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सुख-दुख

मुंबई के पेडर रोड स्थित वुडलैंड्स अपार्टमेंट को ‘रजनीश-स्मारक’ घोषित कर देना चाहिए!

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बम्बई में रजनीश! यह चित्र बम्बई के रजनीशप्रेमी पखावज-वादक पुष्पेन्द्र पाठक ने भेजा है। पखावज के पीछे वैनगॉग की प्रसिद्ध चित्रकृति है : नून, रेस्ट फ्रॉम वर्क। पुष्पेन्द्र जी कलावंत और परिष्कृत रुचियों के मालूम होते हैं।

इसे देखकर मैं सोचने लगा कि जैसे पखावज ध्रुपद-अंग का तालवाद्य है, उसी तरह बम्बई के दिन भी रजनीश के कंठस्वर में ध्रुवपद-सरीखी गम्भीरता, पौरुष और तलस्पर्शी मेधा के ही थे। फिर आगे चलकर पुणे के दिनों में रजनीश की ख़याल-शैली ही ज़्यादा जमी। पुणे में रजनीश का माधुर्य चरम पर था, वे बुद्ध, अष्टावक्र, कबीर, नारद, मीरा, दया, सहजो पर बात करते थे, स्वर में स्त्रैण कोमलता थी। पर बम्बई के दिनों में रजनीश की वार्ता के विषय कुण्डलिनी जागरण, गुह्यविद्याएँ, तंत्र की विधियाँ, योग के सूत्र, उपनिषदों के वचन, जाति-स्मरण, मृत्यु से साक्षात् आदि हुआ करते थे। गुरु-गम्भीर!

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बम्बई की आबो-हवा रजनीश के कण्ठस्वर की पृष्ठभूमि में पखावज की तरह बजी थी!

1 जुलाई 1970 को हावड़ा-बॉम्बे मेल से रजनीश बम्बई पहुँचे थे। जबलपुर से अपना सामान-असबाब समेटकर आए थे, फिर निर्मोही ने जबलपुर को एक बार झाँककर भी नहीं देखा, जहाँ 17 साल बिताए। जब बम्बई आए थे तो आचार्य कहलाते थे, जब वहाँ से विदा हुए तो भगवान कहलाने लगे। वे पेडर रोड स्थित वुडलैंड्स अपार्टमेंट में रहते थे, उससे पहले कुछ दिन दिनशॉ वाच्छा रोड स्थित सीसीआई चेम्बर्स में भी रहे। वह वुडलैंड्स अपार्टमेंट आज भी बम्बई में खड़ा है। उसके जिस फ़्लैट में रजनीश 1970 से 1974 तक पाँच साल रहे, उसे रजनीश-स्मारक घोषित कर दिया जाना चाहिए। वहाँ संग्रहालय बनाया जाना चाहिए। उस फ़्लैट में चंद साधकों के सम्मुख रजनीश ने शिव, पतंजलि, महावीर, लाओत्से और कृष्ण पर गहन-गम्भीर चर्चाएँ की थीं। वहाँ वो तरंग आज भी होगी!

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बम्बई में ‘मेरे प्रिय आत्मन्’ का पहुँच जाना उसका अपने ठिकाने लग जाना ही है!

आज एक मित्र ने जबलपुर से भी संदेश भेजा कि पुस्तक में 115, नेपियर टाउन स्थित जिस योगेश भवन का उल्लेख है, वह भी आज तक मौजूद है और उसमें रजनीश के कमरे को यथावत रखा गया है, उनकी कुर्सी, उनकी चीज़ें, उनके छायाचित्र सब वहाँ पर हैं। अनेक रजनीशप्रेमी उस स्थान की तीर्थयात्रा समय-समय पर करते हैं।

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अगर बम्बई रजनीश के गायन का ध्रुपद था और पुणे ख़याल- तो जबलपुर में उन्होंने अपने कण्ठ को साधा था, एक सुदीर्घ, संयत् आलाप किया था। वह एक सिद्ध की साधनास्थली थी।

मेरा मन बार-बार मुझसे कहता है कि जहाँ-जहाँ रजनीश रहे, सोये, जिन-जिन स्थलों पर श्वास ली- चल हंसा उस देस!

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