सहारा इंडिया अपने एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों को अपना कर्मचारी नहीं मानता!

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सहारा इंडिया के चेयरमैन सुब्रत रॉय

एक बड़ी खबर सहारा इंडिया कंपनी से आ रही है. कंपने कोर्ट में यह लिखकर दे दिया है कि उसका अपने कमीशन एजेंटों, फील्ड वर्करों और मोटीवेटरों से कोई संबंध नहीं है. Continue reading

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Fraud, cheating in Sahara Q shop

Dear sir / madam

Herewith I would like to draw your kind attention that , I was cheated by Sahara Q Shop. I was invested Rs 1 Lac ,in word rs 1,00, 000/ on my name. For Five years. But Till date I have not get any return money. Continue reading

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सहारा मीडिया में फिर सेलरी संकट, अरुप घोष से कर्मियों का भरोसा उठा

सहारा मीडिया से खबर है कि वहां सेलरी संकट फिर गहरा गया है. सीईओ बनकर जबसे अरुप घोष आए हैं, चीजें दिन ब दिन बिगड़ती ही जा रही हैं. सहारा से जुड़े कई लोगों ने भड़ास को मेल और ह्वाट्सअप के जरिए बताया है कि तीन-तीन महीने के बाद आधी-अधूरी सेलरी आ रही है. लोग किसी तरह घिसट घिसट कर काम कर रहे हैं. Continue reading

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मनोज मनु नहीं दे रहे मेरा बकाया पैसा… सहारा समय के टीवी जर्नलिस्ट ने लिखा गौतम सरकार को पत्र

गौतम सरकार सर

नमस्कार

मेरा नाम तहसीन ज़ैदी है.. मैंने सहारा समय में साल 2003 से साल 2015 तक रहकर भोपाल, रायपुर, चंडीगढ़ और जयपुर में कोर्डिनेटर से लेकर ब्यूरो चीफ तक के पद पर पूरे 14 साल सेवा की है… मैं कंपनी को आधी सैलरी मिलने के बावजूद छोड़ना नहीं चाह रहा था लेकिन कंपनी में कुछ तानाशाह लोगों की वजह से छोड़ना मजबूरी हो गया था… छोड़ने से पहले मेरी 19 महीनों की सैलरी आपके पास पेंडिंग है… इसके लिए मैंने मिस्टर मनोज मनु से कई बार SMS, MAIL व्हाट्स ऐप, टेलीफोनिक रिक्वेस्ट की लेकिन उन्होंने अभी तक कोई रिस्पॉन्स नहीं किया… PF तो जैसे तैसे करके निकलवा लिया… उसी बात को लेकर मिस्टर मनोज कुछ ईगो पाले हुई हैं…

अभी कुछ दिन पहले सहारा श्री रायपुर आये थे… मैं चाहता तो उनसे आसानी से मिल लेता… मेरे को मेरे शहर में कोई नहीं रोकता, इतना मुझे विश्वास है… लेकिन किसी का कार्यक्रम खराब करना मेरे संस्कार में नहीं है… दूसरा, कई लोगों ने आपसे बात करने को बोला था तब तक आपसे मेरी बात भी नहीं हुई थी… गौतम जी, मैं आपसे निवेदन करता हूँ कि मेरी 19 महीनों की सैलरी दिलवाने की कृपा करें.. क्योकि ये आप भी बहुत अच्छे से जानते हैं कि कोई किसी के पैसे कभी भी नहीं खा सकता… क्योंकि हर आदमी में अपने पैसे निकालने की अपनी ताकत होती है… इसके अलावा कई फोरम भी होते हैं…

आपसे निवेदन है कि एक हफ्ते के भीतर मेरी 19 महीने की सैलरी दिलवाकर हिसाब करवा देवें…. वरना आपसे अगली मुलाकात माननीय सहारा श्री के सामने होगी… शायद आप इस बात को बहुत हल्के में ले रहे होंगे कि मैं सहारा श्री के सामने की बात कर रहा हूँ… तो शायद आप मेरे बारे में नहीं जानते… किसी पुराने सहारा इम्प्लॉई से मेरे बारे में पता कर लेवें… मैं जो ठान लेता हूँ वो मैं करके रहता हूँ… मेरा डिटेल इस प्रकार है…. नाम- तहसीन ज़ैदी इंप्लाइ कोड EC-58987.. लोकेशन… रायपुर..

दूसरी बात गौतम सर, मैंने सहारा समय में रहते हुए टेक्निकल, एडिटोरियल, कोर्डिनेशन, मार्केटिंग और डिस्टिब्यूशन डिपार्टमेंट में रहकर कंपनी को अपनी सेवाएं दी हैं…आपसे कुछ उम्मीद है… अपने पास एक हफ्ते का समय है सर… तीसरी और आखरी बात गौतम सर… आप सोच रहे होंगे कि मैं इतने दिन बाद क्यों बोल रहा हूँ…तो मैं आपको बताना चाहूंगा कि मुझे कंपनी मजबूरी में छोड़ने के बाद भी पूरा भरोसा था कि पैसा मिल जाएगा… कंपनी अपनी है…लेकिन मनोज जी जैसों के बेईमानी के तेवर देखकर कंपनी पर से भी भरोसा हट गया है… वजह बताता हूं.

मिस्टर मनोज अभी जब रायपुर आये थे तो वो एक एम्प्लोयी मिस्टर प्रफुल्ल पारे का डेढ़ लाख रुपए बकाया सैलरी का चेक लेकर आये… जब तक मुझे पता चला तब तक मिस्टर मनोज यहां से नोएडा जा चुके थे… कई बार कॉल किया लेकिन उनने नहीं उठाया… मैंने यहां के ब्यूरो से पूछा तो बोला गया कि मिस्टर मनोज को कुछ गलतफहमी है मेरे को लेकर कि मैंने कहीं किसी से ये कहा है कि पैसे तो टेढ़ी उंगली से भी निकल जाएंगे… तो गौतम सर इस बारे में मैं आपको बताना चाहूंगा कि पहले तो मैंने ये बात किसी से बोली भी नहीं है क्योंकि ये बात मुझे मिस्टर आदित्य जो रायपुर के ब्यूरो हैं, से पता चली…दूसरा आप ही बताइए, गौतम सर, कि अगर बोल भी दिया तो क्या गलत बोल दिया क्योंकि ये मेरा अपनी मेहनत से कमाया हुआ पैसा है… उसके लिए एक आम आदमी किसी भी हद तक जाता है और जाना भी चाहिए…. बाकी आप काफी समझदार हैं….कम लिखे को ज्यादा समझें और संबंध मधुर रहे… ये मेरी तरफ से हमेशा कोशिश रहेगी….

आपका पुराना और पूर्व मीडिया इंप्लाई

तहसीन जैदी

रायपुर

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मांगा था मजीठिया का हक, इसलिए नहीं छापा निधन का समाचार

जिनके साथ 25 साल गुजारा उनका भी मर गया जमीर, नहीं शामिल हुए अंतिम यात्रा में, यह है सहारा परिवार का सच…  वाराणसी : सहारा समूह के हुक्मरान सुब्रत राय सहारा एक तरफ जहां सहारा को एक कंपनी नहीं बल्कि परिवार मानने का दंभ भरते हैं, वहीं इसी सहारा समूह के पत्रकार रह चुके जयप्रकाश श्रीवास्तव के निधन की एक लाईन की खबर इसलिये राष्ट्रीय सहारा अखबार में नहीं लगायी गयी क्योंकि जयप्रकाश ने अखबार प्रबंधन से जस्टिस मजीठिया वेज बोर्ड के अनुसार अपना बकाया मांग लिया था।

राष्ट्रीय सहारा के वरिष्ठ पत्रकार श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव का सोमवार को वाराणसी के सिंह मेडिकल एण्ड रिसर्च सेंटर, मलदहिया में निधन हो गया। ६४ वर्षीय श्री जयप्रकाश श्रीवास्तव मधुमेह एवं हृदय रोग से पीड़ित थे। उनके निधन पर समाचार पत्र कर्मचारी यूनियन के अजय मुखर्जी सहित कई पत्रकारों ने शोक जताया है।  स्व॰ जयप्रकाश श्रीवास्तव लम्बे समय से पत्रकारिता से जुड़े रहे।  वे अपने पीछे पत्नी, तीन पुत्रियां और एक पुत्र छोड़ गये हैं।  उनके निधन पर देश भर के मजीठिया क्रांतिकारियों ने शोक जताया है और साफ कहा है कि इस क्रांतिकारी का बलिदान र्ब्यथ नहीं जाने दिया जायेगा।

जयप्रकाश श्रीवास्तव का कसूर बस इतना था कि उन्होंने मजीठिया के लिए श्रम न्यायालय में केस कर रखा था। नतीजा रहा कि उनके निधन का समाचार तक नहीं छापा गया। यह कड़वी हकीकत है,  सच कहने की हिम्मत का नारा देने वाले राष्ट्रीय सहारा अखबार का। इस अखबार की वाराणसी यूनिट में जयप्रकाश श्रीवास्तव लगभग 25 वर्ष रिपोर्टर रहने के बाद एक वर्ष पहले रिटायर हो गये थे। सोमवार की शाम हार्ट अटैक के चलते उनका निधन हो गया। उनके निधन की जानकारी मिलते ही राष्ट्रीय सहारा में शोक सभा की तैयारी शुरू हुई। फोटो ग्राफर ने जयप्रकाश की फाइल फोटो कम्प्यूटर में खोज कर निकाला ताकि वह उनके निधन के समाचार के साथ प्रकाशित हो सके।

निधन का समाचार एक रिपोर्टर ने कम्पोज करना शुरू ही किया कि ऊपर से मौखिक निर्देश आ गया। बताया गया कि जय प्रकाश ने मजीठिया का हक पाने के लिए लेबर कोर्ट में संस्थान के खिलाफ मुकदमा कर रखा है इसलिए उनके निधन का समाचार राष्ट्रीय सहारा में नहीं छपेगा। यह सूचना मिलते रिपोर्टर ने खबर और फोटोग्राफर ने कम्प्यूटर से जयप्रकाश की फोटो डिलीट कर दी। इतना ही नही, इशारों में एक दूसरे को कुछ ऐसे संकेत हुए कि राष्ट्रीय सहारा के पत्रकार साथी न तो संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर गये और न ही उनकी अंतिम यात्रा में शामिल हुए। केवल एक स्टाफर और चार-पाच स्ट्रिंगर ही उनके घर गए।

जयप्रकाश ने लगभग 25 साल राष्ट्रीय सहारा में सेवा की। वह ब्यूरो के स्टाफ थे। उनके साथ ही सहारा में नौकरी शुरू करने वाले लगभग डेढ दर्ज़न कर्मचारी आज भी सहारा की वाराणसी यूनिट में है जिनके साथ जयप्रकाश के घरेलू रिश्ते रहे लेकिन ऐसे लोगों ने भी नौकरी जाने के भय में अपना जमीर गिरवी रख दिया। वे भी संवेदना व्यक्त करने के लिए जयप्रकाश के घर जाने की हिम्मत नहीं जुटा सके। सहारा को परिवार बताने वाले सुब्रत राय के इस संस्थान की ओर से एक माला तक नसीब हो सकी जय प्रकाश को।

शशिकांत सिंह
पत्रकार और आरटीआई एक्सपर्ट
९३२२४११३३५

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राष्ट्रीय सहारा अखबार के वरिष्ठ पत्रकार कुणाल ने कर दी ये भयंकर गलती, मचा हाहाकार

राष्ट्रीय सहारा अखबार के नेशनल ब्यूरो हेड और राजनीतिक संपादक कुणाल ने एक बड़ी गलती कर दी है. इसे लेकर पूरे समूह में हाहाकार मचा हुआ है. ह्वाट्सअप पर सहारा मीडिया के न्यूज चैनलों और अखबारों के मीडियाकर्मियों का एक आफिसियल ग्रुप ‘समय रिपोर्टर्स’ के नाम से संचालित किया जाता है. इस ग्रुप में सहारा में काम करने वाली महिला मीडियाकर्मी भी शामिल हैं. कल रात इसी ग्रुप पर कुणाल की तरफ से दस सेकेंड का एक पोर्न वीडियो डाल दिया गया. इसके बाद तो हड़कंप मच गया.

खासकर सहारा मीडिया के ‘समय रिपोर्टर्स’ ह्वाट्सअप ग्रुप की महिला पत्रकारों ने जमकर आपत्ति जताई और कुणाल की लानत-मलानत की. अपनी तगड़ी घेरेबंदी के बाद कुणाल ने अपनी हरकत के लिए इस ह्वाट्सअप ग्रुप पर माफी मांगी है या नहीं, यह नहीं पता चला है. वहीं कुछ लोग कुणाल का बचाव करते हुए कह रहे हैं कि उन्होंने जानबूझ कर ये पोर्न वीडियो नहीं डाला. उनसे गलती से सेंड यानि मिस्टेक हो गया. बताया जा रहा है कि आज सहारा मीडिया के नोएडा आफिस में इस मामले को लेकर मीटिंग बुलाई गई है. चर्चा है कि कुणाल को फोर्सलीव पर भेजा जा सकता है. वहीं इस मामले को लेकर सहारा मीडिया के देश भर के रिपोर्टर्स में तरह तरह की चर्चा है.

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सहारा में प्रबुद्ध राज को राजस्थान और एनसीआर की भी जिम्मेदारी, विमलेंदु राजस्थान चैनल के इनपुट हेड बने

सहारा मीडिया से खबर है कि सहारा समय चैनल में प्रबुद्ध राज की कद बढ़ा दिया गया है. वे अब सहारा समय बिहार-झारखंड रीजनल न्यूज चैनल के अलावा राजस्थान और एनसीआर चैनल के भी हेड बना दिए गए हैं. वहीं सहारा के पत्रकार विमलेन्दु को राजस्थान चैनल का इनपुट हेड बनाया गया है. विमलेन्दु इससे पहले यूपी-उत्तराखंड चैनल के इनपुट हेड रह चुके हैं. वे फिलहाल बिहार-झारखंड चैनल के इनपुट में सीनियर पोजिशन पर कार्यरत थे.

