दिल्ली यूनियन ऑफ जर्नलिस्ट्स (DUJ) ने वरिष्ठ पत्रकार और ‘मज़दूर बिगुल’ पत्रिका के संपादक सत्यम वर्मा के खिलाफ राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) लगाए जाने की कड़ी निंदा की है। संगठन ने इसे स्वतंत्र पत्रकारिता पर हमला बताते हुए कहा कि उत्तर प्रदेश सरकार आलोचनात्मक और जनपक्षीय आवाजों को दबाने का काम कर रही है।
DUJ ने जारी बयान में कहा कि सत्यम वर्मा लंबे समय से नोएडा समेत देश के विभिन्न हिस्सों में मजदूरों की समस्याओं को लगातार उठाते रहे हैं। मजदूरों और श्रमिक आंदोलनों से जुड़े मुद्दों पर लिखने के कारण उनके खिलाफ NSA जैसी कठोर धारा लगाना बेहद चिंताजनक है। संगठन का कहना है कि यह फैसला स्वतंत्र पत्रकारों को डराने और दबाने की कोशिश का हिस्सा है।
पत्रकार संगठन ने आरोप लगाया कि मुख्यमंत्री Yogi Adityanath के नेतृत्व वाली उत्तर प्रदेश सरकार के कार्यकाल में प्रेस की स्वतंत्रता पर लगातार हमले हुए हैं। DUJ ने कहा कि इससे पहले भी कई पत्रकारों को कठोर कानूनों के तहत गिरफ्तार किया गया, जिनमें पत्रकार Siddique Kappan का मामला प्रमुख रहा है।
DUJ ने उत्तर प्रदेश सरकार को याद दिलाया कि पत्रकारिता कोई अपराध नहीं है और भारतीय संविधान अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की गारंटी देता है। संगठन ने मांग की कि सत्यम वर्मा के खिलाफ NSA लगाने का फैसला तुरंत वापस लिया जाए और उन्हें जल्द रिहा किया जाए।
संगठन ने नोएडा प्रदर्शन से जुड़े मामले में एक्टिविस्ट आकृति चौधरी समेत अन्य लोगों पर NSA लगाए जाने की भी आलोचना की। DUJ का कहना है कि विरोध और असहमति की आवाजों पर राष्ट्रीय सुरक्षा कानून का इस्तेमाल लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है।
बयान में इलाहाबाद हाईकोर्ट की उन टिप्पणियों का भी जिक्र किया गया, जिनमें अदालत ने अतीत में यूपी पुलिस द्वारा NSA के कथित दुरुपयोग पर चिंता जताई थी। DUJ ने कहा कि नागरिकों और पत्रकारों के खिलाफ इस तरह कठोर कानूनों का इस्तेमाल बंद होना चाहिए।
नौजवान भारत सभा हरियाणा का एफबी पोस्ट-

सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर लगाये गये दमनकारी रासुका/NSA के ख़िलाफ़ और नोएडा-मानेसर हिंसा के नाम पर साजिश के तहत गिरफ़्तार सभी कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और मज़दूरों की रिहाई के मसले पर नरवाना (हरियाणा) में संयुक्त विरोध प्रदर्शन का आयोजन कर राष्ट्रपति के नाम सौंपा गया ज्ञापन!
वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाये गये दमनकारी रासुका/NSA को तत्काल हटाया जाये! नोएडा हिंसा मामले के नाम पर यूपी पुलिस द्वारा साजिश के तहत गिरफ़्तार सात सामाजिक कार्यकर्ताओं, बुद्धिजीवियों और श्रमिकों को अविलम्ब रिहा करो!
मानेसर हिंसा मामले के नाम पर गिरफ़्तार छह ट्रेड यूनियन एक्टिविस्टों को तुरन्त रिहा करो! यूपी पुलिस की तानाशाही नहीं चलेगी! निर्दोष एक्टिविस्टों को तुरन्त रिहा करो!
