दीपक गोस्वामी-
जो काम पिछले कई दशकों में न कांग्रेस कर पाई और न भाजपा कर पाई, वो इस बंदे अभिजीत दीपके ने कर दिखाया। दिल्ली की सड़कों को इसने आम युवाओं से भर डाला।
आंदोलन का अंजाम जो भी हो वो मायने नहीं रखता। मायने ये रखता है कि 12 साल में पहली बार भाजपा सरकार के ख़िलाफ़ क्रांति की एक अलख जाग चुकी है। लोग खुलकर बोलने लगे हैं।

आप कहेंगे कि इस आंदोलन का कोई नतीजा नहीं निकला, इसलिए ये विफल है। ऐसा कहने से पहले जाइए और भारत की स्वतंत्रता का इतिहास पढ़िए। 1857 से लेकर 1947 तक देश में अनेक आंदोलन हुए। क्या सभी सफल हुए? सफलता का प्रतिशत न के बराबर था।
लेकिन, फिर भी आंदोलन होते रहे। उन आंदोलनों में देश के कुछ लोग अंग्रेज़ों के लिए जासूसी भी करते रहे, फिर भी क्रांति की अलख ज़िंदा रही। वो सिर्फ़ इसलिए हुआ क्योंकि असफल ही सही, लेकिन ऐसे आंदोलन होते रहे जो लोगों में बदलाव और उम्मीद की अलख जलाए रखें।
पिछले 12 सालों में कांग्रेस एक भी ऐसा जन आंदोलन खड़ा नहीं कर पाई। इस सरकार को हिलाने के लिए जनता का सड़कों पर आना जरूरी है। अब अगर कांग्रेस इसमें असफल है तो फिर जो भी जनता को जगा सके, उसका स्वागत है।
और हां, जगाने वाले के इरादे चाहे कुछ भी हों। एक बार जनता जाग जाती है तो आंदोलनों की कमान अपने आप बदल जाती हैं। किसान आंदोलन तो याद ही होगा।
इसलिए जिन्हें अभिजीत या सोनम वांगचुक में खोट भी नजर आ रहा है, तो यह मायने नहीं रखता। एक बार जनता जाग जाती है तो उसे न अभिजीत की जरूरत रह जाती है और न वांगचुक की। तब सीधा लाभ विपक्ष को ही मिलता है। इसलिए जनता को जागने दो। आंदोलन के अंजाम या उसे लीड करने वाले चेहरों की परवाह मत करो। ज़्यादा दिमाग़ लगाओगे तो अगले 10-12 साल और वो सत्ता में बने रहेंगे।
यशवंत सिंह-
प्रधानमंत्री संसद से सुरक्षित निकाले गए। हिंदी में इसका मतलब है झोला उठाकर भागे साहेब।
काक्रोच संसद परिसर में घुसने पर उतारू, सारे दरवाज़े बंद करने को दौड़े सुरक्षाकर्मी। क्यूआरटी तैनात, निशाना साधे जवान अगले आदेश के इंतज़ार में!

जंतर मंतर, इंडिया गेट, कनाट प्लेस, रेल भवन से लेकर पूरे आसपास के अति महत्वपूर्ण इलाकों में फैले काक्रोच!
पुलिस हर जगह काक्रोचों को दौड़ा रही लेकिन काक्रोच कम होने की बजाय बढ़ते ही जा रहे।
कई किस्म के गंभीर आरोपों से घिरी मोदी सरकार अब तक के सबसे मुश्किल दौर में।
नौजवानों का गुस्सा क्या रंग रूप लेगा, किसी को नहीं पता लेकिन जितना दमन होगा उतना गुस्सा बढ़ेगा यूथ का!
नौकरियों से जबरन दूर रखा गया जेनजी अब करो या मरो पर उतारू होता दिख रहा है। पूरे सीन से कांग्रेस ग़ायब, कांग्रेसी मौनव्रत पर!
युवाओं को सलाम! जंतर मंतर पर सैलाब उमड़ पड़ा है। सारी पाबंदियों सारे डराऊ आदेशों को धता बताते हुए आए नौजवानों ने जता दिया है, एग्जाम तक सही ढंग से न करा पाने वाली सरकार की उल्टी गिनती शुरू हो चुकी है। सीपी दिल्ली गोलचा की नौकरी तो छात्र ले ही चुके हैं। अब शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान जाएँगे। फिर जाएगी मोदी सरकार। युवाओं के गुस्से के आगे बड़े बड़े तानाशाह भूलुण्ठित मिलते हैं। दुर्भाग्य है कांग्रेस इस सीन में आज कहीं नहीं हैं। इसीलिए कहता हूँ कांग्रेसी तो बीजेपी की बी टीम के मेम्बर हैं। असली मौके से गायब मिलते हैं। किधर हो राहुल गांधी। पहुँचो न जंतर मंतर। देश के नौजवान तुम्हारा इंतज़ार कर रहे हैं और तुम छिपे हो अपने घर में। विदेश से लौट आए न मौज मस्ती करके। अब तो आ जाओ सड़क पर।

तस्वीर : जंतर मंतर पर लाठीचार्ज से डरे बिना साहस के साथ आँख में आँख डाले खड़ा एक काक्रोच!



