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मनी लॉन्ड्रिंग : सहारा ग्रुप को झटका, कोर्ट ने ईडी की कार्रवाई को वैध बताया

नई दिल्ली, 23 अक्टूबर 2025: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने सहारा ग्रुप की चार सहकारी समितियों की याचिका खारिज कर दी है। कोर्ट ने मनी लॉन्ड्रिंग रोकथाम अधिनियम (पीएमएलए) के तहत प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जुलाई 2024 में की गई छापेमारी और जब्ती को वैध ठहराया। जस्टिस सुभाष विद्यार्थी की एकलपीठ ने 17 अक्टूबर 2025 को फैसला सुनाते हुए कहा कि याचिकाकर्ताओं के खिलाफ पीएमएलए की कार्यवाही में हस्तक्षेप का कोई आधार नहीं है। कोर्ट ने ईसीआईआर (केएलजेडओ-1/21/2023) पर आधारित जांच, सर्च और सीज की पूरी प्रक्रिया को बरकरार रखा।

यह फैसला लंबे समय से चल रही ईडी जांच में सहारा ग्रुप को बड़ा झटका है। याचिका में एम/एस हमारा इंडिया क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड (कोलकाता पंजीकृत), एम/एस सहारा क्रेडिट कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड, एम/एस स्टार्स मल्टीपर्पस कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड और एम/एस सहारायन यूनिवर्सल मल्टीपर्पस सोसाइटी लिमिटेड (सभी लखनऊ स्थित) ने 2 जुलाई 2024 के अधिकृत आदेश पर आधारित 3-5 जुलाई की छापेमारी रद्द करने की मांग की थी। ईडी ने लखनऊ सहित विभिन्न स्थानों से दस्तावेज जब्त किए और 2.98 करोड़ रुपये सीज किए थे।

क्षेत्राधिकार विवाद: कोर्ट ने ईडी की आपत्ति खारिज की, लेकिन गुण-दोष पर याचिका खारिज

ईडी ने प्रारंभिक आपत्ति उठाई थी कि ईसीआईआर कोलकाता में दर्ज हुई है, जहां हमारा इंडिया का पंजीकृत कार्यालय है। एएसजी एस.वी. राजू ने तर्क दिया कि अपराध की परतें (लेयरिंग) कोलकाता में बनीं, अधिकृत अधिकारी वहां हैं और सर्च पूरे देश में हुईं, इसलिए कोलकाता कोर्ट का क्षेत्राधिकार है। उन्होंने याचिकाकर्ता का बोर्ड रेजोल्यूशन कोलकाता से होने का हवाला दिया।

याचिकाकर्ताओं के वकील विक्रम चौधरी (सीनियर एडवोकेट) ने जवाब में ईडी पर ‘फोरम हंटिंग’ का आरोप लगाया। उन्होंने कहा कि मूल एफआईआर (142/2020) भुवनेश्वर (ओडिशा) में दर्ज हुई, जहां अपराध हुआ, लेकिन ईडी ने जानबूझकर कोलकाता चुना। चौधरी ने सहारा ग्रुप की संरचना का हवाला देते हुए बताया कि सभी किताबें, खाते, आयकर आकलन, फंड ट्रांसफर और मीटिंग मिनट्स लखनऊ में ही रखे जाते हैं। ईडी ने लखनऊ से ही रिकॉर्ड जब्त किए, इसलिए यहां कारण कार्रवाई का हिस्सा है। कोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के फैसलों (राना अय्यूब बनाम ईडी, 2023; के.ए. रऊफ शरीफ बनाम ईडी, 2023; वाई. अब्राहम अजीत बनाम राज्य, 2004) का हवाला देते हुए याचिकाकर्ताओं के तर्क स्वीकार किए और ईडी की आपत्ति खारिज कर दी। जस्टिस विद्यार्थी ने कहा कि सर्च लखनऊ में हुई, जहां याचिकाकर्ताओं का व्यवसायिक केंद्र है, इसलिए पीएमएलए की धारा 42 के स्पष्टीकरण के अनुरूप लखनऊ कोर्ट का क्षेत्राधिकार है।

