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आज के अखबार : एसआईआर के पक्ष में माहौल बनाते लग रहे हैं, कपिल सिबल के धारदार तर्क ‘गायब’ हैं

संजय कुमार सिंह

सुप्रीम कोर्ट में कल एसआईआर पर हुई चर्चा की खबर के जरिए आज मेरे ज्यादातर अखबार एसआईआर के पक्ष में माहौल बनाते लग रहे हैं। प्रचारकों ने एक प्रचार यह भी किया है कि दिल्ली का प्रदूषण कम हो गया। कुल मिलाकर मामला यह है कि जब प्रदूषण बढ़ता है तब खबर नहीं होती है या छोटी होती है जब कम हो गया, प्रधानमंत्री कार्यालय के सक्रिय होने का प्रचार हुआ तो आज यह बता दिया गया है कि दिल्ली की हवा बेहतर हुई और ग्रैप तीन के जो प्रावधान लागू किए गए थे, वापस ले लिए गए हैं। आज के अखबारों की खबरों से मैं यह बताने की कोशिश करूंगा कि ज्यादातर शीर्षक एसआईआर के पक्ष में हैं जबकि कपिल सिबल ने इससे हो रही समस्याओं और इसकी वैधता से संबंधित कई तथ्य बहुत गंभीरता से रखे। संयोग से कल मैंने यू ट्यूब पर वीडियो देखा था इसलिए आज खबरों का इंतजार कर रहा था। वीडियो देखकर मैं यही उम्मीद कर रहा था कि अखबारों में कपिल सिबल के तर्क अंदर के पन्नों पर हों तो हों, पहले पन्ने पर नहीं होने वाले हैं लेकिन सुप्रीम कोर्ट की टिप्पणी पहले पन्ने पर होगी इसका अनुमान मुझे कल रात तक की खबरों से नहीं था। इस लिहाज से आज की खबरें दिलचस्प हैं। इंडियन एक्सप्रेस की लीड का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने पूछा क्या आधार वाले किसी घुसपैठिए को वोट देने की इजाजत दी जा सकती है? उपशीर्षक है – मुख्य न्यायाधीश के नेतृत्व वाली पीठ ने कहा, अगर मामला सामने आता है तो चुनाव आयोग को हमेशा यह निर्देश दिया जा सकता है कि मतदाता सूची का मसौदा प्रकाशित करने की अंतिम तिथि बढ़ाई जाए।

यहां मुझे बिहार में एसआईआर के दौरान मृत बताकर हटा दिये गए मतदाताओं का मामला याद आता है। मुझे पता नहीं है कि कानूनी स्थिति क्या है और उस मामले में क्या हुआ, किसी के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई या नहीं। अभी भले ही यह मुद्दा न हो लेकिन तथ्य है कि आम आदमी को अगर मृत बताकर मतदाता सूची से हटा दिया जाए तो उसके लिए इसे चुनौती देना भी मुश्किल होगा और उसकी कोई सुनेगा इसकी संभावना बहुत कम है। इसके अलावा, अगर मतदान ही नहीं हो पाया तो एसआईआर का जो असल ‘मकसद’ बताया जा रहा है वह तो पूरा हो ही जाएगा। एक-एक व्यक्ति शिकायत नहीं कर पाए, लेकिन राजनीतिक दल अगर ऐसा बड़े पैमाने पर करें तो उसे रोका जाना चाहिए और मैं नहीं कह सकता कि सुप्रीम कोर्ट को चीजों को समग्रता में देखना चाहिए। क्योंकि कानूनन शायद यह संभव नहीं हो। वैसे भी, कल कपिल सिबल का तर्क यही था कि मतदाता सूची में नाम दर्ज करने का काम समावेशी होना चाहिए। मकसद लोगों के नाम शामिल करना होना चाहिए, निकालना नहीं। जहां तक घुसपैठिये के पास आधार होने या उसके मतदाता होने की बात है – सिबल ने यह भी कहा कि नियमानुसार सामान्य निवासी मतदाता होता है। उसका पता, उम्र आधार समेत अन्य दस्तावेजों से जांचा जा सकता है और उसकी नागरिकता तय करना बीएलओ का काम नहीं है। जो पहले से मतदाता है उसपर शक क्यों और शक है तो शक करने वाले को साबित करना होता है। उसकी प्रक्रिया है और ऐसे लोगों को बाकायदा हटाया जा सकता है उसके लिए नाम हटाने वाले एसआईआर की जरूरत ही नहीं है। यही नहीं, तमाम लोगों के नाम बिना आधार, बिना शक, बिना शिकायत हटाए गए हैं और ऐसे लोग वोट नहीं दे पाए। दूसरी ओर दिल्ली में वोट देने वालों ने बिहार में वोट दिए, खुद बताया पर कार्रवाई भी नहीं हुई। सिस्टम, कानून का पालन और डर ऐसा होना चाहिए था कि यह संभव ही नहीं होता पर ऐसा हुआ और कार्रवाई की खबर नहीं है। ऐसे में एसआईआर का मकसद ही कुछ और समझा जा रहा है पर वह कोर्ट में मुद्दा नहीं हो सकता है। मामला समग्रता का है।