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सहारा प्रकरण : देश के उद्यमियों के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार मत करिए

सहारा-सेबी केस विश्व के आधुनिक न्यायिक इतिहास में अपनी तरह का अकेला मामला है जिसमें न सिर्फ निर्धारित कानूनी प्रावधानों का उलंघन किया गया बल्कि नियामक संस्थाओं का पक्षपातपूर्ण रवैया भी स्पस्ट रूप से सामने आया। जैसा कि 2 मार्च 2014 को पंजाब केसरी ने अपने सम्पादकीय में उल्लेख किया था कि 2004 में यूपीए सरकार बनने के बाद एक केबिनेट मंत्री को देश के दो प्रतिष्ठित लोगों (मा. मोदी जी और मा. सहाराश्री) को नेस्तनाबूद करने का टास्क दिया गया था।

उसके बाद सरकारी एजेंसियों द्वारा चरणबद्ध तरीके से इस तरह के नोटिफिकेशन और नियम-कानून लाए गए जिससे सहारा इंडिया परिवार के व्यावसायिक क्रिया-कलापों पर विपरीत प्रभाव पड़े या धीरे-धीरे नष्ट होने की प्रक्रिया की तरफ बढ़े। उन तमाम प्रयासों के बाद भी जब उनके आकाओं को मनमाफिक परिणाम नहीं मिले तो, एक काल्पनिक व्यक्ति रोशन लाल के द्वारा शिकायत का हवाला देकर सेबी द्वारा कार्यवाही शुरू करवाई गई। जबकि यह केस सेबी के अधिकारक्षेत्र के बजाय कंपनी अफेयर मंत्रालय के अधीन बनता था, जिससे सहारा इंडिया परिवार ने उक्त योजनाओं (OFCD) की अनुमति ली थी।

सहारा इंडिया को माननीय न्यायालय पर पूर्ण भरोसा था इसीलिए संस्था कोर्ट गई परंतु उम्मीद के विपरीत माननीय न्यायालय के निर्देश भी पूर्वाग्रह से ग्रसित थे। सहारा द्वारा पेश किए सभी प्रस्ताव ठुकरा दिए गए। सेबी ने जो कुछ कहा वह सही माना गया और सहारा की हर दलील और तर्क को गलत माना गया। पहले आदेश दिया गया निवेशकों को पूरी रकम लौटाई जाए और इस कार्यवाही से संबंधित दस्तावेज सेबी को सौंप दिए जाएं। जब ऐसा किया गया तो पहले सेबी ने दस्तावेज लेने में आनाकानी की और माननीय न्यायालय के आदेश के बावजूद आजतक उनका सत्यापन नहीं किया गया। उसके बाद आदेश दिया गया संपूर्ण राशि सेबी को दी जाए और सेबी निवेशकों को रकम लौटाए।

ये आदेश दो बार भुगतान करने जैसा था, जबकि एक सामान्य वित्तीय विशेषज्ञ भी इस तथ्य से अनभिज्ञ नहीं होता कि किसी भी वित्तीय संस्थान या बैंक के केबल तीन प्रतिशत जमाकर्ता भी एक साथ अपनी जमाराशि लेने आ जाएं तो उनको तुरंत भुगतान संभव नहीं हो पाएगा क्योंकि कोई भी बैंक या वित्तीय संस्थान जमाराशि का एक बड़ा हिस्सा अन्य व्यावसायिक गतिविधियों में निवेश करके रखते हैं और तभी वे जमाराशि पर ब्याज देने की स्थिति में होते हैं। सेबी के पास करीब चौदह हजार करोड़ रुपये जमा होने के बाद भी अभी तक केबल पचपन करोड़ रुपये की राशि का ही भुगतान सेबी द्वारा किया गया है। इसके बावजूद कोर्ट ने कभी न तो दस्तावेजों के सत्यापन और ना ही भुगतान से संबंधित कोई सवाल-जवाब सेबी से किया। पूरी अदालती कार्यवाही में अव्यवहारिक आदेश दिए गए जिससे उनके अनुपालन में अनेक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा। जब निर्धारित कानूनी प्रक्रियाओं को ताक पर रखकर मा. सहाराश्री जी को न्यायिक अभिरक्षा में भेज दिया गया था, तब सम्मानित बेंच के समक्ष वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ राजीव धवन ने कहा था कि 4 मार्च 2014 का आदेश पहले से लिखा हुआ था। अदालत ने इस लिखित आदेश की सिर्फ घोषणा की। डॉ धवन ने अदालत की अवमानना मामलों के लिए सुप्रीम कोर्ट की नियमावली का हवाला दिया। वरिष्ठ अधिवक्ता ने कहा कि इस नियमावली के एक भी प्रावधान का पालन नहीं किया गया। उसके बाद दस हजार करोड़ की क्रूरतापूर्ण शर्त थोपी गई जो विश्व-इतिहास की सर्वाधिक जमानत राशि थी।

अभी जो तीसरे पक्ष के श्री स्वामी पर दस करोड़ का जुर्माना, विदेश जाने पर रोक और 27 अप्रेल को कोर्ट में पेश होने का आदेश दिया है वह भी पूरी तरह से अव्यवहारिक है। यह निर्देश एक धमकी की तरह है जिससे कोई भी तीसरी पार्टी सहारा इंडिया से कोई डील करने से पहले सौ बार सोचे। क्या इस निर्देश के बाद कोई तीसरा पक्ष सहारा इंडिया परिवार के साथ कोई सौदा करने आ सकता है जिससे कोर्ट के आदेशानुसार रकम जमा करने की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया जा सके। पिछले छह-सात वर्षों की कार्यवाहियों का निष्कर्ष जो मुझे समझ में आता है वह यह है, माननीय न्यायालय और सेबी का किन्हीं निवेशकों के हितों की रक्षा करने का कोई इरादा नहीं है, शुरू से ही उनका बस यही लक्ष्य नजर आ रहा कैसे एंबी वैली की नीलामी हो, कैसे सहारा इंडिया परिवार का ज्यादा से ज्यादा नुकसान हो। इस संपूर्ण घटनाक्रम को देखकर एक ऐतिहासिक घटना बार-बार मेरे जेहन में कौंधती है, जो इस प्रकार है :

जब कभी भी हम पाश्चात्य दर्शनशास्त्र का अध्ययन या चर्चा करते हैं तो जिस महान दार्शनिक का नाम सबसे पहले आता है वो अब से करीब 2500 वर्ष पूर्व यूनान में जन्मे सुकरात हैं। उनकी गिनती अब तक के विश्व-इतिहास के कुछ सर्वश्रेष्ठ विवेकशील व्यक्तियों में की जाती है। उनकी बातें और विचार इतने बुद्धिमतापूर्ण, शिक्षापूर्ण और गहराई लिए हुए थे कि युगों के पार आज करीब ढाई हजार वर्ष बाद भी अत्यधिक प्रासंगिक और उपयोगी बने हुुए हैं। उस समय यूनान में तत्कालीन सत्ताधारी और प्रभावशाली लोगों ने उन पर राष्ट्रद्रोह, युवाओं को भ्रमित करने और उस समय के देवताओं का अपमान करने यानी नास्तिक होने का आरोप लगाया था, जिसकी सजा मृत्युदंड थी। न्यायपालिका में सुनवाई की प्रक्रिया काफी लम्बी चली। मानव-इतिहास के सबसे महान तर्कशास्त्रीयों में से एक सुकरात के सामने विरोधी-पक्ष और न्यायधीशों की एक न चली, सुकरात ने अपने अकाट्य तर्कों से सबको निरुत्तर कर दिया था। फिर भी सुकरात की हर दलील और तर्क को गलत माना गया और सुकरात को मृत्युदंड दिया गया था। सुकरात को अपराधी ठहराने के बाद उन्हें माफ़ी मांग कर और अपना रास्ता बदल कर मृत्युदण्ड से बचने सुविधा दी गई। इसके बाद सुकरात ने कहा वह ऐसे अपराध के लिए क्षमा नहीं मांग सकते जो उन्होंने कभी किया ही नहीं, न वह जुर्माने के रूप में धन दे सकते हैं और ना ही अपना रास्ता बदल सकते हैं। इसके बाद अदालत में सुकरात ने एथेन्सवासीयों को संबोधित करते हुए जो शब्द कहे वे विश्व-इतिहास की अमूल्य धरोहर माने जाते हैं, जो इस प्रकार हैं :

“मैं उनसे कह रहा हूँ जिन्होंने मुझे मौत की सजा दी है और मैं एथेंस की जनता से भी कहता हूँ, ओ एथेंसवासियो! शायद तुम सोचते हो, कि मैं पर्याप्त तर्क प्रस्तुत न कर पाने के कारण दंडित हुआ हूँ, जिनके (तर्कों) द्वारा मैं तुम्हें सहमत कर सकता था। अगर मैं ऐसा करना उचित समझता तो तुम्हें राजी करके बरी होने की कोशिश करता। मैं किसी बात के आभाव के कारण दण्डित हो रहा हूँ, पर वह तर्क नहीं हैं और न ही मेरे द्वारा किया गया कोई अपराध है। इसका कारण मेरा दुःसाहस और ढिठाई है। मैंने वैसी बातें करने की प्रवृत्ति नहीं दिखाई, जिसे सुनना तुम सब पसंद करते। अगर मैं रोता-पीटता, विलाप करता–और भी ऐसी बातें कहता, जो मुझ जैसे व्यक्ति को सोभा नहीं देती। न तो मैंने तब खतरे से बचने के लिए ऐसा कुछ किया, जो किसी स्वतंत्र व्यक्ति के लिए अशोभनीय विचार हो और न ही अब मुझे इसको लेकर कोई पछतावा है। इस तरह अपना बचाव करके जीने के बजाय तो मैं मर जाना पसंद करूँगा; क्योंकि युद्ध में अथवा किसी मुकदमे की सुनवाई में मुझे या किसी भी अन्य व्यक्ति के लिए मृत्यु से बचने के लिए हरसंभव साधन का प्रयोग करना उचित नहीं होता। युद्ध में हर कोई जानता है कि कोई व्यक्ति हथियार डालकर और अपने विपक्षियों से दया की भीख माँगकर मौत से बच सकता है। इसी तरह दूसरी तरह के खतरों में भी मृत्यु से बचने के अन्य उपाय हैं। बसर्ते आदमी वह सब कहने और करने को तैयार हो!  … ओ एथेंसवासियो! मृत्यु की अपेक्षा दुष्टता से बचना कहीं अधिक कठिन होता है; क्योंकि इसकी गति मृत्यु से तीव्र होती है।…”

अतः मैं देश के नीतिनियन्ताओं से आग्रह करना चाहता हूँ कि देश के उद्यमियों के साथ आतंकवादियों जैसा व्यवहार मत करिए, उद्यमियों के साथ इस तरह का व्यवहार करने से इस देश का भला नहीं होने वाला है क्योंकि कोई भी उद्यमी अकेला नहीं होता है उसके साथ हजारों-लाखों लोगों की जिंदगी भी जुड़ी होती है। कोई भी देश चाहे कितना भी संपन्न क्यों न हो अपने सभी नागरिकों को सरकारी नौकरी नहीं दे सकता है।

मेरा मानना है नियामक संस्थानों की भूमिका औद्योगिक संस्थाओं का मार्गदर्शन करना होना चाहिए न कि बदले की भावना से कार्य करना, जिससे देश में उद्योगों का विकास हो सके, देश में ज्यादा से ज्यादा लोगों के लिए रोजगार सृजन का कार्य हो सके। क्योंकि किसी भी देश या मानव समाज का उत्थान उस समाज या देश में रोजगार के अवसरों के सृजन से सीधा जुड़ा है। जो देश या समाज अपने लोगों के पालन पोषण, शिक्षण-प्रशिक्षण, विकास और प्रतिभाओं के उपयोग में जितना आगे रहे हैं, इतिहास साक्षी है ऐसे देशों और समाजों ने हमेशा समृद्धि, खुशहाली और शांति हासिल की है।

धन्यवाद!

(एक मीडियाकर्मी द्वारा भड़ास को भेजे गए पत्र पर आधारित.)

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सुब्रत राय पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, एंबी वैली बेचने और कोर्ट में हाजिर होने के आदेश

सुप्रीम कोर्ट से सुब्रत रॉय को तनिक भी राहत नहीं मिली. कोर्ट ने 34,000 करोड़ रुपये वाली एंबी वेली को बेचने का आदेश कर दिया है. सुप्रीम कोर्ट एंबी वैली की नीलामी की देखरेख के लिए ने बॉम्बे हाईकोर्ट को कहा है. कोर्ट ने सहारा को आदेश दिया है कि अगले 48 घंटों में एंबी वैली से जुड़ी सभी जानकारी सौंपे. कोर्ट आदेश में कहा गया है कि सेबी और बॉम्बे हाईकोर्ट कोर्ट सभी कागजात मिलते ही नीलामी प्रक्रिया शुरू कर दें. सुप्रीम कोर्ट ने सुब्रत रॉय सहारा को आदेश दिया है कि वह 28 अप्रैल को कोर्ट में पेश हों.

सहारा समूह के प्रमुख सुब्रत राय तथा दो अन्य निदेशकों रविशंकर दुबे और अशोक राय चौधरी को ग्रुप की दो कंपनियों सहारा इंडिया रीयल एस्टेट कॉरपोरेशन और सहारा हाउसिंग इन्वेस्टमेंट कॉर्प लिमिटेड द्वारा 31 अगस्त, 2012 तक निवेशकों का 24,000 करोड़ रुपये का रिफंड करने के आदेश का अनुपालन नहीं करने के लिए गिरफ्तार किया गया था. एक निदेशक वंदना भार्गव को हिरासत में नहीं लिया गया था. सुप्रीम कोर्ट ने 6 मई, 2016 को सुब्रत राय को अपनी मां की अंत्येष्टि में शामिल होने के लिए चार हफ्ते का पैरोल दिया था. उसके बाद से उनके पैरोल को बढ़ाया गया है.

