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आज के अखबार : पांच अखबारों की एक लीड, दूसरी खबर का ‘हश्र’ बताता है, सब संपादक एक ‘स्कूल’ के

संजय कुमार सिंह

आज की सबसे दिलचस्प और पढ़ी जाने वाली खबर है, माधवी पुरी बुच जेपीसी के समक्ष उपस्थित नहीं हुईं और राजनीति ने मोर्चा संभाला, नियम-कानून गये तेल लेने। पर यह खबर ऐसे छपी नहीं है और सभी अखबारों में इसे अलग ट्रीटमेंट मिला है। छोटी और अदृश्य होने तक। इसका कारण ‘स्कूल’ की पढ़ाई का प्रभाव कम ज्यादा हो या नौकरी की मजबूरी पर आज ऐसा हुआ है। इसके अलावा आज की खास बात यह है कि हिन्दी अखबारों में दो खबरें प्रमुखता से हैं, दिल्ली में प्रदूषण के कारण सीजेआई ने सुबह टहलना छोड़ दिया और हम भानुमति का पिटारा खोलना नहीं चाहतेअमर उजाला ने दूसरे शीर्षक में यह भी लिखा है, (बुलडोजर कार्रवाई पर) राज्य सरकारों के खिलाफ (अवमानना) अर्जी खारिज। अमर उजाला में इसके साथ एक खबर है, याचिकाकर्ता को तथ्यों की जानकारी नहीं : यूपी सरकार। अगर सरकार ने जो कहा है वह सही है और इस कारण याचिका खारिज हुई है तो यह खबर ही नहीं है पर अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर छह कॉलम में छपी है। इन तथ्यों का प्रमुखता से उल्लेख किये बगैर नवोदय टाइम्स में यह खबर चार कॉलम में है। यहां सुप्रीम कोर्ट के पिछले आदेश का उल्लेख तो है ही, फ्लैग शीर्षक है, … अवमानना के आरोप वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार।

इन खबरों के बीच आज एक खबर यह भी है कि विमान में बम होने की धमकी और इस कारण होने वाली अराजकता जारी है। गुरुवार को कम से कम 80 और उड़ानों में बम होने की धमकी मिली। अधिकारियों ने सोशल मीडिया मंचों से सहयोग मांगा है। इस बीच 11 दिनों में 250 उड़ानें प्रभावित हुई हैं। इन खबरों से पता चलता है कि सरकार क्या काम कर रही है और भाजपा के नेता क्या कर रहे हैं पर खबरों की प्रस्तुति से ऐसा कोई संकेत नहीं मिलता है। आज मेरे आठ में से पांच अखबारों की लीड कश्मीर में आतंकी हमला है। आप जानते हैं कि 5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 खत्म किये जाने के बाद कश्मीर की खबरें छपनी बहुत कम हो गई थीं। वैसे भी, कश्मीर की जो खबरें होती थीं वो हिंसा की ही होती थीं पर लेह का आंदोलन भी दिल्ली या बाकी देश के अखबारों में नहीं के बराबर छपा। कश्मीर में चुनाव से पहले आतंकवाद की खबरों के साथ आतंकवाद खत्म करने और उसके अंतिम सांस लेने जैसी ‘खबरें’ छपती रहीं जबकि आतंकी वारदात तो नरेंद्र मोदी के तीसरी बार शपथ ग्रहण के दौरान भी हुई थी लेकिन आज आतंकी हमले की खबर ज्यादातर अखबारों में लीड ही बनी है। सेबी प्रमुख, माधवी पुरी बुच की आज की खबर लीड के लायक भले न हो पहले पन्ने की प्रमुख खबर जरूर होनी चाहिये थी। उसपर आने से पहले आइये आज के बाकी तीन अखबारों की लीड खबरें भी जान लें और समझें कि समुद्री तूफान दाना के कारण उड़ान और रेल रद्द होने की खबर भी लीड हो सकती थी

