
लोकसभा चुनाव में सीटें कम होने के बाद प्रधानमंत्री ने यह कहकर ईवीएम की आलोचना का मजाक उड़ाने की कोशिश की थी “…. मैंने पूछा ईवीएम जिन्दा है कि मर गया”। आज किसी अखबार ने नहीं कहा है कि ईवीएम जिन्दा है। इंडिया टीवी डॉट इन के अनुसार, तब उन्होंने कहा था, “ये लोग तय कर बैठे थे कि भारत के लोकतंत्र और चुनावी प्रक्रिया से भरोसा उठ जाए। उन्होंने आगे कहा कि 4 जून की शाम तक जो लोग ईवीएम की विश्वसनीयता पर सवाल उठाने रहे थें, उनके मुंह पर ताला लग गया। अगले 5 सालों तक अब ईवीएम पर कोई चर्चा नहीं होगी। लेकिन हो सकता है कि 2029 के बाद फिर से विपक्षी दल ईवीएम पर सवाल उठाएं।” इसके बावजूद चुनाव आयोग ने ईवीएम की विश्वसनीयता बहाल करने के लिए कुछ नहीं किया। नये आरोप लगे तब भी नहीं। सुप्रीम कोर्ट में मामला गया वहां भी नहीं। एक मतदाता के रूप में मैं चुनाव आयोग के जवाब और अखबारों में उसकी प्रस्तुति से बिल्कुल असंतुष्ट हूं। मेरी चिन्ता यह है कि ईवीएम अगर इतना ही अच्छा है तो भाजपा ने पहले इसका विरोध क्यों किया था और अब जो जवाब दिया जाता है वह हवा-हवाई क्यों होता है, बिन्दुवार क्यों नहीं।
संजय कुमार सिंह
हरियाणा में भाजपा की हैटट्रिक निश्चित रूप से चौंकाने वाली है। उसकी सीटें पहले से बढ़ गई हैं और यह प्रशंसा की बात हो सकती है। अगर यह सब चुनावी प्रबंध से हुआ है तो भी प्रशंसनीय है। लोकसभा चुनाव में 400 पार के नारे के बाद 240 पर सिमट जाना उसकी घटती लोकप्रियता का प्रतीक था लेकिन नरेन्द्र मोदी समेत भाजपा के कई बड़े नेताओं के बात-विचार से लगता था कि वे नुकसान की भरपाई कर लेने की उम्मीद में हैं। मुझे लगता था यह उनकी अयोग्यता (या विशेष योग्यता) के कारण हो सकता है। इसके अलावा ईवीएम पर अत्यधिक भरोसे के कारण भी ऐसा संभव है। नतीजों के साथ कल ईवीएम पर भी आरोप लगे और जब पहले के मामलों की जांच नहीं हुई है तो इस बार भी क्या होना है लेकिन नतीजे की खबरों में शिकायतों का हवाला नहीं होना (कम से कम पहले पन्ने पर) मीडिया का पक्षपात है और इस लिहाज से इंडियन एक्सप्रेस की लीड का बैनर हेडलाइन रेखांकित करने लायक है। अकेले इंडियन एक्सप्रेस ने मुख्य शीर्षक में कल के नतीजे को भाजपा के लिए बूस्टर डोज लिखा है जो कश्मीर के चुनाव परिणाम के कारण नहीं है।
कहने की जरूरत नहीं है कि कश्मीर में केंद्र की भाजपा सरकार बनने के दस साल बाद हुए चुनाव में भाजपा की लोकप्रियता तब साबित होती जब वह कश्मीर में भी जीतती। सच्चाई यह है कि राज्य में 10 साल चुनाव नहीं कराये गये। अनुच्छेद 370 को खत्म करने की बहुप्रचारित कार्रवाई के बाद भी पांच साल चुनाव नहीं हुए और सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जब हुए तो भाजपा चुनाव हार गई। तुष्टीकरण के साथ आतंकवाद खत्म होने के दावे और पाक अधिकृत हिस्से पर कब्जे जैसे प्रचार के बावजूद। इसलिए कल