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सहारा प्रबन्धन के खिलाफ जुलूस : सहारा टॉवर, सहारा शहर और ओपी श्रीवास्तव के घर के सामने हुआ प्रदर्शन

लखनऊ। सहारा प्रबन्धन के खिलाफ आज उत्पीड़ित और शोषित सैकड़ों कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर विरोध रैली निकालकर सहारा टावर कपूरथला, सहारा शहर और वायरलेस चैराहा स्थित ओ0पी0 श्रीवास्तव के आवास के समक्ष जोरदार प्रदर्शन किया। सहारियन कामगार संगठन उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष ऋषि कुमार त्रिवेदी के नेतृत्व में सहारा स्टेट जानकीपुरम से सैकड़ों की संख्या में कर्मियों की शुरू हुयी विरोध रैली जैसे ही कपूरथला स्थित सहारा कार्पोरेट कार्यालय पहंची, जोरदार प्रदर्शन शुरू कर दिया गया। इस विरोध प्रदर्शन के दौरान सहारा कार्यालय में मौजूद अन्य सभी कर्मी भी बाहर निकल आये और प्रदर्शनकारियों के साथ प्रबन्धन के खिलाफ जोरदार नारेबाजी शुरू कर दी।

इस विरोध प्रदर्शन में महिला कर्मियों ने भी बढ़चढ़ कर हिस्सा लिया। कपूरथला में लगभग एक घण्टे के प्रदर्शन के बाद रैली वायरलेस चैराहा महानगर स्थित ओ0पी0 श्रीवास्तव के आवास के समक्ष प्रदर्शनकारियों की विरोध रैली जा पहुंची। वहां भी जमकर नारेबाजी हुयी और अपनी मांगों को पूरा करने की मांग करने लगे। काफी देर के तक यहां विरोध प्रदर्शन होने के बाद सहारा शहर, गोमतीनगर सहित विभिन्न मार्गों से होते हुये लक्ष्मण पार्क, के0डी0 सिंह बाबू स्टेडियम के समक्ष विरोध रैली का सम्पन्न हुयी।

रैली के समापन मौके पर संगठन के अध्यक्ष ऋषि कुमार त्रिवेदी ने बताया कि सहारा प्रबन्धन ने बीते ढाई वर्षों से अपने कर्मचारियों को वेतन का भुगतान नहीं कर रहा है और वेतन की मांग किये जाने पर सभी कर्मचारियों को असंवैधानिक एवं गैरकानूनी ढंग से विभिन्न राज्यों में स्थानान्तरित किया जा रहा है व ज्वाइन न करने पर नौकरी से निकाला जा रहा है व जबरन त्यागपत्र लिखवा लिया जा रहा है। श्री त्रिवेदी ने बताया कि कर्मचारियों के आर्थिक और मानसिक शोषण व उत्पीड़न तथा उनके संवैधानिक अधिकारों को दिलाने के लिये सहारियल कामगार संगठन ने अपर श्रम आयुक्त लखनऊ क्षेत्र को एक मांग पत्र बीते एक दिसम्बर-2016 को दे चुका है, और श्रम आयुक्त ने भी मांग पत्र को संज्ञान में लेते हुये सहारा प्रबन्धन को नोटिस जारी कर चुका है लेकिन सहारा प्रबन्धन बराबर अवहेलना करते हुये वार्ता के लिये मौजूद नहीं हुआ और न ही वेतन दिया।

इस मौके पर मीडिया प्रभारी श्री राम तिवारी ने बताया कि जब तक सहाराकर्मियों को पूर्णतयः न्याय नहीं मिल जाता तब तक सहारियन कामगार संगठन, लखनऊ उत्तर प्रदेश संघर्ष करता रहेगा, और जल्द ही बड़े स्तर पर सहारा प्रबन्धन के खिलाफ विरोध प्रदर्शन शुरू किये जायेंगे।

मीडिया बन्धु अधिक जानकारी के लिये सम्पर्क करें:-
राम तिवारी
7668175977, 7985624100
राज कुमार श्रीवास्तवब
7985624100
मीडिया प्रभारी    
सहारियल कामगार संगठन
लखनऊ
उत्तर प्रदेश

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सुप्रीम कोर्ट हुआ सख्त- पैसे न दिए तो एंबी वैली नीलाम कर देंगे

सुप्रीम कोर्ट ने सहारा मामले में अपने फरवरी के आदेश को संशोधित कर दिया है… सहारा को अब सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री के मुकाबले सेबी-सहारा खाते में रकम जमा करानी होगी.. सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेताते हुए कहा अगर उसने पैसे नहीं जमा कराए तो एंबी वैली को नीलाम कर देंगे… सहारा मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फरवरी के आदेश को संशोधित करते हुए समूह के न्यूयॉर्क स्थित होटल की नीलामी से मिलने वाली रकम को सुप्रीम कोर्ट रजिस्ट्री में जमा कराए जाने के बदले सेबी-सहारा के संयुक्त खाते में जमा कराने का आदेश दिया है…

इस होटल की बिक्री से कंपनी को करीब 750 करोड़ रुपये मिलने की उम्मीद है… साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने सहारा को चेतावनी देते हुए कहा कि अगर वह तय समय पर पैसा जमा कराने में विफल होती है तो वह एंबी वैली को नीलाम कर देगी… सुप्रीम कोर्ट ने सहारा ग्रुप को 17 अप्रैल तक 5,000 करोड़ रुपये जमा कराए जाने का आदेश दिया था… इससे पहले सहारा समूह को बड़ा झटका देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने लोनावाला में सहारा की प्रॉप्रटी एंबी वैली को जब्त किए जाने का आदेश दिया था… सहारा ग्रुप के इस प्रॉपर्टी की कीमत 39,000 करोड़ रुपये है…

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक सहारा से रकम की वसूली नहीं होती है तब तक यह टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास ही रहेगी… सहारा ग्रुप का यह टाउनशिप मुंबई के पुणे में है… सहारा ने सुप्रीम कोर्ट में माना कि उसे मूलधन के तौर पर सेबी को 14,000 करोड़ रुपये का भुगतान करना है और कंपनी सेबी को अभी तक 11,000 करोड़ रुपये का भुगतान कर चुकी है।

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छेड़छाड़ में मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी के खिलाफ FIR के आदेश

सेक्सुअल हरासमेंट मामले में सहारा मीडिया को बड़ा झटका… मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी हैं बड़े पदों पर आसीन…

दिल्ली की कड़कड़डूमा कोर्ट ने सेक्सुअल हरासमेंट के केस में शुक्रवार 10.1.2017 को ऐतिहासिक फैसला सुना दिया है… सेक्सुअल हरासमेंट के एक मामले में सहारा मीडिया के मनोज मनु, गौतम सरकार और रमेश अवस्थी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के आदेश दिए हैं… इन पर आरोप है कि ये लोग अपनी घिनौनी करतूत छिपाने के लिए पीड़ित महिला को लगातार धमकाते रहे… साथ ही पुलिस को भी मैनेज करते रहे…

पीड़ित महिला अपने साथ हुए दुर्व्यवहार के प्रकरण को लेकर सहारा मीडिया के उच्च पदों पर बैठे मोस्ट सीनियर अधिकारियों से मिलती रही और न्याय की गुहार लगाती रही लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई थी. नोएडा स्थित सहारा समूह के न्यूज चैनल कैंपस में अपने साथ हुए अभद्र व्यवहार के खिलाफ महिला इंसाफ के लिए सहारा मीडिया के एचआर से लेकर महिला आयोग और पुलिस हर दरवाज़ा खटखटाती रही. मगर किसी ने इस मामले में जांच तक करना मुनासिब नहीं समझा. यहाँ तक कि पुलिस एफआईआर दर्ज करने को राजी नहीं थी…. तब महिला अंततः कोर्ट पहुँची.. कोर्ट ने जब महिला की आपबीती सुनी तो फ़ौरन 156 के तहत एफआईआर दर्ज करने और जांच के आदेश दिए.

घटना 2016 के जून महीने की है. तब उस समय के सहारा मीडिया के एमपी चैनल हेड रहे और बाद में नेशनल हेड बने मनोज मनु ने कैंपस में सीढ़ियों पर महिला के साथ अभद्र व्यवहार किया. ऐतराज़ दर्ज कराने पर उसे इतने जोर से पकड़ा कि उसकी बांहों पर नील निशान पड़ गए… हालाँकि मनोज मनु ज्वायनिंग के बाद से ही महिला के पीछे हाथ धो कर पड़ गए थे… महिला के ऑब्जेक्शन पर उसे तरह तरह की धमकियां देते थे… महिला ने इस बात की शिकायत गौतम सरकार और रमेश अवस्थी से भी की थी लेकिन उनका कहना था कि मीडिया में काम करना है तो ये सब तो बर्दाश्त करना ही पड़ेगा … मनोज मनु जो भी बोल रहा है उसकी डिमांड पूरी कर दो…

मनोज मनु द्वारा महिला के साथ हो रहे उस गंदे व्यवहार के गवाह उस समय के कुछ अन्य सीनियर्स और साथ में काम करने वाले कुछ साथी भी थे… जब उन्होंने मनोज मनु की हरकतों पर ऐतराज़ जताया तो गौतम सरकार और मनोज मनु ने उन्हें नौकरी से निकाल दिया था… पीड़ित महिला ने दिल्ली महिला आयोग और राष्ट्रीय महिला आयोग में इस बात की लिखित शिकायत की… महिला दिल्ली में रहती थी और उसे बार-बार धमकी दी रही थी लिहाज़ा महिला ने दिल्ली पुलिस को कंप्लेन भी. तुरंत एफआईआर दर्ज करने की गुहारिश की. मगर पुलिस ने एफआईआर दर्ज नहीं की… महिला को टाल मटोल करती रही… लेकिन कोर्ट ने सहारा की दबंगई व महिला के दर्द को समझा और एफआईआर दर्ज कर जांच के आदेश दिए.

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जेल न भेजा जाना सुब्रत रॉय की जीत है

सर्वोच्च अदालत ने भले ही ऐम्बी वैली टाउनशिप जब्त करने का आदेश दे दिया हो और मीडिया वाले इसे सहारा के लिए झटका बता रहे हैं पर सच्चाई ये है कि अगर सुब्रत राय को जेल नहीं भेजा गया है तो फिर यह कोर्ट की हार और सुब्रत राय की जीत है. हालांकि सुब्रतो रॉय को 27 फरवरी तक ही राहत मिली है. उस दिन फिर सुनवाई होगी. यानि फिर भी सहारा पर लटकी है तलवार. पर आज की सुनवाई को लेकर देश भर के लोगों की निगाह इस बात पर थी कि क्या सुप्रीम कोर्ट फिर से सुब्रत राय को जेल भेजेगा. जेल न भेजे जाने और ऐम्बी वैली टाउनशिप जब्त किए जाने की खबर सामने आने पर मिली जुली प्रतिक्रिया रही. कुछ लोगों ने इसे सुब्रत राय की जीत बताया क्योंकि वे जेल नहीं गए तो कुछ लोगों ने सबसे कीमती टाउनशिप को जब्त किए जाने को सहारा के लिए बड़ा झटका करार दिया.

सर्वोच्च अदालत ने सोमवार को सहारा चिटफण्ड मामले की सुनवाई करते हुए उसके मुम्बई स्थित ऐम्बी वैली टाउनशिप प्रॉजेक्ट को जब्त किये जाने का आदेश दिया। अदालत ने सहारा ग्रुप से कहा कि वह अपनी ऐसी सम्पत्तियों की सूची सौंपे, जिन पर किसी तरह का कर्ज नहीं लिया गया है।

सर्वोच्च अदालत ने कहा कि इन सम्पत्तियों की नीलामी कर लोगों के पैसों की वसूली की जाएगी और उसे जनता को दिया जाएगा। अदालत ने 14,799 करोड़ के बकाये के मामले की सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया है।

इसका अर्थ यह हुआ कि सहारा का ऐम्बी वैली प्रॉजेक्ट बकाया वसूली तक सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में होगा और वसूली के बाद समूह को सौंप दिया जाएगा। सहारा समूह ने बकाया राशि को जुलाई, 2019 तक चुकाने की बात कही, लेकिन जस्टिस दीपक मिश्रा के नेतृत्व वाली बेंच ने तेज रिकवरी के लिए ऐम्बी वैली प्रॉजेक्ट को ही जब्त करने का आदेश दिया।

हालांकि समूह के मुखिया सुब्रत रॉय सम्पत्तियों की सूची सौंपे जाने तक परोल पर जेल से बाहर रहेंगे। कोर्ट इस मामले में 27 फरवरी को अगली सुनवाई करेगा। अदालत में सुनवाई के दौरान सहारा समूह ने स्वीकार किया कि उसे 14,000 करोड़ रुपये का मूलधन सेबी को चुकाने थे, जिसमें से 11,000 करोड़ रुपये उसने अब तक चुका दिये हैं।

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मीडिया में छंटनी : एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है, हक के लिए हुंकार भरें मीडियाकर्मी!

सुना है कि एबीपी ग्रुप ने 700 मीडियाकर्मियों से इस्तीफा लिखवा लिया है। दैनिक भास्कर में भी पुराने कर्मचारियों से इस्तीफा लिखवाया जा रहा है। दमन का यह खेल पूरे मीडिया जगत में चल रहा है। मजीठिया वेज बोर्ड की वजह से प्रिंट मीडिया में कुछ ज्यादा ही कहर बरपाया जा रहा है। चाहे राष्ट्रीय सहारा हो, दैनिक जागरण हो, हिन्दुस्तान हो या फिर अमर उजाला लगभग सभी समाचार पत्रों में कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना दिया गया है।

दूसरों की लड़ाई लड़ने का दम भरने वाले मीडियाकर्मी अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ पा रहे हैं। सहमे हुए हैं। डरे हुए हैं। जो मीडियाकर्मी आगे बढ़कर कुछ साहस दिखाते हैं, उन्हें प्रबंधन का निशाना बना दिया जा रहा है। अखबार मालिकानों और प्रबंधनों ने चाटुकार, दलाल, बेगैरत और जमीर बेच चुके कर्मचारियों को अपना मुखबिर बना रखा है। मजीठिया न देना पड़े, इसलिए पुराने कर्मचारियों का टारगेट बनाया जा रहा है। दमन के इस खेल में सभी मीडियाकर्मी शांत होकर अपना भारी नुकसान कर रहे हैं। यह सोचकर कि ‘मैं तो बचा हूं, रहूंगा, खुश हो रहे हैं। यह नहीं समझ रहे हैं कि जल्द ही उनका भी नंबर आने वाला है।

दरअसल अखबार मालिकान किसी भी हालत में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन और एरियर देना नहीं चाहते। यही वजह है कि पुराने कर्मचारियों पर गाज गिर रही है। मालिकान किसी भी तरह से रेगुलर कर्मचारियों को निकालकर कांटेक्ट बेस पर कर्मचारी रखने की नीति बना रहे हैं। इसलिए जो कर्मचारी यह सोच रहे हैं कि वह बच जाएंगे, वह भारी भूल कर रहे हैं। कर्मचारियों को लामबंद होकर इस दमन के खिलाफ आवाज उठानी होगी। कर्मचारियों को यह समझना होगा कि यदि सबने मिलकर यह लड़ाई लड़ ली तो मजीठिया भी मिलेगा और नौकरी भी और ऐसे ही डरते रहे तो न नौकरी बचेगी और न ही पैसा मिलेगा। सुप्रीम कोर्ट में अखबार मालिकों को खिलाफ अवमानना का केस चल रहा है। ये लोग कब तक बचेंगे।

हम लोग हर हाल में जीतेंगे पर जो लोग कमजोर बने हुए हैं उन्हें तो मालिकान और प्रबंधन डरा-धमकाकर भगा ही देंगे। रोज बड़े स्तर पर कर्मचारी निकाले जा रहे हैं। एक-एक कर सबका नंबर आने वाला है। राष्ट्रीय सहारा सहारा इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जब मुकुल राजवंशी और उत्पल कौशिक को निकाला गया तो। कर्मचारी प्रबंधन का खुलकर विरोध न कर पाएं। यही वजह रही कि देहरादून में अरुण श्रीवास्तव को निकाल दिया गया। कुछ दिन बाद में हक की लड़ाई की अगुआई कर रहे 21 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। हाल ही में 25 कर्मचारियों को बर्खास्त किया गया है। इनका 17 महीने का बकाया वेतन संस्था पर है। न तो उनका पैसा दिया जा रहा है और न ही नौकरी पर लिया जा रहा है। जरा-जरा की बात पर पूरे दिन शोर मचाने वाले टीवी चैनल, व प्रिंट मीडिया में अपने बीच में सताये जा रहे साथियों के लिए कोई जगह नहीं है। अब समय आ गया है कि मीडियाकर्मी संगठित होकर अपने दमन के खिलाफ हुंकार भरें। यदि अब भी चुप रहे तो अपने तो दुर्गति करोगे ही साथ ही में अपने बच्चों से भी निगाह नहीं मिला पाओगे।

राष्ट्रीय सहारा और दैनिक जागरण समेत कई अखबारों से बर्खास्त किए गए कर्मचारी बेरोजगार होकर भी प्रिंट मीडियाकर्मियों के हक की लड़ाई लड़ रहे हैं। अंदर काम कर रहे कर्मचारियों को यह समझना होगा कि थोड़ा बहुत भय मालिकानों और प्रबंधनों में यदि है तो वह इस लड़ाई का ही है। कर्मचारियों में तालमेल का अभाव, नौकरी जाने का डर, लालच और चाटुकारिता का फायदा  उठाकर मालिकान और प्रबंधन कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रहे हैं। सभी लामबंद होकर लड़ लिए तो मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन भी मिलेगा और एरियर भी। यदि इसी तरह से डरते रहे।

एक-दूसरे से दूरियां बनाते रहे तो न तो पैसा मिलेगा और न ही नौकरी बचेगी। एक-एक कर सभी को निशाना बना दिया जाएगा। जब जागोगे तो समय निकल चुका होगा। जब उठोगे प्रबंधन उठने लायक नहीं छोड़ेगा। यह समझ लो कि मजीठिया की लड़ाई ऐसी लड़ाई है जो मीडियाकर्मियों की जिंदगी बदल कर रख देगी। इसे सब मिलकर मजबूती से लड़ें। सुप्रीम कार्ट का आदेश है तब भी डर रहे हो। यह जान लो कि मजीठिया मांगने पर जो साथी बर्खास्त किए गए हैं वे सभी ससम्मान अंदर जाएंगे तथा मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से पूरा वेतन और एरियर पाएंगे। इन कर्मचारियों का बाद में मालिकान और प्रबंधन भी कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे। जो कर्मचारी अंदर बैठकर सेटिंग में लगे हैं, उनकी सबसे अधिक दुर्गति होगी। सोचे जो 700 कर्मचारी एबीपी समूह ने निकाले हैं। जो दैनिक भास्कर या अन्य अखबारों से निकाले जा रहे हैं। वे सभी हमारे ही बीच के हैं। क्या उनकी जरूरतें किसी से कम हैं। सोचो, जिस दिन आप निकाले जाओगे और आपके बीच के दूसरे कर्मचारी मूकदर्शक बने रहेंगे तो उनके बारे में आपकी क्या सोच होगी ?

