अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बार फिर बड़ा बयान दिया है। बयान भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को लेकर। ट्रंप ने कहा है कि वह मोदी का पॉलिटिकल करियर तबाह नहीं करना चाहते हैं। अब बड़ा सवाल यही है कि आखिर ट्रंप के पास मोदीजी का ऐसा कौन सा पुर्जा दबा है जो वह बार बार ऐसी हिमाकत कर रहा है। और उससे भी बड़ा सवाल की मोदीजी की चुप्पी से उठता है। जबकि उन्हें लाठी लेकर ट्रंप को दे दनादन… नीचे पढ़िए
नीरजा-
ट्रंप कहते हैं ”मैं मोदी का राजनीतिक करियर बर्बाद नहीं करना चाहता” और भारत के प्रधानमंत्री पूरी तरह ख़ामोश।
फिर उसी ख़ामोशी के बाद होती है किसानों के ख़िलाफ़ ट्रेड डील, रूस से तेल पर विदेशी निगरानी और मंत्री एक-दूसरे पर जिम्मेदारी टालते नज़र आते हैं। ऐसा कौन-सा दबाव है जिसके आगे विश्वगुरु बोल ही नहीं पाता?
खैर Epstein Files के बाद भी जो इसे संयोग माने वो समझना नहीं चाहता…या समझने से डरता है।
आवेश तिवारी-
डोनाल्ड ट्रंप ने इस बार चार कदम आगे बढ़कर बोला है कि मैं नरेंद्र मोदी का राजनैतिक भविष्य चौपट नहीं करना चाहता। अरे भाई तुम हो कौन? क्या तुम यह कहना चाहते हो कि ट्रेड डील के बदले नरेंद्र मोदी ने अपना कैरियर चौपट होने से बचा लिया? तो किस बात की दोस्ती निभा रहे हो भाई?
डोनाल्ड ट्रंप न तो चुनाव आयोग है न देश का विपक्ष, न सुप्रीम कोर्ट तो फिर वो मोदी का राजनैतिक भविष्य चौपट कैसे कर सकता है? कौन सी ऐसी फाइल, ऐसा जुगाड़ है ट्रंप के पास?
देखना है कितने चैनल ट्रंप की इस बात को प्रसारित करते हैं। भक्तों ने नया-नया पापा पाया है वह तो सारे मंसूबों पर ही पानी फेरने लगा। क्या यह मान लिया जाना चाहिए कि ट्रेड डील की खुशी दरअसल सरकार बचाने की खुशी थी?
प्रमोद पाहवा-
ट्रंप ने फिर कहा : “मोदी का राजनीतिक करियर नष्ट नहीं करना चाहता” डोनाल्ड ट्रंप फिर याद दिला रहे हैं कि वे कितने दयालु हैं। बोले “मैं मोदी का राजनीतिक करियर नष्ट नहीं करना चाहता।” वाह!
मतलब करियर अब भारत की जनता, चुनाव आयोग या संसद नहीं तय करेगी—वॉशिंगटन के एक नेता की मर्जी से तय होगा कि दिल्ली में मोदीजी टिकेंगे या उजड़ेंगे!
अब असली सवाल यह नहीं है कि ट्रंप बार बार ऐसा क्यों कहते हैं। असली सवाल है—मोदी यह सब चुपचाप क्यों सहते हैं?
- कभी कहा जाता है—“मोदी मेरे दोस्त हैं”
- कभी—“उन्होंने मुझसे वादा किया है”
- कभी—“मैं उनका करियर बर्बाद नहीं करना चाहता”
और जवाब में? पूर्ण मौन। ना स्पष्टीकरण, ना आपत्ति, ना यह याद दिलाने की ज़रूरत कि “भारत के प्रधानमंत्री किसी अमेरिकी नेता की दया से नहीं चुने जाते।”
शायद इसलिए कि— दोस्ती की प्रचंड मार्केटिंग कर चुके हैं इसलिए निभानी है! कैमरे के सामने मुस्कुराना है और देश में लगातार कहना और कहलवाना है: “भारत की प्रतिष्ठा विश्व में बढ़ी है”!
व्यंग्य यह है कि जो नेता देश में 56 इंच की छाती के प्रतीक हैं, वही अंतरराष्ट्रीय मंच पर ट्रंप की हर off-colour टिप्पणी के सामने “नो कमेंट” की मुद्रा में ही दिखाई देते हैं।
शायद यही नई कूटनीति है—अपमान को दोस्ती कहना और चुप्पी को रणनीति।


