
पाकिस्तान को हमले की सूचना पहले दी गई हो या बाद में – बेमतलब है। सूचना देने की जरूरत थी ही क्यों? जयशंकर पहले खुद स्वीकार करके मुकर चुके हैं। कल छपा था कि बाद में कहा लेकिन कल ही प्रधानमंत्री का कहा छपा था, …बता कर मारा। संभव है, सरकार ने तय नहीं किया हो कि क्या कहना है पर अखबार वाले रेखांकित भी नहीं कर रहे हैं – यह दिलचस्प है और स्वतंत्र मीडिया का हाल है।
संजय कुमार सिंह
अमर उजाला में आज पहले पन्ने पर दो कॉलम की एक खबर है, गुयाना का भी अटूट समर्थन…. स्पीकर ने थरूर को अपने आसन पर बैठाया। यह खबर देशबंधु में कल (27 मई) को ही थी। कल एक और शीर्षक था, दुष्प्रचार में न आएं…. विदेश नीति पर एकता दिखाएं। इससे पहले राहुल गांधी ने कहा है, ध्वस्त हो चुकी है विदेश नीति और तीन सवाल पूछे हैं, भारत को पाकिस्तान के साथ क्यों जोड़ा जा रहा है, पाकिस्तान की निंदा में एक भी देश साथ क्यों नहीं और ट्रंप को मध्यस्थता के लिए किसने बुलाया? कहने की जरूरत नहीं है कि राहुल गांधी के सवाल पहले पन्ने पर नहीं छपेंगे तो उनकी गंभीरता कम हो जायेगी या सरकार और सरकार समर्थकों की परेशानी कम होगी। गुयाना का भी अटूट समर्थन सरकार की पेरशानी कम करने के काम भले आये सच यह है कि कल अखबारों में विदेश मंत्री एस जयशंकर का कहा छपा था, “हमले के बाद दी गई थी पाकिस्तान को सूचना : जयशंकर”। इसकी जरूरत भी राहुल गांधी के सवाल के कारण पड़ी थी। एक वायरल वीडियो बयान में विदेश मंत्री ने कहा था कि पाकिस्तान पर हमले की सूचना पहले दे दी गई थी। मुझे लगता है कि इन खबरों की क्रोनोलॉजी अब बहुत दिलचस्प होगी और अखबारों को पाठकों के लिए इसे जरूर पेश करना चाहिये। लेकिन अब वह सब कुछ नहीं होता है जो सरकार को परेशानी में डाले। विदेश मंत्री ने भले अपने बयान का स्पष्टीकरण दिया, मैंने कल भी यहां लिखा था, हमले की सूचना पहले दी हो या बाद में जरूरत क्या थी? दिलचस्प यह है कि आज मुझे किसी पाठक ने देशबंधु का पहला पन्ना भेजा है, इसमें प्रधानमंत्री ने कहा है, हमने छुपाकर नहीं, बता कर मारा। उपशीर्षक है, मैंने वही किया, जिसके लिए देश ने मुझे प्रधानसेवक बनाया। प्रधानमंत्री की इस स्वीकारोक्ति या दावे के बाद जयशंकर के कहे का क्या मतलब रह जाता है और राहुल गांधी के सवाल का जवाब क्यों नहीं दिया गया?