द हिन्दू में भी आज एसआईआर की खबर लीड है। शीर्षक है – चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट से कहा, केरल एसआईआर में कोई समस्या नहीं है। उपशीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा कि राज्य चुनाव आयोग के साथ तालमेल कर रहा है, मानव संसाधन की कमी से इनकार किया; केरल सरकार ने यह कहते हुए सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है कि एक साथ एसआईआर और स्थानीय निकाय के चुनाव लगभग असंभव होंगे। कहने की जरूरत नहीं है कि सरकारी कर्मचारी एसआईआर और स्थानीय निकाय चुनाव में लगा दिए जाएं तो बाकी काम प्रभावित होंगे। ऐसा हो ही नहीं सकता है कि राज्य सरकार के इतने कर्मचारी फालतू हों कि दोनों काम एक साथ हो जाए। पर दबाव डालकर, धमकी देकर करवाया जा सकता है और उसका असर देश भर में देखा गया है। कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई, आत्महत्या तथा मौत के साथ इस्तीफे की भी खबरें हैं। अगर प्राथमिकता एसआईआर ही हो तो नोएडा में मुख्य चुनाव आयुक्त की बेटी ने सरकारी कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई का रिकार्ड बनाया है और चुनाव आयोग के आंकड़ों के ही अनुसार उत्तर प्रदेश में यह काम सबसे पीछे है। कारण जो हो, मामला एसआईआर की जरूरत का है और सुप्रीम कोर्ट में बात उसी पर होगी जो मुकदमा है। लेकिन खबरों से माहौल बनाया जा सकता है। नैरेटिव तो बनाया जाता रहा है और हेडलाइन मैनेजमेंट कोई नया नहीं है। यह सब पार्टी अपनी राजनीति से करती तो एक बात थी। विज्ञापन और सत्ता की ताकत से कर रही है तो अखबारों को चीजों को समग्रता में पेश करना चाहिए और नहीं कर रहे हैं तो पाठकों को इसे समझना चाहिए। मेरी कोशिश बस इतनी सी है।

