Connect with us

Hi, what are you looking for?

Local News Community

प्रिंट

आज के अखबार : सोशल मीडिया पर घोषणा सबसे बड़ी खबर है तो उसके ‘निर्माण’ की क्रोनोलॉजी भी समझिए!

संजय कुमार सिंह

दिन में संसद में हंगामा, रात में अमेरिका से करार की घोषणा। अभी भी कई बातें एकतरफा। लेकिन इसे महत्व मिला है क्योंकि सरकार अनुकूल खबरें ही छपने देती है। वरना जनरल नरवणे की किताब के जिस अंश को संसद में पढ़ने नहीं दिया गया वह एक सामान्य खबर है और तभी छप गई होती तो अब इतना बड़ा मुद्दा नहीं बनता। लेकिन खबर नहीं छपेगी तो किताब के लिए मसाला बनेगी और किताब छपने से रोक दी जाएगी तो उसके अंशों पर चर्चा होगी ही। उसे उद्धृत किया ही जाएगी। इस लिहाज से सरकार इस मामले में फंस चुकी थी। पढ़ने देती तो जो पढ़ा जाता उसकी चर्चा होती। नहीं पढ़ने देने से भी उसकी चर्चा हो ही रही है। यह अलग बात है कि प्रचारक मुद्दे को घुमा रहे हैं और फालतू बातें कर रहे हैं। अभी मुद्दा तो यही है कि सरकार सेना प्रमुख की किताब छपने नहीं दे रही है, उसका अंश सिर्फ कारवां में छपा और संसद में उसकी चर्चा नहीं होने दी गई।   

अमृतकाल आने से पहले संसद में हंगामे की खबर अगले दिन अक्सर अखबारों की लीड होती थी। आज संसद में हंगामे की खबर कई अखबारों में पहले पन्ने पर नहीं है। इसका कारण अघोषित इमरजेंसी का विरोध नहीं है ना ही अखबारों ने इमरजेंसी के समय के इंडियन एक्सप्रेस की तरह जगह खाली छोड़कर यह बताने की कोशिश की है खबर सेंसर हो गई और जगह भरने के लिए कुछ है ही नहीं। आज संसद की खबर पहले पन्ने पर नहीं है तो उसका कारण दूसरी महत्वपूर्ण खबरें है। अमर उजाला की लीड का शीर्षक है, अमेरिका से व्यापार समझौते पर सहमति भारत पर टैरिफ अब 50 से घटकर 18 प्रतिशत। अमर उजाला ने संसद में हंगामे की खबर को भी महत्व दिया है और यह सेकेंड लीड है। शीर्षक है, नरवणे की बिन छपी किताब पर संसद में राहुल सरकार में ठनी। मुझे लगता है कि बिन छपी किताब गैर जरूरी है और तकनीकी मामला है। बिन छपी की जगह हिन्दी में पांडुलिप के अंश कहा जाता तो तथ्यों के करीब होता। हालांकि अब तो पांडुलिपि भी घरेलू प्रिंटर पर छपी हुई ही होती है जो बहुत पहले हाथ का लिखा और फिर टंकित हुआ करता था। लेकिन यह अलग मुद्दा है। इस संबंध में संसद के नियमों के हवाले से खबर या शीर्षक की बात हो तो संसद में गालियां दी गई हैं और रोकना तो छोड़िए संबंधित सांसद के खिलाफ किसी कार्रवाई की सूचना नहीं है पर वह अलग मुद्दा है। मध्य प्रदेश के एक मंत्री द्वारा सेना और सेना की महिला अधिकारी के बारे में अपमानजनक बात कहने पर अदालत के स्वतः संज्ञान लेने पर संबंधित जज के तबादले की खबर है। उससे पहले और बाद के कई उदाहरण हैं लेकिन वह सब चर्चा का मुद्दा नहीं है।

