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आज के अखबार : स्पष्ट विज्ञापन और विपक्ष के दावे के बहाने स्पष्टीकरण से भ्रम फैलाने का खुला खेल

विज्ञापन स्पष्ट न हो, भ्रम फैलाये तो सरकारी पैसों की बर्बादी है। ऐसा खुलेआम नहीं किया जा सकता है। करने वाला नप जायेगा। लेकिन ‘भ्रम’ उससे फैला कहकर आवश्यक भ्रम फैलाया जा सकता है और वही होता नजर आ रहा है।  

संजय कुमार सिंह

दिल्ली के आठ-हिन्दी अंग्रेजी अखबारों में तीन ऐसे हैं जिनमें आज पहले पन्ने पर बिहार में मतदाता सूची के विशेष सघन पुनरीक्षण से संबंधित कोई खबर नहीं है। इनमें हिन्दी के दो, अमर उजाला और नवोदय टाइम्स हैं जबकि अंग्रेजी में हिन्दुस्तान टाइम्स है। असल में विपक्ष के दावे और चुनाव आयोग के स्पष्टीकरण में से कोई एक बाकी सभी अखबारों में है। आठ अखबार देखकर मैं वास्तविकता जान गया और खेल समझ रहा हूं। मुझे लगता है कि खबर यही थी कि चुनाव आयोग कैसे बिहार के मतदाताओं को परेशान किये हुए है और झका रहा है ताकि उनके नाम दर्ज न हो पायें या उसे दर्ज न करने का मौका-बहाना कुछ मिल सके। यह सब होने के बावजूद हिन्दुस्तान टाइम्स के लिए आज कोई खबर नहीं है तो मेरे लिए वह भी खबर है। दिल्ली के मेरे पांच अंग्रेजी अखबारों में हिन्दुस्तान टाइम्स अकेला है जिसके पहले पन्ने पर न तो विपक्ष का दावा है ना चुनाव आयोग का कथित स्पष्टीकरण। विज्ञापन तो यहां होना नहीं था हालांकि राज्य सरकारों के विज्ञापन दिल्ली में छपते रहे हैं। चुनाव आयोग ने जनता के पैसे की बर्बादी वैसे नहीं की है जैसे राज्य या केंद्र सरकार करती है। हिन्दी के तीन में से दो अखबारों में भी यह खबर नहीं है। इन आठ अखबारों के अलावा मैं कोलकाता का द टेलीग्राफ भी नियमित देखता हूं पर उसमें इस खबर के पहले पन्ने पर होने का कोई कारण नहीं है। हिन्दुस्तान टाइम्स में इन दोनों खबरों में से किसी का भी न होना इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि कल इसमें पूर्व मुख्य न्यायाधीश के बंगला खाली नहीं करने की खबर तो थी पर बिहार चुनाव में चुनाव आयोग की मनमानी से  संबंधित कोई खबर नहीं थी। अंदर के पन्ने पर चुनाव आयोग के आदेश को सुप्रीम कोर्ट में एडीआर की चुनौती से संबंधित खबर जरूर थी पर वह कुछ अखबारों में लीड भी थी। यही नहीं, हिन्दी के अखबारों के मुकाबले हिन्दुस्तान टाइम्स का मामला इसलिये भी अलग है कि पटना से इसका संस्करण निकलता है। तमाम शहरों में इसके संवाददाता होंगे जिला मुख्यालयों पर कार्यालय भी होंगे। 

