मोदीजी अब फैसले नहीं लेते, ना कड़े ना ढीले, बोलते बिलकुल भी नहीं… (संदर्भ मुखर्जीनगर भाषा आंदोलन)

Shahnawaz Malik : मोदीजी अब फैसले नहीं लेते। ना कड़े ना ढीले। बोलते बिलकुल भी नहीं। अब वह सिर्फ मुद्दों पर नज़र रखते हैं। मंत्री तैनात कर देते हैं। कमिटी बना देते हैं। रिपोर्ट तैयार की जाती है। उस पर विचार किया जाता है। फैसला लेने की कोई तय समयसीमा अब नहीं रही। जंतर-मंतर पर हिन्दू सेना मोदी के ख़िलाफ़ नारेबाज़ी कर रही है। मोदी मनमोहन हो गए हैं। (पत्रकार शाहनवाज मलिक के फेसबुक वॉल से.)

Sanjay Tiwari : मुखर्जी नगर का यह दृश्य देखकर मुझे रामलीला मैदान की याद आ गयी. उस रात भी बिल्कुल ऐसा ही नजारा था. रात के अंधेरे में पुलिस जब यह बख्तरबंद रूप धरती है तो क्या करती है यह रामदेव से ज्यादा बेहतर कौन बता सकता है? लेकिन तब शायद रामलीला मैदान में लोकतंत्र की हत्या हुई थी. अब मुखर्जी नगर में लोकतंत्र मजबूत हुआ है. नजारा वही है, बस नजरिया बदल गया है. किस्से का यह हिस्सा भी कम रोचक नहीं है कि सरकारी हिन्दी वाला विभाग और दिल्ली पुलिस दोनों एक ही महकमें के तहत आते हैं जिसका नाम है गृह मंत्रालय। वही गृहमंत्रालय जिसके मंत्री आजकल राजनाथ सिंह हैं। वही राजनाथ सिंह जो हिन्दी में ट्वीट करने के लिए सरकारी फरमान तो जारी करवाते हैं लेकिन सिविल सेवा में हिन्दी की बात आती है तो डंडे चलवाकर सिर तुड़वा देते हैं। वहीं, हिन्दी के लिए जान की बाजी लगाकर आंदोलन करनेवाले दिल्ली के आंदोलनकारियों को टाइम्स आफ इंडिया ने ‘दंगाई’ करार दे दिया है। हिन्दी का आंदोलन अंग्रेजी में “दंगा” हो जाता है। अब भी आपको हिन्दी और अंग्रेजी की मानसिकता का फर्क बताने की जरूरत है? (वेब जर्नलिस्ट संजय तिवारी के फेसबुक वॉल से)

Vineet Kumar : मैं कम से कम दस बार मुकर्जीनगर की उस टेंट के पास गया, कभी वहीँ नीचे बिछी दरी पर बैठा, कभी खड़ा रहा, कभी कुछ दोस्त मिल गये तो चर्चा की जहाँ csat को लेकर विरोध-प्रदर्शन की शुरुआत हुई और मैं ये बात बेहद फक्र से कहता हूँ कि मंच से भाषा, शासन व्यवस्था और समाज को लेकर जो भी बातें हो रही थी, वो किसी भी ac सेमिनार हॉल में होनेवाली परिचर्चा से बेहतरीन रही. आपको एक ही साथ इतने वैचारिक रूप से एक-दुसरे से अलग लोगों को सुनने को कहाँ मिलेगा..csat के खिलाफ ये सिर्फ प्रदर्शन नहीं, सिलेबस और सेमिनार में कैद हो चुके विमर्श को सड़क पर ले आना था जिसे लम्बे समय तक याद किया जायेगा. लेकिन चूंकि ये सब सड़क पर हो रहा था तो दिल्ली पुलिस के लिये हिंसा हो गयी, यही काम लोदी रोड के किसी सेमिनार रूम में होता तो यही पुलिस वक्ता के आगे सलाम ठोकती.. (मीडिया विश्लेषक विनीत कुमार के फेसबुक वॉल से.)