राहुल गांधी कह चुके हैं कि, ‘विश्वगुरु का गुब्बारा पंक्चर’ होने के बाद पीएम को दुनिया भर में प्रतिनिधिमंडल भेजने पर मजबूर होना पड़ा। जयशंकर के बयान के बाद उन्होंने पूछा था कि पाकिस्तान को हमले की पूर्व सूचना किसके कहने पर दी गई थी। उनका कहना था कि इसी कारण पाकिस्तान ने कई भारतीय विमान मार गिराये। जयशंकर का जवाब नहीं आने पर एक्स पर एक पोस्ट में उन्होंने लिखा था, “विदेश मंत्री जयशंकर की चुप्पी न सिर्फ़ बहुत कुछ करती है, बल्कि यह निंदनीय भी है। इसलिए मैं फिर पूछूंगा: हमने कितने भारतीय विमान खो दिए क्योंकि पाकिस्तान को पता था?” दैनिक जागरण की एक खबर के अनुसार, विदेश मंत्री जयशंकर के बयान पर कांग्रेस नेता ने खड़े किए सवाल तो भाजपा ने किया पलटवार। कहा, ‘पाकिस्तान की भाषा बोल रहे राहुल गांधी’। जाहिर है, मामला इतना सीधा नहीं है और बताकर हमला नहीं किया जाता है। अगर पाकिस्तान को सूचना किसी भरोसे में दी गई थी और उसने भरोसा तोड़ा तो भी खबर है पर सरकार की सेवा में वह गायब है और प्रधानमंत्री व विदेश मंत्री परस्पर विरोधी दावे कर रहे हैं।

जहां तक प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बात है, पुलवामा हमले के बाद घुस कर मारूंगा और गलवान के बाद ना कोई घुसा था ना कोई घुसा है – कौन नहीं जानता है। मीडिया के सहयोग से इस प्रचार का असर भी हुआ और सरकार ने अभी तक इस मामले का खुलासा नहीं किया और दुनिया नहीं जानती है कि इन हमलों के पीछे कौन था। इसका कारण क्या था। बालाकोट हमले में तीन सौ लोगों के मारे जाने की खबर तब भी संदिग्ध थी और आतंकवाद खत्म हो जाने और कुचल दिये जाने के दावों के बावजूद नौ नए ठिकानों पर हमला करना पड़ा या पहले के एक के मुकाबले 100 ही लोगों को मारने का दावा किया गया। इसमें पहले और बाद में बता कर हमले का विवाद है और कितने मरे राम जानें। भारत का कितना नुकसान हुआ – सरकार ने नहीं बताया है। प्रचार के इस माहौल में आज खबर है, जिस पहलगाम में आतंकियों ने बहाया खून, उमर कैबिनेट ने की वहीं बैठक। अमर उजाला में छपी इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, आतंकवाद के खिलाफ स्पष्ट संदेश….हम डरेंगे नहीं। आप समझ सकते हैं कि जिस आतंकवाद के खिलाफ नरेन्द्र मोदी ने ऑपरेशन सिन्दूर चलाया और अब उसका प्रचार कर रहे हैं। उस आतंकवाद से सीधे प्रभावित जम्मू व कश्मीर की सरकार पहलगाम में बैठक कर साफ संदेश दे रही है …हम डरेंगे नहीं। इसकी जरूरत क्यों पड़ी? क्योंकि भारत सरकार वो नहीं कर रही है जिसकी कश्मीर को जरूरत है। वह अपने किये को सही साबित करने और उसके प्रचार में लगी है क्योंकि उसे इससे भविष्य के चुनाव में लाभ मिलने की उम्मीद है।
भविष्य के लाभ या जरूरत के लिए नरेन्द्र मोदी ने हाल में कहा था, केंद्र और राज्य मिलकर टीम इंडिया की तरह काम करें तो कोई भी लक्ष्य असंभव नहीं है। कश्मीर में आतंकवाद खत्म करने के लिए क्या वे कश्मीर सरकार के साथ मिलकर काम करते दिख रहे हैं? मुझे तो नहीं लगता कि इस विषय पर युद्ध छेड़ने से पहले कश्मीर सरकार से राय भी ली गई होगी। पर वह अलग मुद्दा है और सरकार न सिर्फ ऑपरेशन सिन्दूर बल्कि इस बहाने सेना के शौर्य का भी लाभ उठा रही है। अखबारों में नहीं बताया जा रहा है वह अपनी जगह, जो हो रहा है उसे