का नतीजा भाजपा के लिए भाजपाइयों की नजर में बूस्टर डोज हो सकता है। निष्पक्ष पर्यवेक्षक के लिए यह तथ्य है कि 370 हटाने की उसकी बहुप्रचारित कार्रवाई को कश्मीर में ही पसंद नहीं किया गया। जहां तक पार्टी के रूप में भाजपा की बात है वह कश्मीर (और कश्मीरियों के साथ) देश का भी भला करने का दावा करती है और भले इसी के लिए वह हरियाणा में जीत गई हो पर कश्मीर में वह सभी सीटों पर चुनाव लड़ने की स्थिति में नहीं थी। दिल्ली में दीन दयाल उपाध्याय मार्ग पर ऑफिस और उसके सामने दूसरी बिल्डिंग बनाने तथा केशव कुंज में तीन नये टावर बना लेने की खबरों के बाद भी।
यह भाजपा की लोकप्रियता बताने के लिहाज से अच्छी स्थिति नहीं है पर इंडियन एक्सप्रेस का शीर्षक ऐसा ही है। ईवीएम पर कांग्रेस के आरोप को एक कॉलम में बड़े शीर्षक और छोटी खबर के साथ निपटा दिया गया है। पांच लाइन का शीर्षक, दो लाइन का उपशीर्षक, दो लाइन में बाईलाइन और एक लाइन में डेटलाइन यानी कुल 10 लाइनों के मुकाबले खबर सिर्फ नौ लाइन में है। इसके मुकाबले प्रधानमंत्री का यह बयान तीन कॉलम में है, जाति के आधार पर बांटने की कांग्रेस की साजिश को तमाचा है, इसकी गूंज दूसरी जगह भी होगी। मैं इसी को भाजपा और नरेन्द्र मोदी का आत्मविश्वास कहता हूं। हाल में संघ प्रमुख ने हिन्दुओं को एक होने की अपील की थी। समाज को हिन्दू मुसलमान में बांटने की भाजपा की कार्रवाइयों के बारे में मुझे यहां बताने की जरूरत नहीं है लेकिन दलितों, पिछड़ों, गरीबों को उनका हक दिलाने की कांग्रेस या राहुल गांधी की कोशिश अथवा राजनीति को नरेन्द्र मोदी साजिश कहते हैं और इंडियन एक्सप्रेस उसे प्रचारित कर रहा है। वैसे भी महाराष्ट्र में भाजपा ने जो सब किया है उसके बावजूद जीत का भरोसा है तो वह खबरों में दिखेगा ही। पर वह अलग मुद्दा है।
आज सभी अखबारों में नतीजे की खबर ही लीड है। इंडियन एक्सप्रेस के लीड और बैनर हेडलाइन की चर्चा करने के बाद मैं चाहता हूं कि आप इसकी तुलना दूसरे अखबारों के शीर्षक से करें और अखबारों के पक्षपात और अंध समर्थन को समझें। अमर उजाला में शीर्षक सात कॉलम, दो लाइन में है। शीर्षक है, हरियाणा में भाजपा की ऐतिहासिक हैट्रिक जम्मू कश्मीर में नेशनल कांफ्रेंस व कांग्रेस को बहुमत। नवोदय टाइम्स ने हरियाणा की खबर पांच कॉलम में, भाजपा की नायाब हैट्रिक शीर्षक के साथ छापी है जबकि जम्मू व कश्मीर की खबर तीन कॉलम में छापी है। शीर्षक है, नेशनल कांफ्रेंस की नैया पार। द टेलीग्राफ में चुनाव नतीजों की खबर छह कॉलम में है। हरियाणा का नतीजा तीन कॉलम में है। शीर्षक है, “हरियाणा की बल परीक्षा : भाजपा ने कांग्रेस को चित्त किया”। दो कॉलम में कश्मीर की खबर का दूसरा शीर्षक है, एनसी को 370 के खिलाफ जनादेश मिला। बीच में सिंगल कॉलम की खबर है, हारी हुई पार्टी को एक विलेन मिला : ईवीएम पर आरोप”। मुझे लगता है कि नतीजों की रिपोर्टिंग या प्रस्तुति का यह एक निष्पक्ष तरीका है। इन तीनों खबरों का एक फ्लैग शीर्षक है, प्रभावशाली जाटों के खिलाफ ध्रुवीकरण की कोशिश के नतीजे मिले, एक्जिट पोल, नाकाम साबित हुए।