आज की लीड पर चर्चा जरूर हो सकती है। खबर यही है कि अमेरिका ने भारत पर लगा टैरिफ घटाया। यह देशबन्धु में तीन कॉलम की खबर है। टाइम्स ऑफ इंडिया, द हिन्दू में यह लीड है लेकिन हिन्दुस्तान टाइम्स और इंडियन एक्सप्रेस में यही खबर बैनर है जबकि द टेलीग्राफ में सात कॉलम में है। संसद में हंगामे की राहुल गांधी से संबंधित खबर द टेलीग्राफ में पहले पन्ने पर नहीं है लेकिन दिल्ली में चुनाव आयोग पर ममता बनर्जी की गतिविधियों की खबर है। देशबन्धु में संसद में हंगामे की खबर लीड है और शीर्षक है, मोदी सरकार डरी, बोलने नहीं दे रही : राहुल। देशबन्धु ने दिल्ली में ममता बनर्जी के प्रदर्शन की खबर का शीर्षक भी ममता बनर्जी के हवाले से लगाया है, हमने इतना झूठा चुनाव आयुक्त नहीं देखा। टाइम्स ऑफ इंडिया में अधपन्ने पर वित्त मंत्री के हवाले से छपी खबर लीड है। खबर यह है कि सरकार की व्यय प्राथमिकताओं की पूर्ति के लिए टैक्स आधार का विस्तार किया जाएगा। यह वित्त मंत्री के साथ अखबार के साक्षात्कार में कहा गया है और वित्त मंत्री ने यह भी कहा है कि उठाए गए कदम से निवेशकों को भारत की ओर आकर्षित करने में मदद मिलेगी। नवोदय टाइम्स में लीड का शीर्षक है, भारत-अमेरिका में व्यापार समझौता, टैरिफ अब 18 प्रतिशत। दि एशियन एज में भारत, अमेरिका के व्यापार करार पर सहमत होने की ट्रम्प की घोषणा लीड है तो संसद में हुआ हंगामा टॉप पर तीन कॉलम में है। ममता बनर्जी, चुनाव आयोग की खबर सेकेंड लीड है। इसका शीर्षक ममता बनर्जी का आरोप है, दिल्ली पुलिस मुझे परेशान करने की कोशिश कर रही है। अखबार ने लिखा है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के साथ मुख्यमंत्री की मीटिंग हंगामी हो गई और बंग भवनों पर शक्ति प्रदर्शन शुरू। 

आइए, अब देखें, अमेरिका के साथ व्यापार करार पर सहमति की खबर कैसे बनी, क्रोनोलॉजी समझिए। हिन्दुस्तान टाइम्स ने लिखा है, फोन कॉल का पहला ज़िक्र अमेरिकी राजदूत सर्जियो गोर ने रात 9.16 बजे एक सोशल मीडिया पोस्ट के ज़रिए किया। इसके एक घंटे से भी ज़्यादा समय के बाद ट्रम्प ने ट्रुथ सोशल पर एक लंबी पोस्ट की और फिर लगभग दो घंटे बाद प्रधानमंत्री ने एक सोशल मीडिया पोस्ट की। टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर है, महीनों के तनावपूर्ण व्यापार संबंधों के बाद, भारत और अमेरिका ने सोमवार को एक द्विपक्षीय व्यापार समझौते की घोषणा की। इसके तहत वॉशिंगटन भारतीय आयात पर अतिरिक्त टैरिफ को मौजूदा 50% से घटाकर 18% कर देगा। इससे यह कपड़ा, चमड़ा और समुद्री खाद्य पदार्थों के निर्यातकों के लिए अधिक प्रतिस्पर्धी हो जाएगा। टाइम्स ऑफ इंडिया ने मूल खबर की खास बातों को हाईलाइट किया है और यह अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प की पोस्ट के साथ प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की पोस्ट के खास अंश हैं। इसका शीर्षक है, प्रधानमंत्री मोदी के जवाब में रूसी तेल या अमेरिकी सामानों पर शून्य टैरिफ का कोई उल्लेख नहीं है – तस्वीर देखिए। द हिन्दू का उपशीर्षक है, प्रधानमंत्री के साथ फोन पर बातचीत के बाद अमेरिकी राष्ट्रपति ने कहा कि दोनों देशों ने व्यापार सौदे पर सहमति जताई है और भारत रूस से तेल खरीदना बंद कर देगा। द टेलीग्राफ की खबर इस तरह शुरू होती है, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोमवार को भारत के साथ एक ट्रेड डील की घोषणा की। इसमें उन्होंने अपनी टैरिफ को 25 प्रतिशत से घटाकर 18 प्रतिशत करने पर सहमति जताई और नई दिल्ली से बड़ी रियायतें मिलने का दावा किया। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने जवाब में टैरिफ में कटौती की पुष्टि की, लेकिन इसके अलावा ज़्यादा कुछ नहीं कहा। अमेरिकी दूतावास के एक प्रवक्ता ने कहा कि रूस से तेल खरीदने के लिए अमेरिका द्वारा भारत पर लगाया गया 25 प्रतिशत का अतिरिक्त टैरिफ, भारत द्वारा रूस से तेल आयात बंद करने के वादे को देखते हुए हटा दिया जाएगा। प्रवक्ता ने कहा, “मैं पुष्टि कर सकता हूं कि अंतिम टैरिफ 18 परसेंट होगा।” खबर के अंत में लिखा है, दोनों नेताओं के बयानों में बड़े अंतर से सहमति की असली शर्तों पर सवाल उठते हैं। क्या भारत ने ज़ीरो यानी शून्य टैरिफ के लिए सहमति जताई है? क्या सच में 500 अरब डॉलर का खरीद समझौता हुआ है? क्या भारत पूरी तरह से रूसी तेल खरीदना बंद कर देगा? मोदी के जवाब में एक घंटे की देरी और ट्रंप के दावों की उनकी चुनिंदा पुष्टि से सहमति के पूरे दायरे के आसपास संभावित राजनयिक संवेदनशीलता या उनकी बातचीत के दौरान असल में क्या तय हुआ, इस पर असहमति का संकेत मिलता हैटाइम्स ऑफ इंडिया ने लिखा है कि यह घोषणा भारत और ईयू के बीच व्यापक व्यापार करार पर सहमति की घोषणा के छह दिन बाद हुई है।

