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उत्तर प्रदेश

यूपी : प्रमुख सचिव प्रदीप दुबे के रिटायरमेंट की डेट सिर्फ भगवान को पता है!

अनूप गुप्ता-

विधान भवन के सामने से निकलो तो शानदार अतीत के कारण मुंह से निकलता है, वाह क्या बात है? इसके विपरीत अंदर क्या चल रहा है, यह अंदर वाला जानता है या अंदर आने-जाने वाला या फिर “ऊपर” वाला।

अंदर तानाशाही की पराकाष्ठा के चलते हालत खराब है और हालात अराजक। राजधानी के जो ऊपर वाले हैं, अंदर के जानकार भी हैं और राजदार भी, पर उन्हें देखकर तो यही लगता है कि वे सबकुछ जानकर भी अंजान हैं या फिर अंजान बनकर अनदेखी का स्वांग रच रहे हैं।

पूरी ईमानदारी, जिम्मेदारी, पुख्ता प्रमाणों और दावे से कहता हूं कि अंदर अराजकता का आलम है। अब जवाब जिम्मेदारों को देना है, क्योंकि हर बार विधानसभा सचिवालय के आधे लोगों की भर्ती बैकडोर से होती है। वह ऐसे आदमी के कर कमलों में थामी हुई कलम के जरिए, जिसकी खुद की नियुक्ति अवैध है। हाथ गंदे हैं, अपवित्र हैं और खून से सने भी।

कई कर्मचारियों की जिंदगी बर्बाद करने और आत्महत्या के लिए मजबूर करने का भी आरोप है। सुसाइड नोट में नाम तक लिखा मिला है पर नतीजा ढाक के तीन पात भर ही रहा।

पुलिस ने सुसाइड नोट में लिखे व्यक्तियों से बात तक करना जरूरी नहीं समझा था। न यह जांचा कि प्रेम के नाम पर विधानसभा सोसाइटी से निकाले गए लाखों रुपए कहां गए? अगर मामले की जांच निष्पक्ष तरीके से की गई होती तो कई लोग महीनों जेल में चक्की पीस रहे होते।

बात हो रही है विधानसभा के प्रमुख सचिव प्रदीप कुमार दुबे की। जनसूचना अधिकार के तहत मांगी गई जानकारी में भी इस बात का खुलासा हुआ है कि नियुक्ति अनुभाग ने 1 अप्रैल 2017 के उपरांत किसी भी सेवानिवृत्त होने वाले राज्य सरकार के अधीनस्थ विभागों के प्रमुख सचिव स्तर के अधिकारियों में से किसी को पुनर्नियुक्ति या सेवा विस्तार नहीं दिया है।

इसका सीधा मतलब है कि बिना किसी सरकारी आदेश के प्रदीप दुबे विस्तार पर विस्तार लेकर वित्तीय फैसले लेकर सरकार की जीरो टॉलरेंस नीति को धता बता रहे हैं।

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