
प्रधानमंत्री के खिलाफ कार्रवाई करने में चुनाव आयोग के हाथ-पांव फूले, नोटिस की खबर हेडलाइन मैनेजमेंट से ज्यादा नहीं है। कार्रवाई की औपचारिकता का आलम है कि प्रधानमंत्री ने लोगों को इनहेरीटेंस टैक्स में उलझा दिया। पहले आरोप लगाया कि कांग्रेस सत्ता में आई तो यह टैक्स लगाएगी, बाद में कहा कि राजीव गांधी ने इसे अपने फायदे के लिए हटा दिया था। पर इसमें यह चिन्ता नहीं हुई कि राजीव गांधी ने संजय गांधी का हिस्सा दिया या नहीं और दिया तो क्या, मेनका गांधी को फायदा हुआ कि नहीं। हालांकि, इस मारे यह गूगल सर्च किया जाने वाला सबसे बड़ा मुद्दा बन गया। चर्चा है कि लोगों को लड़ाया जा रहा है, मुझे लगता है राहुल और वरुण को अब गले लग जाना चाहिये
संजय कुमार सिंह
देश में चल रहे आम चुनावों के दूसरे चरण का मतदान आज है और आज के दिन मेरे सातों अखबारों ने चुनाव आयोग की छवि बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है। आप जानते हैं कि एक सदस्य वाला टीएन शेषण का चुनाव आयोग कैसा था और उसके बाद तीन सदस्यों वाले चुनाव आयोगों ने क्या-क्या किया है और इस बार तीन सदस्य कैसे चुने गये हैं। मेरे जैसे साठ पार वालों को शेषन से पहले के भी चुनाव याद हैं और अभी इस विस्तार में जाने की जरूरत नहीं है। लेकिन यह बताना जरूरी है कि निष्पक्ष चुनाव कराना सरकार का ही काम है भले यह काम चुनाव आयोग करता है। ईवीएम के खिलाफ शिकायत और निष्पक्ष चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति तथा उन्हें स्वतंत्र रूप से काम करने का माहौल देना सरकार का ही काम है। प्रधानमंत्री या सत्तारूढ़ दल के प्रधानप्रचारक से यह अपेक्षा रहती है कि वे कायदे कानूनों का पालन करें और आदर्श आचार संहिता में बंधे रहें।
कायदे से प्रधानमंत्री को ऐसा कुछ करना ही नहीं चाहिये कि चुनाव आयोग के पास शिकायत भी जाये और जाये तो यह नजर आना चाहिये कि चुनाव आयोग ने स्वतंत्र रूप से जरूरी कार्रवाई की है। पर 2014 के बाद के चुनावों से ऐसा लगता नहीं है। इस बार भी वैसा ही है लेकिन आज के अखबार (नवोदय टाइम्स) में यह पढ़कर कि, “निर्वाचन आयोग ने पहली बार लिया पीएम के खिलाफ शिकायत का संज्ञान, भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा को नोटिस” – से कौन नहीं प्रभावित होगा। इसी से बचने के लिए मैं अपना वोट सुबह अखबार देखने से पहले डाल आया था वरना मैं भी चुनाव आयोग की निष्पक्षता और अखबारों की निष्ठा से प्रभावित हो सकता था। आप भी हुए ही होंगे। वोट डाल आये तो अगली बार ध्यान रखियेगा। आज नहीं डालना था तो पढ़ कर समझिये कि यह नोटिस कैसे बेमतलब है और हेडलाइन मैनेजमेंट का हिस्सा। इरादतन न हो तब भी।
