कैंसर से दो-दो हाथ कर रहे सीनियर जर्नलिस्ट रवि प्रकाश की पूरी कहानी पटना आईनेक्स्ट में प्रकाशित हुई है. रवि काफी समय तक आईनेक्स्ट पटना के स्थानीय संपादक रहे हैं. यहां कई लोग उनके प्रशंसक भी हैं.
उज्जवल कुमार-
कैंसर का मतलब हमेशा द एंड नहीं होता। इसको तो आप रवि प्रकाश सर ने साबित कर दिखाया है। कैंसर का पता चलने के बाद भी आपकी सक्रियता में कमी नहीं आयी। और तेज हो गयी। एक-एक दिन को आप जीने लगे।
आपने मिसाल कायम की है। न केवल कैंसर से जूझ रहे लोगों के लिए बल्कि हमसब के लिए जो थोड़ी सी परेशानी पर चिंतित होने लगते हैं। पूरी रिपोर्ट यहां पढ़ें…

लेखक आईनेक्स्ट पटना के संपादक हैं.
रवि प्रकाश की हालिया स्थिति क्या है, नीचे पढ़ें…
रवि प्रकाश-
स्पताल (सनएक्ट कैंसर इंस्टीट्यूट, ठाणे) के जिस एक नंबर कमरे में मेरी तत्काल रिहाइश है, उसमें कोई खिड़की नहीं। दीवार पर एक टेलीविजन टँगा है, जो मुझे बाहरी दुनिया से जोड़ता है। लेकिन, मैं टीवी पर या तो नहीं जाता या फिर कम वक्त के लिए जाता हूँ।
मुझे सोना पसंद है और कुछ-कुछ पढ़ते रहना। बीच का वक्त डॉक्टर्स, सिस्टर्स आदि से बात करने में गुजर जाता है। आज CAR T सेल थेरेपी का सेकेंड इन्फ्यूजन होना है। पैंक्रियाटाइटिस के अटैक की वजह से इसमें कुछ देरी हुई। रेडिएशन और सेकेंड लाइन कीमो के साइड इफ़ेक्ट के कारण कानों से सुनाई देना प्रभावित हुआ है। मतलब मध्यम दर्जे का बहरापन हुआ है, जो ठीक नहीं हो सकता। थोड़ा कम दिखता भी है। शायद चश्मे का रेंज बढ़े। बाकी सारी स्थितियाँ नियंत्रण में हैं।
डॉक्टर विजय पाटिल और उनकी टीम लगी हुई है। डॉ कुमार प्रभाष सर हाल लेते रहते हैं। ये देवता तुल्य डॉक्टर मुझे पूरी तरह ठीक करना चाहते हैं और मेरे मन में राँची वापसी की अकुलाहट है। सैम की याद आती है। वह हॉस्टल में कैसे रहता होगा। इस बार लंबा वक्त हो गया है। राँची से मुंबई आए करीब एक महीना हुआ। आगे भी रहना होगा, ऐसा लगता है। अगर डॉक्टर्स ने इजाज़त दी, तो एक ब्रेक लेकर 2-4 दिन के लिए राँची और एक सप्ताह के लिए अमेरिका जाऊँगा। इजाज़त नहीं मिली, तो यहीं रहेंगे।
इस बार का पंद्रह अगस्त अस्पताल के इसी कमरे में बितेगा। आजादी का जश्न यहीं मनाएँगे। इस दुआ के साथ कि आने वाले सालों में मेडिकल साइंस कैंसर को प्रिवेंट करने और इसपर पूरी तरह काबू करने के उपाय खोज लेगा। हमारी आने वाली पीढ़ी कैंसर से आज़ाद हो जाएगी। आमीन।