भी सिर्फ प्रचार की तरह पेश किया जा रहा है। पहलगाम में कैबिनेट मीटिंग की खबर इंडियन एक्सप्रेस में एक कैप्शन के रूप में है जो इस प्रकार है – शीर्षक है, पहलगाम में वापस। इंडियन एक्सप्रेस के कैप्शन का हिन्दी अनुवाद इस तरह होगा, पहलगाम में कैबिनेट बैठक के बाद मंगलवार को जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने अपने बेटों जहीर (बाएं) और जमीर (पीछे) के साथ पर्यटन केंद्र के आसपास साइकिल चलाते हुए यह संदेश दिया है कि घाटी सुरक्षित है। 22 अप्रैल को आतंकवादियों ने पहलगाम में 26 लोगों की हत्या कर दी थी, जिनमें से ज्यादातर पर्यटक थे। केंद्र सरकार ने इसके बाद ऑपरेशन सिन्दूर के नाम से पाकिस्तान के खिलाफ अभियान छेड़ा है लेकिन आतंकियों के साथ पकड़ गये जम्मू कश्मीर के पुलिस अधिकारी का क्या हुआ, पांच साल बाद भी कोई नहीं जानता। इस मामले की जांच केंद्र सरकार के तहत आने वाला एनआईए कर रहा है। केंद्र सरकार की दूसरी एजेंसियों की मनमानी हम जानते हैं। ईडी की आलोचना तो हाल में सुप्रीम कोर्ट ने भी की थी। इन सबके बावजूद प्रधानमंत्री मोदी ने कहा और आज अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, आतंकवाद छद्म युद्ध नहीं, पाकिस्तान की सोची समझी जंग…. हमारा जवाब भी अब वैसा ही होगा।
यहां प्रधानमंत्री को खुद बताना चाहिये था कि उन्हें यह अहसास कब और क्यों हुआ तथा 2014 में जब वे नवाज शरीफ से दोस्ती कर रहे थे तब क्यों नहीं था? या तब भी था? इसपर सवाल नहीं उठाया गया है तो प्रधानमंत्री की नैतिक जिम्मेदारी है कि वे देशवासियों के समक्ष अपना पक्ष तो स्पष्ट करें। खासकर इसलिए कि द टेलीग्राफ ने आज ऑपरेशन सिन्दूर के सीक्वेल के रूप में स्वदेशी की भावना को पेश किये जाने की खबर दी है। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, मोदी ने कहा है विदेशी सामान मत खरीदिये या बेचिये। पर साथ ही कहा कि चीन पर निर्भरता बेहद स्पष्ट है। द टेलीग्राफ ने पहलगाम में कैबिनेट की बैठक की खबर को पूरी प्रमुखता दी है और नेशनल कांफ्रेंस के अध्यक्ष फारुक अब्दुल्ला की फोटो छापी है जिसका कैप्शन है, मंगलवार को पहलगाम में गोल्फ खेलते हुए फारुक अब्दुल्ला। कुल मिलाकर, आज की खबरों से मणिपुर के मुकाबले कश्मीर बहुत शांत और नियंत्रण में लग रहा है। लेकिन हमारा देश कश्मीर के लिए आतंकवाद और पाकिस्तान से लोहा ले रहा है और पाकिस्तान के खिलाफ कार्रवाई चल रही है। इसके मुकाबले मणिपुर की स्थिति बहुत खराब लगती है लेकिन उसका कोई धनी-धोरी ही नहीं दिखता है। अखबारों की खबरों से मुझे तो यही लगता है बाकी पाठकों का मैं नहीं जानता। आपको अगर कुछ और लगता है तो मुझे जरूर बतायें। हेडलाइन मैनेजमेंट के साथ या बावजूद आज के लीड की चर्चा करूं तो द हिन्दू की लीड मणिपुर पर है। इसके अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने राज्य में केंद्र सरकार के कार्यालयों में ताले लगा दिये हैं। उपशीर्षक के अनुसार, बढ़ते प्रदर्शन के बीच केंद्र सरकार के जो कार्यालय मणिपुर में बंद किये गये हैं उनमें भारतीय भूगर्भीय सर्वेक्षण और मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यालय शामिल हैं। इंफाल 20 मई से उबल रहा है जब सुरक्षाकर्मियों ने राज्य की पहचान का अपमान किया था। इसके मुकाबले केंद्र सरकार हमेशा की तरह चुनाव लड़ने और जीतने की प्रक्रिया में है।
टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड बताती है कि केंद्र की मोदी सरकार अभी तक अगर पंक्चर बनाने वालों और ज्यादा बच्चे पैदा करने वालों को कपड़ों से पहचान कर और चुनाव जीत कर खुश थी तो अब पाकिस्तान को परेशान करके खुश है। पहलगाम का आतंकी हमला पुलवामा की तरह, कैसे-क्यों हुआ में गये बिना, पाकिस्तान की करतूत करार दिया गया है। युद्ध तक छेड़ दी गई और फिर अमेरिका के ट्रम्प ने युद्ध खत्म कराने का श्रेय ले लिया। ऐसे में आज लीड का शीर्षक है, सिर्फ सिन्धु संधि को स्थगति किया और पाकिस्तान के पसीने छूट रहे हैं। पर मुद्दा यह है कि भारत को क्या मिला और भारत के किस लाभ के लिए ऐसा किया गया है। इस खबर का इंट्रो है, सौदेबाजी खराब ढंग से हुई, इसकी धाराएं भारत के हितों के खिलाफ थीं। मैं नहीं कहता कि ऐसा नहीं होगा पर मुद्दा यह है कि ऐसा था ही तो समझने में इतना समय क्यों लगा और जो बहुत पहले समझ लिया गया था, अनुच्छेद 370 हटाना जरूरी था उसे हटाकर क्या मिला? दोनों सवालों के जवाब सरकार न दे पर मीडिया वाले पूछ भी नहीं रहे हैं और सरकार जो कह रही है उसका फायदा नहीं बता रही है।
ऐसे में आज हिन्दुस्तान टाइम्स की लीड है, 1947 में पाक अधिकृत कश्मीर को रीक्लेम करने की पटेल की सलाह नजर अंदाज की गई। अखबार ने लिखा है कि यह नेहरू पर प्रधानमंत्री का प्रहार था। मुद्दा यह है कि देश के प्रधानमंत्री पूर्व प्रधानमंत्री की पुण्यतिथि पर उनपर प्रहार कर रहे हैं और 1947 का मुद्दा अब उठा रहे हैं। खुद 10 साल से शासन में हैं, इस दिशा में कुछ नहीं किया या कर पाये तब। कहने की जरूरत नहीं है कि उनका निधन 1964 में हो गया था। उनके बाद के भारत के नेताओं में से कई जो नरेन्द्र मोदी की विचारधारा के थे, उनकी पार्टी के थे और नरेन्द्र मोदी ने जिन्हें भारत रत्न दिया वो भी इनमें शामिल हैं और किसी ने इस महत्वपूर्ण कार्य पर कुछ नहीं किया। आडवाणी अगर रथयात्रा निकालने और ऐसे अभियान में नहीं लगते जिससे बाबरी मस्जिद गिरी तो शायद नरेन्द्र मोदी प्रधानमंत्री नहीं होते और अब अगर मोदी पाक अधिकृत कश्मीर की बात कर रहे हैं तो सीधे कहना चाहिये कि अटल-आडवाणी ने भी इस दिशा में कुछ नहीं किया या क्या किया, 10 साल वे खुद भी कुछ नहीं कर पाये हैं।
दि एशियन एज की आज की लीड वही है जो अमर उजाला और नवोदय टाइम्स की है। अमर उजाला का शीर्षक बता चुका हूं, दि एशियन एज और नवोदय टाइम्स का शीर्षक लगभग समान है। कुल मिलाकर, सरकार चुनाव जीतने के अपने अभियान में व्यस्त है और देश से संबंधित विपक्ष की मांगों पर सुनवाई तो छोड़िये सरकार के प्रचार को छोड़कर खबरें भी पहले पन्ने पर बमुश्किल होती है। तृणमूल कांग्रेस के सांसदों ने प्रधानमंत्री को चिट्ठी लिखकर संसद का विशेष सत्र बुलाने की मांग की है और दि एशियन एज ने इसे पहले पन्ने पर सिंगल कॉलम में छापा है। बिहार में मोदी 29-30 मई को प्रचार अभियान छेडेंगे ज्यादा बड़ी खबर है और ऑपरेशन सिन्दूर (पाकिस्तान से युद्ध) के बाद संसद का सत्र बुलाने की बजाय प्रधानमंत्री पटना में कल पहली बार मेगा रोड शो करेंगे और गुजरात में रोड शो चल रहा है बड़ी खबरें हैं जो ज्यादा प्रमुखता से छपी हैं।