टाइम्स ऑफ इंडिया की लीड का शीर्षक है – सुप्रीम कोर्ट ने कहा, चुनाव आयोग को एसआईआर करने का अधिकार है अगर जरूरत हुई तो हम गलतियों को ठीक करेंगे। इंट्रो है, सिबल ने पूछा मतदाताओं से फॉर्म भरने के लिए क्यों कहा जाए। कहने की जरूरत नहीं है कि शीर्षक के लिहाज से यह खबर पुरानी है और चुनाव आयोग के अधिकार की बात तो तब होनी चाहिए जब चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति नियमानुसार और सामान्य हो। इससे संबंधित मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है और तारीख पे तारीख का आम मामला भी नहीं है। फेट अकम्पली हो चुका है फिर भी यह शीर्षक होना सामान्य रिपोर्टिंग नहीं है। खासकर तब जब इंट्रो है, सिबल ने पूछा मतदाताओं से फॉर्म भरने के लिए क्यों कहा जाए। मैं जानता हूं कि सुप्रीम कोर्ट की रिपोर्टिंग के लिए कानून पढ़ा होना चाहिए और टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर उसके सीनियर रिपोर्टर की है। फिर भी मामला प्रस्तुति का तो है ही जो डेस्क पर किसी नवसिखुए का भी किया हो सकता है। इसलिए मामले को समग्रता में देखा-समझा जाना चाहिए। अगर मैंने कपिल सिबलको ठीक समझा तो उनका कहना था कि देश में लाखों लोग जब अशिक्षित और निरक्षर हैं तब जो मतदाता सूची में पहले से हैं उन्हें फॉर्म भरकर देने के लिए क्यों कहा जाए। वह भी दो प्रतियों में। निरक्षरों की अपनी समस्या है तो मेरे जैसे लोगों के लिए अलग। मेरे लिए दो प्रतियों में फॉर्म भरना टेढ़ी खीर रही और मुझे इसकी तैयारी करने में काफी समय लगा। दिया नहीं है कि खुद कंप्यूटर से कर लूंगा। एक बार नहीं कर पाया। फिर कोशिश करनी है। मुझे लगता है कि जब मेरा नाम जमाने से मतदाता सूची में है, उम्र के अलावा कुछ बदला नहीं है। बच्चे बड़े हुए तो उनका नाम जुड़ गया। फिर मुझसे फॉर्म भरने के लिए क्यों कहा जा रहा है और अगर नहीं भर कर दूं तो नाम काटने का मतलब? मैं घुसपैठिया हो जाउंगा या मर जाउंगा। अगर फॉर्म नहीं भर पाया तो चुनाव कब होंगे, मुझपर मतदाता सूची में अपना नाम देखते रहने का एक अतिरिक्त बोझ नहीं लद जाएगा? हालांकि, जब नाम हटाए गए हैं तो फॉर्म भरने के बाद भी देखते रहना पड़ेगा। यह लोकतंत्र की हालत बना दी गई है और मीडिया बता रहा है कि सब सामान्य (या जरूरी) है।

द टेलीग्राफ में यह खबर पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन अंदर होने की सूचना है। अंदर के पन्ने पर यह दो कॉलम की लीड है। शीर्षक है, सुप्रीम कोर्ट ने एसआईआर पर चुनाव आयोग से जवाब मांगा। फ्लैग शीर्षक है – अदालत ने कहा : मतदाताओं के नाम हटाने का डर निराधार है। खबर के अनुसार, यह एसआईआऱ को टालने की मांग करने वाली याचिकाओं के संबंध में है। कहने की जरूरत नहीं है कि मतदाताओं के नाम हटाये गए हैं। बिहार में ऐसी खबरें थी और संख्या से भी यह साबित होता है। लेकिन चुनाव आयोग कहता रहा कि किसी ने कोई शिकायत नहीं की है। जैसा मैंने पहले कहा है, आम आदमी की शिकायत कौन सुनता है और अगले चुनाव में सुन भी लिया जाए तो खेल हो ही रहा है। चुनाव आयोग ने दलील दी है कि उसके पास शिकायत नहीं आई इसलिए सब ठीक है। कहने की जरूरत नहीं है कि शिकायत करना आसान नहीं है। और शिकायत करने की जरूरत ही क्यों पड़े जब चुनाव आयोग का काम यह भी है कि कोई वोटर छूटे नहीं। द टेलीग्राफ की खबर के अनुसार, सिबल ने कहा कि कुछ लोगों को मृत घोषित कर दिया गया था और पहले की सुनवाई में उन्हें कोर्ट में पेश किया जा चुका है। हालांकि, इसपर बेंच ने कहा कि चुनाव आयोग की संवैधानिक जिम्मेदारी है कि मृत वोटर को हटाए। कहने की जरूरत नहीं है कि एक मतदाता के नाम कई बार होने की शिकायत पर दलील दी जाती है कि पार्टियों के चुनाव एजेंट उन्हें रोक सकते हैं, एक व्यक्ति दो बार कैसे वोट देगा आदि। अगर इस तर्क को मान लिया जाए तो मृत वोटर को हटाना क्यों जरूरी है। और है तो एक वोटर के नाम एक से ज्यादा बार क्यों हैं? इसे रोकने के लिए चुनाव आयोग सॉफ्टवेयर का उपयोग क्यों नहीं कर रहा है? मृत वोटर वोट कैसे देगा, एजेंट क्या करेंगे और पहचान पत्र कैसे आएगा आदि आदि। मुझे लगता है कि एसआईआर को टालने की मांग इन कारणों से की गई है पर सुनवाई कानूनी आधार पर की जा रही है।  

