
संजय कुमार सिंह
महाराष्ट्र और झारखंड में चुनाव चल रहे हैं। महाराष्ट्र विधानसभा के पिछले चुनाव में बहुमत नहीं होने के बावजूद भाजपा और उसके सहयोगियों ने सत्ता में रहने के लिए क्या सब किया और वह सरकार कैसे चलती रही, जनहित के कितने काम किया वह सब दुनिया को पता है। झारखंड में भाजपा सरकार गिरा नहीं पाई लेकिन कोशिशें वहां भी कम नहीं हुई और आग लगाने वालों को कपड़ों से पहचानने के दावे के बावजूद बहुमत नहीं मिला। भ्रष्टाचार के आरोपी मुख्यमंत्री ही चुनाव हार गये, भाजपा के बागी से। फिर भी, भ्रष्टाचार के आरोपी मुख्यमंत्री को उड़ीशा का राज्यपाल बना दिया गया और उनके बेटे ने वहां भी कांड कर दिया। सबके बावजूद उनकी बहू को भाजपा ने टिकट दिया है। कांग्रेस उम्मीदवार डॉक्टर अजय कुमार ने राज्यपाल पर बहू के लिए चुनाव प्रचार करने का आरोप लगाया है। ऐसे में चुनाव जीतने के लिए हर उपाय करने वाली भाजपा और उसके समर्थक अखबारों में प्रचार वाली खबर छापने-छपवाने में कोई कसर नहीं छोड़ रहे हैं। यह अलग बात है कि भाजपा ने महाराष्ट्र की ही तरह कर्नाटक में भी जनादेश की अवहेलना करके अपनी सरकार बना ली थी। अब कर्नाटक से भाजपा साफ हो चुकी है। राजनीति के इस दौर में पत्रकारिता के सामान्य नियमों की भी अवहेलना हो रही है। चुनावी आचार संहिता की धज्जियां तो पहले भी उड़ती रही हैं।
पत्रकारों-एंकरों का हाल यह हो गया है कि सरकार के खिलाए सूचनाएं उनके पास होती ही नहीं हैं। 2019 के लोक सभा चुनाव में शहीद सैनिकों के नाम पर वोट मांगे गये थे। यह एक सर्वविदित सत्य है। चुनाव आयोग ने कार्रवाई नहीं की लेकिन इसकी जानकारी एक मशहूर चैनल की वरिष्ठ एंकर को नहीं थी और अब यह भी सार्वजनिक है। इसके बावजूद मीडिया को निष्पक्ष रहने की जरूरत महसूस नहीं होती है। ऐसे में आज प्रधानमंत्री की घोषणा, 70 पार के बुजुर्गों को पांच लाख तक मुफ्त इलाज और 51 हजार युवाओं को नियुक्ति पत्र देने की खबर कई अखबारों में लीड नहीं है। इसका एक कारण तो यही है कि चुनाव के समय ऐसी घोषणाएं उचित नहीं है। पर प्रधानमंत्री बार-बार होने वाले चुनावों से परेशान हैं। उन्हें विकास की ऐसी घोषणाएं करने के लिए पूरा साल चाहिये। इसलिए वे घोषणाएं किये जा रहे हैं और ‘एक देश एक चुनाव’ पर कार्रवाई भी चल रही है। यह अलग बात है कि उसकी घोषणा भी एक चुनाव के समय की गई थी। 70 पार के बुजुर्गों को मुफ्त इलाज की इस सुविधा का लाभ छह करोड़ लोगों को होगा। आज यह खबर इंडियन एक्सप्रेस, अमर उजाला, नवोदय टाइम्स और दि एशियन एज में लीड है। द हिन्दू में सेकेंड लीड है।
