सोमवंशी राजपूतों के इस गांव में हर तीसरे घर का कोई न कोई जवान सरहद पर मोर्चा लेते हुए शहीद हुआ है

जयराम शुक्ल

मध्यप्रदेश के सतना जिले में एक गाँव है चूँद। इलाके में इसे शहीदों के गाँव के तौर पर जाना जाता है। सोमवंशी राजपूतों के इस गाँव में हर तीसरे घर का कोई न कोई जवान सरहद में मोर्चा लेते हुए शहीद हुआ है। औसतन हर घर में एक फौजी है। एक दो घर ऐसे भी हैं जहां दो तीन पीढ़ी एक के बाद एक शहीद हुई। गाँव में द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर अब तक हुए सभी युद्धों में इस माटी में पैदा हुए जवानों ने देश के लिए मोर्चा सँभाला है।

फौज को लेकर बच्चों में ऐसा जज्बा कि तरुण होते ही दौड़कूद करके खुद को इस काबिल बनाने लगते हैं कि फौज में भर्ती हो सकें। यहां रोज रिटायर्ड फौजियों की चौपाल लगती है,उनमें से कई ऐसे भी हैं जिनके जिस्म में युद्ध के दौरान गोलियों के निशान हैं, कुछ तो हाँथपाँव से विकलांग हैं। चौपाल में चर्चा के विषय में फौजी जीवन के किस्से ही रहते हैं। स्कूल की बच्चियों ने चूँद के शहीदों के शौर्य पर गीत बनाए हैं। जब भी कोई हाकिम, अफसर, नेता किसी कार्यक्रम के सिलसिले में गाँव जाता है तो बच्चियां स्वागत गीत की बजाय शहीदों का गीत ही सुनाती हैं।

मेरे फिल्मकार मित्र सभाजीत शर्मा ने ..सलाम चूँद..नाम से घंटे भर की एक डाक्यूमेंट्री बनाई है। मुझे इसके प्रीमियर में बुलाया था। कस्बे में उपलब्ध संसाधनों के जरिए ये फिल्म की गुणवत्ता क्या है ये अलग बात है असली विषय यें कि फिल्म देखकर आत्मा से..जय जवान जय किसान ..का नारा स्वमेव निकल आता हे। चूँद गाँव में किसान हैं और उनके बच्चे फौज में जवान।

सेना, जवान, उनकी वर्दी और उनके द्वारा युद्ध और सैन्य जीवन के किस्से मुझे बचपन से रोमांचित करते रहे हैं, वजह लगभग चूँद जैसे ही कहानी मेरे अपने गाँव की है। मेरा गाँव रीवा जिले में है, उसे बड़ीहर्दी के नाम से जाना जाता है। मेरे बड़े व लंबे परिवार में प्रायः हर घर से कोई न कोई फौज में रहा है। यहां भी द्वितीय विश्वयुद्ध से लेकर करगिल और आतंकवाद से  मोर्चा लेने वाले फौजी हैं।

मेरे पिता खुद डिफेंस की फैक्ट्री में थे और बम बनाने की एक मशीन को सुधारते समय हुए हादसे में शहीद हो गए। मेरे गाँव को फौजियों की शहादत के लिए नहीं अपितु खेल की दुनिया में नाम कमाने के लिए जाना जाता है। मेरे कजिन कैप्टन बजरंगी प्रसाद तैराकी के प्रथम अर्जुन पुरस्कार विजेता हैं। उन्हें भारतीय तैराकी का पितामह कहा जाता है। वे टोक्यो ओलंपिक में भारतीय टीम को लेकर गए थे। कई नेशनल रेकार्ड उनके नाम है। पानी के खेलों में चीन और जापान के दबदबे के बीच उन्होंने थ्री एन्ड हाफ समरसाल्ट का एशियाई रेकार्ड बनाया था।

हमारे एक बडे़ भैय्या रंगनाथ शुक्ल विश्व की दुर्गमतम जंस्कार वैली में व्हाइट वाटर एक्सपिडीशन टीम के सदस्य रहे जिन्होंने राफ्टिंग के जरिए इस जानलेवा बर्फीले अभियान को पूरा किया। सन् 90 में इसे वर्ल्ड रेकार्ड बुक में दर्ज किया गया। सन् 65 और सन् 71 के युद्ध के किस्से मैने अपने चाचा से सुने। इसलिए सेना,जवान,उनकी जिंदगी के मैं काफी करीब हूँ। फौजी जीवन खासकर युद्ध की पृष्ठभूमि पर बनी फिल्में घर में मुझे नहीं देखने दी जातीं क्योंकि मैं भावुक हो जाता हूँ और आँसुओं का ग्लैशियर फूट पड़ता है।