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा को झटका : सुप्रीम कोर्ट ने एंबी वैली अटैच करने का आदेश दिया

सहारा के मामले पर सुप्रीम ने बड़ा फैसला सुनाया है. सुब्रत राय को तगड़ा झटका देते हुए एंबी वैली अटैच करने का आदेश दिया है. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख दी है. सुब्रत रॉय और सहारा ग्रुप को सुप्रीम कोर्ट से बड़ा झटका लगा है.

सर्वोच्च न्यायालय ने लोनावला में सहारा की प्राइम प्रॉपर्टी एंबी वैली को अटैच करने का आदेश सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने 27 फरवरी को इस मामले की अगली सुनवाई की तारीख देते हुए कहा कि रकम की वसूली तक टाउनशिप सुप्रीम कोर्ट के पास रहेगी. सहारा की यह लग्जरी टाउनशिप एंबी वैली मुंबई के पास लोनावला में है और इसके खरीदार बहुत बड़े बड़े लोग हैं.

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सहारा का हाल : अय्याशी के लिए पैसा है पर कर्मचारियों के लिए नहीं!

चरण सिंह राजपूत

सुना है कि पैरोल पर जेल से छूटे सहारा के चेयरमैन सुब्रत राय ने 18 जनवरी की शाम को दिल्ली के मौर्य होटल में भव्य कार्यक्रम आयोजित कर अपनी शादी की वर्षगांठ मनाई। इस कार्यक्रम में करोड़ों का खर्च किया गया। जनता के खून-पसीने की कमाई पर मौज-मस्ती करना इस व्यक्ति के लिए कोई नयी बात नहीं है। गत दिनों लखनऊ में अपनी पुस्तक ‘थिंक विद मी’ के विमोचन पर भी करोड़ों रुपए बहा दिए। अखबारों में विज्ञापन छपवाया कि देश को आदर्श बनाओ, भारत को महान बनाओ। दुर्भाग्य देखिए, यह सुब्रत राय अपनी संस्था और अपने आप को तो आदर्श व महान बना नहीं पाए लेकिन देश को आदर्श और महान बनाने चल पड़े हैं। गरीब जनता को ठगेंगे। कर्मचारियों का शोषण और उत्पीड़न करेंगे पर देशभक्ति का ढकोसला करेंगे। यह व्यक्ति कितना बड़ा नौटंकीबाज है। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यदि आप सहारा के कार्यालयों में जाएंगे तो आपको वहां पर भारत माता की तस्वीर दिखाई देगी।

कार्यक्रमों की शुरुआत में आप इस व्यक्ति को भारत माता की तस्वीर के सामने दीप प्रज्ज्वलित करते पाएंगे। दिखावे के लिए यह संस्था गणतंत्र दिवस और स्वतंत्रता दिवस को भारत पर्व के रूप में मनाती है। तिरंगे का इस्तेमाल ऐसे किया जाता है कि जैसे इनसे बड़ा देशभक्त कोई दूसरा हिन्दुस्तान में नहीं। देशभक्तों को लूटकर देशभक्ति का जो दिखावा ऐसे लोग कर रहे हैं। यह देश के लिए बहुत घातक है। ऐसे लोगों के चेहरे बेनकाब करने बहुत जरूरी है। कारगिल के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए की उगाही करने वाला। जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठगने वाला यह व्यक्ति देश और समाज दोनों को बेवकूफ बना रहा है। सुप्रीम कोर्ट को बनाने चला था कि आ गया शिकंजे में। अपनी मां के निधन पर पैरोल पर जेल से छुटकर कर्मचारियों में आतंक का माहौल बना रहा है।

जिन कर्मचारियों के बल पर 2000 रुपए से दो लाख करोड़ रुपए की संपत्ति अर्जित कर पाया यह व्यक्ति, अब उन्हीं कर्मचारियों को बर्बाद करने में लगा है। कर्मचारियों को सच बोलने की शिक्षा देने वाले इस व्यक्ति को सच्चाई पसंद नहीं। जो जितना झूठ बोलता हो, चाटुकारिता करता हो। निर्लज्ज और बेशर्म हो। वह उतना ही इसे पसंद आता है। स्वाभिमानी, खुद्दार और ईमानदार कर्मचारी तो जैसे इसका सबसे बड़ा दुश्मन हो। प्रवचन ऐसे देता है कि बाबा आशाराम और रामपाल भी शर्मा  जाएं। कितना निरंकुश और तानाशाह है यह व्यक्ति। इसका अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि जब मीडिया में सहारा में चल रही अराजकता के खिलाफ मोर्चा खोल दिया गया तो जैसे इसके सीने पर पैर रख दिया गया हो। इस व्यक्ति ने आंदोलन की अगुआई कर रहे कर्मचारियों को जेल में बुलाकर धमकाना चाहा पर उन कर्मचारियों की दाद देनी पड़ेगी कि उन्होंने हर बात का मुंहतोड़ जवाब दिया। देशभक्ति का ढकोसला करने वाली संस्था पर जिस दिन सीबीआई जांच बैठेगी उस दिन लोगों को पता चल जाएगा कि इसमें कितने गड़बड़झाले हुए हैं।

यह वह संस्था है जिसके मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को एक-एक पैसे के लिए तरसाया जाता है। भले ही आज की तारीख में कर्मचारियों को वेतन मिलने लगा हो पर आज भी 10-17 माह का बकाया वेतन संस्था पर है। जिन कर्मचारियों का रिटायरमेंट हुआ है। उन्हें पैसा नहीं दिया गया। जिन लोगों ने एक्जिट प्लॉन के तहत नौकरी छोड़ी है। उन्हें पैसा नहीं मिला है। हमेशा कोर्ट के सम्मान की बात करने वाला यह व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेज बोर्ड के हिसाब से वेतन देने को तैयार नहीं। जिंदगी के महत्पवूर्ण 20-25 साल संस्था को देने वाले कर्मचारी अब इसे बोझ लगने लगे हैं। किसी को तबादले के नाम पर तो किसी को बर्खास्त कर और किसी को तरह-तरह के तरीके अपनाकर परेशान कर नौकरी से निकालने में लगा है। वह भी बिना भुगतान किए बिना। मीडिया से 22 कर्मचारी मई माह में निकाल दिए गए थे कि हाल ही में 25 कर्मचारियों की नौकरी ले ली गई। यह कर्मचारी इस हाड़ कंपकपाती ठंड में राष्ट्रीय सहारा (नोएडा) के मेन गेट पर जमीन पर बैठकर अपने हक की लड़ाई लड़ रहे हैं पर इन लोगों के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। इन सब बातों की ओर शासन-प्रशासन, उत्तर प्रदेश व केंद्र सरकारों के अलावा सुप्रीम कोर्ट का ध्यान आकृष्ट करना बहुत जरूरी हो गया है।

चरण सिंह राजपूत

पूर्व सहारा कर्मी

charansraj12@gmail.com

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हाड़ कंपाती ठंड में सहारा के मेन गेट पर बैठे ये बर्खास्त 25 कर्मी किसी को नहीं दिख रहे!

किसी को नहीं दिखाया दे रहा सहारा का यह अन्याय… नोएडा में बड़ी संख्या में राजनीतिक व सामाजिक संगठन हैं। ट्रेड यूनियनें भी हैं। देश व समाज की लड़ाई लड़ने का दंभ भरने वाले पत्रकार भी हैं। पर किसी को इस हाड़ कंपाती ठंड में गेट पर बैठे बर्खास्त 25 कर्मचारी नहीं दिखाई दे रहे हैं। 17 महीने का बकाया वेतन दिए बिना सहारा प्रबंधन ने इन असहाय कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया पर इनकी पीड़ा समझने को कोई तैयार नहीं।

नोएडा में श्रम मंत्रालय से लेकर जिला प्रशासन की पूरी व्यवस्था है पर कोई भी व्यक्ति इन कर्मचारियों को इनका हक नहीं दिलवा पा रहा है। किसान-मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाले दलों को क्या मेन गेट पर बैठे ये कर्मचारी दिखाई नहीं दे रहे हैं ? मजदूरों की लड़ाई लड़ने की बात करने वाली सीटू भी क्या इस अन्याय से अंजान है। बड़ी-बड़ी बातें लिखने वाले लेखकों को ये पीड़ित मीडियाकर्मी नहीं दिखाई दे रहे हैं? कौन बनेगा इन कर्मचारियों की आवाज? कौन समझगेगा इन कर्मचारियों के बीवी-बच्चों की पीड़ा। बच्चों को साक्षर और स्वस्थ बनाने की बात करने वाली सरकारें बताएं कि जिन कर्मचारियों का 17 महीने का बकाया वेतन न दिया गया हो और उन्हें नौकरी से निकाल दिया गया हो। वे अपने बच्चों को कहां से पढ़ाएं? कहां से खिलाएं? कहां से बीमारी का इलाज कराएं?


पूरे मामले को विस्तार से जानने-समझने के लिए इसे भी पढ़ें…


विज्ञापनों पर करोड़ों खर्च करने वाले सहारा प्रबंधन के पास इन कर्मचारियों को पैसा देने के लिए नहीं। सहारा मालिकान और अधिकारियों के किसी खर्चे में कोई कमी नहीं है। जमकर अय्याशी हो रहे ही है पर पीड़ित कर्मचारियों के लिए पैसा नहीं है। ऐसा नहीं है कि अंदर काम कर रहे कर्मचारी बहुत खुश हों। उनका भी 10-12 महीने का बकाया वेतन संस्था ने नहीं दिया है। स्थानांतरण के नाम पर इन्हें भी डराया हुआ है। देश को आदर्श बनाने और भारत को महान बनाने की बात करने वाला संस्था का चेयरमैन जिंदगी के 20-25 वर्ष संस्था को देने वाले कर्मचारियों की नौकरी ले लेता है पर इनके पक्ष में कोई आवाज नहीं उठती, इससे शर्मनाक बात और नहीं हो सकती है।

इस नपुंसक समाज में हर कोई ताकतवर व्यक्ति के साथ खड़ा हुआ दिखाई दे रहा है। गरीबों को सताकर नायक बन रहे हैं। मुझसे भी काफी लोग कह रहे हैं आप क्यों बिना वजह के इतनी बड़ी संस्था से दुश्मनी मोल ले रहे हो। मेरा कहना है कि मरा तो जन्म ही अन्याय के खिलाफ लड़ने के लिए हुआ है। दूसरों के लिए लड़ने के लिए हुआ है। अपने बच्चों की परवरिश तो मैं मजदूरी करके भी कर लूंगा पर किसी दमन के सामने नहीं झुकूंगा। जब हम अपनी ही लड़ाई नहीं लड़ सकते तो दूसरों की क्या खाक लड़ेंगे। जानवरों की खाल भी जूते बन जाते हैं पर आदमी की खाल के तो जूते भी नहीं बनते। क्या करेंगे हम इस शरीर का? कहां ले जाएंगे इन पैसों को? जितना हम दूसरों के काम आ जाएंगे वह ही हमारा असली पुरुषार्थ है। अपने लिए तो सब जीते हैं जरा दूसरों के लिए भी जी कर देखो।

मैंने तो सहारा के अन्याय के खिलाफ 2006 में ही मोर्चा खोल दिया था। हम लोग एक-एक पैसा सहारा से लेकर रहेंगे और एक बार ससम्मान अंदर भी जाकर दिखाएंगे। हमारे हौंसलों को कोई गेट कोई ताकत नहीं रोक सकती है। कानूनी रूप से हम सहारा को मुंह तोड़ जवाब देते रहेंगे।

देखें यह वीडियो, कैसे इस ठंढ में सहारा के बर्खास्त कर्मी मेन गेट पर जमे हैं और सहारा प्रबंधन के अन्याय के खिलाफ जमकर अपनी बात रख रहे हैं>>

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया में सेलरी संकट से त्रस्त कर्मियों ने शुरू किया मेन गेट पर धरना-प्रदर्शन (देखें वीडियोज)

सहारा मीडिया के नोएडा स्थित मुख्य आफिस के गेट पर सहारा कर्मियों ने सेलरी के लिए धरना प्रदर्शन शुरू कर दिया है. कई महीने की सेलरी दबाए बैठे सहारा प्रबंधन ने अपने कर्मियों को भूखे मरने के लिए छोड़ दिया है. इससे परेशान कई कर्मचारी अब गेट पर धरना प्रदर्शन शुरू कर चुके हैं. दूसरे मीडिया हाउसेज इस आंदोलन को इसलिए कवर नहीं कर रहे क्योंकि चोर चोर मौसेरे भाई के तहत वे एक दूसरे के घर में चलने वाले उठापटक को इग्नोर करते हैं. धरना प्रदर्शन सात जनवरी से चल रहा है. धरने में करीब 25 कर्मचारी खुल कर हिस्सा ले रहे हैं.

देखें वीडियो>>

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स्वामी अग्निवेश ने खोला सहारा के खिलाफ मोर्चा!