आप जानते हैं कि चुनाव प्रचार में देश के प्रधानमंत्री और सत्तारूढ़ भाजपा के प्रधान प्रचारक नरेन्द्र मोदी ने कायदे कानूनों के साथ नैतिकता की भी धज्जियां उड़ा दी हैं और यह कोई नई बात नहीं है। हालत यह है कि 2019 के चुनाव में उन्होंने पहली बार के मतदाताओं से पुलवामा के नाम पर वोट मांगा था और इसपर प्रधानमंत्री के समर्थक एंकर को भी यकीन नहीं था। इसके लिए उन्हें ऑन एयर बेइज्जती झेलनी पड़ी। इस बार पुलवाला जैसा कुछ नहीं है तो इतवार को प्रधानमंत्री ने बेहद आपत्तिजनक भाषण दिया था। बाद में कुछ सुधार के साथ वही सब दोहराते रहे और नये पर झूठे व गलत आरोप भी लगाये। आज के अखबारों में उसकी भी खबर है लेकिन लीड और सेकेंड लीड तो चुनाव आयोग की कथित कार्रवाई की ही खबर है।
प्रधानमंत्री के आपत्तिजनक भाषण की शिकायत आम लोगों के साथ विपक्षी दलों ने भी चुनाव आयोग से की थी। उसकी खबर भी छपी थी फिर भी, चुनाव आयोग ने पहले आपत्तिजनक भाषण की रिकार्डिंग और स्क्रिप्ट मंगाई। कल के अखबारों में खबर छपी कि अमुक कार्रवाई हो सकती है और आज कई दिनों बाद कार्रवाई के नाम पर नोटिस भेजने की खबर है। वैसे तो इस नोटिस का कोई मतलब नहीं है और यह सब आज के अखबारों में भी छपा है। लेकिन हेडलाइन मैनेजमेंट का कमाल है कि अमर उजाला का शीर्षक है, “मोदी और राहुल के बयानों पर आयोग को नोटिस, नफरत फैलाने का आरोप”। चुनाव आयोग ने कहा, अध्यक्षों को स्टार प्रचारकों के भाषण की लेनी होगी जिम्मेदारी। यहां तथ्य यह है कि प्रधानमंत्री (और अगर राहुल गांधी कुछ आपत्तिजनक बोल रहे थे तो वे भी) ने इतवार को जो आपत्तिजनक कहा था उसके लिए गुरुवार को नोटिस जारी किया गया (इतवार को वीडियो सोशल मीडिया पर उपलब्ध था) और आज मतदान हो जायेगा उसके बाद ही जवाब दिया जाना है।
गलत और झूठे आरोप से जिसे फायदा होना था हो चुका होगा और जिसे नुकसान होना था हो जायेगा। अमर उजाला ने शिकायतों, आरोपों और चुनाव आयोग के दावों को भी फिर से छापा है जबकि आयोग ने कार्रवाई करने में असामान्य देरी की। मुझे लगता है कि प्रधानमंत्री को अपने ही बनाये चुनाव आयुक्तों का डर होता तो वे अनैतिक और गलत बयान देते ही नहीं। इसी तरह चुनाव आयुक्तों को पहले के आयुक्त का हश्र पता होने के बावजूद कार्रवाई करनी होती तो वे पद स्वीकार क्यों करते और ऐन मौके पर इस्तीफा देने वाले चुनाव आयुक्त का इस्तीफा स्वीकार क्यों किया जाता। जो भी हो, कार्रवाई सामान्य नहीं है और कई अखबारों में जिस तरह छपी है वह निश्चित रूप से चुनाव आयोग की प्रशंसा है और उसे सुरक्षा देना है।
आज हिन्दी के अपने दोनों अखबारों, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में इस खबर और शीर्षक की चर्चा ऊपर कर चुका हूं। अब आइये, अंग्रेजी के अपने पांच अखबारों में चुनाव आयोग की ‘कार्रवाई’ की सूचना देने वाली खबरों के शीर्षक देख लें –
1. इंडियन एक्सप्रेस