आज हिन्दुस्तान टाइम्स, दि एशियन एज, नवोदय टाइम्स और अमर उजाला में एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट में कल हुई सुनवाई पर कोई खबर पहले पन्ने पर नहीं है। माना जा सकता है कि इनके लिए यह इस लायक मुद्दा नहीं है और इसलिए इनकी इतनी ही चर्चा पर्याप्त है। देशबन्धु में यह खबर तीन कॉलम में है। शीर्षक है, एसआईआर पर सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग से जवाब मांगा। हाईलाइट किया हुआ अंश है – एक दिसंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा। उपशीर्षक है – केरल पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु में एसआईआर को चुनौती दी गई है। इसके साथ पश्चिम बंगाल की ओर से पेश वकील कल्याण बनर्जी के हवाले से छपी एक खबर का शीर्षक है, अब तक 23 बीएलओ की मौत। खबर से यह पता नहीं चल रहा है कि ये मौतें सिर्फ बंगाल में हुई हैं या देश भर में। टाइम्स ऑफ इंडिया में अंदर छपी खबर के अनुसार, मुख्य न्यायाधीश ने बिहार का उल्लेख किया, कहा जमीन पर कोई प्रभाव नहीं है। इंट्रो है, सिबल ने कहा, बीएलओ को मतदाता की नागरिकता जांचने का कोई अधिकार नहीं है। यह अखबार के पहले पन्ने की खबर का विस्तार है। इसके अनुसार सिबल ने कहा कि ऐसा (एसआईआर जैसा) काम देश में पहले कभी नहीं किया गया है। इस संबंध में योगेन्द्र यादव एक पुराने दस्तावेज का हवाला देते हैं जो चुनाव आयोग नहीं दे रहा है और यादव के अनुसार कह चुका है कि उपलब्ध नहीं है और इस आड़ में मनमानी कर रहा है जबकि उनके पास पुराना दस्तावेज है जिससे साफ होता है कि ऐसा पहले कभी नहीं हुआ है। खबर के अनुसार, न्यायमूर्ति जॉयमाल्या बागची ने कहा कि यह रिकार्ड में है कि 2012 और 2014 में मतदाताओं की संख्या वयस्क आबादी से ज्यादा हो गई थी। ऐसे में क्या मतदाता सूची को ठीक करने की जरूरत नहीं है। जाहिर है कि इससे इनकार नहीं किया जा सकता है लेकिन ऐसा कैसे हुआ, कौन जिम्मेदार है और उसके खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं होनी चाहिए। फर्जी वोट के जरिए वोट चोरी का राहुल गांधी का मामला साधारण नहीं है। हम जानते हैं कि सुप्रीम कोर्ट अनिल मसीहों और इलेक्टोरल बांड के मामले में कैसे आदेश देता रहा है। अभी वह मुद्दा नहीं है। अभी तो मुद्दा यह है कि बीएमसी की मतदाता सूची ऐसी ही है। तारीख को लेकर भी विवाद है। तमाम फर्जी वोटर हैं और वहां एसआईआर नहीं हुआ था पर चुनाव आयोग उसे ठीक करने में नाकाम रहा है। अभी तक यह पहले पन्ने की खबर नहीं है।  

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। चैट जीपीटी का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

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1 Comment

1 Comment

  1. Kaushal Kishore

    November 28, 2025 at 2:05 am

    You are a liar and playing victimhood in the name of poor people of india. Today not a single person is idiot like u said who are unable to fill a form if they really want and will not raise questions if deletion is wrong, they will . But u and likes u wants that all ilegal bangladeshi, Rohingyas and pakistani muslims becomes citizens of india that suits ur left ecosystem so that india can be destroyed by help of these radicalised jihadis . I wish first mamta government replace by bjp government in west bengal so that further expulsion of these people from Bengal and all gates closed by government fully and that safe path finally closed which is wide opend by left and mamta government from decades.

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