कांग्रेस ने शास्त्री को बर्खास्त किया था, भाजपा ने बेनीवाल को बर्खास्त कर हिसाब बराबर किया!

समझ से परे है कि कमला बेनीवाल को राज्यपाल पद से बर्खास्त करने की जरूरत ही क्या थी। दो महीने बाद वे रिटायर होने वाली थी। राज्यपाल पद की एक गरिमा होती है, उसे बनाये रखना चाहिए। हालांकि जो कांग्रेसी इस पर हो-हल्ला कर रहे हैं, उन्हें अपने धत्तकर्म याद नहीं हैं। विष्णुकांत शास्त्री के भी उस समय चार ही महीने बचे थे, जब उन्हें यूपीए सरकार ने बर्खास्त कर दिया था। राजभवनों को राजनीति का अखाड़ा बनाने की शुरुआत तो कांग्रेस ने ही की है। राजभवनों में पार्टी नेताओं की स्थापना का काम उसी ने शुरू किया है।

क्या ऐसे समर्पित कांग्रेसियों का ये फर्ज नहीं बनता है कि केन्द्र में दूसरे दल की सरकार बनने की सूरत में वे खुद ही राजभवन छोड़ दें? कमला बेनीवाल ने गुजरात में मोदी सरकार की नाक में दम किये रखा। उन्हें तो उसी समय इस्तीफा दे देना चाहिए था, जब मोदी प्रधानमंत्री बन गये थे। मिजोरम तबादले के समय उनके पास दूसरा मौका था, जब वे त्यागपत्र देकर सम्मान बचाए रख सकती थी परन्तु लगता है कि वे बदले हुए दौर के हालातों को समझना ही नहीं चाहती थी…अब उनके बारे में जो बातें छन-छनकर बाहर आ रही हैं, उससे तो उन्हीं की फजीहत हो रही है। (वरिष्ठ पत्रकार ओमकार चौधरी के फेसबुक वॉल से.)

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गुजरात से वृद्ध मगर जुझारू राज्यपाल को पूर्वोत्तर भगा दिया गया; उन्होंने ‘अपमान-स्वाभिमान’ का खेल नहीं खेला, सरकार को परीक्षा पर टांक मिजोरम जा पहुंचीं। कल उन्हें बर्खास्त कर दिया गया। सरकार मानो कपड़ों से बाहर आ गई है। बर्खास्त ही करना था तो गुजरात में रहते किया जा सकता था, उन्हें ही क्यों हर कांग्रेसी राज्यपाल को घर का रास्ता दिखाया जा सकता था। आखिर सत्ता मिलते ही अपने-अपने वृद्ध राजभवनों में ठूंसने का जतन कांग्रेस भी तो करती आई ही है। … पर बदले की भावना से कमला बेनीवाल के साथ जो सलूक किया गया है, वह राज्यपाल के पद से खिलवाड़ के नायाब किस्से की तरह याद किया जाएगा – ओछे दिनों की एक मिसाल के बतौर। (वरिष्ठ पत्रकार Om Thanvi के फेसबुक वॉल से)

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कमला बेनीवाल के बाद शीला दीक्षित का नंबर आएगा। वे भी बर्खास्त की जाएंगी। वैसे इसमें गलत कुछ भी नहीं है। हर सरकार ऐसे ही पैतरें आजमाती है। याद करिए यूपीए वन की सरकार आने पर एक विद्वान राज्यपाल विष्णुकांत शास्त्री को किस तरह बेइज्जत कर यूपी के गवर्नर हाउस से निकाला गया था। जबकि तब यूपी के मुख्यमंत्री मुलायमसिंह यादव उनको हटाए जाने के विरुद्घ थे। इसलिए इसमें अचंभा कुछ भी नहीं है कि कमला बेनीवाल को बर्खास्त किया गया। उनकी महत्वाकांक्षाएं उन्हें गवर्नर हाउस की चारदीवारी से बाहर लाकर एक पार्टी विशेष का एजंट जो बना रही थीं। कमला बेनीवाल में अगर इतनी राजनीतिक सूझबूझ और फुर्ती है तो उन्हें कांग्रेस चुनाव लड़वाए। बिलावजह बेइज्जती करवा रही है। गवर्नर की न तो कोई योग्यता होती है न कोई उम्र सीमा। जब हर आदमी रिटायर होता है तो गवर्नर हाउस में ऐसे नाकारा लोग पाले ही क्यों जाते हैं? नई सरकार छोटे लाट का यह पद ही खत्म कर दे। (वरिष्ठ पत्रकार शंभूनाथ शुक्ल के फेसबुक वॉल से)



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