आज दूसरे चरण का मतदान है और 88 सीटों के लिए वोट पड़ेंगे यह मुख्य शीर्षक और लीड है। लेकिन आज की सबसे बड़ी या प्रमुख खबर की जगह छपा है, “चुनाव आयोग ने भाजपा, कांग्रेस से मोदी, राहुल के खिलाफ शिकायतों का जवाब मांगा”। भाजपा अध्यक्ष जेपी नड्डा और कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे को 29 अप्रैल तक जवाब देना है। एक और शीर्षक है, स्टार प्रचारकों के नाम नहीं लिये कहा, मामलों के आधार पर कार्रवाई करेगा। एक्सप्रेस की इस खबर के अनुसार आयोग की चिट्ठी में प्रधानमंत्री का नाम नहीं है पर इसमें कांग्रेस, भाकपा, माकपा (एमएल) द्वारा दाखिल शिकायतें हैं जो 21 अप्रैल को प्रधानमंत्री ने बांसवाड़ा, राजस्थान में दिये भाषण से संबंधित हैं। अखबार ने इसके साथ एक्सप्रेस एक्सप्लेन्ड में छापा है, उम्मीदवारों की बजाय पार्टी को नोटिस भेजना चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया में बदलाव का संकेत है।
2. द हिन्दू
मोदी के खिलाफ शिकायत के लिए चुनाव आयोग ने नड्डा को नोटिस भेजा। चुनाव आयोग ने कहा कि उच्च पदों पर बैठे लोगों के चुनाव अभियान के भाषणों का ज्यादा गंभीर परिणाम होता है। खरगे और राहुल गांधी – दोनों से संबंधित शिकायतों के लिए खरगे को भी ऐसा ही नोटिस दिया गया है।
3. टाइम्स ऑफ इंडिया
प्रधानमंत्री, राहुल के भाषणों पर भाजपा और कांग्रेस को चुनाव आयोग के नोटिस। पार्टी प्रमुखों से सोमवार सुबह तक जवाब मांगा। लीड के साथ अखबार ने खबर दी है कि दिल्ली हाईकोर्ट में एक जनहित याचिका दायर की गई है जो आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करने के कारण प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी को चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने की मांग करती है। याचिका में आरोप लगाया गया है कि 9 अप्रैल को उत्तर प्रदेश के पीलीभीत में भाषण देते हुए उन्होंने भगवान और पूजास्थल के नाम पर वोट मांगा था।
4. हिन्दुस्तान टाइम्स
हिन्दस्तान टाइ्म्स में यह खबर लीड नहीं है लेकिन लीड के बराबर में टॉप पर बोल्ड फौन्ट वाले शीर्षक के साथ छपी है जबकि लीड का शीर्षक भले बड़ा है पर हल्के फौन्ट में है। जो भी हो, चुनाव आयोग की खबर का शीर्षक बहुत गंभीर खबर जैसा है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, “चुनाव आयोग (ईसी) ने मोदी, राहुल के भाषणों के लिए नोटिस भेजा”। इसके साथ अलग रंग, बॉक्स और रिवर्स में हाइलाइट किया गया है, ईसी के नोटिस में क्या कहा गया है। कुल मिलाकर मोदी को कसने की अपनी जिम्मेदारी चुनाव आयोग ने पार्टी अध्यक्ष जेपी नड्डा पर डाल दी है। मकसद नौकरी बचाये रखना भी हो तो गलत है। असल मकसद और उसके लिए की गई व्यवस्था को समझाने की जरूरत अभी नहीं है।
5. द टेलीग्राफ