राष्ट्रीय सहारा में टर्मिनेट किए गए कर्मचारियों को फोन पर किया संबोधित, डीएम को लिखा पत्र

सहारा मीडिया में हो रहे शोषण और उत्पीड़न के खिलाफ समाज सुधारक और बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने मोर्चा खोल दिया है। जहां उन्होंने नोएडा के सेक्टर 11 स्थित राष्ट्रीय सहारा के मेन गेट पर चल रहे बर्खास्त 25 कर्मचारियों के धरने को मोबाइल फोन से संबोधित किया, वहीं इस मामले को लेकर गौतमबुद्धनगर के जिलाधिकारी को पत्र भी लिखा है। अपने संबोधन में उन्होंने कर्मचारियों को आश्वस्त किया कि उनके हक की लड़ाई सड़क से लेकर संसद तक लड़ी जाएगी। 17 माह का बकाया वेतन रहते हुए कर्मचारियों की बर्खास्तगी को उन्होंने अपराध करार दिया।

सहारा के उत्पीड़न पर जिला प्रशासन की चुप्पी पर आश्चर्य व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा कि नोएडा जैसे शहर में कोई संस्था इस हद तक कर्मचारियों का उत्पीड़न कर रही है और प्रशासन आंख मूंदे बैठा है। यह शर्मनाक है। स्वामी अग्निवेश ने जिलाधिकारी को लिखे पत्र में सहारा प्रबंधन के खिलाफ के खिलाफ कार्रवाई करने को कहा है। साथ ही कार्रवाई की सूचना दिल्ली स्थित उनके कार्यालय को देने को लिखा है। उचित वेतन दिए बिना काम कराने को स्वामी अग्निवेश बंधुआ मजदूरी मानते हैं। सहारा मीडिया में तो 17 माह का बकाया वेतन दिए बिना कर्मचारियों को नौकरी से निकाल दिया गया है। 22 कर्मचारी पहले निकाल दिए थे। बड़े स्तर पर दूर-दूराज क्षेत्रों में कर्मचारियों का स्थानांतरणर कर दिया जा रहा है वह भी बिना बकाया वेतन दिए बिना।

इस संस्था का गजब खेल है। एक ओर संस्था का चेयरमैन सुब्रत राय थिंक विंद मी पुस्तक लिखता है। देश को आदर्श और भारत को महान बनाने की बातें लिखकर अखबारों में विज्ञापन छपवाए जाते हैं। लखनऊ में भव्य कार्यक्रम आयोजित किया जाता है। विभिन्न राजनीतिक दलों के नेता उस कार्यक्रम में पहुंचते हैं। अपने को बड़ा देशभक्त बताने वाले बाबा रामदेव तो सुब्रत राय से मिलकर अपने को धन्य मानने लगे। जगजाहिर है कि यह संस्था अपने कर्मचारियों का किस हद तक शोषण और उत्पीड़न कर रही है। दबे-कुचले और किसान मजदूरों की लड़ाई लड़ने का दावे करने वाले किसी नेता ने कर्मचारियों के शोषण की बात उठाने की जहमत नहीं समझी।

बताया जाता है कि इस संस्था ने कारगिल के नाम पर 10 साल तक अपने कर्मचारियों के वेतन से 100-500 रुपए काटे। संस्था के चेयरमैन ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों रुपए ठग लिए। इस संस्था के खिलाफ यदि स्वामी अग्निवेश ने आवाज बुलंद की है तो निश्चित रूप से इस आवाज में और दिग्गजों की आवाज भी जुड़ेंगी और देशभक्ति के नाम पर समाज और देश को गुमराह करने वाले संस्था के चेयरमैन का चेहरा बेनकाब होगा।

ज्ञात हो कि स्वामी अग्निवेश लंबे समय से बंधुआ मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे हैं। किसी समय उन्होंने फरीदाबाद में पत्थर खदानों से 2000 के आसपास परिवारों को छुड़ाकर पुनर्वासित कराया था। पीआईएल भी स्वामी अग्निवेश की देन हैै। बताया जाता है कि इन खदान मजदूरों की समस्याओं से संबंधित एक पत्र स्वामी अग्निवेश ने सुप्रीम कोर्ट को पोस्ट कार्ड पर लिखा था, जिसे कोर्ट ने पीआईएल मानते हुए मजदूरों के पक्ष में अपना फैसला दिया था।

अक्सर देखा जाता है कि जब मीडिया में शोषण के खिलाफ आवाज उठाने की बात आती है तो राजनीतिक व सामाजिक संगठन दूर भागने लगते हैं। ऐसे में स्वामी अग्निवेश ने राष्ट्रीय सहारा से निकाले गए कर्मचारियों के पक्ष में आवाज उठाकर उन लोगों के मुंह पर तमाचा मारा है जो बड़ी-बड़ी बातें तो करते हैं पर करते कुछ नहीं। खुद मीङिया दूसरों की आवाज तो उठाने की बात करता है पर मीडिया में शोषण और उत्पीड़न का जो खेल खेला जा रहा है उस पर न कुछ बोलने को तैयार है और न ही लिखने को। दैनिक, जागरण, राष्ट्रीय सहारा, हिन्दुस्तान, अमर उजाला, दैनिक भास्कर समेत कई अखबारों के कितने पत्रकार और कर्मचारी मजीठिया वेज बोर्ड  की मांग करने और मीडिया में हो रहे शोषण के खिलाफ आवाज उठाने पर बाहर कर दिए गए पर  मीडिया की ओर से कोई आवाज नहीं उठी। ऐसा नहीं है कि इलोक्ट्रिक मीडिया इससे खेल से वंचित है। यहां पर तो हालात और बुरे हैं।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया प्रबंधन ने 25 कर्मियों की नौकरी ले ली

चरण सिंह राजपूत की रिपोर्ट…

सहारा अपनी ऐबदारी से बाज नहीं आ रहा है। जहां कर्मचारियों को 12-17 महीने का बकाया वेतन देने को तैयार नहीं वहीं सुप्रीम कोर्ट आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया को मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से सेलरी। साथ ही कर्मचारियों का दूर-दूराज स्थानांतरण कर नौकरी छोड़ने को मजबूर कर रहा है। वह भी बिना बकाया वेतन भुगतान किए। राष्ट्रीय सहारा में हक की आवाज उठाने वाले 22 कर्मचारियों को पहले की बर्खास्त कर दिया गया था कि बिना कारण बताए कॉमर्शियल प्रिंटिंग में काम कर रहे 25 कर्मचारियों की सेवा आज समाप्त कर दी गई। इन कर्मचारियों का दोष बस इतना था कि इन लोगों ने अपना 17 महीने का बकाया वेतन मांगा था।

पीड़ित कर्मचारी सहारा मीडिया वर्कर्स यूनियन का बैनर लगाकर इस ठंड के मौसम में राष्ट्रीय सहारा के गेट पर अपने हक की गुहार लगा रहे हैं पर सहारा प्रबंधन के कानों पर जूं तक नहीं रेंग रही है। हालांकि बंधुआ मुक्ति मोर्चा का समर्थन इन पीड़ित कर्मचारियों को मिला है। बंधुआ मुक्ति मोर्चा के राष्ट्रीय अध्यक्ष स्वामी अग्निवेश ने दिल्ली से पीड़ित कर्मचारियों की लड़ाई लड़ने का दंभ भरा है।

कहने को तो जिला स्तर पर श्रमिकों के शोषण रोकने के लिए उप श्रमायुक्त कार्यालय की व्यवस्था की गई है। जिलाधिकारी की भी जिम्मेदारी बनती है कि किसी कंपनी में किसी श्रमिक के साथ किसी तरह का अन्याय न हो सके। राष्ट्रीय सहारा में गत ढाई साल से कई बार आंदोलन हो चुका है पर कर्मचारियों को उनका बकाया भुगतान नहीं दिया गया। उल्टे 47 कर्मचारियों को संस्था से निकाल दिया गया। बड़े स्तर पर स्थानांतरण किए जा रहे हैं। सहारा में कर्मचारियों के उत्पीड़न की दास्तां जिला प्रशासन से लेकर उत्तर प्रदेश सरकार, केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक लिखी जा चुकी है पर किसी तरह की कोई राहत नहीं मिली। अब तो कर्मचारियों को अदालत ही एक सहारा है। संस्था की मक्कारी देखिए कि एक ओर कर्मचारियों को कई माह से वेतन नहीं मिला था दूसरी ओर 2014 में आयकर छापे में नोएडा के राष्ट्रीय सहारा परिसर से 134 करोड़ रुपए बरामद किए गए।

दिलचस्प बात यह है कि आयकर विभाग के इस छापे में एक डायरी बरामद हुई थी जिसमें गुजरात के मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री समेत 100 नेताओं को पैसे देने की बात लिखी हुई है। जब इस बारे में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल, सुप्रीम कोर्ट के वकील प्रशांत भूषण और कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री को घसीटा तो आयकर नियामक आयोग से सहारा को राहत दिलवा दी गई। दरअसल सहारा ने नियामक आयोग में डायरी को सबूत न मानने की याचिका दायर की थी। पहले तो आयोग ने डायरी को सबूत मानते हुए याचिका ठुकरा दी पर किसी दबाव में यह याचिका स्वीकार की गई और मात्र तीन दिन के अंदर  फैसला देकर सहारा को राहत दे दी गई। यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन सुब्रत राय ने अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से अरबों की उगाही कर ली।

यह वह सहारा है जिसके चेयरमैन ने कारगिल के नाम पर अपने ही वर्करों से 100-500 रुपए प्रति माह के हिसाब से दस साल तक वेतन से काटे। अब जब डायरी में गुजरात का मुख्यमंत्री रहते प्रधानमंत्री को पैसे देने का मुद्दा उठा तो आयकर नियामक आयोग को भी सेट कर लिया। इसे भी मैनेज ही कहा जाएगा कि सहारा डायरी का मुद्दा अब न तो केजरीवाल उठा रहे हैं और न ही राहुल गांधी। हां प्रशांत भूषण अपने मिशन में जरूर डटे हैं। वह मीडियाकर्मियों के हित में सुप्रीम कोर्ट में चल रही मजीठिया वेजबोर्ड की सुनवाई में भी शामिल हुए। प्रधानमंत्री कहने तो गरीबों के बड़े हितैषी बने घूमते हैं पर सहारा कर्मियों की उत्पीड़न की दास्तां उनके मंत्रालय को कई बार लिखी गई हैं पर उन्होंने न तो सहारा के खिलाफ कोई जांच बैठाई और नही कोई कार्रवाई की। पीएमओ से कर्मचारियों को भी कोई राहत नहीं मिली है। ऐसे में क्या माना जाए ? तो यह माना जाए कि प्रधानमंत्री बस जनता को बेवकूफ बनाने में लगे हैं। यदि नहीं तो सहारा के खिलाफ कोई कार्रवाई क्यों नहीं करते या जांच क्यों नहीं बैठाते?

चरण सिंह राजूपत
charansraj12@gmail.com

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सहारा की डायरी : नेताओं को अरबों रुपए रिश्वत देने वाले गलत तरीके से खुद कितने रुपए कमाते होंगे!

तोड़ना ही होगा सहारा व नेताओं का गठजोड़

कारपोरेट घरानों और नेताओं के गठजोड़ ने देश की राजनीति की ऐसी की तैसी कर दी है। कारपोरेट घरानों और नेताओं ने मिलकर व्यवस्था को ऐसे कब्जा रखा है कि आम आदमी सिर पटक-पटक कर रह जा रहा है। जनता के चंदे से चुनाव लड़ने वाले दल अब पूंजीपतियों के पैसों से चुनाव लड़ते हैं तथा चुनाव जीतकर उनके लिए ही काम करते हैं। जनता की भावनाओं से खिलवाड़ करने का खेल तो बहुत लंबे समय से चल रहा है पर सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का गुजरात के मुख्यमंत्री के पद पर रहते हुए पैसा लेने की लिस्ट में नाम आने से मामला गरमाया है।

दिल्ली के मुख्मयंत्री अरविंद केजरीवाल और सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ वकील व स्वराज इंडिया पार्टी के नेता प्रशांत भूषण के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने सहारा-प्रधानमंत्री प्रकरण को जोर-शोर से उठाया है। मामला बिड़ला ग्रुप का भी है पर सहारा मामले का जोर मारने का कारण सहारा प्रमुख सुब्रत राय का राजनेताओं के साथ घनिष्ठ संबंध होना है। दरअसल सुब्रत राय पैसे के बल पर हर किसी को खरीदना चाहते हैं। निवेशकों का पैसा हड़पने का मामला जब सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था तब भी उन्होंने समाचार पत्रों में पूरे के पूरे पेज विज्ञापन देकर सेबी को पैसा देने नहीं बल्कि उससे वसूलने की बात कही थी। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसी हेकड़ी निकाली है कि जो पैसा वह सेबी से लेने की बात कर रहे थे चुपचाप देने की व्यवस्था में लगे हैं।

हां, सुप्रीम कोर्ट को यह भी देखना होगा कि निवेशकों की हड़पी रकम को वह कहीं फिर से निवेशकों से उगाहकर तो नहीं लौटा रहे हैं ? क्योंकि तमाम प्रतिबंधों के बावजूद सहारा की उगाही रुकी नहीं है। एक ओर संस्था अपने प्रचार-प्रसार करोड़ों रुपए खर्च कर रहे ही तो दूसरी ओर अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न कर रही है। राजनीतिक दलों के साथ संबंधों के दम पर संस्था के हर गलत काम को दबा दिया जाता है। प्रधानमंत्री का नाम लिखी जो डायरी जिस छापे में मिली थी, उस मामले में कोई कार्रवाई न होना कहीं न कहीं केंद्र सरकार से साठ-गांठ की बात दर्शा रहा है। जो संस्था अपने कर्मचारियों को कई महीने से वेतन नहीं दे रही थी, उस संस्था के कार्यालय में 134 करोड़ रुपए जब्त किए गए।

12 महीने का बकाया वेतन और सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद मजीठिया वेजबोर्ड मांगने वाले कर्मचारियों ने उत्तर प्रदेश सरकार से लेकर केंद्र सरकार और राष्ट्रपति महोदय तक को अपनी पीड़ा लिखी पर उनका कुछ भला न हो सका। उल्टे आंदोलन की अगुआई कर रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया। जिस संस्था में कर्मचारियों के साथ इस हद तक उत्पीड़न किया जा रहा हो और उसका कुछ न बिगड़ रहा हो कहीं न कहीं राजनीतिक दलों के साथ गठजोड़ को दर्शा रहा है। मुंबई और नोएडा दो जगह आयकर विभाग के छापे पड़ने के दो-तीन साल बाद भी मामले में कोई कार्रवाई न होना केंद्र सरकार को भी कटघरे में खड़ा कर रहा है। सहाराकर्मी और देशहित में सहारा प्रमुख और राजनीतिक दलों के संबंधों के राज से पर्दा उठना बहुत जरूरी है। जरूरी इसलिए भी क्योंकि यह व्यक्ति देशभक्ति का ढकोसला कर जनता के साथ अपने ही कर्मचारियों को ठगने में लगा है।

