अभिषेक श्रीवास्तव-
पुलिस वालों में देहयष्टि और स्टाइल का शौक मेरे खयाल से दबंग (2010) आने के बाद अचानक बढ़ा था। सिंघम (2011) के बाद इसमें तेजी आई। कई शहरों के कप्तानों को सिंघम, लेडी सिंघम के नाम से पुकारा गया। सबकी मूंछ एक ही जैसी, सबका तेवर और एविएटर चश्मा एक जैसा। यहां तक कि दिल्ली पुलिस के आम सिपाही तक बढ़िया तलवारी मूंछ रख के, पेट अन्दर कर के, सिंह की चाल में चलने लगे, एनफील्ड पर तन कर घूमने लगे।

पुलिसिया फिल्मों की क्रेज को देखते हुए रोहित शेट्टी ने कॉप यूनिवर्स नाम से फ्रेंचाइजी ही बना लिया। इसके बावजूद, नए दौर की कॉप प्रधान फिल्मों में राजनीतिक या धार्मिक नैरेटिव अब तक नहीं डाला गया था। केवल नायकीय दबंगई के गौरवगान और भ्रष्टाचार, गुंडई आदि के खात्मे और शुद्ध मनोरंजन तक सारे कथानक सीमित थे। “सिंघम अगेन” इस मामले में बेहद खतरनाक फिल्म है और एक विक्षेप है। रोहित शेट्टी जैसे चालू फिल्मकार को अगर राजनीतिक लाइन पर कहानी बुनना आ जाए, तो तबाही से कम कुछ भी पैदा नहीं होगा।
अद्भुत ढंग से “सिंघम अगेन” बनाई गई है। शेट्टी ट्रेडमार्क मनोरंजन और छिछोरापन अपनी जगह, लेकिन पूरी पुलिसिया कहानी को तकरीबन फ्रेम दर फ्रेम, सीक्वेंस दर सीक्वेंस, रामलीला के समानांतर बुनना, सिंघम ब्रांड पुलिस को राम दिखाना और उसकी पत्नी को सीता दिखाना, और इस बहाने रामकथा के अहम अध्यायों व भौगोलिक पड़ावों की जानकारी को किसी तथ्य की तरह पेश करना दिलचस्प प्रयोग है जो संक्रामक होने की क्षमता रखता है।
पूरी फिल्म देख कर लगता है कि पुलिस स्टेट को रामायण की कथा के सहारे नैतिक और धार्मिक वैधता दिलवाई गई है। न्यायपालिका और फेडरलिज्म को आदर्श पुलिस स्टेट की राह में रोड़ा बताया गया है। सर्जिकल स्ट्राइक जैसे कॉन्सेप्ट को लोकल पुलिस पर लागू किया गया, फिर बानर सेना के लंका पर हमले से तर्ज बैठकर उसे वैधता दिलवाई गई। ज्यादा खतरनाक यह है कि लोकल का दायरा कश्मीर तक फैला दिया गया है। दबंग और सिंघम ब्रांड पुलिस को अब एकाध जिले में नहीं, पूरे देश में स्वीकार्यता मिल चुकी है और शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व का वरदहस्त प्राप्त है। सिंघम किसी ऑब्लिगेशन को तरह यह डायलॉग कहता है कि हम भले सम्मान गांधी का करते हैं लेकिन पूजते शिवाजी को ही हैं।
इसे देखते हुए याद आया कि 2023 में एक फिल्म आई थी “बवाल”। वह भी प्रयोग के मामले में ऐसी ही थी, लेकिन सिनेमाघरों के बजाय ओटीटी पर रिलीज हुई थी। उसमें कथानक को इस तरह रचा गया था कि उसमें दूसरे विश्व युद्ध, नाजी जर्मनी और हिटलर के यहूदी विरोधी उत्पीड़न की पूरी कहानी अपने आप आ गई थी। यहां तक कि दर्शक को आश्वित्ज कैंप तक की सैर फिल्मकार ने करवा दी थी और पूरी प्रेम कहानी को नाजी यातना के समानांतर ऐसे बुना गया था कि किताब पढ़े बगैर कोई पांचवीं का बच्चा नाजीवाद को आसानी से समझ जाए।