इंडियन एक्सप्रेस की आज की खबर का शीर्षक है, मुख्य चुनाव आयुक्त ने मतदाता सूची पुनरीक्षण का बचाव किया, चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया। इस खबर का फ्लैग शीर्षक है, चुनाव आयोग ने कहा – मतदाता सूची का मसौदा एक अगस्त को जारी होगा, दस्तावेज 25 जुलाई से पहले कभी भी जमा कराये जा सकते हैं। इस खबर का एक उपशीर्षक है, स्थानीय अखबारों में बिहार के सीईओ के विज्ञापन से भ्रम फैलने पर चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण। जहां तक वास्तविक स्थिति का सवाल है, एक और शीर्षक है – न सिर्फ ईबीसी (आर्थिक रूप से पिछड़ा वर्ग) और अल्पसंख्यक, ऊंची जाति के लोगों में भी सब सामान्य नहीं है। इसी पन्ने पर इन खबरों के साथ एक और खबर का शीर्षक है, चुनाव आयोग के अनुसार (मतदाता सूची में नामांकन के लिए) फॉर्म बांटने का काम लगभग पूरा हो चुका है, 21 प्रतिशत ने भरे हुए फॉर्म दे दिये हैं। दूसरी ओर, देशबन्धु में सिंगल कॉलम की खबर का शीर्षक है, बढ़ते दबाव के बीच चुनाव आयोग ने कहा – बाद में भी दे सकते हैं दस्तावेज। वैसे तो देशबन्धु ने यह सूचना राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी के हवाले से कहा है लेकिन खबर दिल्ली डेटलाइन से है। इंडियन एक्सप्रेस ने स्पष्ट लिखा है कि चुनाव आयोग का स्पष्टीकरण स्थानीय अखबारों में बिहार सीईओ के विज्ञापन के बाद आया है। सीईओ के संबंधित विज्ञापन में स्पष्ट लिखा है, यदि आवश्यक दस्तावेज तथा फोटो उपलब्ध नहीं हो तो सिर्फ गणना प्रपत्र भरकर बीएलओ को उपलब्ध करा दें। विज्ञापन में आगे लिखा है, यदि आप आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध करा देते हैं तो निर्वाचक निंबंधन पदाधिकारी (ईआरओ) को आवेदन को प्रोसेस करने में आसानी रहेगी। इसके आगे एक और बिन्दु है, यदि आप आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं करा पाते हैं तो ईआरओ द्वारा स्थानीय जांच या अन्य दस्तावेज के साक्ष्य के आधार पर निर्णय लिया जा सकेगा। 

टाइम्स ऑफ इंडिया की खबर का शीर्षक है, बिहार की मतदाता सूची में नाम शामिल करने के लिए अधिकारी जमीनी जांच पर भी भरोसा कर सकते हैं। इस खबर का इंट्रो चुनाव आयोग के हवाले से है। इसके अनुसार, नागरिकता का सबूत 11 विनिर्दिष्ट दस्तावेजों तक सीमित नहीं है। लेकिन द हिन्दू की लीड का शीर्षक चुनाव आयोग के हवाले से है, बिहार में मतदाता सूची के संशोधन के लिये निर्देशों में कोई परिवर्तन नहीं। यहां भी वही उपशीर्षक है जो पहले कहा जा चुका है। हिन्दी में यह इस प्रकार होगा, अधिकारी ने कहा – राज्य सीईओ के विज्ञापन के बाद विपक्षी नेता जब यह कहने के लिए प्रेरित हुए कि चुनाव आयोग ने अपने पैर पीछे कर लिये हैं तो स्पष्टीकरण जारी किया गया है।  दि एशियन एज में इस खबर का शीर्षक है, विपक्ष के आरोपों के बीच चुनाव आयोग ने सघन मतदाता पुनरीक्षण के नियमों में ढील दी। सघन मतदाता पुनरीक्षण पर टीएमसी की महुआ मइत्रा ,सुप्रीम कोर्ट पहुंची। अन्या राज्यों में स्टे की मांग। मुझे लगता है कि चुनाव आयोग अपने ही जाल में उलझ गया है। राज्य चुनाव आयोग नियमानुसार काम कर रहा है लेकिन उसे यह दिखाना पड़ रहा है कि उससे जो कहा गया है वह वैसा ही करने की कोशिश कर रहा है। दोनों उसकी मजबूरी है और ठीक से चुनाव कराना मजबूरी। ऐसे में मीडिया का काम था वह मतदातों को आश्वस्त करता कि विज्ञापन वही है जो होना चाहिये। चुनाव आयोग ने भले विपक्षी नेताओं के कहे अनुसार कदम वापस नहीं लिये हों, सच्चाई यह है कि उसके पास ऐसी सख्ती करने का अधिकार ही नहीं है।   