हिन्दुस्तान टाइम्स में यह पहले पन्ने से पहले वाले अधपन्ने पर लीड है। अखबार की लीड भारत-चीन डिसएंगेजमेंट की है और यह भी अनाम सूत्रों के हवाले से है। अखबारों ने लिखा है कि इस मामले के जानकार लोगों ने सूचना दी। जाहिर है संबंधित लोगों ने सूचना दी तो वह उनका हित था और एक अखबार ने यह सूचना ली तो और भी कइयों ने ली है। उसपर आने से पहले बता दूं कि किसी ने यह जानने और बताने की कोशिश नहीं की है कि सेबी प्रमुख माधवी पुरी बुच संसद की लोक लेखा समिति के समक्ष उपस्थित नहीं हुईं तो अब आगे क्या हो रहा है। चलिये, मान लेता हूं कि यह तो पूछकर बताना होगा और पूछने के लिए जरूरी है कि उनका नंबर हो, उनसे संपर्क हो आदि आदि। यह भी सही है कि जब वे संसद की समिति के समक्ष नहीं आईं तो किसी आम संवाददाता को क्या घास डालेंगी। ऐसे में कांग्रेस ने माधवी पुरी से संबंधित वीडियो बनाये हैं और न सिर्फ नये खुलासे किये हैं बल्कि प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी पर सिंडिकेट चलाने का आरोप भी लगाया है। यह खबर आज द टेलीग्राफ में है। अपने अखबार में आप ढूंढ़िये और तय कीजिये कि आपका अखबार एकतरफा खबरें ही तो नहीं देता है।
अनाम सूत्रों से प्राप्त खबर को लीड बनाने के मुकाबले द टेलीग्राफ ने सिंगल कॉलम में छापा है, जमीन और हवा से सेना ने चीन के पीछे हटने की पुष्टि की। नई दिल्ली डेटलाइन से इमरान अहमद सिद्दीकी की बाईलाइन वाली खबर है, भारतीय सेना ने पिछले सप्ताह शीर्ष सैन्य कमांडरों द्वारा हस्ताक्षरित समझौते के अनुसार चीनी वापसी की प्रगति का पता लगाने के लिए पूर्वी लद्दाख में देपसांग मैदानों और डेमचॉक में अतिक्रमण बिंदुओं पर “भौतिक सत्यापन” शुरू कर दिया है। वैसे तो यह भी सूत्रों की जानकारी है पर कुछ नई और अलग है। जहां तक ना कोई घुसा है ना घुसा हुआ है के चार साल बाद डिसएंगेजमेंट की बात है, द टेलीग्राफ ने लिखा है, दोनों पक्षों ने डिसएंगेजमेंट का काम कथित रूप से 90 प्रतिशत पूरा कर लिया है। यह सिंगल कॉलम की खबर है, पहले पन्ने पर है तो भी। पूर्व सेना प्रमुख जनरल मनोज मुकुंद नरवणे ने इस बात पर जोर दिया है कि भारत को गश्त पर चीन के साथ समझौते पर “बहुत सावधानी से काम करना चाहिए, क्योंकि चीन की आदत एक बात कहने और उसके ठीक विपरीत करने की है”। रक्षा मंत्रालय के एक अधिकारी ने कहा, “जमीन पर और मानव रहित हवाई वाहनों (यूएवी) के माध्यम से भौतिक सत्यापन किया जा रहा है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि चीनी सेना ने दोनों पक्षों के बीच हस्ताक्षरित समझौते के अनुसार दो बिंदुओं पर वॉचटावर, बंकर और टेंट जैसी संरचनाओं को ध्वस्त किया है या नहीं।”