इस फिल्म की चर्चा तो दूर, इजरायली एम्बैसी ने बाकायदा इसके निर्माताओं को नोटिस जारी किया, भारत सरकार से अपना एतराज जताया और प्रेस विज्ञप्ति जारी कर के बवाल में नाजीवाद के संदर्भ के सरलीकरण का विरोध किया। मुझे समझ ही नहीं आया कि जिनके ऊपर अत्याचार हुआ था और जो खुद होलोकास्ट के मारे हैं, उन्हें काहे को आपत्ति होने लगी एक ऐसी फिल्म से जो होलोकास्ट की भयावहता को एक साधारण प्रेम कथा से सफलतापूर्वक दिखला पाई है।
“बवाल” इस दौर की एक अच्छी फिल्म थी, शिक्षाप्रद फिल्म थी और अंत तक आते-आते काफी गंभीर हो गई थी। जिस त्रासद ऐतिहासिक अध्याय को अभी सौ साल भी नहीं हुए, उससे पैरलल बैठा के एक स्वस्थ कहानी रचना इजराइल को रास नहीं आया। इसके उलट, रामकथा के मिथक से पैरलल बैठा कर पुलिस स्टेट के समर्थन में बनाई गई एक छिछोरी फिल्म “सिंघम अगेन” 2024 की तीसरी सबसे कमाऊ फिल्म बन गई! और इस पर तो कोई बात ही नहीं हुई, नोटिस या आपत्ति तो दूर!
अगर इजराइल बॉलीवुड की फिल्म देख कर आपत्ति कर सकता है, तो हम क्यों नहीं? क्या कर रहे हैं फिल्म आलोचक? संकट ये है कि हम लोग घटिया या सस्ता मान के इन फिल्मों को देखते ही नहीं। फिर जब यूपी के सम्भल में डीएसपी का इंटरव्यू लेने गए एक पत्रकार की टांग तोड़कर पुलिसवाले लौटा देते हैं तो हमें इसके पीछे का तर्क नहीं समझ आता। पुलिस सुनियोजित एनकाउंटर करती है और जनता उस पर फूल बरसाती है, ये भी समझ नहीं आता। गूगल पर “सिंघम पुलिस” खोज के देखिए, हर जिले में आपको एक रियल लाइफ सिंघम मिल जाएगा और उसकी तारीफ में खबर लिखी गई होगी।
अब फर्ज करिए कि थोक भाव में बीते डेढ़ दशक में पैदा हुए ये सिंघम अपनी ज्यादतियों की नैतिक आधार पर तुलना रामायण से करने लग जाएं तो क्या होगा! किसी साहसी और दबंग लोकल दरोगा या कप्तान को सिंघम कहना या मानना कभी बुरा नहीं था, भले फिल्मी हो। जब सिंघम का चरित्र एक मिथकीय कथा की राजनीति और नैतिकता को ओढ़ कर भगवान बनने की कोशिश करने लग जाए और यह परिघटना लोकल से राष्ट्रीय बनने लगे, तब चिंता स्वाभाविक है।
अगर आप अपने समाज, मोहल्ले, गांव, कस्बे में रोजाना प्रशासनिक तंत्र के साथ काम करते हैं तो आपको निश्चित रूप से पुलिस स्टेट की आहटें सुनाई दे रही होंगी। अगर आप चिंतित हैं, तो कॉप वाली घटिया हिंदी फिल्में देखिए और इस बीमारी की जड़ पर प्रहार करिए। ऐसी फिल्में आदमी को मनबढ़ बनाती हैं, मनबढ़ को दबंग और दबंग को जंगली, बर्बर। लेकिन देखेंगे नहीं, तो जानेंगे कैसे?



