
संजय कुमार सिंह
आज जब कई अखबारों की लीड बोइंग विमानों के फुएल स्विच की जांच के आदेश की खबर लीड है तो कुछ अखबारों में बीजिंग से विदेश मंत्री का बयान लीड है। नवोदय टाइम्स में शीर्षक है, बीजिंग में बोले विदेशमंत्री तनाव कम करने की जरूरत। इसका उपशीर्षक है, प्रतिबंधात्मक व्यापार उपायों एवं बाधाओं से बचना आवश्यक। इस खबर का इंट्रो है, कहा – मतभेद विवाद नहीं बनने चाहिये। आज यह खबर नवोदय टाइम्स के अलावा दि एशियन एज में लीड है। हिन्दुस्तान टाइम्स में सेकेंड लीड और टाइम्स ऑफ इंडिया में पहले पन्ने पर दो कॉलम में है। विदेश मंत्री के इस बयान को पढ़कर प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के पांच साल पुराने, ‘न कोई हमारी सीमा में घुसा, न ही हमारी कोई पोस्ट किसी दूसरे के कब्जे में है’ की याद आती है। उपशीर्षक से पता चल जाता है कि यह जरूरत क्यों है और तब, ‘अबकी बार ट्रम्प सरकार’ की याद आती है। इसी तरह, मतभेद विवाद नहीं बनने चाहिये से याद आता है, चीन के झालर और टिक-टॉक जैसे ऐप्प पर प्रतिबंध लगाकर चीन का कमर तोड़ने की कोशिश और देश भक्ति का माहौल। कहने की जरूरत नहीं है कि आज की यह स्थिति बताती है कि देश की या प्रधानमंत्री की राजनीति में दूरदर्शिता का कितना अभाव रहा है। मीडिया इसकी चर्चा तो नहीं ही करता है उनके प्रचार और उन्हें महान बताने की कोशिशों में कोई कमी नहीं होने का नतीजा है कि वे आज भी उतने ही लोकप्रिय हैं। 11 साल पहले मेरा क्या है, झोला उठाकर चल दूंगा कहने वाले 75 साल में दूसरों को मार्गदर्शक मंडल में भेजने वाले खुद 75 साल के होने वाले हैं तो यह मुद्दा ही नहीं है। और तो और 100 दिन में विदेश में रखा काला धन वापस लाने का दावा करने वाले अब 100 साल की बात करने लगे हैं और काला धन तीन गुना होने की खबर पर मीडिया में कोई हलचल नहीं है। खास बात यह भी कि यह सब 1975 की बदनाम इमरजेंसी के सेंसर के बगैर हो रहा है।
जयशंकर और ‘जटिल’ वैश्विक स्थिति
विदेश मंत्री जयशंकर ने जो कहा वह हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा है और अभी जब उन्हें अमेरिका के प्रतिबंधों की बात करनी चाहिये तो वे जो कर या कह रहे हैं वह पांच साल पहले कहा जाना चाहिये था। यही नहीं, गुजरे पांच साल में कई बार कहा जाना चाहिये था। लेकिन अब यह सामान्य सा ज्ञान दिया जा रहा है तथा नवोदय टाइम्स ने इसे प्रमुखता से छापा है कि, सामान्य संबंधों से दोनों देशों को लाभ है। खबर बताती है कि जयशंकर यह सब ‘जटिल’ वैश्विक स्थिति के मद्देनजर बता रहे हैं। अमर उजाला ने इस खबर को चार कॉलम में छापा है और शीर्षक है, द्विपक्षीय रिश्तों में अच्छी प्रगति, अब सीमा पर घटायें तनाव। यह आपसी घोषणा या करार नहीं है। चीन पहुंचे विदेश मंत्री ने वहां के उपराष्ट्रपति और विदेश मंत्री से ऐसा कहा बताते हैं। इसे पढ़ और सुनकर लगता है कि विदेश मंत्री ने बिना कहे यह कहा है कि हम पांच साल चुप रहे, अब अमेरिका हमें परेशान कर रहा है, सीमा पर तनाव कम कीजिये तो हम आगे संबंध बेहतर करने की कोशिश करें। भारत सरकार की ऐसी कोई योजना हो या नहीं, आज की खबरों से उसकी यह मजबूरी दिख रही है और किसी को भी समझ में आयेगी। हेडलाइन मैनेजमेंट नहीं चल रहा होता तो यह बात खुलकर कही और बताई जानी चाहिये थी। कांग्रेस सरकार के समय मीडिया की भूमिका ऐसी ही होती थी। अब चुनाव आयोग सरकारी खर्चे और रुतबे से अपनी छवि बना रहा है तथा पूर्व में हुई मनमानी को छिपाने की कोशिश कर रहा है।