उधर, किताब के अंश पढ़ने से रोकने के हर संभव उपाय किए गए। देशबन्धु की एक खबर के अनुसार, राजनाथ सिंह ने कहा कि राहुल गांधी संसद या सदन को गुमराह कर रहे हैं। उपशीर्षक है, राहुल के बयान की विश्वसनीयता पर सवाल उठाए। मुझे लगता है कि यह मानहानि का मामला है लेकिन संसद में ऐसे आरोपों के लिए कार्रवाई नहीं होने का नियम है। जब सदस्य को गाली देने के मामले में कार्रवाई नहीं हुई तो बाकी बातें बेकार हैं। दूसरी ओर, सरकार समर्थक 30 मार्च 2021 के किसी बयान के हवाले से प्रचार कर रहे हैं कि राहुल गांधी जानबूझकर भ्रम फैला रहे हैं। देश विरोधी हैं जबकि पुस्तक का अंश जो तथ्य और विवरण है, सरकार की देशभक्ति पर सवाल उठाता है। संभवतः इसीलिए परेशानी है। वैसे भी मुद्दा सरकार की देशभक्ति या राहुल गांधी के दावे या भ्रम फैलाने का नहीं है। मुद्दा यह है कि पूर्व सेनाध्यक्ष ने जो लिखा (किताब लिखने के नियम हैं और उसका पालन नहीं होने का कोई मामला नहीं है) फिर भी उसे प्रकाशित नहीं होने दिया गया है। रोड़े तो अटकाए ही गए हैं। काफी समय निकलने के बाद उसका अंश एक पत्रिका में प्रकाशित हुआ है जिसे संसद में पढ़ने नहीं दिया गया। मुझे विपक्ष के नेता की सूचना को संसद में रखे जाने से रोकना ही अटपटा लगता है पर मामला नियमों का है और सवाल यह है कि किताब का प्रकाशन क्यों नहीं होने दिया जा रहा है। खासकर तब जब नौकरी में रहते लिखी गई किताब  INDIA@100 की 10 हजार प्रतियां सरकारी बैंक खरीदने वाला था। आइए नियम भी देख लें। नियम  349 (i) के तहत: “जब सदन चल रहा हो, सदस्य कोई किताब, अख़बार या पत्र नहीं पढ़ सकता सिवाय उस विषय से सीधे संबंधित सामग्री के जो सदन के कामकाज का हिस्सा हो।” सरकार और सरकार की तरफ से बोलने वालों ने इसे संसद के औपचारिक उद्देश्यों से अलग बताया। हालांकि, देश की आंतरिक सुरक्षा पर बात हो रही थी और ‘संबंधहीन’ साबित करना मुश्किल है।