सहारा की डायरी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम आने पर कांग्रेस प्रधानमंत्री पर तो निशाना साध रही है पर मामले की जड़ सहारा के प्रति नरम रवैया क्यों अपनाए हुए है। सहारा की डायरी में 100 लोगों के नाम बताए जा रहे हैं। तो समझ लीजिए कि इस संस्था ने कितने काले कारनामों को छिपाने के लिए 100 लोगों को रिश्वत दी होगी। निश्चित रूप यह धनराशि अरबों में रही होगी। जो संस्था नेताओं को अरबों रुपए की रिश्वत दे रही हो। उसने गलत से ढंग कितने रुपए कमाए होंगे बताने की जरूरत नहीं है। निश्चित रूप से खेल खरबों का रहा होगा। यह सब पैसा गरीब जनता का ही रहा होगा। यह तो सहारा की बात है देश के कितने पूंजीपति नेताओं के साथ मिलकर अरबों-खरबों का खेल कर रहे हैं।

यही वजह है कि इस व्यवस्था में जनता को कीड़े-मकोड़े से ज्यादा नहीं  समझा जा रहा है। पैसे और सत्ता की ताकत के बल पर भ्रष्ट हो चुकी इस व्यवस्था के खिलाफ उठने वाली आवाज को दबा दिया जा रहा है। प्रधानमंत्री नोटबंदी और बेनामी संपत्ति पर प्रहार की बात तो कर रहे हैं। उनक कारपोरेट घरानों की बात नहीं कर रहे हैं, जिन्होंने नेताओं के जमीर को खरीद रखा है। जब तक राजनीतिक दलों और कारपोरेट घरानों की गठजोड़ नहीं टूटेगा तब तक गरीब किसान और मजदूर की भलाई की बात करना बेमानी है। गरीब और अमीर की खाई पाटने, स्वच्छ राजनीति लाने और देश के विकास के लिए पूंजीपतियों और राजनीतिक दलों का गठजोड़ बेनकाब कर इसे तोड़ना जरूरी हो गया है।

दरअसल राजनीतिक दलों के साथ मिलकर ये कारपोरेट घराने अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण-उत्पीड़न करते हैं। यदि विरोध में कहीं से कोई आवाज उठती भी है तो उसे बलपूर्वक दबा दिया जाता है। वैसे तो लगभग हर पूंजीपति यह सब कर रहा है पर सहारा में कुछ ज्यादा नहीं बल्कि बहुत ज्यादा हो रहा है। हाल यह है कि यह संस्था जहां तरह-तरह के कार्यक्रम कर देशभक्ति का ढकोसला करती घूम रही है वहीं इसने संस्था को 2000 से दो लाख करोड़ तक पहुंचाने कर्मचारियों को तबाह कर मानसिक रोगी बना दिया है।

चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा प्रमाण, यहां आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है!

सहारा के खिलाफ उच्च स्तरीय जांच बैठाएं प्रधानमंत्री : दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल और स्वराज इंडिया पार्टी के नेता तथा सुप्रीम कोर्ट के प्रख्यात वकील प्रशांत भूषण के बाद अब कांग्रेस के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर गुजरात के मुख्यमंत्री रहते सहारा समूह से रिश्वत लेने के आरोप लगाए हैं। सत्ता पक्ष और विपक्ष भले ही इसे राजनीतिक स्तर पर देख रहा हो पर मेरा मानना है कि हम लोग इस मामले को इस तरह से देखें कि एक संस्था की वजह से हमारे देश के प्रधानमंत्री का नाम बदनाम हो रहा है।

इसमें दो राय नहीं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भले ही साम्प्रदायिक दंगों को लेकर तरह-तरह के आरोप लगते रहे हों पर उनकी ईमानदारी पर अभी तक कोई विरोधी भी आरोप नहीं लगा पाया था। उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि, हालात और उनकी राजनीतिक कार्यशैली भी उनकी ईमानदार छवि बखान कर रही है। हां, आयकर विभाग के छापे पड़े दो साल से ज्यादा बीत गए हैं। ऐसे में सहारा समूह के खिलाफ कार्रवाई न होना, कहीं न कहीं केंद्र सरकार को कटघरे में खड़ा कर रहा है। ऐसे में सहारा समूह और आयकर विभाग पर जरूर जांच बैठनी चाहिए। आयकर विभाग पर इसलिए क्योंकि दो साल पहले नोएडा कार्यालय में पड़े छापे में वहां से 134 करोड़ रुपए बरामद हुए थे। इस मामले में सहारा ग्रुप पर कोई कार्रवाई क्यों नहीं की गई। यदि प्रधानमंत्री को रिश्वत देने संबंधी दस्तावेज आयकर विभाग को सहारा समूह से बरामद हुए थे तो इस मामले पर जांच क्यों नहीं बैठाई गई।

सहारा समूह पर कोई कार्रवाई न होने से कहीं-कहीं प्रधानमंत्री की कार्यशैली पर भी उंगली उठ रही है। इन आरोपों के बाद प्रधानमंत्री पर सहारा समूह के खिलाफ उच्चस्तरीय जांच कराने की और नैतिक जिम्मेदारी बन जाती है। सहारा ग्रुप के खिलाफ जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इसके सुप्रीमो सुब्रत राय देशभक्ति के आड़ में लम्बे समय से देश की भोली-भाली जनता को ठग रहे हैं। भेड़ की खाल में घूम रहे इस भेड़िये ने जनता के खून-पसीने की कमाई पर जमकर अय्याशी की और बड़े स्तर पर नेताओं व नौकरशाह को कराई है। देश में कालेधन के खिलाफ माहौल बन रहा है और जगजाहिर है कि सहारा हमारे देश का स्विस बैंक रहा है।

निवेशकों के हड़पे पैसे के बदले सहारा समूह जो पैसा सुप्रीम कोर्ट में जो पैसा जमा करा रहा उसका स्रोस भी पूछा जाना चाहिए। इस संस्था पर जांच इसलिए भी जरूरी है क्योंकि जब नोएडा से 134 करोड़ रुपए जब्त किए गए थे, उस समय सहाराकर्मियों को कई महीने से वेतन नहीं मिल रहा था तथा सहारा प्रबंधन संस्था के पास पैसा न होने का रोना रो रहा था। जांच इसलिए भी होनी चाहिए क्योंकि इस संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय ने राजनीतिक दलों की पकड़ के चलते बनाए अपने रुतबे के बल पर देश में बड़े स्तर पर अनैतिक काम किए हैं। इस संस्थान में मालिकान और अधिकारी खूब अय्याशी करते हैं पर कर्मचारियों को भुखमरी के कगार पर पहुंचा दिया है।

दिखावे को तो सुब्रत राय देशभक्ति का ढोल पीटते फिरते हैं पर जमीनी हकीकत यह है कि यहां पर कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न किया जाता रहा है। लंबे समय से कर्मचारियों का प्रमोशन नहीं हुआ है।  12-16 महीने का वेतन बकाया है। जो कर्मचारी अपना हक मांगते हैं उन्हें या तो नौकरी से निकाल दिया जाता है या फिर कहीं दूर स्थानांतरण कर दिया जाता है। अपना बकाया वेतन व मजीठिया वेजबोर्ड मांग रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया है। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिया जा रहा है। गत सालों में एग्जिट प्लॉन क तहत कितने कर्मचारियों की नौकरी तो ले ली पर हिसाब अभी तक नहीं किया गया। इन कर्मचारियों ने पूरी जवानी इस संस्था को दे दी और अब वे दर-दर की ठोकरें खा रहे हैं। यह संस्था अपने को बड़ा देशभक्त और भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होना दिखाती है पर कर्मचारियों को नमस्ते, प्रणाम की जगह ‘सहारा प्रमाण’ करवा कर अपनी गुलामी कराती है। आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है।

देशभक्ति के नाम दिखावा तो बहुत किया जाता है पर सब अपने कर्मचारियों को ठग कर। 1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे सैनिकों के परिजनों की देखभाल के नाम पर संस्था ने अपने ही कर्मचारियों से 10 साल तक 100-200-500 रुपए तक वेतन से काटे। उस समय चेयरमैन ने यह बोला था कि दस साल पूरे होने पर यह पैसा ब्याज सहित वापस होगा पर किसी को कोई पैसा नहीं मिला। यह रकम अरबों-खरबों में बैठती है। इस मामले की उच्च स्तरीय जांच बैठाई की जाए तो पता चल जाएगा कि इस संस्था ने शहीदों की लाश पर ही अपने ही कर्मचारियों से अरबों-खरबों की उगाही कर ली।

गत साल चेयरमैन सुब्रत राय जब जेल गए तो अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से 10,000-100000 रुपए तक ठग लिए। जब हक की लड़ाई लड़ रहे कर्मचारियों में से एक प्रतिनिधिमंडल जेल में जाकर चेयरमैन से मिला तथा इस रकम के बारे में पूछा तो उन्होंने बड़ी ही बेशर्मी से यह कहा कि संस्था में किसी स्कीम में धन कम पड़ रहा था। इसलिए अपने ही कर्मचारियों से पैसा लेना पड़ा। यह पैसा कर्मचारियों ने ऐसे समय में दिया था जब कई महीने से उन्हें वेतन नहीं मिला था। किसी कर्मचारी ने अपनी पत्नी के जेवर बेच कर ये पैसे दिए तो किसी ने कर्जा लेकर। कर्मचारियों ने हर बार अपने चेयरमैन पर विश्वास किया और इस व्यक्ति ने हर बार उन्हें इमोशनल ब्लैकमेल करते हुए बस ठगा। लंबे समय तक वेतन न देकर  इस संस्था ने कितने कर्मचारियों के परिवार तबाह कर दिए। कितने बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया। कितने कर्मचारियों को मानसिक रूप से बीमार बना दिया।

देश का दुर्भाग्य है कि सब कुछ जानते हुए भी विभिन्न दलों के नेता इस संस्था के कार्यक्रमों में पहुंच जाते हैं। गत दिनों जब नोएडा के मेन गेट पर बड़ी तादाद में कर्मचारी जब अपना हक मांग रहे थे तो किसी दल के नेता का दिल नहीं पसीजा पर 18 दिसम्बर को लखनऊ में सहारा न्यूज नेटवर्क की ओर से थिंक विद मी, देश आदर्श बनाओ, भारत महान बनाओ कार्यक्रम किया गया तो विभिन्न दलों के नेता उस कार्यक्रम में पहुंचे और बड़ी-बड़ी बातें की। इस कार्यक्रम में लगभग सभी मुख्य दलों के नेता मौजूद थे। इनमें कांग्रेस उत्तर प्रदेश के अध्यक्ष राजबब्बर और प्रभारी गुलाम नबी आजाद भी मुख्य रूप से उपस्थित थे। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जब राहुल गांधी प्रधानमंत्री पर सहारा समूह से रिश्वत लेने का आरोप लगा रहे हैं तो उन्हें यह भी समझना चाहिए कि यदि सहारा ने गुजरात के मुख्यमंत्री रहते उन्हें रिश्वत दी होगी तो कुछ गलत काम पर पर्दा डालने के लिए ही दी होगी। वैसे भी संस्था के चेयरमैन के जेल जाने के बाद सहारा के काले कारनामे जगजाहिर हो चुके हैं तो वह क्यों नहीं सहारा के कार्यक्रमों में जाने से अपने नेताओं को रोकते और क्यों नहीं सहारा के निवेशकों के पैसे हड़पने के केस को लड़ रहे अपने नेता कपिल सिब्बल को उनकी नैतिक जिम्मेदारी समझाते ?  यदि राजनीतिक दल वास्तव में देश में अब कुछ अच्छा करना चाहते हैं तो अपने दलों की छवि सुधारने के साथ ही उन कारपोरेट घरानों के खिलाफ मोर्चा खोलें उनके वजूद का इस्तेमाल करते हुए अपने काले कारनामों से जनता व देश को ठग रहे हैं।

CHARAN SINGH RAJPUT
charansraj12@gmail.com

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मोदी भी क्या सुब्रत राय के चंगुल में फंसे थे?

सहारा के चंगुल से कौन बड़ा राजनेता बचा है? कैश ही सहारा की सबसे बड़ी ताकत… मोदी भी क्या सुब्रत राय सहारा के चंगुल में फंसे थे? ये सवाल इसलिए भी अहम हो जाता है क्योंकि देश भर के जब सारे चिटफंडियों जैसे रोजवैली की संपत्ति कुर्क की जा रही है, चिटफंड कंपनी के निदेशकों को जेल की सलाखों के पीछे डाला जा रहा है, निचली अदालतों से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक किसी भी चिटफंडियों को जमानत तक नहीं दे रहा है तो सहाराश्री आखिर किस तरह रियायत पाते जा रहे हैं.

सरकारी एजेंसियां सुप्रीम कोर्ट के सामने क्यों नहीं खुलासा कर रही हैं कि जेल के भीतर और अब बाहर आकर भी सुब्रत राय सहाराश्री कभी कोऑपरेटिव सोसायटी के नाम पर तो कभी बीमा बेचने के जरिए जनता से उगाही कर रहे हैं. आरोप है कि पैसों को गलत तरीके से एक कंपनी से दूसरे में ट्रांसफर किया जा रहा है. हर महीने करोड़ों रुपये घाटे सहकर भी सहारा मीडिया जिंदा रखा गया है. आखिर कैसे? अब तक किसी और कंपनी की बात होती तो रिसीवर नियुक्ति कर दिये गये होते. बिना राजनीतिक प्रभाव के इस तरह के मामलों की अनदेखी कर पाना किसी भी अधिकारी के लिए संभव नहीं होता. इसीलिए ये सवाल बार-बार उठ रहा है. 

सहारा से पैसे लेने के मामले में मोदी पर सबसे पहले हमला किया स्वराज इंडिया से जुड़े प्रशांत भूषण और इसके अध्यक्ष योगेंद्र यादव ने. प्रशांत भूषण ने सुप्रीम कोर्ट तक में इस मामले की जांच के लिए अपील की है, तो राहुल गांधी और केजरीवाल जनता की अदालत में इस मामले में फैसला कराने पर तुले हैं. लेकिन मोदी ने सहारा कंपनी से मिले पैसे पर चुप्पी साध रखी है. धीरे-धीरे ये मामला गरमाता जा रहा है. प्रधानमंत्री चाहे तो इसका जवाब आम आदमी को दूरदर्शन के जरिए दे सकते हैं क्योंकि लोकतंत्र के मर्म में आम आदमी ही महत्वपूर्ण होता है. लेकिन अभी इसकी भी सुगबुगाहट नहीं है.

सहाराश्री ग्लैमर के साथ दबंगई के लिए भी जाने जाते हैं. सहारा मीडिया में कई पूर्व संपादकों से सहाराश्री की दंबगई के किस्से सुन सकते हैं. कैसे सहाराश्री के एक आदेश पर एक मिनट के अंदर प्रधान संपादक जलील होकर कैंपस से बाहर कर दिये गये, कैसे एक संपादक को गार्डों के जरिए बेइज्जत करके इस्तीफा लिया गया, कैसे सहाराश्री के स्वास्थ्य के बारे में गलत खबर देने के चलते एक संपादक की पिटाई की गई, कैसे एक संपादक के घर सहारा के गार्डों ने छापा मारा और उसकी संपत्ति की सहारियन तरीके (अवैध) से जांच की. दुनियादारी और बदनामी के चलते ये संपादक भी अपनी बेइज्जती कराकर चुप रहना ही बेहतर समझे.

