वैभव अग्रवाल-
भारत में उद्योग या व्यापार करना, और कर विभागों से जुड़ी परेशानियाँ; यह लंबे समय से व्यापारियों की चिंता का विषय रही हैं। यह भी सच है कि ताली एक हाथ से नहीं बजती। कुछ व्यापारियों और उद्योगपतियों ने कर-चोरी के रिकॉर्ड तोड़े है, इसमें कोई दो राय नहीं। … लेकिन उतना ही कड़वा सच यह भी है कि आज कई कर विभागों के भीतर वसूली और मानसिक उत्पीड़न की एक तरह की संगठित व्यवस्था बनती दिख रही है। यही बात सबसे ज़्यादा चिंता पैदा करती है।
हाल ही में बेंगलुरु में आयकर विभाग की रेड के दौरान एक बड़े व्यापारी, सीजे रॉय, द्वारा आत्महत्या की घटना सामने आई। .. परिवार ने मानसिक उत्पीड़न के गंभीर आरोप लगाए हैं, जबकि विभाग का कहना है कि उन्हें राजनीतिक फंडिंग से जुड़े सबूत मिले हैं। सच क्या है, यह जांच का विषय है, लेकिन ऐसी घटनाएँ पूरे सिस्टम पर सवाल जरूर खड़े करती हैं।
उत्तर प्रदेश में इन दिनों जीएसटी रेड का भी एक नया दौर चल रहा है। कई मामलों में जीएसटी अधिकारी व्यापारियों के घरों तक पहुँच रहे हैं, जबकि पहले यह काम आमतौर पर आयकर विभाग तक सीमित रहता था। .. घरों में महिलाओं के आभूषणों की जांच, नकदी मिलने पर लंबी पूछताछ, और फिर समझौते के नाम पर बड़ी रकम की मांग; यह सब अब आम बात होती जा रही है।
आज जिन रिश्वत की राशियों की चर्चा सुनाई देती है, उतनी रकम कई व्यापारियों ने अपने पूरे कारोबारी जीवन में कभी नहीं दी होगी। विडंबना यह है कि ज़्यादातर निशाने पर वही व्यापारी होते हैं जो अपेक्षाकृत सही तरीके से काम करने की कोशिश कर रहे होते हैं। .. जो पूरी तरह “नंबर-दो” में काम करते हैं, वे अक्सर पहले से ही सांठ-गांठ के सहारे सुरक्षित रहते हैं।
मेरे मित्रों में बड़े व्यापारी, उद्योगपति, IAS-IPS अधिकारी, आयकर, GST और कस्टम विभाग से जुड़े लोग, सब शामिल हैं। मेरा साफ़ मानना है कि कर संग्रह विभाग, चाहे वह आयकर हो या जीएसटी, और व्यापारी वर्ग दोनों के बीच सम्मानजनक और संतुलित व्यवहार होना चाहिए। जहाँ व्यापारियों से यह अपेक्षा है कि वे कानून के दायरे में काम करें, वहीं अधिकारियों से भी यह अपेक्षा होनी चाहिए कि वे टैक्स देने वालों को अपराधी की तरह नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण में योगदान देने वाले भागीदार की तरह देखें।
मैं इस विषय पर लिखना नहीं चाहता था, लेकिन आसपास की घटनाओं को देखकर मेरा चुप रहना मुश्किल हो गया है। भाजपा एक राजनैतिक सुसाइड की ओर बढ़ रही है। कभी-कभी ऐसा लगता है कि आज देश और प्रदेश में अधिकांश व्यापारी और उद्योगपति संदेह की नज़र से देखे जा रहे हैं, जबकि कुछ चुनिंदा लोगों को खुला संरक्षण मिलता दिखता है। क्षेत्रीय नेता, विधायक और सांसद भी कई बार इस व्यवस्था के सामने असहाय नज़र आते हैं।
मैं इस बात को किसी जातीय एंगल में नहीं ले जाना चाहता, लेकिन यह भी सच्चाई है कि यूजीसी जैसे कानूनों के कारण शिक्षा पाना कठिन हो जाएगा, आरक्षण की व्यवस्था में नौकरी के अवसर सीमित हैं, और अगर स्व-रोज़गार का रास्ता चुनो, तो कर विभाग चैन से जीने नहीं देते।
मेरे एक मित्र ने फेसबुक पर लिखा था कि खराब नीतियों के कारण भारत के कई संपन्न व्यापारी दुबई जैसे देशों की ओर जा रहे हैं। इस पर देश के एक वरिष्ठ केंद्रीय कैबिनेट मंत्री ने हमें केजरीवाल समर्थक बताकर अपने ऑफिस में खूब लताड़ा। बताओ हमारी फेसबुक या तो मंत्री जी पढ़ रहे थे या किसी दिलजले ने स्क्रीनशॉट पहुंचा दिये।
उस घटना के बाद से मैंने फेसबुक पर लिखना लगभग छोड़ ही दिया। अब तो बस; सुबह सुप्रभात लिख देता हूँ, दिन में किसी यात्रा की फोटो डाल देता हूँ, और शाम को कोई दिल-फटी शायरी साझा कर देता हूँ। .. उसी में संतोष कर लिया है। वैसे भी फेसबुक पर आजकल ज्ञानियों की तादाद बहुत ज्यादा है।
वैभव अग्रवाल नॉरेक्स फ्लेवर्स प्राइवेट लिमिटेड के मैनेजिंग डायरेक्टर और सीईओ हैं!
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