दूसरे दौर के मतदान में शामिल होने वालों की संख्या पर नजर (फ्लैग शीर्षक) प्रधानमंत्री के मामले में हाथ-पांव फूले, चुनाव आयोग ने पार्टी को कसा। खबर के अनुसार आयोग ने यह नहीं बताया है कि दोनों प्रमुख प्रचारकों को नोटिस भेजे गये हैं कि नहीं। आमतौर पर आचार संहिता का उल्लंघन करने वालों को आयोग नोटिस भेजता है। इस चुनाव में आरोपियों के पार्टी नेताओं को भी चुनाव आयोग ने नोटिस भेजा है। वैसे तो वरिष्ठ राजीतिज्ञों के लिए कोई छूट नहीं है पर यह पता नहीं है कि आयोग ने कभी किसी प्रधानमंत्री को नोटिस भेजा है कि नहीं। 1975 में जब इंदिरा गांधी को सांसद के रूप में अयोग्य ठहराया गया था तब कार्रवाई इलाहाबाद हाईकोर्ट ने की थी, चुनाव आयोग ने नहीं।
इन दिनों दिल्ली के उपराज्यपाल को मार-पीट के मामले में अदालत से राहत मिली हुई है और मुख्यमंत्री जेल में हैं। राहुल गांधी को यह पूछने के लिए दो साल की सजा हो चुकी है और हाई कोर्ट से राहत नहीं मिली थी कि सभी चोरों के नाम मोदी क्यों होते हैं। आतंकवाद की आरोपी साध्वी प्रज्ञा को भोपाल की जनता सांसद चुन चुकी है और समझौता ब्लास्ट के आरोपियों को सजा नहीं हुई तो उनकी अपील नहीं की जायेगी यह तबके गृह मंत्री ने पहले ही कह दिया था। जजों को ईनाम देने के मामले सार्वजनिक हैं। चुनाव आयोग ने प्रधानमंत्री के रविवार के भाषण पर अब पार्टी अध्यक्ष को नोटिस भेजा है जबकि उन्होंने अपने आरोप (सब नहीं) दोहराये हैं और नये पर गलत और झूठे आरोप भी लगाये हैं।
इनहरीटेंस टैक्स और कानून
टाइम्स ऑफ इंडिया ने आज प्रधानमंत्री के एक आरोप को लीड के बराबर तीन कॉलम में दो लाइन के शीर्षक से छापा है। चालाकी इस खबर के शीर्षक से टपक रही है। इसके अनुसार प्रधानमंत्री ने कहा है कि लोगों ने कहा कि राजीव (गांधी) ने अपनी संपत्ति बचाने के लिए इस्टेट लॉ को खत्म कर दिया। खबर के अनुसार प्रधानमंत्री ने इनहेरीटेंस टैक्स को लेकर गुरुवार को लगातार दूसरे दिन कांग्रेस पर हमला किया। यह कहते हुए कि कई लोगों ने यह आरोप लगाया था कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी ने जब भारत की इस्टेट ड्यूटी खत्म की थी तब कई लोगों ने यह संकेत दिया था कि ऐसा उन्होंने प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के निधन के बाद की उनकी संपत्ति को हासिल करने के लिए किया था। इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्तूबर 1984 को हुई थी और प्रधानमंत्री ने पूरे नाटकीय अंदाज में कहा जिसे टाइम्स ऑफ इंडिया ने भी छापा है। एक दिलचस्प तथ्य पेश कर रहा हूं के साथ उन्होंने कहा, तब चर्चा थी और व्यापक रूप से चर्चा थी कि जब इंदिरा जी नहीं रहीं और उनके बेटे राजीव गांधी जी को ये प्रोपर्टी मिलने की थी ….. सरकार को पैसा चला न जाये , प्रोपर्टी को बचाना था …. उस समय के प्रधानमंत्री श्रीमान राजीव गांधी ने अपनी संपत्ति बचाने के लिए पहले जो इनहेरीटेंस कानून था उसको समाप्त किया और उनके पैसे बचा लिये।