Neelima Chauhan : औपनिवेशिक मानसिकता का शिकार अंग्रेजी मीडिया मातृभाषाओं के संरक्षण के लिए चल रहे आंदोलन को दंगा करार दे और आंदोलनकारियों को दंगाई की उपाधि दे – इससे अधिक दुखद और क्या हो सकता है कि जिस मुद्दे के लिए एक माह से एक आंदोलन चल रहा हो उसके प्रति एक साधारण सी संवेदनशीलता भी अंग्रेजी तबके व अंग्रेजी मीडिया में नहीं उपज पाई! अत्यंत शर्मनाक है यह!  सरकार बहादुर जानते हैं कि यह आंदोलन भाषा के माध्यम से दरअसल मध्य्वर्ग के भीतर वर्चस्वी वर्ग के खिलाफ प्रतिरोध की भावना से उद्वेलित है वह यह भी जानते है कि ये तो केवल इस भावना की अंगड़ाई मात्र है ….अपनी सत्ता को अपने ही हाथ से वर्चस्वशाली अभिजात वर्ग जाने कैसे दे… आए दिन व्यवस्थाएं ऎसी वैसी हाय- हाय के आगे झुकने लगें तो चल गया साम्राज्य …इससे गरीबों ,पिछड़ों , दलितों ,आदिवासियों , वंचितों के हौसले बढ़ नहीं जाऎंगे..और कितनी ही आवाजें ये निचली केटेगिरी के लोग सिर् उठाने लगेंगे …इसलिए शोलों को वो पानी डालेंगी न कि हवा देगी…यानि जंग तो लंबी भी है और कठिन भी ! यह भी तय है कि बारी तो हम सबकी आएगी एक एक करके किसी न किसी बात पर विरोध करने की ..क्योंकि माने न मानें हम सब व्यवस्थाओं की साजिशों के शिकार हैं..!! (प्रोफेसर नीलिमा चौहान के फेसबुक वाल से)

Shailendra Mishra : कुछ तो शर्म करो हिंद के शहंशाहों ! ………छात्रों ने ऐसा क्या मांग दिया तुमसे कि दिल्ली में तुम्हारी पुलिस इतनी बर्बर हो गई……..क्या मातृभाषा मे पढ़ाई करके इन छात्रों ने कोई गुनाह किया है …….. जनता तुम्हारी ग़ुलाम नही कि उसको संगीनों से रौंद दो ………कहाँ गया तुम्हारा वादा ? क्या बोला था सेवक बनकर सेवा करोगे ! ……..तो फिर अपने मालिक जनता जनार्दन के उपर ये हिटलरशाही क्यों ? ………मत भूलो, ये वही नौजवान हैं जो दो महीने पहले तक घर घर जाकर तुम्हारे लिए वोटों की भीख माँगते थे ………और तुमने क्या दिया उनको ….लाठियाँ और लात जूते …… (आम आदमी से जुड़े शैलेंद्र मिश्रा के फेसबुक वॉल से)

Shashi Bhushan Singh : यूपीएससी भेदभाव कथा : CSAT मुद्दे की वास्तविकता को समझने के लिए इस देश के प्रशासकों के चरित्र, नेताओं की अल्पबुद्धि, अभिजन पक्षधरता, समाजिक जरूरतें सबकी समझ बनानी जरूरी है। परन्तु चालाकी से ब्यूरोक्रेसी ने मुद्दे की जलेबी बना दी है और सारी बहस अत्यन्त सरलीकृत हो गयी है। समझना होगा कि मुद्दा न ‘भाषा’ का है न ‘एप्टीच्यूड’ का। मुद्दा सीधे सीधे भारतीय ब्यूरोक्रेसी के निजी स्वार्थ का है। सिविल सेवाओं में स्थापित भारतीय अभिजन अंग्रेजी ज्ञान के बहाने पर ८० प्रतिशत भारतीयों को ७० के दशक तक रोकने में सफल रहा। जनता सरकार के दबाव में ७९ के बाद बेमन से भारतीय भाषाओं को भी माध्यम के रूप में स्वीकृति मिली। परन्तु मुख्य परीक्षा में और साक्षात्कार बोर्ड (ब्यूरोक्रेट्स का वर्चस्व) द्वारा गैर अंग्रेजी माध्यम वालों के विरुद्ध भेदभाव जारी रहा। फिर धीरे धीरे भारतीय भाषा को माध्यम बनाने वाले परीक्षा प्रणाली से तादात्म्य स्थापित करने का तरीका सीखने में सफल होने लगे और ९३ से पिछड़े भी थोड़ी थोड़ी मात्रा में ही सही इस कथित इस्पाती ढांचे वाली अभिजन के एकाधिकार वाली सेवा में सेंध लगाने में सफल होने लगे। पिछड़ों के बढ़ते अनुपात से घबरायी ब्यूरोक्रेसी ने बाजपेयी सरकार के समय सीटों में कटौती कराकर, अभिजन वर्चस्व को बचाने का हताशापूर्ण प्रयास किया जिसका नुकसान उस दौर में तैयारी करनेवाले मुझ जैसे सामान्य वर्ग के अभ्यर्थियों को भी हुआ, क्योंकि पूरे एनडीए काल में कभी भी ५०० वैकेंसी नहीं निकाली गयी। तो असली उदेश्य ब्यूरोक्रेसी का ये है कि कैसे सिविल सेवा उनके बच्चों के लिये एक्सक्लूसिव बनी रहे। उनके बच्चे जिस परीक्षा प्रणाली के उपयुक्त होंगे, वही उनकी पसंद होगी। यही कारण है कि २०११ से अभिजन पक्षधरता वाला पैटर्न लागू किया गया। २०१० में अंतिम परिणाम में २५% हिन्दी माध्यम के थे और २०१३ में २.३%। यह कोई राकेट साइंस नहीं है, स्वार्थ का मामला है। (शशि भूषण सिंह के फेसबुक वॉल से)



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