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कोई बता सकता है अमीर और गरीब पत्रकार की नौकरी जाने में इतना फर्क क्यों होता है?

रंगनाथ सिंह-

मीर पत्रकारों की नौकरी जाना न्यूज है। गरीब पत्रकारों की नौकरी जाना एक नंबर है जो किसी छोटी खबर में दर्ज होता है।

अमीर पत्रकारों की नौकरी जाने से पत्रकारिता संकट में पड़ जाती है। गरीब पत्रकारों की नौकरी जाना बढ़ती बेरोजगारी (सॉरी आकांक्षी) का आंकड़ा भर है।

अमीर पत्रकार जब नौकरी छोड़ता है तो वह पूँजीपति या/और सरकार के खिलाफ क्रान्ति कर रहा होता है। गरीब पत्रकार जब नौकरी छोड़ता है तो उसके बाद दूसरी नौकरी की तलाश में निकल रहा होता है।

क्या कोई बता सकता है कि ऐसा क्यों होता है?


इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़ें…

अजीत सिंह-

बड़े पत्रकार नौकरी जाते ही लोकतंत्र और पत्रकारिता पर खतरे का ऐलान कर देते हैं। उनके यूट्यूब को फोलो करना आपके भीतर सरोकारों के बचे होने का सबूत हुआ करता है।

अजय कुमार-

क्योंकि लोकमानस में पत्रकार केवल रवीश, अंजुम, पुण्य प्रसून आदि आदि हैं। बाकी सब लोकमनासा में कुछ भी नहीं है। इसलिए लोकमानस उसी की चिंता करता है जो उसके मानस में पत्रकार है।

जाहिद अली-

कुछ पत्रकार तो नौकरी करते हुए भी आधे बेरोजगार हैं क्योंकि वहां पर वेतन का टोटा लगा रहता है।

सुरेश पांडेय-

ये सिर्फ पत्रकारिता तक नहीं बल्कि वकालत से अध्यापकीय तक छायी घटाए है!

संजीव कुमार-

ऐसा इसलिए होता है कि अमीर पत्रकार के पास बैंक में तगड़ा बैलेंस होता है. छोटे पत्रकारों के सामने रोटी का संकट होता है. अमीर और बड़े पत्रकार वेल कनेक्टेड होते हैं इसलिए उनकी क्रांति भी स्पॉंसर हो जाती है. बाक़ी छोटा श्रमजीवी तो बस नंबर है।

स्वाति बख्शी-

जवाब तो नहीं है लेकिन बहुत सारे और अस्तित्व संबंधी सवालों की तरह भारतीय मीडिया इस सवाल को भी दबाए बैठा हुआ है. शायद इसका संबंध इसी बात से है कि कुछ लड़ाईयां मुख्यधारा बन जाती हैं या बना दी जाती हैं जबकि कुछ लड़ाईयां चुपचाप गुमनामी में लड़ी जाती हैं. अक्सर दूसरी नौकरी की तलाश में निकला पत्रकार भी कई असहमतियों को समेटे, वो सीमाएं लांघने की कोशिश ही कर रहा होता है जो उसने बनाई ही नहीं लेकिन जिनमें उसकी ज़िंदगी क़ैद है. हर किसी को वो ज़ुबान आती भी नहीं कि अपनी लड़ाई को ख़ुद ही स्त्रीवाद या मानवता की सबसे ज़रूरी लड़ाई घोषित कर दे.

मनोरमा सिंह-

अमीर पत्रकार पहले टीवी चैनल पर पैसा पीट रहे थे अब You tube पर पीट रहे हैं। जो ब्रैंड नेम वाले हैं वो भी और जो छोटे नाम हैं ब्रैंड नेम वाले के द्वारा एंडोरस्मेंट के प्रिविलेज से संपन्न हैं, फटीचर हालत उनकी ही है जो पहले ही नौकरी में नहीं थे और अब Youtube पर भी इन सबके आगे मार्जिनाइज़्ड हैं, संसाधन, पहुंच, सम्पर्क, आमदनी सभी से।

प्रमोद कुमार पांडेय-

ये (जिनकी आप बात कर रहे हैं) अमीर पत्रकार ही इन गरीब (जिनकी बात हो रही है) पत्रकारों के बॉस होते हैं। ‘बॉस’ की एक खूबी यह भी मानी जाती है कि अपना मनचाहा पैकेज तो ले ले बाकी आप सस्ते से सस्ते श्रमिक जुटायेंगे! वे गरीब पत्रकार जो किन्हीं वजहों से मजबूर, लाचार, हताश भी हों!

प्रत्यक्ष मिश्रा-

इस असमानता की जड़ पूंजीवादी मीडिया ढांचे में छिपी है, जहाँ बड़े पत्रकार सत्ता और संस्थानों के करीब होते हैं और उनके पास पहले से ही संसाधनों और संपर्कों की कमी नहीं होती। वे जब नौकरी छोड़ते हैं, तो उनके पास नए दरवाजे खुल जाते हैं—लेखक, यूट्यूबर, स्वतंत्र पत्रकार, या फिर किसी विदेशी संस्था में शोधकर्ता बनने का विकल्प। लेकिन गरीब पत्रकार, जो हाशिए पर होता है, उसके पास ऐसा कोई सुरक्षा जाल नहीं होता।

यह फर्क सिर्फ पत्रकारिता तक सीमित नहीं, बल्कि पूरे समाज में व्याप्त वर्गीय भेदभाव का प्रतिबिंब है। बड़े लोगों की तकलीफ ‘संस्थान पर खतरा’ बन जाती है, जबकि छोटे लोगों की तकलीफ सिर्फ उनका निजी संघर्ष रह जाती है।

यह हमारी सामाजिक चेतना का भी सवाल है—हम किसकी आवाज़ सुनते हैं और किसकी अनसुनी कर देते हैं?

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