सहाराश्री के दबंगई के साथ दरियादिली के भी किस्से आम हैं. यूपी के तमाम दलों के बड़े नेता खुलेआम स्वीकार करते हैं कि सहाराश्री के चलते ही आज बड़े नेता हैं. इनमें कांग्रेस के राजसभा सांसद प्रमोद तिवारी, यूपी कांग्रेस अध्यक्ष राज बब्बर, समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह यादव से लेकर बीजेपी के तमाम बड़े नेता भी शामिल हैं. अटल जी के प्रधानमंत्री रहने के दौरान तो यूपी के तमाम बीजेपी नेता अपनी सिफारिश सहाराश्री से करने की सिफारिश करते थे. बीएसपी के कई बाहुबली सांसद भी मायावती के नहीं पसंद करने के बावजूद सहाराश्री के यहां अपनी हाजिरी लगाकर चरणामृत ले आते थे.

चुनावों में कैश की खासी किल्लत रहती है. ऐसे में चिटफंडियों के अलावा अंबानी जैसा धन्नासेठ भी देश के कोने-कोने में कैश मुहैया कराने की हालत में नहीं होता है. इसी कारण से नेताओं ने चिटफंडियों को पालना-पोसना जारी रखा. जब हालात बिगड़ते तो नेता चिटफंडियों से पल्ला झाड़ लेते. लेन-देन में कोई लिखा-पढ़ी तो होती नहीं है. ये स्थिति नेताओं के साथ चिटफंडियों को भी खूब रास आती है. कई नेताओं की अवैध कमाई का हिस्सा इन चिटफंडियों के यहां रहता है. जहां देना होता है, चिटफंडिये अपनी शाखाओं के जरिए पहुंचा देते हैं. कई मौके पर जब नेता स्वर्ग पहुंच जाते हैं तो चिटफंडिये नेता का सारा पैसा दबा जाते हैं. इसके उदाहरणों में यूपी के पूर्व मुख्यमंत्री वीर बहादुर सिंह का नाम सबसे ऊपर आता है. इसी कारण से मोदी पर भी सवाल उठना लाजिमी है.

पूरे मामले को समझने के लिए इसे भी पढ़ें :

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सहारा पर मोदी की चुप्पी देशद्रोह! भड़ास के सवालों पर भी मौन है मोदी सरकार

राहुल गांधी ने सहारा पर मोदी से अपने सवालों का सीधा जवाब मांगा. भड़ास ने तो सबसे पहले यह सवाल उठाया था कि आखिर क्यों जब सारे चिटफंडिये जेल की सलाखों के पीछे पहुंच चुके हैं तो सहारा और एक-दो चिटफंडियों पर रियायत क्यों? गरीबों के मसीहा बने मोदी सरकार क्यों इस मामले में दरियादिली दिखा रहे हैं. जबकि सहारा मीडिया कर्मचारी भी अपनी सैलरी के लिए सहाराश्री की पोल खोलते हुए सत्ता के तमाम दरवाजों को खटखटा चुके हैं.

अब राहुल गांधी ने फिर पूछा कि प्रधानमंत्री साफ करें कि सहारा से उन्होंने पैसे लिए या नहीं. प्रधानमंत्री को अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए. भड़ास का स्टैंड राहुल गांधी से थोड़ा अलग है. हम प्रधानमंत्री जी से पूछना चाहते हैं कि अदालतों को दोष देने से पहले बतायें कि किन प्रशासनिक विफलताओं की वजह से…

-चिटफंडियों के मसीहा समझे जाने वाले सहाराश्री जेल से बाहर कैसे आये?

-सुप्रीम कोर्ट के आदेश पर जो पैसा सहारा कंपनी सेबी में जमा करा रही है वो पूंजी कहां से आ रहा है. कहीं गरीबों से फिर से वसूली जा रही रकम ही तो नहीं है.

-मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जरिए सहारा के ऑफिसों को क्यों पूरे देश में पैसे वसूलने की आजादी मिली है, जिसके कारण सही मायने में संचालित कोऑपरेटिव संस्थायें भी आने वाले समय में बदनाम होंगी.

-सहारा ग्रुप के ऑफिसों से ही मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं को संचालित किया जा रहा है, सूत्र बताते हैं कि इन संस्थाओं से सहाराश्री ने लिखित रुप से किसी प्रकार का संबंध नहीं रखा है.

-कृषि मंत्रालय के सूत्रों के मुताबिक मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं के जिम्मेदार पदों पर सुब्रत राय सहाराश्री ने अपनी कठपुतलियों को बैठाया है. कार्रवाई किसके दबाव में रूकी है?

-किस कारण सहाराश्री परिवार का अब एक भी सदस्य सहारा इंडिया परिवार का किसी भी अहम पद पर नहीं है, जबकि अच्छे दिनों में बेटा-बहु से लेकर भाई-भतीजा तक सहारा कर्तव्ययोगियों की सलामी (सहारा प्रणाम) लेते रहे हैं और आज भी लेते हैं.

-सहारा जिन मल्टी लेवल मल्टी स्टेट कोऑपरेटिव संस्थाओं और बीमा कंपनी के जरिए पूंजी जुटा रही है, आखिर उस पूंजी के लेन-देन की दैनिक निगरानी क्यों नहीं की जा रही है जबकि सहाराश्री की गतिविधियां संदिग्धता के दायरे में आ चुकी हैं.

क्या मोदी सरकार उस समय जागेगी, जब गरीब जनता अपने पैसों के लिए फांसी पर झूलने के लिए मजबूर होने लगेगी और फांसी के लिए रस्सी कम पड़ना शुरू हो जायेगी. दबाव बनाने और बेजा फायदे के लिए मीडिया कंपनी खोले सुब्रत राय सहाराश्री की मनमानी के चलते ही सहारा मीडिया भारी घाटे में रीढ़हीन और पंगु दिखती है. सहारा मीडिया के कर्मचारी आज भी अपने एक साल से ज्यादा की सैलरी के लिए सहाराश्री की कृपा की बाट जोह रहे हैं. लेकिन सहाराश्री की मुख्य चिंता बकाये सैलरी से ज्यादा ग्लैमरस पार्टी में होती है.

भड़ास4मीडिया केवल इतना चाहता कि मोदी सरकार स्वीकार करे कि सहाराश्री को मिल रही रियायत के लिए अदालतों से ज्यादा उनकी प्रशासनिक नाकामयाबी है. देश की अस्मिता से जुड़ा सवाल है कि क्या ये फायदे सुब्रत राय सहाराश्री को मोदी सरकार ने लोकसभा चुनावों में पूंजी उपलब्ध कराने के एवज में दी है? अगर ऐसा है तो ये देशद्रोह है. अब बारी मोदी जी की है, तो मोदी जी… बोलिए, देश सुन रहा है…

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सहारा समूह ने छह महीने में नौ बार दिए नरेंद्र मोदी को करोड़ों रुपये : राहुल गांधी

कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आखिरकार बम फोड़ ही दिया. उन्होंने आज मेहसाणा (गुजरात) में आयोजित एक रैली में कहा कि सहारा समूह पर पड़े छापे के बाद छह महीने में सहारा समूह के लोगों ने नरेंद्र मोदी को नौ बार करोड़ों रुपए दिए. मोदी को सहारा के बाद बिड़ला ग्रुप के लोगों ने भी पैसे दिए. इसकी पूरी जानकारी तारीख-दर-तारीख और विस्तार से मौजूद है.

6 mahine mein 9 baar Sahara ke logon ne apni diary mein likha hai ki humne Narendra Modi ji ko paisa diya hai. The records are with IT Dept for last 2 and half years yet no action has been taken. An independent enquiry must be initiated. IT Department raided Sahara Company on 22 Nov, 2014. As per record with IT, Rs 2.5 cr was given to PM Modi on 30 Oct ’13; Rs 5cr on 12 Nov ’13; Rs 2.5 cr on 27 Nov ’13; Rs 5cr on 29 Nov ’13 : Rahul Gandhi

राहुल के इस सनसनीखेज आरोप से हड़कंप मच गया है. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने आज आखिर उस आरोप का खुलासा कर ही दिया जिसमें उन्होंने कहा था कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. मेहसाणा में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने कहा कि उन्हें प्रधानमंत्री के निजी भ्रष्टाचार की जानकारी है. राहुल ने कहा कि पीएम मोदी ने गुजरात का सीएम रहने के दौरान सहारा कंपनी से 6 महीने में 9 बार पैसे लिए थे. आईटी के छापे में इसका खुलासा हुआ था. उन्होंने बकायदा रैली के मंच से चिट लहराते हुए ये आरोप लगाया.

राहुल ने कहा कि 2013 में पड़े आईटी के छापे के बाद सामने आया कि सहारा ने नरेंद्र मोदी को पैसा दिया. सहारा के लोगों ने अपनी डायरी में लिखा है कि हमने 6 महीने में 9 बार नरेंद्र मोदी जी को पैसा दिया है. आपने मुझे संसद में बोलने नहीं दिया. आप मेरे सामने खड़े होने को तैयार नहीं थे. पता नहीं क्या कारण था? कोई बिजनेस चलाता है तो वो उसका रिकॉर्ड रखता है. किसको कितने पैसे दिए कितने लिए. 22 नवंबर 2014 को सहारा पर रेड हुई. सहारा के रिकॉर्ड में जो लिखा था वो बताता हूं.

30 अक्टूबर 2013 को ढाई करोड़ मोदी जी को दिया गया. 12 नवंबर 5 करोड़ दिया गया. 29 नवंबर को 5 करोड़ लिखा था. 6 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 19 दिसंबर को 5 करोड़ दिया गया. 14 जनवरी 2104 को 5 करोड़. 28 जनवरी को 5 करोड़. 22 फरवरी को 5 करोड़ दिए गए.

राहुल ने कहा कि छह महीने में 9 बार सहारा ने मोदी जी को पैसा दिया है. ये जानकारी ढाई साल से आयकर के पास है. इस पर जांच होनी चाहिए. इस पर जांच क्यों नहीं हुई? ये सच है या झूठ, देश को बताइए मोदी जी. आपने पूरे देश को लाइन में रखा, उनकी ईमानदारी पर सवाल उठाया. अब मैं देश की ओर से पूछ रहा हूं जो ये इनफार्मेशन इनकम टैक्स के पास है, क्या यह सच है और इसमें जांच कब होगी? ऐसा ही एक रिकॉर्ड बिरला कंपनी का है. मोदीजी आप प्रधानमंत्री हैं, आपके ऊपर सवाल उठाए जा रहे हैं अब आप देश को बताओ कि यह सच है कि नहीं? आप एक निष्पक्ष जांच इस मामले में कराइए. बिरला का भी रिकॉर्ड है. आप पीएम हैं, आप पर सवाल है. आयकर के साइन हैं. आप खुद बताइए कि यह सच है या नहीं?

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सुब्रत राय ये पैसा अपने पास से दे रहे हैं या गरीबों से वसूली गयी रकम से?

चिटफंडिये, मीडिया और मोदी सरकार, जवाबदेही किसकी…. : देश के गरीबों का पैसा मारने वाले चिटफंडियों के मसीहा बन चुके सुब्रत राय सहाराश्री जेल के बाहर हैं. रिहाई के बदले सहाराश्री से सुप्रीम कोर्ट सैकड़ों करोड़ जमा कराते जा रही है. बड़ा सवाल है कि ये पैसा क्या सुब्रत राय सहाराश्री अपने पास से दे रहे हैं या फिर गरीबों से ही नये तरीके से वसूली जा रही रकम में से ही एक हिस्सा जमा कराई जा रही है. बेल पर बाहर सहाराश्री फिर से अपना जाल बिछाने में लग गये हैं. जिसके लिए कई राज्यों की राजधानी में ग्लैमर शो आयोजित किये जा रहे हैं. नेताओं और अधिकारियों को इसमें मेहमान बनाया जा रहा है. खुलेआम ये खेल उस मोदी सरकार के नाक के नीचे चल रहा है, जो दावा करती है कि ना खायेंगे ना खाने देंगे. मोदी सरकार अदालतों को दोषी ठहरा कर पल्ला नहीं झाड़ सकती क्योंकि निचली से लेकर सुप्रीम कोर्ट तक की अदालतें चिटफंडियों को अब जमानत पर रिहा नहीं होने देती हैं.

चिटफंडिये गरीबों का पैसा सीधे अंदर करने के लिए सरकारी पॉलिसी की खामी, सत्ता और प्रशासन के घटिया चरित्र का फायदा उठाते हैं. उदाहरण के लिए अपने कामकाज के पाक-साफ बताने के लिए कुछ सालों से चिटफंडिये कोऑपरेटिव सोसायटी के तहत रजिस्ट्रेशन कराकर, चंद कागजी खानापूर्ति के जरिए देश के दूर-दराज के अंचलों में गरीबों से अरबों-खरबों की वसूली कर रहे हैं. शिकायत होने पर कोई कड़ी कार्रवाई नहीं हो पाती है क्योंकि कोऑपरेटिव सोसायटी का रजिस्ट्रेशन कृषि मंत्रालय में होता है. घपले होने की शिकायत पर कृषि मंत्रालय सीमित कार्रवाई ही कर सकती है, जिसके चलते चिटफंडिये बेखौफ हैं. कृषि मंत्रालय के अधिकारी भी सबकुछ जानते हुए भी सहारा जैसी कंपनियों के दोहन पर कोई सख्त कदम नहीं उठा रहा हैं. जो अलग-अलग नामों से कार्यरत है. जिसके कारण सत्ताधीशों पर भी सवाल खड़े होते हैं.

स्थानीय स्तर पर कार्रवाई और दबावों से बचने के लिए चिटपंडिये लंबे समय से मीडिया में भी पैसा लगा लगा रहे हैं, जिसकी कायदे से शुरुआत सुब्रत राय सहाराश्री ने की. यानि जो पत्रकार ऐसे चिटफंडियों को बेनकाब करता अब ऐसी कंपनियों का कर्मचारी बन गया. सही गलत दलील देकर अपने पेट पालने वाली सैलरी को बचाने की जुगाड़ में लग गया. चिटफंडियों ने पत्रकारों को तनख्वाह की लालच देकर पीत पत्रकारिता को बढ़ावा दिया. सत्ताधारी भी कुंद होती जा रही पत्रकारिता में ऐसे चिटफंडियों को जमकर सपोर्ट किया. इन चिटफंडियों के कार्यक्रमों में हिस्सा बने. गरीब को लूटने वाले केवल सुब्रत राय सहारा ही नहीं, वो राजनेता भी कसूरवार हैं जो इन चिटफंडियों के जरिए चुनावों में अरबों रूपये कैश में पाते हैं और पानी की तरह बहाते हैं.

