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सियासत

तो नेता प्रतिपक्ष देशद्रोही हैं!

अरुण श्रीवास्तव-

जाद भारत के इतिहास में शायद यह पहली हुआ कि दुनिया के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश के नेता प्रतिपक्ष को देशद्रोही कहा गया। यह बात, यह खुलासा, यह खुफिया जानकारियां हमारे देश, किसी मित्र या शत्रु देश की जांच एजेंसियों ने नहीं बल्कि विश्वगुरु बनने के मुहाने पर खड़े अपने ही देश भारत के मोदी सरकार के काबीना मंत्रियों ने कही। वह भी चुनावी सभा या रैली में नहीं।

कई बार मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री रह चुके मोदी सरकार के तीसरे कार्यकाल के कैबिनेट मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कही। अपने बयान में उन्होंने कहा कि, राहुल गांधी अपने अमेरिका यात्रा के दौरान जिस तरह से देश के विरोध में बोल रहे थे वो देशद्रोह की सीमा में आता है।

गौरतलब है कि शिवराज जी कैबिनेट मंत्री हैं जो कि कार्यकारी सरकार के भीतर मुख्य निर्णय लेने वाला समूह होता है। यही नहीं राज्यों में आयोजित होने वाले सरकारी समारोह में राज्यों के मुख्यमंत्री की तुलना में कैबिनेट मंत्रियों को वरियता दी जाती है। इसी तरह एक और काबिना मंत्री जीतन राम मांझी ने कहा कि ‘कोई भी देशभक्त विदेशी धरती पर जाकर जनता की चुनी गई सरकार पर अभद्र टिप्पणी नहीं कर सकता। राहुल का बयान एक देशद्रोही का बयान है। उन्होंने तो उन पर मुकदमा दर्ज कराने की इच्छा जाहिर की। इसी तरह कैबिनेट मंत्री हरदीप सिंह पुरी, गिरिराज सिंह ने भी राहुल के बयान की निंदा की।

इन मंत्रियों के अलावा सांसद जगदंबिका पाल जो कि 31 घंटों के लिए उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे ने कहां की लोकसभा में विपक्ष के नेता होने के बावजूद राहुल गांधी अंतरराष्ट्रीय मंच पर भारत की आलोचना कर रहे थे वे संसद में जितना चाहे भारत की आलोचना कर सकते हैं। पीएम मोदी को गाली देनी है तो भारत में दें। अब ऐसे में रूस यूक्रेन के बीच चल रहे युद्ध को पीएम मोदी जी के आग्रह पर चार घंटे रुकवाने की गलत जानकारी देने वाले भूतपूर्व कानून मंत्री रवि शंकर प्रसाद जी ने भी कैसे चुप रहते भाजपा ने उनको भी मैदान में उतार दिया।

बहरहाल, यह सवाल उठना लाजिमी है कि आखिरकार नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने देश की सीमा से बाहर जाकर कहा क्या? यहां यह बताना जरूरी है कि राहुल पिकनिक मनाने के लिए तो अमेरिका गए नहीं थे और न ही किसी विशेष सरकारी आयोजन में शामिल होने के लिए आमंत्रित किए गए थे। आमतौर पर ऐसे आयोजन किसी दूसरे देश में रहने अपने मूल देश के लोग करते हैं। इस बार का आयोजन इंडियन ओवरसीज कांग्रेस ने किया था। इसके तहत उन्हें विश्वविद्यालयों सहित अन्य एकेडमिक कार्यक्रमों में शामिल होना था।

ऐसे कार्यक्रमों में सिर्फ भाषण नहीं होता कि अपनी बात कहिए और कट लीजिए। सवाल- जवाब होते हैं। तो राहुल गांधी ने जो भी कहा वह पूछे गए सवालों के जवाबों में कहा। उन्होंने चीन पर भारत में रह रहे सिक्कों पर देश में आरक्षण और बेरोजगारी के सवाल पर अपना पक्ष रखा। उन्होंने टैक्सास यूनिवर्सिटी के छात्रों को संबोधित करते हुए कहा कि भारत में कौशल की कमी नहीं बल्कि कौशल रखने वालों का यहां सम्मान नहीं होता उन्होंने यह भी कहा कि वैश्विक उत्पादन में चीन का प्रभुत्व है इसलिए वहां भी रोजगारी नहीं है।

