क्षमता से अधिक क़ैदी हैं भारतीय जेलों में, कुल कैदियों में 21 प्रतिशत मुस्लिम अपराधी

सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद भारत के जेलों में कैदियों का रेला यानी क्षमता से अधिक कैदियों की संख्या कम नहीं हो रही है। जेलों की संख्या बढ़ाने से लेकर बैरकों की संख्या दोगुना करने की सरकारी कवायद के बावजूद देश के जेलों की क्षमता से 112 प्रतिशत ज्यादा कैदी ठूंसे हुए हैं। गृह मंत्रालय के गैर योजना स्कीम के तहत 1800 करोड़ रुपये जेलों के आधुनिकीकरण पर खर्च करने की योजना भी जेलों की सेहत सुधारने में कोई खास भूमिका अदा नहीं कर पाई। इस योजना के तहत केंद्र-राज्य को क्रमश: 75:25 के अनुपात में खर्च करने हैं।

प्रथम चरण में घोषित 1800 करोड़ के बाद केंद्र सरकार ने दूसरे चरण में जेलों के आधुनिकीकरण पर 5693.33 करोड़ की योजना को अमल में लाई है। यही नहीं प्रथम योजना जिसमें 1800 करोड़ रुपये खर्च करने थे उसे भी अगले दो वर्ष के लिए विस्तारित कर दिया है। यह योजना मार्च 2009 में समाप्त हो गर्ई थी। बावजूद इसके केंद्र द्वारा जारी की गर्ई इस राशि का उपयोग बहुत से राज्य सरकारों ने नहीं किया है, केंद्र ने दोबारा नई जेल आधुनिकीकरण योजना भी घोषित कर दी है। 1987-2000 के बीच केंद्र सरकार 125.24 करोड़ रुपये जारी कर चुकी है।

इस योजना के तहत पूरे देश में 125 नई जेलों के अलावा 1579 अतिरिक्त बैरकों का निर्माण विभिन्न राज्य सरकारों द्वारा कराया गया है। इससे जेलों में कैदियों की अधिकता 122.8 की जगह 112.2 प्रतिशत पर पहुंच गई है। हालांकि यह आंकड़ा दिसंबर 2012 तक का है। गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार भारत के जेलों में कुल 3,85,135 कैदी सजा काट रहे हैं।

कुल कैदियों में 21 प्रतिशत हैं मुस्लिम अपराधी- गृह मंत्रालय, भारत सरकार के अधीन कार्यरत नेशनल क्राइम रिकॉर्ड ब्यूरो के अनुसार देश की जेलों में सजा काट रहे कुल कैदियों (3.85 लाख) में से केवल मुस्लिम अपराधियों की संख्या 53 हजार 836 (21 प्रतिशत) हैं, इसमें दोनों (सजायाफ्ता और विचाराधीन) तरह के कैदी शामिल हैं। इसमें भी उत्तर प्रदेश के जेलों में ही मुस्लिम कैदियों की संख्या देश में सबसे ज्यादा है, उसके बाद बिहार, महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल का स्थान है।

जहां तक हिन्दू, मुस्लिम, सिख और इसार्ई कैदियों की संख्या की तुलना का सवाल आता है इसमें जनसंख्या के हिसाब से देखा जाए तो मुस्लिम देश की कुल जनसंख्या का लगभग 16 प्रतिशत हैं जबकि कुल अपराधों में इनकी संलिप्तता 21 प्रतिशत है। वहीं कुल जनसंख्या का 84 प्रतिशत हिन्दू हैं जबकि अपराधों में संलिप्तता का औसत प्रतिशत 70 के आसपास हैं क्योंकि भारत के जेलों में बंद (सजायाफ्ता और विचाराधीन) कैदियों में से 71.4 फीसदी हिन्दू हैं वहीं सिख अपराधियों की संख्या (सजायाफ्ता और विचाराधीन) 4 प्रतिशत है। वहीं देश की जनसंख्या में दो प्रतिशत की भागीदारी करने वाले क्रिश्चियन का (सजायाफ्ता और विचाराधीन) कैदियों आंकड़ा 4 प्रतिशत है। यानी कहने का मतलब यह कि देश का हरेक 16वां व्यक्ति मुस्लिम है लेकिन देश में होने वाले 100 अपराधों में 21 अपराध मुस्लिमों के नाम हैं।

इसे लेकर विभिन्न दलों और संगठनों द्वारा यह सवाल उठाया जाता रहा है कि देश की जेलों में सबसे ज्यादा अपराधी मुस्लिम हैं और इसके पीछे पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाए जाते हैं। हालांकि इस मामले में पिछले साल महाराष्ट्र के पुलिस महानिदेशक संजीव दयाल, उत्तर प्रदेश के डीजीपी देवराज नागर और तमिलनाडु के डीजीपी के. रामानुजम द्वारा केंद्र सरकार को प्रस्तुत की गई रिपोर्ट में पुलिस की एक पक्षीय धारणा का उल्लेख मिलता है।

जहां तक जेलों का सवाल है यह राज्य का विषय है और भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार इसकी देखभाल, सुरक्षा और उन्नयन की जिम्मेदारी राज्य सरकारों के जिम्मे है। जेलों में मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतें अक्सर मिलती रहती हैं। इसका परिणाम यह देखने में आता है कि सजा काटकर निकलने वाले अपराधी और बड़े अपराधी बनकर समाज में आतंक फैलाते हैं। यह जेलों के संचालन और उसके उद्देश्य को अलग करता है क्योंकि जेल अपराधियों को एक अच्छा नागरिक बनाने की जगह है लेकिन दुर्भाग्य से ऐसा नहीं होता है।

