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ओम थानवी खा आए संजीव श्रीवास्तव की कचौरी, पढ़िए फीडबैक

ओम थानवी-

संजीव श्रीवास्तव ने कचौरी की दुकान नहीं खोली है। वह एक दोमंज़िला कैफ़े है। तीसरी मंज़िल पर रूफ़टॉप रेस्तराँ की योजना है।

मैं आज हो आया। बहुचर्चित मटर-कचौरी के साथ मिर्चीबड़ा, लघु-बालूशाही, बेसन का लड्डू और बर्फ़ीली पुदीना-चाय का सेवन किया। उदार मन से लघु-फीणी का त्याग किया।

विनम्रता से संजीव मटर-कचौरी के बचपन के सपने को साकार करने की कहानी सुनाते हैं। भाई लोग उसी के गिर्द घूमने लगे। यों ज़ाहिर किया जैसे दिग्गज पत्रकार को कचौरी का ठेला लगाने की नौबत आ गई हो।

राजस्थान में खानपान की दुकानों में किसी एक उत्पाद को USP बना लेने की परम्परा है। जयपुर का प्राचीन लक्ष्मी मिष्ठान भंडार (एलएमबी) घेवर के लिए प्रसिद्ध हुआ। जोधपुर का रावत मिष्ठान भंडार मावे की कचौरी के नाम से। चतुर्भुज गुलाबजामुन और मिश्रीलाल लस्सी के लिए। बीकानेर का हल्दीराम भुजिया के लिए, जेसराज पन्धारी लड्डू के लिए, स्वामी (बीके स्कूल) गोंदपाक के लिए। कोटा का रतन हींग वाली कोटा-कचौरी के लिए।

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उन प्रसिद्ध दुकानों में दूसरे खाद्य नहीं मिलते। एलएमबी अब एक विशाल दुकान ही नहीं, रेस्तराँ और होटल का नाम है।

इशारे में कुछ वही सिलसिला “Throwback – देसी” का समझिए। अभी चुनिंदा खाद्य और पेय हैं। आगे-आगे देखिए होता है क्या। ‘देसी’ चल पड़ा तो संजीव कहीं ‘थ्रोबैक देसी’ की शृंखला न खड़ी कर दें। कचौरी के नाम पर ऑनलाइन प्रचार तो अंतरराष्ट्रीय स्तर का हो ही चला है — सरासर मुफ़्त।

जो हो, मटर-कचौरी स्वाद में है कैसी? क़सम से, लाजवाब। मैंने चटनी मँगवाई, पर उसे छुआ तक नहीं। हींग और गरम मसाले की महक के बीच साबुत मटर और साबुत मसालों ने छोटे आकार में कुछ दिलचस्प लज़ीज़ रच दिया है।

मगर खाद्य-समीक्षा मेरा लक्ष्य नहीं। मुझे उसमें उतरा देख मेरे अज़ीज़ विनोद दुआ की आत्मा नाहक कष्ट पाएगी।

बहरहाल, संजीवजी को बधाई। देश में पत्रकारिता के दुर्दिनों में एक विकल्प खड़ा कर उन्होंने शान और संजीदगी का स्पंदित संकेत दिया है।

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