन्हें लगता था कि मोदी आ गया तो हिंदी आ जाएगी, कलेक्टरी के उनके सपने सिर्फ अंग्रेजी की वजह से हद से हद डिप्टी और हद पार मास्टर बनने तक आके दम न तोड़ देंगे. तब उन्हें स्वदेशी का हश्र याद दिलाने पर झिड़की भरी नजरें ही मिलती थीं.

अब शुक्रिया करूं मोदी सरकार का (पहली बार) जो कल उन्हें लाठियों से समझाया, वही बात जो हम मुहब्बत से न समझा पाए. शुक्रिया करूँ उन्हें घरों से निकाल निकाल लतियाने के लिए? और हाँ, पीएमओ जी ने यूपीएससी जी को पत्र लिख के परीक्षा टाल देने को कहा था. छात्रों से वही वादा था. अब जियो मेरे यारों! तानाशाह केवल प्रतिरोध करने वालों पर ही जुल्म नहीं करते, वे डर या किसी और भाव से चुप बैठी रही आम अवाम पर ही नहीं, समर्थकों पर भी कहर तोड़ते हैं.

अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकारवादी अविनाश पांडेय समर के फेसबुक वॉल से.

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