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सुख-दुख

हमने आखिरी सवाल दागा- “गाड़ी में प्रेस लिखाने के लिए क्या करना होगा!”

विनय मौर्या-

पत्रकारिता के गिरते स्तर की एक बानगी आज देखने को मिली। एक व्हाट्सएप ग्रुप में ब्यूरो, जिला संवाददाता और अपराध संवाददाता बनाने का ऑफर चल रहा था।

हमने सिर्फ परखने के उद्देश्य से उस नंबर पर मैसेज किया कि जुड़ने का तरीका क्या है। उधर से जवाब आया दो हजार का विज्ञापन दीजिए, जुड़ जाइए। यानी दो हजार देकर आप मीडिया पर्सन बन सकते हैं।

हमने कहा हम पढ़े-लिखे नहीं हैं, मात्र पांचवीं पास हैं। पहले तो उन्होंने थोड़ी असमर्थता जताई, फिर अपने ही मीडिया संगठन में मात्र ग्यारह सौ में जोड़ने की पेशकश कर दी। उनके शब्द थे “आप यूनियन से जुड़कर कार्य करें, यहां पढ़ाई का कोई मानक नहीं है, यहां पर मीडिया गिरी करना है।”

हमने पूछा गाड़ी पर प्रेस लिखवा सकते हैं उनका जवाब आया “नाम, पद, यूनियन का नाम लिख सकते हैं।” हमने आगे कहा कि प्लंबर-मिस्त्री का काम करता हूं, मगर मीडिया से जुड़ने की इच्छा है। तुरंत जवाब मिला “आप पत्रकारिता करना चाहते हैं तो हमारे यूनियन *य मीडिया फाउंडेशन से जुड़ सकते हैं, सक्रिय सदस्यता शुल्क मात्र 1100 रुपए है, आपको जिले लेवल पर कोई न कोई पदाधिकारी बना दिया जाएगा, आप जो खबर देंगे हमारे न्यूज़ पोर्टल और अखबारों में प्रकाशित होगी।”

फिर हमने आखिरी सवाल दागा प्रेस लिखने के लिए क्या करना होगा, हम 2000 दे देंगे। इस पर उनका जवाब था “आप प्रेस लिखकर चलेंगे तो रोकता कौन है, बहुत सारे अनपढ़ लोग पत्रकारिता कर रहे हैं, तमाम गुंडा-माफिया मीडिया से जुड़कर प्रेस लिखकर चल रहे हैं।”

इतना ही नहीं, उनका यह भी तर्क था कि “जब अनपढ़ विधायक और सांसद बन रहे हैं तो कोई समाज सेवा भी नहीं कर सकता ” मैंने संपादक पद जोड़ने की बात कही तो बोले यह पद पैसे से नहीं बिकता, योग्यता से मिलता है, आप योग्य होंगे तो बन जाएंगे। जबकि मैं पहले ही साफ बता चुका था कि मैं पांचवीं पास हूं, लिखना-पढ़ना नहीं आता, बस मोबाइल में बोलकर टाइप कर लेता हूं। इसके बावजूद वह मुझे 1100 में जिला स्तरीय पद देने को तैयार थे।

यही आज की सच्चाई है। जिसके हाथ में स्मार्टफोन है, वह स्वघोषित पत्रकार बन चुका है। वॉइस टाइपिंग और एआई ने इस फर्जी पत्रकारिता को और आसान बना दिया है। जो अनपढ़ हो, पत्रकारिता के ‘प’ से भी मतलब न हो, मगर जेब में पैसा हो तो गाड़ी पर प्रेस, पत्रकार, मीडिया लिखकर बेखौफ घूम रहा है। और इन्हीं के बीच असली पत्रकार अपने अस्तित्व की जद्दोजहद लड़ने को मजबूर है।

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