अशोक कुमार पांडेय-
वरिष्ठ पत्रकार राहुल देव ने घोषणा की कि वह दिल्ली छोड़कर लखनऊ जा रहे हैं। कई दोस्तों ने कहा कि संभव हो तो दिल्ली छोड़ दो। जो काम करता हूँ वह देश के किसी कोने से हो सकता है।
पर सोचता हूँ कहाँ जाऊँगा! पापा का बनवाया घर है लेकिन शहर धीरे-धीरे इतना अजनबी होता गया है कि वहाँ बसने के बारे में सोचना मुश्किल है।
बाक़ी कौन सा कोना है जहाँ प्रदूषण नहीं! जहाँ हवा साफ़ है वहाँ भी तो समाज प्रदूषण का शिकार हो चुका है। जो हाल है अर्बन प्लानिंग का अगले एक दशक में कमोबेश हर जगह यही हाल होना है।
कहाँ जाएँ! कहाँ तक भागें! कब तक भागें!
इस पोस्ट पर आए कुछ कमेंट्स भी पढ़िए….
प्रशांत टंडन-
इस वक्त दिल्ली का AQI 275 है और लखनऊ का 250. कुछ दिन बिहार में था वहां कई शहरों का AQI 60–70 था. मुख्य मुद्दा सरकार जवाबदेह होगी तो प्रदूषण भी कंट्रोल में होगा.
शालिनी त्रिपाठी-
एक बार आईए न केरल,ऊपर का पूरा हिस्सा इस बार इंटीरियर करवा दिया जाएगा। कोई आपको डिस्टर्ब नहीं करेगा भैया। ग़ैर न समझिए भैया। लोग भी सरल और अच्छे हैं, यहां।
संदीप सिंह चौधरी-
अभी गांव रहने लायक बचे हैं। बस थोड़ा थोड़ा ही बचे हैं। वायु एवं ध्वनि प्रदूषण से काफी राहत है। बाकी आदमी यहां भी बहुत स्वार्थी और ईर्ष्यालु मिलेंगे। अपनी स्थिति को मजबूत बनाए रखने की यहां ज्यादा जरूरत है।
निर्मल तिवारी-
कभी हमारे भोपाल में भी हरियाली थी लेकिन आज यहां भी प्रदूषण ने हाल बुरा कर रखा हैं। मेट्रो के नाम पर पूरा शहर खोद के रखा हैं। अब यहां से कहां जाएं।
शैलेंद्र शुक्ला-
Exactly भाई साहब… ऐसे भागने से कार्य तो सिद्ध कतई नहीं होगा लेकिन इस भयंकर पॉल्यूशन और इसके निराकरण में failed governance का भरपूर प्रचार, इसके खिलाफ़ भरपूर आंदोलन ही एक मात्र उम्मीद बची है मेरी समझ के अनुसार।
कृपया आप एवं अन्य लोग इसपर वीडियो एवं अन्य प्रस्तुति के माध्यम से इस अति आवश्यक तथा अति संवेदनशील विषय पर सरकारों की negligence के बारे में सचेत तो कर ही सकते हैं। हम साथ हैं लखनऊ से। Please go ahead
Lucknow kuch saalo me Delhi se bhi jyada polluted ho jayega, air, water and land teeno me. Khoobsurat sahar hai Lucknow per ab utna rah nhi gaya jis tareeke se halat hai.. – प्रीती उर्मिला उमराव
मोहसिन नकवी-
आम जनता का ही लगाया पेड़ है ये प्रदूषण भी। इसको कोई स्वीकार नहीं करेगा। बस यही समस्या है। कोविड के समय लगभग सभी इंडस्ट्रीज़ अपना काम कर रही थीं। बस बंद हुई थीं लोगों की बाइक, कार और स्कूटी वगैरह। और इसके बावजूद लगभग सभी काम हो रहे थे।
मेरा सुझाव ये है कि जो भी लोग अपना पर्सनल व्हीकल उसे करते हैं वो उसको 6 दिन से घटा कर 3 दिन के दें और शेयरिंग या पब्लिक ट्रांसपोर्ट का इस्तेमाल करें, इससे आपको एक नया एक्सपीरियंस मिलेगा और प्रदूषण को कम करने में सहायता हो जाएगी।