बिहार का विज्ञापन दिल्ली में
आप जानते हैं कि बिहार में विधानसभा चुनाव से पहले बहुप्रचारित एसआईआर चल रहा है। यह पूरा प्रयास दिखावा है, गैर जरूरी और असामयिक है तथा प्रचार कुछ है, जमीन पर कुछ और हो रहा है। उसकी खबरें दिल्ली के अखबारों में पहले पन्ने पर बमुश्किल छपती है। आज बिहार के बाहर और दिल्ली के अखबारों में भी पहले पन्ने पर पूरे पेज का विज्ञापन छपा है। यह बिहार के मुख्य निर्वाचन पदाधिकारी का है। अंग्रेजी अखबार टाइम्स ऑफ इंडिया के दिल्ली संस्करण में यह विज्ञापन हिन्दी में है। मुझे याद नहीं है कि ऐसा विज्ञापन इससे पहले किसी और राज्य की मतदाता सूची के लिए छपा हो। वैसे भी मतदाता सूची का पुनरीक्षण स्थानीय स्तर का काम है और बीएलओ यानी बूथ लेवल अधिकारी को घर-घर जाकर मतदाताओं की मौजूदगी की पुष्टि करनी होती है। अभी तक मतदाता होने का मतलब किसी चुनाव क्षेत्र का सामान्य निवासी होना होता था। और इसीलिए बीएलओ घर जाकर तस्दीक करता था कि परिवार के सभी लोग घर में या पते पर रहते हैं कि नहीं। जो सामान्य तौर पर नहीं रहते हैं उनका नाम मतदाता सूची से कट जाता था और जो नहीं रहते हैं उनके बारे में परिवार वालों, पड़ोसी की सूचना पर भरोसा किया जाता था। दुनिया भर में रहने वाले स्थान या राज्य विशेष के निवासियों या वहां पैदा हुए लोगों से अपील नहीं की जाती थी कि वे अपने जन्म स्थान की मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए ऐसा या वैसा करें। पहले जो जहां रहता था वहीं का मतदाता होता था और रहने वाले को विदेशी या घुसपैठिया मानने का कोई रिवाज नहीं था। माना जाता था कि जो जहां रहता है, वहां की भाषा बोलता है या किसी और प्रदेश की भाषा बोलता है फिर भी किसी और प्रदेश में रहता है तो मतदाता वहां का होगा जहां रहता है। अपने मूल पते पर ही मतदाता होने का कोई नियम नहीं था। बिहार चुनाव से पहले मतदाता बनाने के नियम में तमाम परिवर्तन के उदाहरण तो दिख रहे हैं लेकिन खबरें यह भी हैं कि असल में जैसे-तैसे नाम दर्ज हो रहे हैं। खबर देने वाले यूट्यूबर के खिलाफ एफआईआर दर्ज करा दी गई है। इसका मकसद उसे डराने के अलावा कुछ और नहीं हो सकता है पर यह सब खबर नहीं है क्योंकि विज्ञापन है। भले गैर जरूरी हो और इसके नाम पर सरकारी धन का अपव्यय किया गया हो।
डीजीसीए का पटरी बदलना
आज के अखबारों में एक और दिलचस्प खबर है, डीजीसीए ने बोइंग विमानों की फुएल स्विच लॉकिंग सिस्टम की जांच के आदेश दिये। यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, हिन्दुस्तान टाइम्स, टाइम्स ऑफ इंडिया के साथ द टेलीग्राफ में लीड है। सबकी सूचना यही है कि डीजीसीए ने विमानन सेवाओं से अपने बोइंग विमानों के फुएल स्विच की जांच करने के लिए कहा है। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड तो है लेकिन शीर्षक है, वाचडॉग ने पटरी बदली। यह खबर देशबन्धु में चार कॉलम का बॉटम है। इससे पहले एक रिपोर्ट के हवाले से दुर्घटना के लिए पायलट को दोषी ठहराने की कोशिश की गई थी लेकिन जांच रिपोर्ट में जितना खुलासा था उससे ज्यादा सवाल थे। सबसे महत्वपूर्ण यह कि कोई अनुभवी पायलट बिना जरूरत स्विच बंद क्यों करेगा जबकि उसे खतरे का अहसास है। तथ्य यह है कि स्विच ऐसा नहीं है कि गलती से ऑफ हो जाये या अपने आप सक्रिय हो