द टेलीग्राफ की लीड का शीर्षक है, हवाई अड्डा बंद, किराया बढ़ा। फ्लैग शीर्षक है,  (समुद्री तूफान) दाना का खामियाजा: हवाई जहाज के टिकटों की कीमत चार गुणा तक बढ़ी। द हिन्दू की लीड का शीर्षक है, कांग्रेस ने उत्तर प्रदेश में उपचुनाव से अलग रहने का निर्णय किया, समाजवादी पार्टी को पूर्ण समर्थन की पेशकश”। कश्मीर में आतंकी घटना की खबर को आज लीड नहीं बनाने वाला मेरा तीसरा अखबार है, दि एशियन एज। शीर्षक है, “एलएसी की स्थिति पर चीन के साथ मोटी सहमति हो गई है : राजनाथ”। यहां सैनिकों के शहीद होने और आतंकी हमले की खबर सिंगल कॉलम में है। 

हिन्दुस्तान टाइम्स में तीन लाइन के शीर्षक के साथ 10 लाइन की खबर से बताया गया है कि खबर अंदर है। टाइम्स ऑफ इंडिया में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक में ही है, राहुल ने पूछा उनका बचाव करने की योजना के पीछे कौन है। जवाब, दो कॉलम में छपी चार लोगों की तस्वीर के फोटो कैप्शन के रूप में है। फोटो में तीन भाजपा के लोग हैं जबकि चौथे पीएसी के चेयरमैन और कांग्रेस नेता केसी वेणुगोपाल हैं। चौथे व्यक्ति की फोटो अलग है पर एक साथ दो कॉलम में छपी है। कैप्शन इस प्रकार है, रविशंकर प्रसाद और अन्य भाजपा सदस्य (बाएं) ने लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला से पीएसी चेयरमैन, कांग्रेस नेता केसी वुणुगोपाल (दायें) की शिकायत की। द हिन्दू में यह संक्षिप्त खबर के रूप में है और विवरण अंदर होने की सूचना। तीन लाइन का शीर्षक औऱ डेटलाइन समेत यह आठ लाइन की खबर है। दि एशियन एज में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है। इंडियन एक्सप्रेस में यह खबर दो कॉलम में तीन लाइन के शीर्षक के साथ है। एख लाइन का फ्लैग शीर्षक है, भाजपा ने चेयरमैन वेणुगोपाल की आलोचना की। शीर्षक या पहले पन्ने पर जितनी खबर है उसमें राहुल गांधी का सवाल नहीं है। अमर उजाला में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है।

द टेलीग्राफ में यह खबर सेकेंड लीड है। मुख्य शीर्षक है, दो घंटे पहले बुच ने कहा नहीं”। यह दो कॉलम की खबर का दो लाइन का शीर्षक है। तीन कॉलम में फ्लैग शीर्षक है, सेबी प्रमुख को कौन बचा रहा है : राहुल”। इसके साथ एक कॉलम की एक खबर है, एकतरफा, राजनीतिक : भाजपा ने वेणुगोपाल को निशाना बनाया”। नवोदय टाइम्स में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, पीएसी के समक्ष उपस्थित नहीं हुईं बुच। वेणुगोपाल के खिलाफ भाजपा ने की शिकायत। आप जानते हैं कि सेबी प्रमुख के खिलाफ कई शिकायतें हैं और उनकी जांच नहीं हो रही है क्योंकि वे सरकार की प्रिय हैं और इसीलिए पीएसी के समक्ष उन्हें बुलाने का ही विरोध हो रहा था और आज खबर छपी है कि भाजपा ने पीएसी के प्रमुख के खिलाफ लोकसभा अध्यक्ष से शिकायत की है। यह स्थिति तब है जब सेबी प्रमुख के खिलाफ आरोप स्पष्ट हैं और हिन्डनबर्ग ने उसकी पुष्टि कर दी है। कहने की जरूरत नहीं है कि यह सब भाजपा या प्रधानमंत्री के उन दावों और घोषणाओं के बावजूद है जो वे भ्रष्टाचार के खिलाफ करते रहे हैं। आप जानते हैं कि दस साल में देश भर के भिन्न दलों के भ्रष्टाचार के आरोपी कई नेता वाशिंग मशीन पार्टी में हैं और उनके खिलाफ आरोप या तो खत्म हो गये या ठंडे बस्ते में पड़े हैं। कांग्रेस के जिन नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप थे वो अदालत में साबित नहीं हुए और राबर्ट वाड्रा का मामला हर चुनाव में पूछताछ के नाम पर भुनाया गया लेकिन कुछ हुआ नहीं। राहुल गांधी ने जब भारत जोड़ो यात्रा की घोषणा की तो नेशनल हेरल्ड का मामला आ गया लेकिन अभी तक उसमें भी कुछ हुआ नहीं है।

