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जामिया में मुस्लिम नाम देखकर पत्रकारों को पुलिस ने लाठी-डंडों से पीटा

नई दिल्ली: नागरिकता क़ानून के विरुद्ध प्रदर्शन को कवर करने वाले जिन मीडिया कर्मियों को जामिया मिल्लिया इस्लामिया कैम्पस में पुलिस की बर्बरता का शिकार होना पड़ा, उनमें पलपल न्यूज के संवाददाता शारिक आदिल यूसुफ़ भी शामिल हैं. शारिक हालात को कवर करने पहुंचे एवं पुलिस दमन के शिकार हो गए.

शारिक ने इस घटना की बाबत अपने ऑफिस को जो रिपोर्ट दी है, उसके अनुसार शारिक आदिल यूसुफ़ जामिया मिल्लिया इस्लामिया में छात्रों पर पुलिस की लाठी चार्ज के बाद की स्थिति को कवर करने गए. पुलिस ने उनको आगे बढ़ने की इजाज़त दी. जब वह रिपोर्ट कवर करके वापिस लौट रहे थे, उनको पुलिस ने पहले रोका फिर उन से मोबाइल छीनने की कोशिश की.

शारिक के अनुसार पुलिस को जब शारिक ने मोबाइल देने से परहेज़ किया तो उनप र लाठी बरसाई गई एवं उनका मोबाइल छीन कर उसको सड़क पर फ़ेंक दिया गया. उसे पुलिस के जवानों ने अपने बूट से कुचल डाला. इस दौरान पुलिस ने शारिक को गालियाँ भी दीं.

शारिक इस पूरी कार्रवाई से हैरान हैं. उनका यह भी कहना है कि पुलिस सच्चाई सामने लाने वाले पत्रकारों को टारगेट कर वह तमाम सुबूत नष्ट करना चाहती है, जिससे पुलिस की बर्बरता मीडिया में सामने आ सके.

शारिक का कहना है कि बीबीसी की संवाददाता बुशरा शैख़ पर जब पुलिस ने बर्बरता की, उस समय वह घटनास्थल से केवल २० मीटर की दूरी पर थे. शारिक के अनुसार यह घटना पुलिस की कोई चूक नहीं थी, बल्कि टारगेट वाले अंदाज़ में अंजाम दिया गया. जब बीबीसी संवाददाता के साथ पुलिस ने बदसुलूकी की, शारिक ने अपनी प्रेस आईडी पुलिस को दिखाई. शारिक का कहना है कि उनकी आईडी भी पुलिस ने छीन ली और उसे जला दिया. फोन तोड़ दिया, चश्मा तोड़ दिया.

यह अहम सवाल है कि पचासों मीडिया कर्मियों के बीच केवल पलपल न्यूज या बीबीसी के संवाददाता को ही क्यूं टारगेट करके पुलिस द्वारा बर्बरता दिखाई गई?

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