नियम 353 ‘मानहानि / आपत्तिजनक आरोप’ संबंधी प्रावधान है। इसके अनुसार, “कोई भी सदस्य ऐसा आरोप नहीं लगा सकता जो किसी व्यक्ति के खिलाफ मानहानिकारक / आरोपित हो, जब तक कि उसने पहले से स्पीकर और संबंधित मंत्री को पर्याप्त अग्रिम सूचना नहीं दी हो।” यह नियम आमतौर पर आरोप लगाने या दुर्भावनापूर्ण बयान देने को रोकने के लिए प्रयोग होता है, और संसद में यह भी कहा गया कि अगर आरोप सदन की गरिमा को चोट पहुँचाता है तो स्पीकर उसे रोक सकते हैं। सरकार / वक्ताओं ने इस नियम का संदर्भ देते हुए कहा कि बिना अनुमति किसी व्यक्ति / संदर्भ के गंभीर आरोप नहीं लगाये जा सकते। बीजेपी नेताओं ने संसदीय कार्यवाही में नैतिकता/प्रक्रिया का समर्थन करते हुए कहा कि बिना अनुमति उद्धरण नहीं दिया जा सकता, जबकि विपक्ष ने कहा कि यह राष्ट्रीय सुरक्षा पर प्रश्न था और उसे रोका गया। जो भी हो, खबर का जो हुआ वह कम नहीं है। और मेरी चिन्ता वही है। इसमें ममता बनर्जी का यह कहना कि दिल्ली पुलिस मुझे परेशान करने की कोशिश कर रही है और दिल्ली में बंगालियों के ठिकानों पर भारी पुलिस की उपस्थिति शामिल है। भारतीय लोकतंत्र के लिहाज से अपनी तरह की यह अनूठी और पहली खबर मोदी और ट्रम्प के बीच कथित सहमति की खबर के कारण दब गई। जो सब इतने समय से चल रहा था उसका कल अचानक खत्म होना भी मायने रखता है और हेडलाइन मैनेमेंट के बड़े खेल या योग्यता का उदाहरण हो सकता है। कल की घटनाएं बताती हैं कि नरेन्द्र मोदी अपनी योग्यता या लोकप्रियता के कारण नहीं, अपनी इस अद्भुत क्षमता के कारण प्रधानमंत्री बने हुए हैं। इसमें पैसे व प्रचार से बनी छवि और सत्ता का दुरुपयोग शामिल है। इसे जारी रखने की कोशिश और इसके लिए सत्ता पर कब्जा बनाए रखने तथा किसी भी तरह चुनाव जीतते जाना ही सरकार चलाना हो गया है। इसमें मीडिया और समाज का यह सहयोग शर्मनाक है।

मैं रोज तीन हिन्दी और छह अंग्रेजी, कुल नौ, कई बार इससे भी ज्यादा अख़बार देखकर उसकी खास बातें लिखता हूँ। अंग्रेजी की खबरों के खास अंशों का अनुवाद करता हूं। वह भी लिखता हूं जो अखबार नहीं लिखते या नहीं लिख सकते हैं। जो लिखता हूं उसमें बहुत कुछ याद से लिखा होता है। एआई का सहयोग होता है। कुछ अंग्रेजी अखबारों की खबरों का अनुवाद होता है। इसलिये भूल-चूक की आशंका है। कृपया कहीं उल्लेख करने या हवाला देने से पहले अपने स्तर पर पुष्टि कर लें।

Local News Community
Click to comment

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

भड़ास लीगल टीम : Bhadas Legal Team

भड़ास मेल: [email protected]

Latest 100 भड़ास

विज्ञापन