साथियो! आज नरवाना में वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाये गये दमनकारी रासुका/NSA के ख़िलाफ़ और नोएडा-मानेसर हिंसा के नाम पर साजिश के तहत गिरफ़्तार सभी कार्यकर्ताओं, पत्रकारों और मज़दूरों की रिहाई के मसले पर संयुक्त विरोध प्रदर्शन का आयोजन किया गया। प्रदर्शन के बाद इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन-पत्र सौंपा गया। इस ज्ञापन को राज्यपाल उत्तरप्रदेश, मुख्यमंत्री उत्तरप्रदेश, मुख्य न्यायाधीश, इलाहाबाद उच्च न्यायालय, मुख्य न्यायाधीश, उच्चतम न्यायालय के नाम भी प्रेषित किया गया। आज की संयुक्त कार्रवाई में नौजवान भारत सभा (NBS), अखिल भारतीय किसान सभा (AIKS), क्रान्तिकारी युवा संगठन (KYS), भारत की जनवादी नौजवान सभा (DYFI), दिशा छात्र संगठन, क्रान्तिकारी मनरेगा मज़दूर यूनियन (हरियाणा) के साथी और वकील व शहर के आम नागरिक शामिल हुए।
प्रदर्शन के दौरान हुई प्रतिरोध सभा में किसान सभा से मास्टर बलबीर सिंह, किसान नेता शीशपाल गुलाढी, ज्ञान-विज्ञान समिति से सतबीर खरल, वकील साथी वीरेन्द्र मोर, नौजवान सभा से नरेश दानोदा, केवाईएस से वीरेन्द्र धरोदी, नौभास से अनिल श्योकन्द, मनरेगा यूनियन से अजय और दिशा से इन्द्रजीत ने अपने विचार रखे। वक्ताओं ने यूपी-हरियाणा की सरकारों व नोएडा-मानेसार पुलिस के रवैये की भर्त्सना की और सभी कार्यकर्ताओं और श्रमिकों की रिहाई की माँग करी।
ज्ञात हो नोएडा विरोध प्रदर्शन मामले में गिरफ़्तार एक्टिविस्टों सत्यम वर्मा और आकृति चौधरी पर यूपी पुलिस ने दमनकारी रासुका लगा दिया है। नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन से जुड़े एक्टिविस्टों की पहली ग़ैरक़ानूनी गिरफ़्तारियों के एक महीने से अधिक समय बाद और नोएडा के फ़ेज-2 में मज़दूरों के प्रदर्शन के दौरान हिंसा भड़कने के ठीक एक महीने बाद, कल 13 मई के दिन यूपी पुलिस ने वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और छात्र एक्टिविस्ट आकृति चौधरी पर राष्ट्रीय सुरक्षा क़ानून (रासुका), 1980 लगाने जैसा अतिवादी क़दम उठाया है।
ग़ौरतलब है कि 12 मई को सेशन कोर्ट में सत्यम और आकृति की जमानत याचिकाओं पर सुनवाई हुई थी। दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद जज ने मामले को स्थगित कर दिया था। बचाव पक्ष के वकीलों ने आरोपों के खोखलेपन और गिरफ़्तारियों की ग़ैरक़ानूनी प्रकृति को उजागर किया था, जबकि सरकारी वकील सत्यम या आकृति के ख़िलाफ़ कोई ठोस सबूत पेश नहीं कर सके थे। सत्यम को लखनऊ से गिरफ़्तार किये जाने के ग़ैरक़ानूनी कृत्य को लेकर इलाहाबाद उच्च न्यायालय में भी एक याचिका दायर की गई है, जिसपर इसी सप्ताह सुनवाई होनी है। यह भी ध्यान देने योग्य है कि आरोपी एक महीने या उससे अधिक समय से न्यायिक हिरासत में हैं, और अब जाकर यूपी पुलिस ने उन पर रासुका लगाया है!