कानूनी दांवपेंचों और खामियों का सहारा लेकर चिटफंडिये गरीब आदमी के पैसों का दोहन करने के लिए कई रास्तों का सहारा लेते हैं. इनके निशाने पर हमेशा गरीब आदमी ही होता है, जो अपने खून-पसीने की कमाई के चंद हजार रूपयों को वापस पाने के लिए कोर्ट-कचहरी तक नहीं पहुंच पाता. चिटफंडिये देश भर में एजेंटों का जाल बिछाकर लाखों-करोड़ों गरीबों से पैसे एजेंटों के माध्यम से लूटते रहते हैं. एजेंट भी स्थानीय निवासी होते हैं, जो कुछ हजार की सैलरी की लालच में अपने करीबी लोगों को बहकाकर पैसा जमा कराते रहते हैं.

2014 तक चली केंद्र की कांग्रेस सरकार को इस बात का श्रेय देना होगा कि उसने सभी बड़े चिटफंडियों को सलाखों के पीछे भेजकर इस तरह के धंधे पर लगाम कस दी थी. लेकिन चिटफंडियों के सरताज की रिहाई के लिए किसी हद तक मोदी सरकार की अबतक की अनदेखी जिम्मेदार है. चिटफंडियों ने गरीबों के दोहन के लिए नये-नये तरीकों को ईजाद कर लिया है. कानूनी एजेंसियां और सरकार भी चिटफंडियों के वसूली के नये-नये तरीकों को बखूबी जानती है. लेकिन कार्रवाई तब होती है जब पानी नाक के ऊपर जाने लगता है. तो सुनो सरकार जी! पानी अब नाक के ऊपर आ गया है.

एक मीडियाकर्मी द्वारा भेजे गए पत्र पर आधारित.

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ये सहारा वाले कब से देशभक्त हो गए!

सहाराकर्मी इस ढकोसले का विरोध करें : सहारा का नाम सामने आते ही संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय का चेहरा सामने आने लगता है। यह वह शख्स है जिसने जनता, बॉलीवुड, विधायिका, कार्यपालिका, मीडिया सबको छकाया और अब न्यायपालिका का बेवकूफ बनाने चला था कि आ गया गिरफ्त में। लंबे समय तक जेल में रहने के बाद अपनी मां के निधन पर पैरोल पर बाहर आया हुआ है। जनता से ठगे पैसे वसूलने के लिए सुप्रीम कोर्ट थोड़ी बहुत राहत भी दे रहा है। अगले माह फिर से 600 करोड़ रुपए देने हैं नहीं तो फिर से जेल जाना पड़ेगा। इतना सब कुछ होने पर यह शख्स अपनी ऐबदारी से बाज नहीं आया। जिन कर्मचारियों ने इसकी तानाशाही का विरोध कर अपना हक मांगा, उन्हें या तो नौकरी से निकाल दिया या फिर हतोत्साहित करने के लिए कहीं-दूर स्थानांतरण करवा दिया।

आजकल राष्ट्रीय सहारा में एक विज्ञापन आ रहा है कि सहारा न्यूज नेटवर्क की ओर से 18 दिसम्बर को उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ में ‘थिंक विद मी समिट-आदर्श बने देश, महान बने भारत’ कार्यक्रम होने जा रहा है। सुना है कि इसी दिन संस्था के चेयरमैन सुब्रत राय भी नोएडा परिसर में किसी पुस्तक का विमोचन करने जा रहे हैं। ऐसे में प्रश्न उठता है कि जिस संस्था में अपने कर्मचारियों का जमकर शोषण और उत्पीड़न किया जा रहा हो। लंबे समय से कर्मचारियों प्रमोशन न हुआ हो। 10-16 महीने का वेतन बकाया है। काफी साथियों को वेतन देना बंद कर दिया हो। हक मांग रहे 22 कर्मचारियों को बर्खास्त कर दिया गया हो। सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बावजूद प्रिंट मीडिया में मजीठिया वेजबोर्ड के हिसाब से वेतन नहीं दिया जा रहा हो। उस संस्था को कैसे देशभक्त कह सकते हैं।

यह वह संस्था है जिसमें संस्था का मुखिया अपने कर्मचारियों को खुद बगावत करने के लिए उकसाता है और खुद ही बागियों को कुचलता है। यह वह संस्था है जिसमें मालिकान और अधिकारी अय्याशी करते हैं और कर्मचारियों को भुखमरी के लिए मजबूर कर किया जाता रहा है। यह वह संस्था जिसमें बड़े छोटों से कुर्बानी मांगते हैं।  यह संस्था अपने को बड़ा देशभक्त और भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत होना दिखाती है पर कर्मचारियों को नमस्ते, प्रणाम की जगह सहारा प्रमाण करवा कर अपनी गुलामी कराती है। आगे बढ़ने का एकमात्र फार्मूला चरणवंदना और वरिष्ठों को अय्याशी कराना है। देशभक्ति के नाम दिखावा तो बहुत किया जाता है पर सब कुछ अपने कर्मचारियों को ठग कर।

1999 में पाकिस्तान के साथ हुए कारगिल युद्ध में शहीद हुए हमारे सैनिकों के परिजनों की देखभाल के नाम पर संस्था ने अपने ही कर्मचारियों से 10 साल तक 100  – 200  – 500 रुपए प्रति माह तक वेतन से काटे। यह रकम सहारा कर्मचारियों के हिसाब से अरबो-खरबों में बैठती है। सहारा जब किसी को देता है कितना गुना प्रचार-प्रसार करता है। केन्द्र सरकार यह जांच कराये कि सहारा ने कारगिल युद्ध में शहीद हुए सैनिकों के परिजनों को कितना पैसा दिया तो मामला सामने आ जायेगा। इस संस्था ने शहीदों की लाश पर भी अपने ही कर्मचारियों से उगाही कर ली। उस समय चेयरमैन ने यह बोला था कि दस साल पूरे होने पर यह पैसा ब्याज सहित वापस होगा पर किसी को कोई पैसा नहीं मिला।

गत साल जब चेयरमैन जेल गया तो अपने को जेल से छुड़ाने के नाम पर अपने ही कर्मचारियों से 10,000 रुपए से लेकर 10,0000 रुपए तक ठग लिए। जब हम लोगों ने जेल में जाकर इस रकम के बारे में पूछा तो चैयरमैन ने बड़ी ही बेशर्मी से यह कहा कि संस्था में किसी स्कीम में धन कम पड़ रहा था, इसलिए अपने ही कर्मचारियों से पैसा लेना पड़ा। यह पैसा कर्मचारियों ने तब दिया था जब कई महीने से कर्मचारियों को वेतन नहीं मिला था। किसी ने अपनी पत्नी के जेवर बेच कर यह पैसे दिए तो किसी ने कर्जा लेकर।

हर बार कर्मचारियों ने इस व्यक्ति पर विश्वास किया और इस व्यक्ति ने हर बार कर्मचारियों को ठगा। हां देश के छल-कपट करने वाले मक्कार लोग संस्था में अधिकारी बना रखे हैं, जो सोचते हैं कि वे अमर हैं। इस संस्था ने कितने परिवार तबाह कर दिए। कितने बच्चों का जीवन बर्बाद कर दिया। कितने कर्मचारियों को मानसिक रूप से बीमार बना दिया। कितने लोगों की भावनाओं से खिलवाड़ किया। यह संस्था देश को आदर्श और भारत को महान बनाने चली है।

सोचने की बात तो यह है कि सब कुछ जानते हुए भी विभिन्न दलों के नेता इस संस्था के कार्यक्रमों में पहुंच जाते हैं क्यों? गत दिनों राष्ट्रीय सहारा नोएडा के मेन गेट पर बड़ी तादाद में कर्मचारी अपना हक मांग रहे थे तो किसी भी दल के नेता का दिल नहीं पसीजा। जो संस्था अपने उन कर्मचारियों की न हो पाई, जिनके पर बल 2000 रुपए की पूंजी से दो लाख करोड़ की पूंजी तक पहुंच गई। वह संस्था देश की क्या होगी ? जो संस्था अपने को आदर्श न बना सकी। महान न बना सकी। वह देश को क्या आदर्श बनाएगी ?  क्या भारत को महान बनाएगी? मेरी सहारा पीड़ित कर्मचारियों तथा निवेशकों और देशभक्त जनता से अपील है कि 18 दिसम्बर को देशभक्ति के नाम हो रहे इस ढकोसले का जमकर विरोध करें।

आपका अपना
चरण सिंह राजपूत
charansraj12@gmail.com

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सहारा मीडिया से रणविजय सिंह को टर्मिनेट किए जाने की खबर!

सहारा मीडिया से एक बड़ी सूचना है कि दशकों से वरिष्ठ पदों पर कार्यरत रहे रणविजय सिंह को प्रबंधन ने टर्मिनेट कर दिया है. उन्हें काफी समय से अधिकार विहीन कर साइडलाइन कर दिया गया था. सूत्रों का कहना है कि रणविजय सिंह पर कई किस्म के आरोप थे जिसमें पद का दुरुपयोग करते हुए महिलाओं का शोषण करना भी शामिल है. उन पर अवैध संपत्ति बनाने और आर्थिक भ्रष्टाचार करने के भी आरोप हैं. उनको लेकर सहारा में आंतरिक जांच कराई गई जिसमें वह सहारा मीडिया के लिए अयोग्य पाये गये. उन पर स्टाफ में असंतोष को बढ़ावा देने का भी आरोप लगाया गया. बताया जा रहा है कि सुब्रत राय के खासमखास ओपी श्रीवास्तव उनसे इन दिनों सख्त नाखुश थे. चर्चा है कि तीन चार बड़े विकेट और गिरेंगे बहुत ज़ल्द. उधर, रणविजय खुद यह दावा कर रहे हैं कि उन्हें टर्मिनेट नहीं किया गया, बल्कि वह खुद हटे हैं. 

रणविजय सिंह पर गाज गिराए जाने के बाद कहा जा रहा है कि कई अन्य मोटी पगार वाले नाकार लोगों को सहारा मीडिया से हटाया जा सकता है. उधर भड़ास से बातचीत में रणविजय सिंह ने टर्मिनेट किए जाने की सूचना को गलत बताया. उन्होंने कहा कि वे महीने भर पहले ही इस्तीफा दे चुके हैं जिसे प्रबंधन ने अब स्वीकार किया है. रणविजय सिंह के मुताबिक उनके पास सहारा में करने के लिए कोई काम नहीं था इसलिए उन्हें सुब्रत राय से मिलकर या तो काम देने या फिर इस्तीफा स्वीकार करने का अनुरोध किया था.

आगे की योजना के बारे में रणविजय सिंह का कहना है कि 21 नवंबर को बिटिया की शादी है. शादी के बाद ही वह नए वेंचर के बारे में घोषणा करेंगे. ज्ञात हो कि रणविजय सिंह राष्ट्रीय सहारा लखनऊ के स्थानीय संपादक रहे. बाद में उन्हें ग्रुप एडिटर तक बनाया गया और नोएडा में बिठाया गया. अब उनकी सहारा से विदाई हो गई है.

फिलहाल पूरा सहारा मीडिया इन दिनों अभिजीत सरकार के नेतृत्व में ठीकठाक चल रहा है. सेलरी का संकट भी खत्म हो गया है. टाइम से लोगों को सेलरी मिलने लगी है. सहारा के चैनल्स जल्द ही टाटा स्काई पर लाए जा रहे हैं. सहारा मीडिया को आर्थिक रूप से दुरुस्त करने के क्रम में ही बड़े पदों पर आसीन निष्क्रिय लोगों को हटाया जा रहा है.

भड़ास के साथ कोई भी सूचना bhadas4media@gmail.com के जरिए शेयर कर सकते हैं. मेल भेजने वाले का नाम पहचान गोपनीय रखा जाएगा.

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सहारा मीडिया में उपेन्द्र राय द्वारा कांट्रैक्ट पर रखे गए सभी 89 लोग टर्मिनेट

सहारा मीडिया ग्रुप (राष्ट्रीय सहारा और सहारा समय न्यूज चैनल) से एक बड़ी खबर आ रही है. उपेन्द्र राय ने अपने छोटे से कार्यकाल में संपादक से लेकर यूनिट हेड, डिप्टी न्यूज एडिटर, विशेष संवाददाता, प्रमुख संवाददाता आदि पदों करीब 89 लोग भर्ती किए थे जिन्हें टर्मिनेट कर दिया गया है. इन दिनों सहारा प्रबंधन उपेंद्र राय से सख्त नाराज चल रहा है क्योंकि उन्होंने जो वादे किए थे, वो पूरे नहीं किए, उलटे अपनी ब्रांडिंग खूब कर ली और अपने खास लोगों को जमकर ओबलाइज कर दिया.

सभी टर्मिनेट लोग कांट्रैक्ट पर एक-एक साल के लिये भर्ती किए थे. हर साल इन लोगों का कांट्रैक्ट रिन्यूवल होना था. भर्ती के बाद कई लोग चौथे माह में तो कई छठें व कई नौवें माह में काम कर रहे थे. तीन दिन पूर्व अचानक इन सभी को टर्मिनेट करके एक-एक माह का एडवांस चेक देकर सभी को रजिस्टर्ड पत्र भेजकर सूचित कर दिया गया है. साथ ही इन सभी को कार्यालय आकर हिसाब करके शेष भुगतान लेने को कहा गया है.

यहां ध्यान देने योग्य बात है कि उपेन्द्र राय ने अपने कार्यकाल में सहारा मीडिया ग्रुप में सेवानिवृत्त के बाद कांट्रैक्ट पर तैनात 60 वर्ष से ज्यादा के 85 लोगों को एक साथ टर्मिनेट करके इसी जगह पर अपने खास लोगों की तैनाती कर दी थी. लेकिन बदले माहौल में मैनेजमेंट उनके उल्टे सीधे कार्यों की नये सिरे से समीक्षा कर रहा है. इसी क्रम में उनके द्वारा लाए गए लोगों को हटा दिया है.

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सहारा ने अपने 21 मीडियाकर्मियों को किया बर्खास्त, देखें पूरी लिस्ट

सुब्रत राय के तिहाड़ जेल से बाहर आने के बाद सहारा मीडिया के कर्मियों का कोई खास भला तो हुआ नहीं, हां, थोक के भाव नौकरियां जरूर जाने लगी हैं. ताजी जारी लिस्ट में 21 मीडियाकर्मियों के नाम पद का जिक्र करते हुए इन्हें बर्खास्त किए जाने की सूचना दी गई है. भड़ास के पास आई इस सूची में कई संपादकीय के लोग हैं तो कई अन्य डिपार्टमेंट के. सात लोग सहारा के ‘समय’ न्यूज चैनल से हैं तो 14 लोग सहारा प्रिंट मीडिया से.

हटाए गए लोगों का नाम पद जानने पढ़ने के लिए नीचे दिए गए लिंक पर क्लिक करें :

Terminated from Sahara Media

पूरे मामले को जानने समझने के लिए इस शीर्षक पर भी क्लिक करें  :

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