इस तरह यह कहा जा सकता है कि जेलो के सुधार की दिशा में हमें अभी मीलों तक चलना है और जेलों को आधुनिक बनाने के साथ ही वहां मानवाधिकार उल्लंघन की शिकायतों को शून्य के स्तर पर लाना प्राथमिक सूची में रखनी होगी। तभी हम जेलों में जाने वाले अपराधियों को मानव में बदलकर समाज में लाने का कार्य कर सकेंगे।

भारत में जेलों में सुधार के लिए 1983 में मुल्ला कमेटी, 1986 में कपूर कमेटी, 1987 में अय्यर कमेटी और 2001 में महिला सशक्तीकरण के लिए संसदीय समिति की सिफारिशें आ चुकी हैं जिसके आलोक में यह कहा जा सकता है कि इन कमेटियों ने जो सुझाव दिए थे वे अब तक पूरे नहीं हो पाए हैं। क्योंकि देश के औसत जेलों में अभी भी कैदियों के रहने के स्थान से लेकर जीवन रक्षक उपाय पर्याप्त नहीं हैं। इन समितियों ने कैदियों में बदलाव के लिए शैक्षणिक, स्वास्थ्य, मनोवैज्ञानिक तौर पर कई तरह की सेवाएं प्रदान करने की बात कही है। उनके मानसिक और शारीरिक विकास और स्वरोजगार से जोड़ने के लिए भी कई सिफारिशें की गई हैं।

Reducing overcrowding in jails!

Several initiatives have been taken to increase the number of jails and barracks in India to reduce overcrowding. The Union Government in the Ministry of Home Affairs had launched a Non-Plan Scheme of Modernisations of Prisons at a total outlay of Rs.1800 crore on a cost-sharing basis in the ratio of 75:25 between the Central Government and State Governments respectively.

The Union Ministry of Home Affairs has initiated a fresh proposal for second phase of prison reforms at a cost of Rs.5693.33 crore. The first phase of prison reforms involving a total outlay of Rs. 1800 crore for modernization of prisons ended on March 31, 2009, which was extended by two years. Still earlier, the Government of India had released Rs.125.24 crore to the States for prison reforms during 1987-2000 without any improvement on the ground.

Under the scheme of modernizations of prisons, 125 new jails and 1579 additional barracks have so far been constructed by the State Governments, bringing down overcrowding from 122.8 per cent in December 2009 to 112.2 per cent in December 2012.

As on December 31, 2012, there were 3, 85, 135 inmates in jails across the country out of a total capacity of 3, 43, 169, constituting over crowding by 112.2 per cent.

As for the number of Hindus, Muslims, Sikhs and Christians in jails, proportionate to their percentage in the total population, according to the National Crime Records Bureau (NCRB) in the Union Ministry of Home Affairs as on December 31, 2012, out of 3. 85 lakh combined convicts and under trial prisoners, per lakh population, 2.50 lakh were under trials. Of these, 53, 836 (21 per cent) were Muslims. Uttar Pradesh, Bihar, Maharashtra and West Bengal have highest number of Muslims.

An analysis of the NCRB data reveals that the rate of under trial Muslim prisoners is almost twice that of Hindus, calculated on number of under trials per lakh population. While the Hindu under trial rate is 21.5 per cent per lakh population, the Muslims are 38.81 per cent per lakh population. This indicates more Muslims as under trials compared to Hindus. This also reveals that 17 per cent convicts in jail constitute Muslims. In the under trial category, Muslims are 21 per cent in prisons. In the case of Hindus, the reverse is true. Hindus constitute 71.4 per cent of convicts and 69.9 per cent under trials. Sikhs constitute 4 per cent of under trials and 4.9 per cent of convicts. Christians comprise 3.5 per cent under trials and 4 per cent convicts.

This can be viewed in the context of a 2013 combined report by three Directors General of Police (DGPs), Sanjeev Dayal of Maharashtra, Deoraj Nagar of Uttar Pradesh and K.Ramanujam of Tamil Nadu on police attitude towards minorities, submitted to the Central Government, which held that there is an entrenched perception of Police being biased against Muslims.

Prison is a State Subject in the Seventh Schedule to the Constitution of India. Prison administration is, therefore, primarily the responsibility of the State Governments. The States have neglected it to the detriment of human rights of the inmates. The result has been that the convicted inmates, on completion of their terms as prisoners and those under trials, when freed, have come out mostly as hardened criminals and not as socially reformed law abiding citizens in sheer violation of the Constitutional postulates of the prison reforms.

All initiatives for prison reforms taken so far are half hearted. India has miles to go before full-scale modernization of its prisons is effected and the human rights of prisoners ensured to let real democracy thrive. The broad mission to make jails as correction (reforms) centres to transform inmates as better humans is yet to be realized.

Prison reforms followed the recommendations of Mulla Committee in 1983, Kapoor Committee in 1986, Iyer Committee in 1987 and Parliamentary Committee on Empowerment of Women in 2001. Having been appalled by pathetic, unhygienic and awful conditions of the average prisons, these Committees had recommended replacement of dilapidated prisons, improvement of living conditions, provision of medical and psychiatric services, vocational training and gainful employment, educational programme, improvement in the conditions of women prisoners, segregation of prisoners, provision for free legal aid, speedy trial, and humane and dignified treatment of prisoners!

एमवाई सिद्दीकी, पूर्व प्रवक्ता विधि व न्याय और रेल मंत्रालय, भारत सरकार।



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