टॉलस्टॉय की धरती पर टैगौर पुरस्कार

मास्को / रायपुर । 21 वीं सदी के पहले व लगभग एकमात्र महाकाव्यकार, आधुनिक हिंदी के शीर्षस्थ कवि श्री रमाकांत शर्मा ‘उद्भ्रांत’ द्वारा रचित व अँगरेज़ी, ओडिया सहित कई भाषाओं में अनुवाद के साथ बहुचर्चित काव्यकृति ‘राधामाधव’ पर प्रथम गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगौर अंतरराष्ट्रीय साहित्य पुरस्कार प्रदान किया गया।

अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन परिवार द्वारा गुरुदेव रवीन्द्रनाथ ठाकुर अंतरराष्ट्रीय सम्मान’ प्रतिवर्ष उस वरिष्ठ रचनाकार को प्रदान किया जायेगा जिसने साहित्य की विविध अनुशासनों में अप्रतिम और समानांतर रचनात्मक लेखन किया हो जिससे भारतीय जीवन मूल्यों के साथ वैश्विक जीवन की प्रगतिशीलता भी अपनी नयी संभावनाओं के साथ स्थापित की हो।

यह सम्मान उन्हें चयन-समिति के सुप्रसिद्ध आलोचक त्रय प्रो. नित्यानंद तिवारी, डॉ. कर्ण सिंह चौहान, डॉ. खगेन्द्र ठाकुर तथा संयोजक जयप्रकाश मानस की अनुशंसा पर 200 से अधिक प्रविष्टियों में विशिष्ट और विलग कृति ‘राधा माधव’ के लिए दिया गया।

श्री उद्भ्रांत को 51,000 रूपयों की प्रतीक राशि, मानपत्र एवं प्रतीक चिन्ह सहित यह पुरस्कार 2 जून के दिन 15 वें अंतरराष्ट्रीय हिंदी सम्मेलन (रूस, मास्को) के अवसर पर 80 वर्षीय देश के शीर्षस्थ उपन्यासकार डॉ. शरद पगारे के करकमलों से दिया गया । अध्यक्षता की अंगरेज़ी-हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार व पूर्व मुख्य सचिव, छत्तीसगढ़ श्री बी. के. एस. रे ने । इस अवसर पर भारत और रूस के अनेक वरिष्ठ कलमकार उपस्थित थे।

हिंदी की लगभग सभी विधाओं में सिद्धहस्त, शताधिक चर्चित कृतियों के रचयिता, सुप्रसिद्ध रचनाकार दूरदर्शन में उपमहानिदेशक (भारतीय प्रसारण सेवा) रहे हैं।

उनकी कुछ प्रमुख कृतियाँ है : अभिनव पांडव, अनाद्यसूक्त, त्रेता एवं प्रज्ञावेणु (महाकाव्य); राधामाधव (उड़िया में भी अनूदित), स्वयंप्रभा एवं वक्रतुण्ड (प्रबंध काव्य); ब्लैकहोल (काव्य नाटक); देवदारू-सी लम्बी गहरी सागर-सी, अस्ति, शब्दकमल खिला है, हँसो बतर्ज़ रघुवीर सहाय एवं इस्तरी (समकालीन कविता); समय के अश्व पर (गीत-नवगीत), मैंने यह सोचा न था (ग़ज़लें)-रा.प्र. शर्मा ‘महर्षि’ द्वारा किया गया उर्दू लिप्यांतरण उ.प्र. सरकार से पुरस्कृत, डुगडुगी और मेरी प्रिय कथाएंँ (कहानी-संग्रह); कहानी का सातवाँ दशक (समीक्षा) तथा सदी का महाराग (चयन डॉ. रेवतीरमण); आलोचक के भेस में एवं मुठभेड़ (आलोचना), सृजन की भूमि (भूमिकाएँ), आलोचना का वाचिक (वाचिक आलोचना), स्मृतियों के मील-पत्थर (संस्मरण) आदि।

कानपुर में प्रलेस के सचिव रहे श्री उद्भ्रांत की अनेक भारतीय भाषाओं में रचनाएँ अनूदित हो चुकी हैं।

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