हिन्दुस्तान टाइम्स ने दो लाइन का बैनर शीर्षक लगाया है। पहली लाइन हरियाणा के लिए तो दूसरी जम्मू और कश्मीर के लिए। शीर्षक हिन्दी में कुछ इस तरह होता, भाजपा के लिए हरियाणा में ऐतिहासिक हैट्रिक, जम्मू व कश्मीर में इंडिया गठबंधन की नई शुरुआत। पहले पन्ने पर अंदर जो खबरें होने की सूचना है उनमें एक खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग ने देरी का कांग्रेस का दावा खारिज किया। इसके अनुसार, कांग्रेस ने शिकायत की थी कि वेबसाइट पर हरियाणा के चुनाव अपलोड करने में असामान्य और अस्वीकार्य देरी हुई है। खबर के अनुसार चुनाव आयोग ने कहा है कि इस आरोप की पुष्टि के लिए रिकार्ड पर कुछ भी नहीं है। ईवीएम की बैट्री से संबंधित कांग्रेस के आरोप पर भी पहले पन्ने पर कुछ नहीं है। मोदी का यह बयान जरूर है कि फैसले की गूंज दूर तक सुनाई पड़ेगी। इसके साथ और नीचे छपी बराबर की एक खबर का शीर्षक है, अनिच्छुक उमर ने वापसी का रास्ता तय किया।
टाइम्स ऑफ इंडिया का शीर्षक सीधा सरल है। शीर्षक है : भाजपा 1, नेशनल कांफ्रेंस-कांग्रेस 1, पोलस्टर्स 0 (एक्जिट पॉल)। इसके मुकाबले द हिन्दू का शीर्षक और सरल है – भाजपा ने हरियाणा अपने पास रखा, एनसी के नेतृत्व वाले अलायंस को जम्मू व कश्मीर मिला। एशियन एज में हरियाणा की खबर चार कॉलम में और जम्मू व कश्मीर की तीन कॉलम में अलग-अलग है। भाजपा ने 48 सीटों के साथ जीत कर हरियाणा में हैट्रिक बनाया, 37 सीटों के साथ कांग्रेस को झटका लगा। एनसी-कांग्रेस को जम्मू और कश्मीर में बहुमत मिला। जम्मू कश्मीर में सीटों की संख्या से साफ है कि भाजपा के लिए खरीद बिक्री की संभावना लगभग नहीं है और हरियाणा में भी स्पष्ट बहुमत है। भाजपा विधायकों को खरीदकर सरकार गिराने का कारनामा करती रही है। कर्नाटक में पहले किया था इसबार ईवीएम के बावजूद हार गई फिर भी जीत को जैसा इंडियन एक्सप्रेस ने लिखा है, 240 के बाद का बूस्टर डोज है। इससे प्रभावित होकर प्रधानमंत्री ने कहा है कि गूंज दूर तक सुनाई पड़ेगी लेकिन महाराष्ट्र में पिछले जनादेश के साथ भाजपा ने जो किया है उसके मद्देनजर यह देखना दिलचस्प होगा कि गूंज महाराष्ट्र में सुनाई देती है कि नहीं। बी, सी और डी टीम के साथ चुनाव लड़ने वाली भाजपा झारखंड में चुनाव जीत जाये तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा और मुद्दा यह है कि, “ईवीएम जिन्दा है”।