प्रधानमंत्री ने ऐसा कहा है तो कुछ बाते मैं भी याद दिला देता हूं। चूंकि यह संबंधित तथ्य है इसलिए प्रधानमंत्री को बाकी सब भी मालूम होना चाहिये था और नहीं होने का कोई कारण नहीं है। इसके बावजूद उन्होंने कहा है तो उनका मकसद क्या होगा और क्या हो सकता है। एक व्यक्ति जो इतना लोकप्रिय है, जिसके इतने प्रशंसक हैं वह इस तरह से वोट लेता है या लेना चाहता है तो उसे क्या माना जाये। खासकर तब जब वह एक देश एक चुनाव की बात करता है। उसके समर्थक संविधान बदलने की बात करते हैं और तानाशाही से परहेज नहीं है तथा निर्वाचित मुख्यमंत्री तक को जेल में रखना सही ठहराया जा रहा है जबकि भष्टाचार के तमाम आरोपियों को दल में शामिल ही नहीं किया गया है। मंत्री और मुख्यमंत्री के पद दिये गये हैं।
इनहेरीटेंस टैक्स का मुद्दा
प्रधानमंत्री को इनहेरीटेंस टैक्स को मुद्दा बनाना था तो तब बनाना चाहिये था जब खबरें आ रही थीं कि रेमंड समूह के विजयपत सिंघानिया को उनके बेटे ने संपत्ति से बेदखल कर दिया है। फिर खबर आई थी कि 11000 करोड़ के मालिक गौतम सिंघानिया की पत्नी ने सड़क पर हंगामा किया पत्नी को अलग कर दिया। फिर पिता से सुलह की खबरें फैलाई जिससे पिता ने इनकार कर दिया। ऐसे में देश को एक अच्छे इनहेरीटेंस कानून से किसे दिक्कत हो सकती है। जब कुछ मिलता ही नहीं है तो टैक्स देकर कुछ मिले तो बुरा किसे लगेगा? जरूरी नहीं है कि सैम पित्रोदा ने अमेरिका की बात की तो उसी से तुलना की जाये। जनता के हित में कानून और व्यवस्था तो होनी ही चाहिये। बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ और नारी शक्ति वंदन विधेयक जैसे प्रचार हम देख चुके हैं हैं। पर हिन्दी पट्टी में क्या बेटियों को पिता की संपत्ति में हिस्सा मिलता है? शायद उन्हें पता भी न हो कि बेटियां दान कर दी जाती हैं। भिन्न शहरों में तमाम बोर्ड लगे मिल जायेंगे कि यह संपत्ति विवादास्पद है। खरीद-बिक्री करने वाले स्वयं जिम्मेदार होंगे। ऐसे में ना संपत्ति बंटती है ना टैक्स मिलता है। कारण साफ है कानून स्प्ष्ट नहीं है और मानने की मजबूरी भी नहीं। सरकार को इसकी चिन्ता करनी चाहिये पर सरकार किसी तरह वोट पाने में लगी है।
ऐसे में राहुल गांधी देश पर जिस तरह की बात करते हैं वह कितना गंभीर है और क्यों लोग उन्हें बदनाम करने में लगे हुए हैं। खासकर झूठे आरोपों के सहारे जबकि प्रधानमंत्री ने वैसी बातें कम नहीं की हैं। प्रधानमंत्री ने मतदान से पहले इनहेरीटेंस टैक्स को मुद्दा बना दिया, राजीव गांधी और कांग्रेस पर आरोप लगा दिये लेकिन सच्चाई कुछ है। बहुत सारी बातें सार्वजनिक हैं और पुराने लोगों को मालूम हैं फिर भी ऐसा किया गया औऱ कई अखबारों ने सिर्फ वही प्रचारित किया जो प्रधानमंत्री या सरकार के फायदा का है। निश्चित रूप से यह सरकार में होने का दुरुपयोग है लेकिन अलग मामला है।