समझौते के अनुसार, दोनों पक्षों द्वारा क्षेत्र में बनाए गए सभी अस्थायी ढांचे और अन्य संबद्ध बुनियादी ढांचे को ध्वस्त कर दिया जाएगा और पारस्परिक रूप से सत्यापित किया जाएगा। गौरतलब है कि चार साल में यह खबर एक साथ कभी लीड के रूप में नहीं छपी, ना किसी ने एक्सक्लूसिव छापा। सैटेलाइट की फोटुएं जरूर छपीं पर उनकी पुष्टि नहीं हुई। अब खबर है कि दोनों पक्षों द्वारा भू-आकृतियों को गतिरोध से पहले की स्थिति में बहाल किया जाएगा और दोनों सेनाएँ अपने सैन्य उपकरणों को वास्तविक नियंत्रण रेखा (एलएसी) के अपने हिस्से के पीछे के स्थानों पर वापस लेगीं। सेना के एक अधिकारी ने कहा कि भारत जून 2020 में गलवान घाटी की घटना को ध्यान में रखता है, जब पेट्रोलिंग पॉइंट 14 से चीनी सेना द्वारा विघटन अभ्यास गड़बड़ा गया था, जिसके कारण हिंसक झड़प हुई थी जिसमें 20 भारतीय सैनिक और चार चीनी सैनिक मारे गए थे। मुझे लगता है कि दोनों सूत्रों की ही खबर है तो भी इनमें अंतर है। एक प्रचार लग रहा है जबकि दूसरा खबर की शैली में लिखा गया है। संभव है सरकारी विज्ञप्ति को जस का तस परोसने के कारण ऐसा हुआ हो।
जहां तक प्रधानमंत्री की घोषणा को महत्व देने या उसी के खबर होने की बात है, टाइम्स ऑफ इंडिया की आज की लीड गाजियाबाद में वकीलों पर पुलिस लाठी चार्ज की खबर है। मैं गाजियाबाद में रहता हूं, इसलिए संभव है कि यहां के एडिशन में यह खबर लीड हो पर यह खबर तो है ही। हिन्दुस्तान टाइम्स में यह खबर अधपन्ने पर है। शीर्षक में बताया गया है कि जज, पुलिस से भिड़ंत के बाद वकीलों ने पुलिस चौकी फूंक दी। टाइम्स ऑफ इंडिया में अधपन्ने की लीड भी ये दोनों खबरें नहीं हैं। यही नहीं, अखबार की सेकेंड लीड भी पहले बताई गई दोनों सरकारी और प्रचार वाली खबरों से अलग है। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होगा, नरेन्द्र मोदी ने आयुष्मान योजना नहीं लागू करने के लिए आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की आलोचना की। खबर का इंट्रो है, इनलोगों ने स्वास्थ्य से ज्यादा महत्व राजनीति को दिया; योजना का विस्तार 70 पार लोगों के लिए किया गया। इस खबर के साथ बॉक्स में हाईलाइट किया हुआ अंश है, एम्स ऋषिकेश में दुर्घटना पीड़ितों और मरीजों के लिए प्रधानमंत्री ने देश की पहली निशुल्क हेलीकॉप्टर इमरजेंसी मेडिकल सेवा शुरू की। यह उत्तराखंड के दूर-दराज के इलाकों के लिए है। मुझे याद आता है 90 के दशक के शुरू के किसी साल वायुसेना दिवस पर दिल्ली से उत्तर पूर्व के दौरे पर ले जाये जाने वाले पत्रकारों में मैं भी था। तब हमलोगों को बताया गया था कि पहाड़ों पर जीवन इतना मुश्किल है कि वायुसेना आम लोगों की मदद करती रहती है। इसमें पूजा के समय मूर्ति पहुंचाना भी शामिल था। ऐसे में मुझे आश्चर्य है कि उत्तराखंड में यह सेवा अब शुरू हुई है। देश में जब लोग शव कंधे पर और निजी वाहनों से ले जाने के लिए मजबूर हैं, अस्पतालों में स्ट्रेचर और व्हील चेयर नहीं होते हैं तो मैं जानना चाहूंगा कि उत्तर पूर्व में निजी कंपनी की भी ऐसी सेवा है कि नहीं?
