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सुख-दुख

बनारस के डीसीपी पद से रिटायर हुए राजेश कुमार सिंह ने मुझसे पूछा था- “तुम जिस अखबार में काम करते हो वो पैसा-वैसा देता है कि नहीं?”

DSP राजेश कुमार सिंह DIG होकर रिटायर हो गए लेकिन उनका एक प्रस्ताव मुझे आज भी याद है!

हुसैन ताबिश-

ऊपर तस्वीर में दिख रहे शख़्स IPS राजेश कुमार सिंह हैं। अभी एक दिन पहले ही वो वाराणसी के डीसीपी पद से रिटायर हुए हैं। सोशल प्लेटफॉर्म पर उन्होंने अपने सेवानिवृत्ति की जानकारी साझा की है।

जब मैं अपने पत्रकारिता करियर की शुरुआती दिनों में एक अखबार में क्राइम रिपोर्टर था, तो वो नोएडा में डिप्टी SP थे। खबरों के चक्कर में दो – चार दिन में उनसे मिलना – जुलना हो जाता था।

एक दिन उन्होंने मेरे से पूछा, “ताबिश तुम जिस अखबार के लिए काम करते हो, वो कुछ पैसा – वैसा देता है कि नहीं?”

मैंने कहा, “हां देता है न, लेकिन आप ऐसा क्यों पूछ रहे हैं?”

“कितना देता है?” अगला सवाल?

आठ हजार महीना। मैंने कहा।

अच्छा!

बात खत्म! इधर – उधर की बात हुई और मैं वहां से चला गया।

ये सवाल कई दिनों तक मेरे दिमाग में घूमता रहा कि आखिर राजेश सिंह ने मेरे से ऐसा सवाल क्यों पूछा?

जो सब खाते हैं, मैं भी खाता हूं। कपड़े भी वो ही पहनता हूं, जो सब पहनते हैं। १० हजार का नोकिया का N70 मोबाइल भी है मेरे पास। २० हजार की सिटीजन की घड़ी भी बांधता हूं। फिर मैं भूखा, नंगा या कंगाल कैसे दिख गया? इन सवालों ने मुझे उलझा दिया।

अगले दो- तीन दिनों में मैं अपने कई दोस्तों से पूछा, “यार जरा मेरी शक्ल देखकर बताओ मैं बहुत गरीब आदमी दिखता हूं क्या?”

सभी ने कहा, नहीं ऐसा तो कुछ नहीं लगता है, लेकिन तुम ऐसा पूछ क्यों रहे हो बे ?

मैंने किसी को कुछ नहीं बताया।

जब अगली बार फिर राजेश सिंह के पास जाना हुआ तो वो अकेले बैठे थे। उस दिन मैंने पूछ लिया कि पिछली बार आप मेरी सैलरी क्यों पूछ रहे थे? कुछ समझ नहीं आया अभी तक। मेरे दिमाग में अभी भी ये सवाल घूम रहा है।

“अरे ऐसे ही पूछ लिया था, क्योंकि बहुत सारे लोग तो बिना पैसे के भी ये काम करते हैं न?” वो हंसते मुस्कुराते नहीं थे, तो थोड़ा सीरीयस अंदाज में ही बोला।।

फिर एक ठंडी आह भरते हुए कहा, “दरअसल, तुमको ये काम करते हुए देखकर हमको अच्छा नहीं लगता है। तुम एक सही आदमी गलत पेशे में आ गए हो।”

तुम्हारे बिहार के लोग तो सिविल सर्विस में भरे पड़े हैं, तुम कैसे इधर फंस गए। तुम तो पढ़े लिखे और बहुत सिंसियर मालूम पड़ते हो।

तुम कोई दूसरा काम नहीं कर सकते हो? कितना पढ़े – लिखे हो?

एक साथ, स्नेह, सलाह, प्रशंसा, चुनौती और प्रेरणा का भाव प्रकट करते हुए इन्होंने कहा।

एमफिल तक पढ़ाई की है, और थोड़ा बहुत पढ़ा -लिखा हूं, तभी तो ये काम करता हूं। और आपने अभी तक सिर्फ सिविल सर्विस में बिहारियों को देखा है, अगर दिल्ली की मीडिया इंडस्ट्री में देखेंगे तो यहां भी आधे लोग बिहार के ही आपको मिलेंगे – मैंने अपने ज्ञान और अनुभव का पूरा निचोड़ दो लाइन में डिप्टी एसपी राजेश सिंह के सामने रख दिया!

अरे यार, ये भी कोई काम है, और जब तुम इतना पढ़े – लिखे आदमी हो तो आगे अध्यापन या रिसर्च में क्यों नहीं गए?

तुम्हें एक बात बोलूं, “अगर तुम ठीक समझो या ठीक लगे तो तुम ये काम छोड़कर लोकसेवा या अध्यापन करियर पर अपना ध्यान लगाओ। और तुम्हें कोई आर्थिक कठिनाई हो तो मैं सहयोग करूंगा – इस बार उन्होंने समस्या का समाधान भी पेश करते हुए कहा।

एक पुलिस वाला जो पब्लिक की निगाह में हमेशा नागरिक विरोधी, कड़क और करप्ट टाइप आदमी समझा जाता है, उसका ये रूप देखकर मुझे थोड़ी हैरत भी हुई और थोड़ा मैं भावुक भी हुआ।

न कोई पुरानी जान पहचान न कोई पुराना याराना। एक पुलिस अधिकारी का ऐसा ऑफर सुनकर एक साथ कई पूर्वाग्रह ध्वस्त हो गए।

कुछ माह बाद उनका ट्रांसफर नोएडा से ग्रेटर नोएडा हो गया। बाद में वो गौतमबुद्ध नगर से सम्भल भेज दिए गए।

इन 17 – 18 सालों में मेरी कभी उनसे कोई बातचीत नहीं हुई। लेकिन उनकी सलाह और ऑफर मुझे हमेशा याद रहे, जैसे ये सब कल की बात हो।

आज जब उनके रिटायरमेंट की खबर दिखी तो लगा कि ऐसे पुलिस अफसर को अभी और दिन देश और समाज की सेवा में होना चाहिए।

जीवन की नई इनिंग की शुरुआत के लिए उन्हें ढेर सारी बधाइयां!

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