इस जिंदगी मेरा यही सबसे बड़ा अफसोस है कि मैं फौज में नहीं जा पाया। जबलपुर साईंस कालेज में हमारा आठदस लड़कों का ग्रुप था, उसमें दो को छोड़कर बाकी सभी सेना में हैं शायद एक दो ब्रिगेडियर भी बन चुके होंगे। मैं सीडीएस में इसलिए नहीं बैठ पाया क्योंकि स्कूल के दिनों से ही मोटे लैंस का चश्मा लगने लगा था। दूसरा साथी चाहकर भी इसलिए नहीं जा पाया क्योंकि उसका पारिवारिक पेशा वकालत था। वह मित्र आज हाईकोर्ट का जज है वरिष्ठता की दृष्टि से निश्चित ही सुप्रीमकोर्ट तक पहुँचना चाहिए ..भगवान करे ऐसा हो। लेकिन उसमें भी मेरी तरह यह कसक है कि भारतीय सेना का हिस्सा नहीं बन पाया।

मुद्दे की बात तक पहुंचने से पहले इस आत्मालाप से इसलिए साझा किया ताकि आप भी मेरे साथ इस सवाल पर मंथन करें कि भारतीय फौज में किसान और मध्यमवर्गीय परिवार के ही बेटे क्यों जाते हैं..? कारपोरेट सीईओ, नौकरशाह और राजपुरुष लोग अपने बच्चों को फौज में जाने के लिए क्यों प्रेरित नहीं करते.? मोर्चे पर जब जवान शहीद होते हैं और खेतों की मेंड पर जिंदगी से हताश किसान जब सल्फास की गोली गटककर जान दे देता है तो यह सवाल किसान के दरांती-हसिए की तरह हर बार झूलता दिखने लगता है। यहां तो अब शहादत का मोल मुआवजे में मिलने वाली रकम के साथ लगाया जाता है।

सरकारों में मुआवजे की रकम बढाने की होड़। गए साल इन्डिया गेट पर वन रैंक वन पेंशन के सवाल पर सल्फास की गोली खाने वाले उस रिटायर्ड फौजी की मौतपर जब केजरीवाल ने एक करोड़ रूपए की बोली लगाई तो परमवीरचक्रधारी भी चकित रह गए होंगे। ये कैसा अजीब चलन चल पड़ा है। कोई भी नीतिनियंता इस बात को लेकर चिंतित नहीं दिखता कि देश का इंटेलीजेंशिया फौज में जाना ही नहीं चाहता। सिविल सर्विसेस, कारपोरेट, और बैकिंग के बाद फौज का नंबर..। दरअसल हम बच्चों को हुक्काम और बड़ा थैलीशाह देखना चाहते हैं।

उच्चवर्ग की क्या कहें मध्यमवर्गीय स्कूलों में भी अब एनसीसी की शाखाएं नहीं रही। एनसीसी सैन्यजीवन का प्रवेशद्वार है। कितने भी अमीर,नौकरशाह और रसूखवाले मंत्री मनिस्टर हों यदि उनका बेटा एनसीसी कैडेट रहा है तो भले ही वह फौज की बजाय दूसरी वृत्ति में लगा हो वह भीड़ में अलग ही दिखेगा। बत्तीस दाँतों के बीच जीभ की तरह घिरा इजराइल आज इसलिए महान देश है क्योंकि हर नागरिक को सैन्यशिक्षा अनिवार्य है। यह शिक्षा सिर्फ़ युद्ध के लिए ही नहीं अन्य क्षेत्रों की श्रेष्ठता कायम रखने के काम आती है। आज इसराइल को कृषि, तकनीक समेत अन्य क्षेत्रों में श्रेष्ठता दिलाने वाले वहीं वैग्यानिक व विशेषज्ञ हैं जिनके जीवन में सैन्यशिक्षा ने संस्कार भरे हैं। हम ऐसा कर सकते हैंं।

अंग्रेजों के बाद पहली बार भारतीय सेना के संगठनात्मक ढ़ांचे को पुनर्गठित करने का निर्णय लिया गया है। रक्षामंत्री ने एनसीसी पर जोर देने की बात की है। हर नागरिक को अनिवार्य सैन्यशिक्षा न सही हर स्कूल चाहे वह दून ही क्यों न हो, एनसीसी की शिक्षा अनिवार्य कर दी जाए। यानी कि देश की ऐसी कोई भी स्कूल शेष  न बचे जहां प्रारंभिक सैन्यशिक्षा न दी जा रही हो..आप देखेंगे कि बदलाव किस तेजी से आता है। शहीदों के गाँव ..चूँद..का जज्बा गांव गांव, कस्बे कस्बे, शहर शहर में होना चाहिए..। नहीं तो जिस दिन गांव का किसान पूछने लगेगा  वह ही अपने बेटे को सरहद में लड़ने के लिये क्यों भेजे, तो आपके पास कोई जवाब नहीं सूझ पाएगा। और हाँ…याद रखिए फौज किसी दौलत से खरीदी नहीं जा सकती।

लेखक जयराम शुक्ला मध्य प्रदेश के वरिष्ठ पत्रकार हैं. उनसे संपर्क 8225812813 के जरिए किया जा सकता है.

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