आयुष्मान योजना के लिए अगर प्रधानमंत्री ने आम आदमी पार्टी और तृणमूल कांग्रेस की आलोचना की है तो कोलकाता के द टेलीग्राफ ने इसे कैसे प्रस्तुत किया है, जानना महत्वपूर्ण है। द टेलीग्राफ में यह खबर लीड है। अखबार में इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, आयुष्मान के स्वास्थ्य को खतरा। मुख्य शीर्षक है, प्रधानमंत्री ने बुजुर्गों से माफी मांगी, टीएमसी और आम आदमी पार्टी से नाराजगी जताई। खबर के अनुसार, योजना के विस्तार की घोषणा करते हुए उन्होंने कहा कि बंगाल और दिल्ली के बुजुर्ग इसका लाभ नहीं उठा पाएंगे, क्योंकि राज्य सरकारें इस योजना में शामिल नहीं हुई हैं। मोदी ने कहा, “अपने राजनीतिक स्वार्थ के लिए वे अपने बीमार बुजुर्गों पर अत्याचार कर रहे हैं।” इस पर प्रतिक्रिया देते हुए तृणमूल के राज्यसभा सदस्य डेरेक ओ ब्रायन ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना बंगाल की स्वास्थ्य साथी योजना की “नकल” है। उन्होंने आगे कहा, “बंगाल की स्वास्थ्य साथी योजना आयुष्मान से दो साल पहले शुरू हुई थी, यह 100 प्रतिशत कागज रहित और नकद रहित है। इसमें पहले से मौजूद सभी बीमारियों को शामिल किया गया है। इसमें परिवार के आकार की कोई सीमा नहीं है और पति-पत्नी दोनों के माता-पिता को शामिल किया गया है।”
आम आदमी पार्टी के सांसद संजय सिंह ने कहा कि आयुष्मान भारत योजना में कड़े मानदंड हैं, जिससे यह आम लोगों के लिए दुर्गम है। “अगर आपके घर में रेफ्रिजरेटर है, तो आप आयुष्मान भारत के लाभ के लिए पात्र नहीं हैं। अगर आपके पास बाइक है या आपकी मासिक आय 10,000 से अधिक है, तो आप इस योजना के तहत सहायता प्राप्त करने से बाहर हैं। दिल्ली में, अगर आयुष्मान भारत लागू भी हो जाए, तो इन प्रतिबंधात्मक शर्तों के कारण एक भी निवासी को इसका लाभ नहीं मिलेगा।” भाजपा और उसकी सरकार द्वारा बनाये गये राजनीतिक माहौल में चल रही पत्रकारिता की बात करूं तो आज इंडियन एक्सप्रेस में खबर है, सोरेन के प्रस्तावक, भाजपा नेताओं से मिले, उनका पीछा किया गया और उन्हें रोका गया, मुख्य चुनाव आयु्क्त ने हस्तक्षेप किया। खबर के अनुसार, झामुमो को जब यह पता चला कि मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन के प्रस्तावक भाजपा से मिल-जुल रहे है तो वह घबड़ा गई। इसके बाद एक-एक कर कई बातें हुईं जिससे मुख्य चुनाव आयुक्त को हस्तक्षेप करना पड़ा। खबर के अनुसार, हेमंत सोरेन के प्रस्तावक मंडल मुर्मू के भाजपा नेताओं से मिलने से सोरेन की उम्मीदवारी पर क्या असर पड़ता इस संबंध में मामूली स्पष्टता के बीच, मुर्मू के वाहन का पीछा किया गया और पुलिस ने उन्हें रोक लिया। बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त के हस्तक्षेप पर उन्हें छोड़ा गया लेकिन सत्तारूढ़ दल के मुख्यमंत्री के प्रस्तावक का पीछा करने, रोकने में नियमों का पालन नहीं किया गया। फिर भी अखबार ने लिखा है कि झारखंड मुक्ति मोर्चा की मुश्किलों इस बात से और बढ़ गईं कि मुर्मू ने स्वीकार किया कि उन्होंने भाजपा नेताओं से मुलाकात की है और अपहरण के आरोपों से इनकार कर दिया।