गौर करने वाली बात है कि मतदान से पहले प्रधानमंत्री ने इनहेरीटेंस टैक्स को मुद्दा बनाया जबकि राजीव गांधी ने उसे हटाया था लेकिन लोगों में यह डर फैलाया गया कि कांग्रेस को सत्ता मिली तो वह ऐसा कर देगी। प्रधानमंत्री के कहने के बाद यह दुनिया भर में टीवी वीडियो पर सुना-सुनाया गया और चुनाव आयोग ने रविवार को जो कहा गया था उसपर गुरुवार को नोटिस जारी किया है और उसकी खबर भी आज उतनी ही प्रमुखता से छपी है। यहां मुद्दा है कि अमेरिका में सैम पित्रोदा ने इनहेरीटेंस टै्स की बात की तो प्रधानमंत्री ने उसे लपक लिया और एक दिन पहले कहा था कि कांग्रेस यह टैक्स लगाना चाहती है। जब यह फैल गया कि भाजपा के वित्त राज्य मंत्री जयंत सिन्हा इसकी वकालत कर रहे थे। अरुण जेटली ने भी इसकी बात की थी तो प्रधानमंत्री से पलटी मारी। ऐसा जयराम रमेश ने कहा है और यह टाइम्स ऑफ इंडिया में छपा है।
टाइम्स ऑफ इंडिया ने ही बताया है कि प्रधानमंत्री द्वारा मतदान से कुछ पहले इनहेरीटेंस टैक्स को मुद्दा बनाये जाने से गूगल पर इसे सबसे ज्यादा सर्च किया गया। 25 अप्रैल को यह पिछले 25 वर्षों में सबसे ज्यादा गूगल सर्च किया जाने वाला मुद्दा बन गया। इनहेरीटेंस टैक्स 2004 के बाद सबसे ज्यादा सर्च किया गया और सैम पित्रोदा को भी सर्च किया गया। मतलब यह कि प्रधानमंत्री ने लोगों को परेशान किया या गूगल व आम लोगों को काम दिया। वह भी तब जब सबको पता है कि इंदिरा गांधी ने अपने पूर्वजों से हो हासिल किया था उसमें बहुत बड़ा बंगला इलाहाबाद का आनंद भवन, बहुत पहले दान कर चुकी थीं और वह जवार लाल नेहरू ट्रस्ट के पास है। इसके अलावा इनहेरीटेंस टैक्स से अगर राजीव गांधी को फायदा हुआ होगा तो उनके भाई संजय गांधी का हिस्सा कहां गया? क्या वह मेनका गांधी और वरुण गांधी को मिला?
दोनों भाजपा में हैं तो प्रधानमंत्री को चिन्ता होनी चाहिये थी कि उन्हें उनका हिस्सा मिला या नहीं और अगर मिला तो लाभ उन्हें भी हुआ ही होगा। नहीं मिला तो प्रधानमंत्री की जिम्मेदारी है कि उसके लिए काम करें और बतायें। यह सब तो नहीं हुआ। कुल मिलाकर इनहेरीटेंस टैक्स को मुद्दा बनाने से कई दिलचस्प बातें हुईं और तय हो गया कि प्रधानमंत्री के पास वोट बटोरने के लिए कोई मुद्दा नहीं है और वोट के लिए वे कितने हताश परेशान हैं। प्रधानमंत्री के लिए यह सब मु्दा नहीं है क्योंकि देश के लिए यह मु्द्दा नहीं है कि ऐसे व्यक्ति को चुनाव लड़ने से प्रतिबंधित किया जाना चाहिये। इस आशय का एक मुकदमा ल्ली हाईकोर्ट में किया गया है पर उसकी खबर को प्रमुखता नहीं मिली।
जहां तक प्रधानमंत्री के आरोपों का सवाल है, कांग्रेस ने बताया है कि इनहेरीटेंस टैक्स 16 मार्च 1985 को या उसके बाद होने वाली मौतों पर लागू होने वाला था। कांग्रेस ने यह तथ्य कल ही सार्वजनक कर दिया था। इसके बाद प्रधानमंत्री के आरोप छपने ही नहीं चाहिये थे और छपे तो उसी प्रमुखता से बताया जाना चाहिये था कि इंदिरा गांधी की हत्या 31 अक्तूबर 1984 को ही हो गई थी। इसके बिना प्रधानमंत्री की राजनीति जो है, जैसी है, सबको बताई जानी चाहिये ऐसा नहीं करना पाठकों दर्शकों के साथ विश्वासघात है पर …. कुछ नहीं होने वाला है। चुनाव परिणाम तक ऐसे मामले सुनने जानने के लिए मुझे यहां पढ़ते रहिये।