जाये। तकनीकी खराबी हो सकती है लेकिन ऐसा हो तो भी सामान्य नहीं होगा। फिर भी दुर्घटना का कारण पायलट की गलती और इसका कारण आत्महत्या की संभावना आदि तक की बात हुई। बेशक, उसकी भी संभावना हो सकती है और जांच होनी चाहिये पर ऐसा हो तो इसका कारण भी ढूंढ़ना होगा कि कोई एक पायलट साथी पायलट और क्रू समेत सैकड़ों यात्रियों के साथ मिलकर या उनकी जानकार के बिना क्यों आत्महत्या करेगा क्या बाकी लोगों को मारने या उनके स्वेच्छा से मरने का भी कोई कारण है। जाहिर है, ऐसे तर्क ज्यादा नहीं चलते। फिर भी, मामला बड़ा है और ऐसे-वैसे कारण नहीं मान लिये जायेंगे। ऐसे में कल के आदेश की खबर महत्वपूर्ण है और दुर्घटना का कारण मालूम होना जरूरी है ताकि भविष्य में ऐसी दुर्घटना फिर न हो। हर पहलू की जांच जरूरी है और कोई भी कारण हो, उसे छिपाने-बचाने की कोशिश तो हो ही सकती है। इसलिए अंतिम रिपोर्ट से पहले की अटकलों का कोई मतलब नहीं है फिर भी पिछली रिपोर्ट को पूरा महत्व मिला था। टेलीग्राफ का शीर्षक इसी संदर्भ में है।
मुद्रास्फीति कम होना
आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, “अभिव्यक्ति की आजादी का मूल्य समझें…सोशल मीडिया पर विभाजनकारी प्रवृत्तियों पर अंकुश जरूरी : सुप्रीम कोर्ट”। यही खबर देशबन्धु में भी लीड है। यहां इसका शीर्षक है, “हेट स्पीच को रोकें केंद्र राज्य सरकारें : सुप्रीम कोर्ट”। द हिन्दू की लीड सबसे अलग और अकेली है। खाद्य पदार्थों की घटती कीमत ने मुद्रास्फीति कम की। इसका उपशीर्षक है, खुदरा मुद्रास्फीति 77 महीने में सबसे कम है और जून में यह 2.1 प्रतिशत रहा क्योंकि खाद्य पदार्थों की मुद्रास्फीति लगातार आठवें महीने कम हुई। थोक मुद्रास्फीति 20 महीने बाद कम हुई है। आम बोलचाल में मुद्रास्फीति को महंगाई समझा जाता है और मुद्रास्फीति कम होना यानी महंगाई कम होना अच्छी खबर मानी जायेगी। लेकिन मंहगाई नहीं बढ़ने या कम होने का एक मतलब मांग कम होना भी हो सकता है। मांग कम होने से चीजें कम बिकेगी, उसकी कीमत कम मिलेगी। खासकर खराब होने वाली चीजें। ऐसे में, जब करोड़ों लोग मुफ्त के राशन पर आश्रित हैं, सब्जियों की कीमत बढ़ नहीं रही है इसका मतलब है, खपत या मांग कम है। ऐसा तब होगा जब लोगों के पास सब्जी खाने के पैसे नहीं होंगे। यह असल में चिन्ता वाली खबर है लेकिन महंगाई कम हुई अच्छी खबर है। वास्तविकता दोनों के बीच में कहीं हो सकती है। मुद्रास्फीति के संबंध में पीआईबी ने 16 अप्रैल 2025 को कहा था, भारत में खुदरा मुद्रास्फीति को उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (सीपीआई) द्वारा मापा जाता है और यह रोजमर्रा की वस्तुओं और सेवाओं की लागत को दर्शाता है। खुदरा मुद्रास्फीति में वित्त वर्ष 2024-25 में उल्लेखनीय रूप से 4.6प्रतिशत तक गिरावट दर्ज की गई, जो 2018-19 के बाद से सबसे कम है। यह उपलब्धि भारतीय रिजर्व बैंक की विकास समर्थक मौद्रिक नीति की प्रभावशीलता को उजागर करता है, जिसने मूल्य स्थिरता के साथ आर्थिक विस्तार को सफलतापूर्वक संतुलित किया है। उल्लेखनीय रूप से, मार्च 2025 के लिए साल-दर-साल मुद्रास्फीति दर 3.34 प्रतिशत तक की गिरावट दर्ज की गई, जो फरवरी 2025 से 27 आधार अंक कम है। यह अगस्त 2019 के बाद से सबसे कम मासिक मुद्रास्फीति दर है। ये आंकड़े आर्थिक विकास को बढ़ावा देते हुए मूल्य वृद्धि को रोकने के निरंतर प्रयास को दर्शाते हैं।