अखबार ने आगे लिखा है, जब मुर्मू का जब पीछा किया गया तब तक भाजपा ने बरहैट सीट से अपने उम्मीदवार की घोषणा नहीं की थी। मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन इसी सीट से चुनाव लड़ रहे हैं। भाजपा ने अपने उम्मीदवार की घोषणा सोमवार को की। खबर का भाव यह है कि सत्तारूढ़ झामुमो बेकार परेशान हुई लेकिन मुझे याद नहीं आता है कि किसी भाजपा सरकार में पुलिस ने ऐसा किया हो। यह सब गैर भाजपा सरकारों में क्यों होता है कि भाजपा के लोग आदर्श चुनावी आचार संहिता का पालन करते देखे जाते हैं और वह सब करते हैं जो नैतिक तौर पर नहीं किया जाना चाहिये। हालांकि भाजपा के ऐसे कारनामों में पुलिस का शामिल होना तो हमेशा सवालों के घेरे में है। यह खबर आज किसी और अखबार में पहले पन्ने पर नहीं मिली। यही नहीं, अमर उजाला के दूसरे पहले पन्ने पर आज विमानों को बम से उड़ाने की धमकी देने वाले का पता चल जाने की खबर है। यह भी किसी अखबार में उस प्रमुखता से नहीं है जितनी प्रमुखता से होनी चाहिये। यह अलग बात है कि अभी भी उसकी गिरफ्तारी नहीं हुई है और सिर्फ पहचान हुई है। इतने दिनों से इस व्यक्ति ने अगर पूरे सिस्टम को परेशान कर रखा था और धमकी देना रुक भी नहीं रहा था तो उसे गिरफ्तार नहीं किया जाना या फरार हो जाना भी बड़ी खबर है। पर इसे भी अखबारों ने महत्व नहीं दिया है।
चुनाव आयोग का सेबी जैसा व्यवहार
टाइम्स ऑफ इंडिया में हरियाणा चुनाव के नतीजों के बाद ईवीएम की शिकायत पर चुनाव आयोग के जवाब की खबर दो कॉलम में है। आयोग ने शिकायतों को “तुच्छ आशंका” कहा है और इसमें मतदान खत्म होने के 60 घंटे बाद भी ईवीएम की बैट्री 99 प्रतिशत चार्ज रहने पर सवाल शामिल हैं और इसके जवाब में पहले कहा गया था कि बैट्री पर उम्मीदवारों के प्रतिनिधियों के दस्तखत कराये जाते हैं। अगर आप जानते हैं कि ईवीएम कितना बड़ा होता है तो समझ सकते हैं कि उसकी बैट्री कितनी बड़ी होती होगी और उसपर कितने दस्तखत हो सकेंगे और कितनी बार कराये जा सकेंगे। यह सब तो अपनी जगह है ही वोट बढ़ने और जितने पड़े उससे कम गिने जाने जैसे मामले भी हैं। यह वैसे ही है जैसे सेबी प्रमुख को अदाणी की कंपनी में निवेश से कोई दिक्कत नहीं है और चूंकि जिसका काम है उसी को दिक्कत नहीं है तो सुप्रीम कोर्ट भी क्या करता। अब वही स्थिति चुनाव आयोग की है और उसे इसमें कुछ गलत नहीं लगता है जबकि पहले मतपेटियां लूट ली जाती थीं उससे सबको दिक्कत थी अब ईवीएम बदल दिये जाने की आशंका का कोई संतोषजनक जवाब नहीं है। जनसत्ता डॉट कॉम की खबर के अनुसार, आयोग ने स्पष्ट किया कि कांग्रेस के द्वारा हरियाणा चुनाव को लेकर उठाए गए सवालों में कोई तथ्य नहीं हैं। इसके अलावा,आयोग ने कांग्रेस को निराधार आरोप लगाने से बचने के लिए पत्र भी लिखा है।
30.10.2024