इससे पूरी कार्यवाही से स्पष्ट तौर पर लगता है कि उत्तरप्रदेश पुलिस का प्रयास यह सुनिश्चित करना है कि नोएडा हिंसा मामले में झूठे तौर पर फँसाए गये लोगों को किसी भी क़ीमत पर इस अन्यायपूर्ण क़ैद से रिहा न होने दिया जाये। यूपी पुलिस ने यह क़दम इसलिए उठाया है क्योंकि पूरा मामला निराधार है और एक महीने बाद भी उनके पास सत्यम, आकृति या अन्य लोगों की संलिप्तता का कोई वास्तविक सबूत नहीं है।
हम सभी देश में पुलिस द्वारा रासुका के बारंबार दुरुपयोग से भली-भाँति परिचित हैं, जिसकी ओर उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने कई बार ध्यान दिलाया है, साथ ही वरिष्ठ वकीलों, कानूनी विशेषज्ञों और मानवाधिकार संगठनों ने भी इसे रेखांकित किया है। जिन मामलों में रासुका लगाया गया है, उनमें से 79% मामलों में अब तक कोई सज़ा नहीं हो पायी, लेकिन इस क़ानून के प्रावधान पुलिस को असीम शक्ति और सबूत पेश करने या चार्जशीट दाखिल करने के लिए 12 महीने तक का लम्बा समय देते हैं। कम सज़ा दर यह साबित करती है कि आज रासुका के अधिकांश मामलों में प्रक्रिया ही सज़ा बन जाती है।
इस मामले में रासुका लगाए जाने से कुछ बेहद गम्भीर सवाल भी उठते हैं। एक ओर स्वतंत्र मीडिया रिपोर्टों और मजदूरों के साक्षात्कारों ने हिंसा भड़काने में यूपी पुलिस की भूमिका की सम्भावना की ओर संकेत किया है, वहीं दूसरी ओर इन गम्भीर तथ्यों की निष्पक्ष और उच्च-स्तरीय जाँच कराने के बजाय यूपी पुलिस सत्यम, आकृति और अन्य एक्टिविस्टों को और अधिक फँसाने में लगी हुई है, जिन्होंने मजदूरों की न्यायपूर्ण माँगों का समर्थन किया था।
सत्यम वर्मा एक वरिष्ठ पत्रकार हैं, जिन्होंने तीन दशकों तक यूनीवार्ता में काम किया है, और वे जनचेतना पुस्तक प्रतिष्ठान तथा जागरूक नागरिक मंच से जुड़े एक सार्वजनिक बुद्धिजीवी और एक्टिविस्ट हैं। वे एक प्रसिद्ध सम्पादक और अनुवादक हैं, जिन्होंने भगत सिंह और उनके साथियों के सम्पूर्ण लेखन का संकलन किया है, तथा बाल्ज़ाक, अप्टन सिंक्लेयर, मार्क ट्वेन, बर्टोल्ट ब्रेख्त, देनी दिदेरो, रोमिला थापर और अन्य लेखकों की कृतियों का अनुवाद किया है। वे नोएडा में मज़दूरों के विरोध प्रदर्शन में मौजूद भी नहीं थे, और 17 अप्रैल को लखनऊ से पुलिस ने उन्हें अगवा कर लिया था। वास्तव में, सत्यम नोएडा में आख़िरी बार 12 साल पहले गए थे! फिर भी यूपी पुलिस उन्हें मुख्य साज़िशकर्ता के रूप में पेश कर रही है और दावा कर रही है कि वे वहाँ मौजूद थे तथा हिंसा भड़का रहे थे। सत्यम ने बस वही किया जो कोई भी सजग नागरिक करता — उन्होंने अपने सोशल मीडिया के माध्यम से मज़दूरों की न्यायपूर्ण माँगों और उनके शान्तिपूर्ण आन्दोलन के प्रति एकजुटता व्यक्त की। यह अपने आप में काफ़ी कुछ बताता है कि यूपी पुलिस इसे एक ऐसे “अपराध” के रूप में प्रस्तुत करना चाह रही है जिसके लिए रासुका लगाया जाना ज़रूरी है!