कांग्रेस ने कल आरोप लगया कि कुछ ईवीएम मशीनें 99 प्रतिशत तक चार्ज थीं। इन मशीनों में भाजपा उम्मीदवारों के वोट 60 से 70 प्रतिशत ज्यादा वोट मिले। जहां बैट्री 70 से 78 प्रतिशत थी वहां डाटा सही थे। मैंने कांग्रेस के इन आरोपों पर चुनाव आयोग का अधिकृत और लिखित जवाब तलाशने की कोशिश की पर वह नहीं मिला। एनडीटीवी का एक वीडियो मिला जिसमें चुनाव आयुक्त ने ईवीएम का बचाव तो किया है पर तर्क नहीं है। वे अगले चुनाव तक ईवीएम को आराम देना चाहते हैं। उनका कहना है कि 20-22 चुनाव से ईवीएम सही नतीजे दे रही है। पर उसका जन्म ही ऐसे नक्षत्र में हुआ है कि बदनाम रही है। मुद्दा यह है कि हर बार उस पर आरोप लगता है लेकिन संतोषजनक जवाब कभी नहीं आया। भाजपा जब केंद्र में सत्ता में नहीं थी तो वह भी आरोप लगाती थी और पिछले लोकसभा चुनाव के बाद वोटों का प्रतिशत और फिर उनकी संख्या बढ़ने के जो आरोप लगे उनका भी कोई संतोषजनक जवाब नहीं है। आज भी खबरों में चुनाव आयोग का पक्ष तो है पर मीडिया के समक्ष किसने रखा या विज्ञप्ति जारी हुई इसका पता नहीं चल रहा है। छपी खबरों के आधार पर चुनाव आयोग की मानें तो ईवीएम की बैट्री मतदान के बाद मतगणना से पहले 99 प्रतिशत चार्ज दिखा सकती है। मेरा सवाल है कि ऐसी बैट्री का इस्तेमाल मोबाइल में क्यों नहीं किया जाता है? ऐसा कोई पावर बैंक आता है क्या? या इस टेक्नालॉजी से कोई बना क्यों नहीं रहा है?
दूसरी ओर, ईवीएम से संबंधित शिकायतें नई नहीं हैं। ये आरोप पहले भी लगे हैं। इनमें मतदान के बाद वोटों का प्रतिशत बढ़ जाना और जितने वोट बताये जाते हैं उनसे ज्यादा को गिना जाना शामिल है। इस बार भी ऐसा हुआ और पिछली बार की तरह इस बार भी इनका जवाब नहीं है जबकि चुनाव आयोग के साइट पर नतीजे देर से अपडेट किये जाने के आरोप भी कल लगे थे और आज छपी खबर के अनुसार उनका सबूत नहीं है। जो भी हो, चुनाव नतीजे आ गये हैं उनपर भरोसा नहीं करने के पर्याप्त कारण हैं और यकीन नहीं होने के भरपूर तर्क। ऐसे में जो बताया गया है उसे मानने के अलावा हमारे पास कोई विकल्प नहीं है। एक पार्टी और संगठन के रूप में भाजपा ईवीएम की अपनी शिकायत को भूल गई है और यही कांग्रेस को भ्रष्ट कहने और स्विस बैंक में काला धन जमा होने के आरोपों के साथ है। ऐसे में मुझे लगता है कि लोगों को ठगा गया है पर जिन्हें ठगा गया है उन्हें परवाह नहीं है और लोकतंत्र का रक्षक राजा का बाजा बजा रहा है।
इससे संबंधित आजतक डॉट इन की खबर का शीर्षक है, ईवीएम की बैटरी का काउंटिंग डेटा पर असर? कांग्रेस के आरोपों पर चुनाव आयोग ने क्या कहा। इस शीर्षक से लग रहा है कि कांग्रेस ने ऐसा कहा है जबकि कांग्रेस ने कहा कि यह तथ्य है। इससे इनकार करते हुए कहा गया है कि ऐसा नहीं है या तकनीकी रूप से यह संभव नहीं है जबकि जो तथ्य है उससे लगता है कि इन मशीनों से छेड़छाड़ की गई है जिससे बैट्री ज्यादा चार्ज बता रही है या छेड़छाड़ करने के लिए बैट्री भी छेड़ी गई है। तथ्य को आरोप की तरह प्रस्तुत करना और उसे तकनीकी तौर पर गलत कहने से मुद्दा खत्म नहीं होगा। तथ्य का आरोप तथ्य के रूप में दिया जाना चाहिये था कि