दूसरी ओर, अदाणी की कंपनियों में 20,000 करोड़ रुपए के निवेश का स्रोत स्पष्ट नहीं है। पहले ऐसे निवेश को कालाधन माना जाता था और शंका थी तथा प्रचार किया गया था कि भारतीयों का पैसा विदेशों से घूम कर भारतीय कंपनियों में निवेश हो जाता है। नरेन्द्र मोदी और उनकी सरकार इसमें शेल कंपनियों की भूमिका बताती थी और ऐसी लाखों कंपनियों को बंद कराने का दावा किया गया है। यह सब भ्रष्टाचार दूर करने और कालाधन खत्म करने के नाम किया गया है और सरकार समर्थक इसके लिए ताली बजाते रहे हैं। ऐसे में सेबी प्रमुख का काम था कि निवेश का पता लगातीं (बताने के लिए के लिए मजबूर करतीं)। यहां सेबी की उस कार्रवाई को याद कीजिये जब उससे इतने दस्तावेज मांगे गये थे जो 100 से ज्यादा ट्रकों पर भेजे गये थे। लेकिन इस सरकार में अदाणी के खिलाफ कार्रवाई इतना मुश्किल काम है कि इसके लिए राहुल गांधी और महुआ मोइत्रा की संसद की सदस्यता चली गई। आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह जेल हो आये। आप जानते हैं कि आम आदमी पार्टी देश की ‘नई भ्रष्टाचारी घोषित’ पार्टी है जिसके कई नेता जेल काट आये पर मामला कुछ साबित नहीं हुआ। ऐसे में माधवी पुरी बुच के लिए यह पता करना बेशक मुश्किल है और उन्होंने कोई कार्रवाई नहीं है। इसलिए उनपर आरोप तो साबित हैं फिर भी कार्रवाई नहीं हो रही है।

हिन्डनबर्ग ने आरोप लगाया कि इसका कारण उनके और उनके पति के अदाणी से संबंध हैं पर मुझे लगता है कि वह मुद्दा ही नहीं है। अगर वे अदाणी के निवेश का पता लगाने के लिए जिम्मेदार हैं और नहीं किया है तो उनके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिये। मीडिया में मुद्दा यह रहा कि ऐसे मामलों में उन्होंने खुद को अलग किया कि नहीं और आरटीआई ने उसका भी जवाब नहीं दिया – या कह दिया कि सब विवरण तैयार नहीं हैं। ऐसे में कार्रवाई क्यों नहीं हो रही है समझना मुश्किल नहीं है और पीएसी के समक्ष उपस्थित होकर भी वे क्या करतीं। ऐसा नहीं है कि यह सब कोई गोपनीय या नई जानकारी है। फिर भी भाजपा को माघवी पुरी बुच के पीएसी के समक्ष उपस्थित नहीं होने से कोई दिक्कत नहीं है और भाजपा के लोग पीएसी के चेयरमैन की शिकायत कर रहे हैं तो आप समझ सकते हैं कि वे क्या चाहते हैं। कम से कम संसद सदस्यता खत्म करने की धमकी तो इसमें शामिल है ही। पर वह मेरा मामला नहीं है। मुझे यह बताना था कि इतना सब सार्वजनिक होने के बावजूद अखबारों ने इस खबर को महत्व नहीं दिया है। और यह एक ही स्कूल का होने के कारण हो सकता है। पुराने मामले लिखने-याद दिलाने का रिवाज ही नहीं है तो वह कोई मामला नहीं है। आइये अब भाजपा की शिकायत का कारण या आधार भी समझ लें।