आकृति चौधरी एक छात्र एक्टिविस्ट और रंगकर्मी हैं। वे दिशा छात्र संगठन की सदस्य हैं जिसने लगातार सबके लिए शिक्षा और रोजगार की माँग उठाई है तथा आम छात्रों और युवाओं के अधिकारों के लिए संघर्ष किया है। दिल्ली विश्वविद्यालय के इतिहास विभाग से स्नातकोत्तर करने के बाद वे पीएचडी की तैयारी कर रही हैं। 11 अप्रैल को बॉटनिकल गार्डन मेट्रो स्टेशन से सादे कपड़ों में आए पुरुष पुलिसकर्मियों द्वारा अगवा किए गए चार लोगों में आकृति भी शामिल थीं। एक न्यायप्रिय, प्रगतिशील छात्र एक्टिविस्ट और कलाकार के रूप में उन्होंने लगातार समाज के वंचित तबक़ों के मुद्दों का समर्थन किया है, और उन्होंने रंगमंच को भी जनता के संघर्षों को अभिव्यक्त करने का कलात्मक माध्यम बनाया है। वे 11 अप्रैल को नोएडा में हुए प्रदर्शन में मजदूरों के आन्दोलन के प्रति एकजुटता जताने गयी थीं और मज़दूरों के बीच शान्तिपूर्ण हड़ताल की वकालत कर रही थीं। आकृति जिन्हें हिंसा भड़कने से दो दिन पहले ही गिरफ़्तार कर लिया गया था और जो अब एक महीने से अधिक समय से जेल में बन्द हैं, उनपर अब रासुका लगाया गया है, जिसके कारण यह सम्भावना है कि बिना किसी ठोस सबूत के उन्हें एक साल तक जेल में रहना पड़ सकता है!
इस बात की प्रबल सम्भावना है कि यूपी पुलिस गिरफ़्तार किये गए सभी 7 एक्टिविस्टों — जिनमें आदित्य आनंद, रूपेश रॉय, मनीषा चौहान, सृष्टि गुप्ता और हिमांशु ठाकुर भी शामिल हैं — पर रासुका लगाएगी। यह स्पष्ट है कि ऐसा इसलिए किया जा रहा है ताकि इन एक्टिविस्टों को जमानत पर रिहा न होने दिया जाये, और सभी न्यायप्रिय लोगों को यह संदेश दिया जा सके कि मज़दूर आंदोलनों का समर्थन करने पर, यहाँ तक कि ऑनलाइन समर्थन करने पर भी, कठोर दमन का सामना करना पड़ेगा। नोएडा में विरोध प्रदर्शन शुरू होने के बाद से यूपी पुलिस द्वारा उठाया गया हर क़दम साफ़ संकेत देता है कि वे मज़दूरों को अपनी माँगें उठाने से डराना चाहते हैं और उनके समर्थन में उठने वाली आवाज़ों को दबाना चाहते हैं। रासुका लगाया जाना शायद अब तक का सबसे चरम और सबसे दमनकारी कदम है।
प्रदर्शन के दौरान माँग की गयी कि नोएडा हिंसा मामले में यूपी पुलिस द्वारा साजिश के तहत गिरफ़्तार सात सामाजिक कार्यकर्ताओं और श्रमिकों को अविलम्ब रिहा किया जाये। वरिष्ठ पत्रकार सत्यम वर्मा और सामाजिक कार्यकर्ता आकृति चौधरी पर लगाये गये दमनकारी रासुका को तुरन्त प्रभाव से वापस लिया जाये।
भगतसिंह को याद करेंगे,
ज़ुल्म नहीं बर्दाश्त करेंगे!
जनता की एकजुटता ज़िन्दाबाद!