फलां ईवीएम की बैट्री 99 प्रतिशत थी लेकिन उसमें कांग्रेस को वोट ज्यादा थे या भाजपा को ज्यादा नहीं थे। वैसे भी, यह खंडन लिखित में नहीं है, चुनाव आयोग का कहना है से बात नहीं बनती है और उसकी गंभीरता का पता नहीं चलता है। आप जानते हैं कि प्रधानमंत्री को लिखी कांग्रेस अध्यक्ष की चिट्ठी का जवाब भाजपा के कार्यवाहक अध्यक्ष ने दिया था। यहां कांग्रेस के लिखित आरोप का लिखित जवाब होना चाहिये। सोशल मीडिया पर लिखित शिकायतें तो हैं पर चुनाव आयोग का जवाब मुझे नहीं मिला। जो है वह खबर के रूप में है।
संजय शर्मा की खबर के अनुसार, कांग्रेस नेता पवन खेड़ा ने आरोप लगाया है कि हिसार, महेंद्रगढ़ और पानीपत से शिकायतें मिली हैं कि 99 प्रतिशत बैटरी वाली ईवीएम पर भाजपा जीती, जबकि 60-70 प्रतिशत बैटरी वाली ईवीएम पर कांग्रेस जीती। वहीं, कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने कहा कि क्या आप इस साजिश को समझ रहे हैं, जहां ईवीएम में 99 प्रतिशत बैटरी थी, वहां बीजेपी जीत गई, जहां 70 प्रतिशत से कम बैटरी थी, वहां कांग्रेस जीत गई। अगर यह साजिश नहीं है तो क्या है? उन्होंने कहा कि अब तक 12 से 14 सीटों पर शिकायतें आई हैं। इसे लेकर चुनाव आयोग की प्रतिक्रिया आई है। ईवीएम की एल्कलाइन बैटरी को लेकर चुनाव आयोग के तकनीकी विशेषज्ञों का कहना है कि इसका आंकड़ों से कोई लेना देना नहीं है। चुनाव आयोग के सूत्रों के मुताबिक ईवीएम के कंट्रोल यूनिट में एल्कलाइन बैटरी का उपयोग होता है. कंट्रोल यूनिट में नई बैटरी ईवीएम की कमिशनिंग के दिन उम्मीदवारों की उपस्थिति में डालकर सील की जाती है। ईवीएम में 7.5 वोल्ट की एल्कलाइन बैटरी लगती है, अमूमन पूरी चार्ज बैटरी 7.58 से 7.4 वॉल्ट के बीच 99% तक चार्ज बताती है। इस्तेमाल के दौरान जब वो 5.4 पर पहुंचती है, तो 10% दिखाती है। उसी समय मशीन बताती है कि बैटरी बदलने की जरूरत है।
संजय शर्मा ने आगे लिखा है, विशेषज्ञों ने कहा कि मतदान पूरा होने के बाद मशीनों को सीलबंद करते वक्त सभी उम्मीदवारों या राजनीतिक दलों के एजेंटों के सामने उनके दस्तखत के साथ बैटरी के आंकड़े भी फॉर्म 17 C में दर्ज किए जाते हैं, लेकिन बंद मशीन में भी बैटरी थोड़ी बहुत ही सही, लेकिन अपने आप थोड़ी बढ़ती है यानी रिस्टोर भी होती है। मुझे यह आश्चर्यजनक लगता है और नाले की गैस से चाय बनाने तथा ट्रैक्टर के ट्यूब की गैस से पानी का पंप चलाने की तरह है। शायद इसी लिए खबर में तकनीकी विशेषज्ञों का नाम नहीं है और चुनाव आयोग ने इसे अधिकृत तौर पर नहीं कहा है। मैं एंटायर पॉलिटिकल साइंस तो छोड़िये, सामान्य विज्ञान का भी बहुत तेज विद्यार्थी नहीं रहा हूं इसलिए निश्चित रूप से गलत हो सकता हूं। पर यह सवाल तो इंडियन एक्सप्रेस से भी हो सकता है कि बूस्टर शॉट जनता ने दिया है या ईवीएम ने? उम्मीद है इंडियन एक्सप्रेस ही इसपर खुलासा करे।