द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, सेबी प्रमुख माधबी पुरी बुच गुरुवार को संसद की लोक लेखा समिति द्वारा बुलाई गई बैठक में शामिल नहीं हुईं। इससे भाजपा और कांग्रेस के बीच तीखी जुबानी जंग छिड़ गई। दरअसल सूचना मिलने पर पैनल अध्यक्ष केसी वेणुगोपाल ने बैठक को बाद की तारीख के लिए स्थगित कर दिया था। माधवी पुरी बुच ने बैठक शुरू होने से दो घंटे पहले वेणुगोपाल को सूचित किया कि वह “व्यक्तिगत कार्यों” के कारण इसमें शामिल नहीं हो पाएंगी। वेणुगोपाल ने संवाददाताओं से कहा, “सेबी अध्यक्ष ने समिति के समक्ष उपस्थित होने से छूट मांगी थी, जिसे हमने अस्वीकार कर दिया। उसके बाद, पुरी-बुच ने पुष्टि की कि वह और उनके अधिकारी उपस्थित होंगे। लेकिन सुबह 9.30 बजे, हमें सेबी अध्यक्ष से एक संदेश  प्राप्त हुआ कि किसी निजी मजबूरी के कारण वह दिल्ली नहीं आ सकेंगी।” हिन्दुस्तान टाइम्स की 10 लाइन की खबर के अनुसार, समिति के भाजपाई सदस्यों ने आरोप लगाया कि वेणुगोपाल ने एकतरफा निर्णय ले लिया। इससे पहले वक्फ समिति की बैठक में गर्मागर्म बहस और उसकी रिपोर्टिंग पर मेरी टिप्पणी आप यहां पढ़ चुके हैं।

मुझे लगता है कि आज यह खबर सबसे महत्वपूर्ण है। माधवी पुरी बुच के नहीं आने के कारण हो न हो, भाजपा के सदस्यों के रवैये के कारण तो महत्वपूर्ण है ही। कहने की जरूरत नहीं है कि बैठक में जो सबसे महत्वपूर्ण काम होना था उसी की संभावना नहीं रही तो बैठक रद्द करने के लिए बैठक होने देने का कोई मतलब नहीं था और इतना अधिकार व निर्णय लेने की योग्यता तो किसी भी समिति के किसी भी पार्टी के नेता-कार्यकर्ता को होना ही चाहिये।  टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, पीएसी को सेबी के प्रदर्शन की समीक्षा करनी थी। लेकिन राजनीतिक पर्यवेक्षकों और बाजार विशेषज्ञों ने एक तनावपूर्ण बैठक की आशंका जताई थी क्योंकि समिति के विपक्षी सांसदों को उम्मीद थी कि वे पुरी-बुच को हाल के विवादों पर घेरने के मौके का लाभ उठा सकेंगे। आज की एक बड़ी खबर दिल्ली के उपराज्यपाल की भी है। आप जानते हैं कि कानून के पालन से बचने के लिए उसकी जानकारी न होने की दलील आम आदमी के भी काम आने वाली नहीं है। लेकिन दिल्ली के उपराज्यपाल ने दिल्ली के रिज क्षेत्र में पेड़ काटने की अनुमति देने के मामले में यह बहाना बनाया है। खबर है कि सुप्रीम कोर्ट को इसपर यकीन नहीं हैहिन्दुस्तान टाइम्स में इस शीर्षक के साथ हाइलाइट किया गया अंश है, सुप्रीम कोर्ट ने आशंका जताई कि एलजी वाकई इस बारे में अनभिज्ञ थे। जो भी हो, यह दिलचस्प है कि एलजी एक संवैधानिक पद पर हैं और इस कारण मार-पीट के एक पुराने मामले की सुनवाई से उन्हें राहत मिली हुई है। दिल्ली के उपराज्यपाल से संबंधित आज की खबर सभी अखबारों में इतनी प्रमुखता से नहीं है। इसका कारण समझना मुश्किल नहीं है और वह यह है कि एलजी भी केंद्र सरकार के प्रिय पात्र हैं। इस कारण यह अंग्रेजी के मेरे कुछ अखबारों में तो छोटी-बड़ी है लेकिन हिन्दी के अखबारों में नहीं है। वहां दिल्ली में वायु प्रदूषण की खबर है और बताया गया है कि सीजेआई ने इस कारण सुबह की सैर छोड़ दी है। चार और छह कॉलम की खबर से बताया है कि बुलडोजर न्याय या घर ध्वस्त करने पर सुप्रीम कोर्ट के आदेश की अवमानना के आरोप लगाने वाली याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया गया है। मुख्य शीर्षक है, हम भानुमति का पिटारा नहीं खोलना चाहते हैं।

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