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सियासत

स्मृति ईरानी को लोकसभा में महिषासुर प्रसंग पर चुप करा देने वाले कॉमरेड सीताराम येचुरी को अलविदा!

संजीव चंदन-

कॉमरेड सीताराम येचुरी ने कई ऐसे मौकों पर हमारा साथ दिया है, जब या तो कोई नहीं या बेहद कम लोग साथ थे।

2016 में स्मृति ईरानी ने जब जेएनयू के एक पोस्टर को लहराते हुए महिषासुर प्रसंग पर लोकसभा में हंगामा किया, लोकसभा में वामपंथी नेताओं को भी चुप करा दिया था, तब हम कोई नेता ऐसा चाहते थे जो राज्यसभा में पूरे माहौल को बदल दे। शरद जी भी तैयार नहीं हुए थे तब। चलते राज्यसभा में हमारे एसएमएस के बाद येचुरी साहेब तैयार हुए और हमारी कुछ कच्ची-पक्की सूचनाओं के आधार पर भी, खूब शानदार भाषण दिया।

अटल जी, इंदिरा गांधी और कॉमरेड डांगे प्रसंग में अरुण जेटली ने उन्हें घेरने की कोशिश की। हमने प्रेमकुमार मणि की मदद से डांगे प्रसंग के बारे में उन्हें जानकारी दी। मामला स्पीकर के चैंबर में सुलझा था।

महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय के तत्कालीन कुलपति विभूति राय के खिलाफ हमारी लड़ाई में भी उन्होंने साथ दिया था। शिक्षा मंत्री के पास ले गए। इसके बावजूद कि राय को वामपंथी खेमों में, खासकर साहित्य सर्किल में समर्थन प्राप्त था। वे छात्र आंदोलन से आये थे,जानते थे विद्यार्थियों का संघर्ष।

हमारे द्वारा आयोजित कुछ आयोजनों में भी येचुरी साहेब सहजता से आते रहे। खासकर, भारत के राजनेता सीरीज की किताबों पर बातचीत के क्रम में।

वामपंथ के एक महत्वपूर्ण स्तम्भ और व्यक्तिगत तौर पर एक ‘अकुंठ’ व्यक्ति का चले जाना, इस राजनीतिक शोर के समय में दुखद है, इसकी कोई भारपाई नहीं। कोरोना में उन्होंने अपने बेटे को खोया था। मानसिक आघात व्यक्ति को तोड़ देता है।

वामपंथी पार्टियों के सिमटते जाने के दौर में उनकी महासचिव के रूप में भूमिका का मूल्यांकन शेष है, सम्यक मूल्यांकन होना चाहिए। अलविदा कॉमरेड!

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