गौरव प्रजापति-
सूची तो देते जाते भाईसाहब… रोज शाम को ऑफिस आते ही मैं बोलता भाईसाहब सूची….?? तो कहते बस दो मिनट गौरव भाई.. मानो मेरे कहने का ही इंतज़ार कर रहे हों… कभी गुस्सा भी हो जाते पर फिर दो ही मिनट में ठीक हो जाते…
कोई बड़ी खबर होती तो मेरे आते ही बोल देते थे, आज तो पेज एक की लीड है अपनी… बस दे रहा हूं। किसी दिन कोई बड़ी खबर नहीं होती तो बोलते कि आज तो दुकान खाली है…
नाम कभी नहीं लिखा अपनी खबर में.. हमेशा मुझे बोलते कि गौरव भाई आप पढ़ लो पहले आराम से, ठीक लगे तो ही बाइलाइन देना… और उनकी टीम के किसी साथी की बाइलाइन काट दूँ तो बोलते जाने दो यार, कम से कम आदमी प्रोत्साहित तो होता ही है…
इतने सालों से खंडूड़ी जी और मेरी जुगलबंदी चल रही थी… सम्पादक जी की बैठक में या सर्वजनिक रूप से उन्होंने कभी हमारी डेस्क की कोई शिकायत नहीं की… और हम भी कभी उनकी टीम की शिकायत नहीं करते..। रात को घर जाते वक़्त रोज़ मुझसे कन्फर्म करते जाते कि सब खबरें मिल गई? निकलूँ मैं…?
फिर सोने से पहले घर जाकर भी एक दो बार बात कर ही लेते थे… शायद ही कोई ऑफ या कोई छुट्टी ऐसी रही हो उनकी कि रात को मेरे पास किसी ना किसी खबर के लिए फोन या व्हाट्सअप ना किया हो..
रेयर ही कभी ऐसा होता था कि वो मुझे कहें कि यह खबर छोटी लग गई या यह खबर बड़ी… मेरी समझ में जब भी कोई खबर नहीं आती थी, चाहें वो कहीं की हो, मैं उन्हीं से समझता..
जब भी किसी अच्छी खबर का पैकेज होता तो मेरे पास आकर बोलते गौरव भाई पेज एक और अंदर, अच्छी तरह से ले लेना… आज सबसे बुरी खबर थी… उन्हीं की… रोता हुआ लगा आया हूं… पेज एक पर भी और अंदर भी…
इतने सरल भी क्यों थे आप… मूल्यों के आगे नतमस्तक क्यों थे आप… रोज सरकार से सीधे सम्पर्क में होने के बावजूद आप अपने सगे भाई का ट्रांसफर तक नहीं करा पाए… जिम्मेदारियों का बोध ऐसा कि दो पहिया से चार पहिया तक पर नहीं आए…
सर्दी, बरसात और हाथियों के खतरे के बीच रोज़ डोईवाला से बाइक पर आना और बाइक पर जाना… हमारा टोकना, जल्दी घर जाने को कहना, और आपका बस मुस्करा देना… लापरवाह तो थे ही आप…
अब ना कभी सूची मागूंगा… ना डे प्लान… ना कभी बाइलाइन दूंगा… ना कभी आपका फोन उठाऊंगा… आपको पंचतत्व में विलीन होते देखा, सबको रोते हुए देखा… भले ही 24 घंटे लगे… पर मैंने अब मान ही लिया कि आप चले गए हैं आराम करने… हमेशा हमेशा के लिए….
मेरे से पहले आप मेरी पत्नी Alka Tyagi को जानते थे, उसके साथ 13-14 साल पहले नौकरी कर चुके थे.. बच्चे की तरह उससे स्नेह था आपका.. सुबह से रो-रो कर आँखे सुजा ली हैं उसने.. एक दिन पहले ही तो आपने उससे बात की थी। हम दोनों के अभिभावक की तरह थे आप… पापा के जाने के 8 माह बाद आज फिर मेरे घर में मातम पसर गया…
कितने प्लान बना रखे थे आपने मेरे साथ… अक्टूबर में हमें केदारनाथ भी तो जाना था… पर आप तो अनंत यात्रा पर चले गए… सबको रोता हुआ छोड़ गए… चार दिन पहले जो मुझसे फोटो खिचवाई थी.. वो तो मुझसे लेकर अब तक फेसबुक पर भी नहीं डाली आपने…?? आज मैं डालूंगा…


दुनिया आपको अच्छा आदमी बोलती थी पर अच्छे थे नहीं आप… अच्छे होते तो सबको यूँ धोखा थोड़ी देते… भाभी, माँ जी और भतीजे को अकेला थोड़ी छोड़कर जाते… हम सबको ऐसे तो नहीं रुलाते… धोखेबाज़ थे आप…
एक बार देखो तो.. पूरा ऑफिस रो रहा है, लाख चाह कर भी संपादक जी अपने आंसू छुपा नहीं पा रहे.. मातम छा गया न्यूज़ रूम में… हर शख्स रो रहा है.. कोई सीट पर बैठकर तो कोई कोने में जाकर… यूँ ही सिसकियाना था तो सबको इतना प्यार दिया ही क्यों…
अब चले गए हो तो और याद मत आना प्लीज… इतने मजबूत नहीं हैं हम… सम्भलने नहीं दिया आपने तो बिखर जाएंगे हम…
शेरों शायरी तुकबंदी पसंद थी ना आपको… तो लो, इन लाइनों के साथ मैं आपको दोषमुक्त करता हूं.. और सारा इल्जाम कुदरत पर डाल रहा हूं… आप सो जाइए.. आराम से-
मिल मिल कर बिछड़
जाती हैं घड़ी की सुइयां
कैसे साथ रहने की
दुआ करे कोई…!!!
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