सामान्य स्थितियों में इस विज्ञापन का वही मतलब है जो इसमें कहा गया है। इसमें भ्रम जैसी कोई बात नहीं है। विज्ञापन में यह भी लिखा है कि गणना प्रपत्र को ऑनलाइन भी भरा जा सकता है। स्वसत्यापित जरूरी दस्तावेजों के साथ ऑनलाइन आवेदन करें। जाहिर है कि बिहार में सभी लोगों के लिए यह संभव नहीं है और तकनीकी तौर पर मामला ठीक न हो तो अपलोड करना मुश्किल हो सकता है। और ऐसा हो तो वह अलग मामला होगा लेकिन अगर कोई स्वसत्यापित दस्तावेज अपलोड कर देता है तो मतदाता नहीं बनाने या मतदाता सूची में शामिल नहीं करने का कारण यह नहीं हो सकता है कि दस्तावेज नहीं थे। जो दस्तावेज है वह स्वसत्यापित है और आवेदन किया जाना भी स्वसत्यापित है। ऐसे में चुनाव आयोग किसी को मतदाता नहीं बनाये तो उसे हमेशा चुनौती दी जा सकेगी और मतदाता को यही करना चाहिये। लेकिन कथित भ्रम और उसे कथित तौर पर दूर किये जाने से लगता है कि चुनाव आयोग मतदाताओं को परेशान करने और जिसे चाहे उसे सूची में शामिल करने औऱ जिसे न चाहे उसे शामिल नहीं करने का अघोषित और अवैध अधिकार अपने पास रखना चाहता है तथा इस अधिकार का मनमाने ढंग से उपयोग करने की तैयारी है। मैं कई बार लिख चुका हूं कि विदेशी नागरिकों या अपात्रों की पहचान करना चुनाव आयोग का काम नहीं है और चुनाव आयोग ऐसा नहीं कर सकता है। यह विज्ञापन यही कह रहा है कि दस्तावेजों के बिना भी आवेदन किया जा सकता है लेकिन स्पष्टीकरण यही कहता है कि दस्तावेज देने होंगे पर यह नहीं कहा गया है कि दस्तावेज के बिना नामांकन नहीं होगा। इस तरह, बिना दस्तावेज आवेदन को खारिज करने के लिए चुनाव आयोग को कारण बताना होगा और नियमों व रिवाज के अनुसार कारण यह नहीं हो सकता है कि दस्तावेज नहीं थे। इसलिये पूरा मामला बड़ी चतुराई से मीडिया के बड़े वर्ग की मिली भगत से हैंडल किया जा रहा है और एक स्पष्ट विज्ञापन से भ्रम फैलने की बात कहकर भ्रम फैलाने वाले बयान का प्रचार करके सरकार जो चाहती है वही किया जाता दिख रहा है।

विज्ञापन में महत्वपूर्ण तारीख के तहत दी गई सूचनाओं के अनुसार, गणना प्रपत्र भरने या आवेदन करने की अंतिम तिथि 26 जुलाई है। मतदाता सूची का प्रारूप एक अगस्त को प्रकाशित होगा और दावा व आपत्ति करने की अवधि एक अगस्त से एक सितंबर होगी। अंतिम मतदाता सूची 30 सितंबर को प्रकाशित होगी। स्पष्ट है कि बिना दसतावेज आवेदन भरने के बाद अगर किसी का नाम प्रारुप में न हो तो वह आपत्ति कर सकता है और आयोग को कारण बताना होगा। दूसरी ओर, अगर किसी को किसी नाम पर आपत्ति हो तो वह भी बताना होगा और जाहिर है आपत्ति का सबूत देकर नाम हटवाया जा सकता है। इस तरह, जाहिर है कि चुनाव आयोग ने भले दस्तावेज मांगे हैं और स्पष्टीकरण भी दिया है, फैले भ्रम को भी दूर किया है पर प्रक्रिया वही है जो पहले से चली आ रही है। चुनाव आयोग सरकार के कहने पर चाहे जो कुछ करे उसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है और भले किसी राज्य के सभी चुनाव रद्द न हुए हों पर मनमानी की छूट भी नहीं है और ना उसका उपयोग किया जाता लग रहा है। अखबारों का काम था कि वे इसे स्पष्ट करते लेकिन वे आयोग अघोषित तथा भाजपा की जरूरत के अनुसार रिपोर्टिंग करते लग रहे हैं।

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