याचिकाकर्ताओं के मुख्य तर्क: क्लोजर रिपोर्ट, बड्स एक्ट और फोर्स मेज्योर

याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया कि मूल एफआईआर (142/2020) की जांच के बाद 27 अगस्त 2020 को क्लोजर रिपोर्ट दाखिल हुई, जिसे 14 सितंबर 2024 को मजिस्ट्रेट ने स्वीकार कर लिया। क्लोजर रिपोर्ट के बाद पीएमएलए की कार्यवाही नहीं चल सकती। उन्होंने कहा कि निवेशकों को रिटर्न न चुकाना बैनिंग ऑफ अनरेगुलेटेड डिपॉजिट स्कीम एक्ट (बड्स एक्ट), 2019 की धारा 4 का अपराध है, जो आईपीसी की धारा 420 से अलग है। बड्स एक्ट विशेष कानून है, इसलिए आईपीसी लागू नहीं होता। साथ ही, सुप्रीम कोर्ट के 21 नवंबर 2013 के प्रतिबंध आदेश के कारण भुगतान संभव नहीं था, जो फोर्स मेज्योर है।

चौधरी ने ईडी के मुंबई कार्यालय द्वारा पहले ही ईसीआईआर (एमबीजेडओ/18/2014) दर्ज होने का हवाला दिया और कहा कि दूसरी ईसीआईआर (कोलकाता) अवैध है। उन्होंने कंपनियों एक्ट की धारा 212(2) का जिक्र कर कहा कि सहारा की कई कंपनियों की जांच एसएफआईओ को सौंपी गई है, इसलिए ईडी की जांच रुकनी चाहिए।

ईडी का जवाब: 315 एफआईआर, बड्स एक्ट आईपीसी को बाधित नहीं करता

एएसजी राजू ने कहा कि ईसीआईआर एक एफआईआर पर आधारित नहीं, बल्कि 502 एफआईआरों (जिनमें 315 शेड्यूल्ड अपराध वाली) पर है। जांच से पता चला कि सहारा इंडिया के एजेंटों ने निवेशकों को धोखा दिया। बड्स एक्ट की धारा 35 स्पष्ट करती है कि यह अन्य कानूनों को प्रभावित नहीं करता। उन्होंने कहा कि ओएफसीडी स्कीम जालसाजी थी, जहां मैच्योरिटी अमाउंट नई जमा राशि से चुकाया जाता था। ईडी ने 6 सितंबर 2025 को कोलकाता स्पेशल कोर्ट में शिकायत दाखिल कर दी है। राजू ने दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले (राजिंदर सिंह चड्ढा बनाम भारत संघ, 2023) का हवाला दिया कि कई एफआईआर एक ईसीआईआर का आधार बन सकती हैं।

कोर्ट का फैसला: याचिका खारिज, ट्रायल कोर्ट तय करेगा अपराध

जस्टिस विद्यार्थी ने याचिकाकर्ताओं के तर्कों को खारिज करते हुए कहा कि क्लोजर रिपोर्ट एक एफआईआर की होने से पूरी जांच रुक नहीं सकती। बड्स एक्ट आईपीसी को बाधित नहीं करता। कोर्ट ने कहा कि सहारा की योजनाएं धोखाधड़ी का पर्दा थीं, जहां मैच्योरिटी अमाउंट नई जमा से चुकाया जाता था। इंटरिम ऑर्डर का उल्लंघन साबित नहीं हुआ। कोर्ट ने एसएफआईओ जांच का हवाला देते हुए कहा कि यह याचिकाकर्ता समितियों को कवर नहीं करती।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि याचिकाकर्ताओं के बचाव संबंधी तर्क ट्रायल के दौरान ट्रायल कोर्ट तय करेगा। फैसले में किसी टिप्पणी का ट्रायल पर असर नहीं पड़ेगा। याचिकाकर्ता अब पीएमएलए की धारा 26 के तहत अपील कर सकते हैं।

पृष्ठभूमि: सहारा पर 500 से अधिक केस, सुप्रीम कोर्ट की निगरानी

ईसीआईआर भुवनेश्वर एफआईआर पर आधारित है, जिसमें सहारा एजेंटों पर निवेशकों को धोखा देने का आरोप है। ईडी ने सहारा ग्रुप के खिलाफ 500 से अधिक एफआईआरों का हवाला देकर जांच विस्तारित की। सुप्रीम कोर्ट ने 29 मार्च 2023 को 5,000 करोड़ रुपये रिफंड के लिए निर्देश दिए, जिनकी निगरानी जस्टिस आर. सुबाष रेड्डी कर रहे हैं। सहारा ने अब तक 1,002 करोड़ वितरित किए हैं। 8 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट ने संबंधित केसों पर स्टे दिया।

यह फैसला सहारा ग्रुप के लिए झटका है। विशेषज्ञों का मानना है कि इससे ईडी की जांच तेज हो सकती है। याचिकाकर्ताओं के वकीलों ने फैसले पर टिप्पणी से इनकार किया, जबकि ईडी ने इसे ‘न्यायपूर्ण’ बताया।

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