अमेरिका के वर्जीनिया में राहुल गांधी लोगों से बात कर रहे थे। इस दौरान उन्होंने एक सिख की ओर इशारा करते हुए कहा कि लड़ाई इस बात की है कि एक से खोने के नाते क्या उन्हें भारत में अपनी पगड़ी पहनने की अनुमति मि,लेगी सिख होने के नाते इन्हें भारत में कड़ा पहनने की अनुमति मिलेगी सिर्फ उनके लिए ही नहीं बल्कि सभी धर्म के लिए यह लड़ाई है। तो राहुल गांधी ने अकेले सिख धर्म के लोगों के लिए यह बात नहीं कही भारत में बहुत से धर्म के लोग रहते हैं क्या सभी धर्म के लोगों को अपने-अपने धर्म के अनुसार जीने की आजादी है।

सवाल का जवाब भारत में रह रहे अन्य धर्म के लोगों को आसानी से मिल जाएगा। क्या ऐसा नहीं हुआ कि देश में जालीदार टोपी देखकर लोगों पर हमले किए गए हों। फ्रिज में गो-मांस रखा होने का आरोप लगाकर माहौल खराब किया जा रहा हो। किसी को गोवंश की कथित रूप से तस्करी करने के आरोप में गोली मार दी गई हो। अखलाक व पहलू खां की हत्या इस बात का जीता जागता सबूत है कि अल्पसंख्यकों के साथ पहले की सरकारों की तरह अच्छा सलूक किया जाता रहा हो। आरक्षण के विषय में भी राहुल ने ऐसा नहीं कहा जिससे समाज में जातीय भेदभाव को बढ़ावा मिले। आरक्षण की व्यवस्था तात्कालिक थी जो कि दस सालों के लिए थी।

हालांकि, यह बाद में भी जारी थी। राहुल गांधी ने भी तो आरक्षण को असामनता समाप्त होने तक जारी रखने की बात कही। तो इसमें ग़लत क्या कह दिया। आरक्षण के मुद्दे पर तो भाजपा और उनके अन्य सहयोगी संगठनों का रवैया हित में मिल रहा याद करिए जब बिस्तर प्रताप सिंह कमंडल के विरोध में मंडल ले आए तो इसी भाजपा ने उसकी जमकर विरोध किया था। तो ये भाजपा का ही दोहरा चरित्र उजागर करता है।

राहुल गांधी के बयान पर तमतमाये भाजपाइयों का कहना है कि उन्होंने विदेश की धरती पर चीन की तारीफ की। समारोह में एक छात्र के पूछने पर राहुल गांधी ने जो कहा वह चीन की तारीफ कहां से है?

राहुल गांधी ने तो यही कहा न कि चीन ने उत्पादन पर जोर दिया जबकि हमने असेंबलिंग पर जोर दिया। वहां के युवाओं को काम ज्यादा और यहां के युवाओं को काम कम मिल रहा है। राहुल गांधी के बयान से एक बात और साफ होती है जो कि यहां के बाजारों में देखने को मिलती है। किसी भी जिले के बड़े बाजार में चले जाइए 80 से लेकर 90% सामान चीन के उत्पादों से भरा हुआ है, चाहे वह एलईडी बल्ब हो चाहे वाशिंग मशीन हो या अन्य कोई इलेक्ट्रॉनिक आइटम हो। दीपावली पर चीनी झालरों/लड़ियों, पटाखों होली पर रंगों के बहिष्कार करने की अपील से ही देशभक्त की भावना नहीं झलकती सरकार को विकल्प देना होगा। सवाल यह है कि चीन के उत्पादों का आयात ही क्यों किया जा रहा है। आम जनता तो चीन जाकर वहां का सामान लाती नहीं।

नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने अमेरिका की धरती पर हुए एक कार्यक्रम में कहा कि यहां पर तमिलनाडु, पंजाब, हरियाणा, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, केरल और महाराष्ट्र के लोग हैं। ये सिर्फ नाम नहीं बल्कि ये इतिहास भाषा और परंपरा का प्रतिनिधित्व करते हैं। आरएसएस कहता है कि ये राज्य, भाषाएं, धर्म और समुदाय दूसरों से निम्न हैं। हम हर राज्य की परंपरा, धर्म संस्कृति और भाषा में भरोसा करते हैं जो सभी की तरह बेहद जरूरी है। तमिलनाडु के किसी शख्स को अगर कह दिया जाए कि वो तमिल नहीं बोल सकता तो वो कैसा महसूस करेगा?

यही आरएसएस की विचारधारा है। तो देश की धरती से बाहर जाकर किसी संगठन के विषय में कुछ भी कहना क्या देशद्रोह है? क्या आरएसएस देश है कि उसके विषय या विरोध में कुछ कहा नहीं जा सकता। आरएसएस अपने को एक सांस्कृतिक संगठन कहती है और ये भी कहती है कि उसका राजनीति से कुछ भी लेना-देना नहीं। तो फिर भाजपा में आरएसएस के लोग क्यों? भाजपा शासित प्रदेशों के मुख्यमंत्री आरएसएस के लोग क्यों? क्या प्रधानमंत्री मोदी कभी आरएसएस के प्रचारक नहीं रहे या राजनाथ सिंह कभी आरएसएस में नहीं रहे, लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला भी कभी आरएसएस के सदस्य रहे। मनोहर लाल खट्टर संघ के स्वयं सेवक रहे क्या इससे इनकार किया जा सकता है।

चलिए एक बार को मान लेते हैं कि, राहुल गांधी ने अमेरिका में या इसके पहले इंग्लैंड में जो कहा वह देश विरोधी है तो प्रधानमंत्री मोदी ने भी गुजरात के मुख्यमंत्री रहते हुए और प्रधानमंत्री रहते हुए भी अपने देश के विषय में जो कहा क्या वह देशभक्ति की भावना से ओत-प्रोत प्रोत है? इसके पहले अपने विदेशी दौरों के बीच प्रधानमंत्री व गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने जो कुछ भी अपने देश के विषय में कहा वह सब रिकॉर्ड में है और गूगल करने से मिल जाएगा। प्रधानमंत्री मोदी कहें तो सही और कांग्रेस के राहुल गांधी कहें तो गलत यह तो नहीं चलेगा। वैसे भी ‘मीठा-मीठा गप्प और कड़वा कड़वा थू’ अवसरवादिता है।

प्रसंगवश, क्या कोई सरकार या प्रधानमंत्री देश होता है? लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुनाव के दौरान हर विपक्षी पार्टी सरकार की नीतियों का विरोध करते हुए चुनाव लड़ती है तो क्या सरकार की नीतियों का विरोध करना देशद्रोह है? यदि विपक्ष प्रधानमंत्री पर कोई आरोप लगाता है तो क्या यह देशद्रोह है? क्या किसी भी देश का प्रधानमंत्री या किसी भी पार्टी की सरकार अपने आप में देश है? इस संबंध में जनकवि सर्वेश्वर दयाल सक्सेना की एक कविता का अंश याद आता है.. ‘देश कागज पर बना नक्शा नहीं होता कि एक हिस्से के फट जाने पर बाकी हिस्से उसी तरह सबूत बन रहे..?

बात मुद्दे कि, अगर नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने विदेशी धरती पर अपने बयान से ऐसी बातें की जो देशद्रोह है तो सरकार राहुल गांधी को अविलंब गिरफ्तार करे, मुकदमा चलाए क्योंकि देश से बड़ा न व्यक्ति है, न संगठन है और न सरकार है‌। यदि वो ऐसा नहीं करती तो वर्तमान सरकार एक देशद्रोही नेता को जो कि नेता प्रतिपक्ष भी है उसे बर्दाश्त कर रही है। भारतीय संविधान के संकल्पों से बंधी सरकार की जिम्मेदारी है कि वो अपना संवैधानिक कर्तव्य निभाये।

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